Monday, October 31, 2022

कॉमरेड सुधाविन्दु मित्रा

इतना भुलक्कड़ हूँ! अब मुझे यह भी याद नहीं कि किसकी शादी में मैं हाजीपुर गया था। बेशक सुधाविन्दु मित्रा के ही परिवार का था वह आयोजन। निमंत्रण भी मुझे सुधांशुजी से ही मिला था। सिर्फ इतना याद है कि मेरे जैसा, रोज की नौकरी और युनियनबाजी के बाद शाम को या रविवार को कहीं जाने-आने से जी चुरानेवाला आदमी भी तत्काल दिल में ठान लिया था कि ‘जाना है’ – ‘जाना ही है, कॉमरेड सुधाविन्दु मित्रा बीमार हैं, उनसे मिलना है’। 

शायद सुधांशुजी ही मुझे विवाहस्थल के करीब उस कमरे तक ले गये थे जहाँ बिस्तर पर कॉमरेड लेटी हुई थीं। थोड़ी देर हम बातचीत करते रहे। बीमार हालत में भी वह लगातार बात करती रही, कामकाज के बारे में तरह तरह का सवाल पूछती रहीं … और मैं बात करते हुये भी लगातार डरता रहा कि शायद डाक्टर ने ज्यादा बात करने से मना कर रखा हो! इसी कारण से मैं अनिच्छा के बावजूद उनसे विदा लेकर विवाहस्थल पर वापस चला आया। 

ऐडवा का अखिल भारतीय सम्मेलन बोधगया में हुआ। बतौर वॉलन्टियर मैं वहाँ मौजूद था। सुधाजी अस्वस्थता के बावजूद सम्मेलन में भाग ले रही थीं। पुरानी तस्वीरें कहाँ छूट गई थीं! वह गर्दनीबाग स्थित कोऑपरेटिव हॉल में मुझे कॉमरेड किशोर ले गये थे कि ‘दादा, महिलाओं का सम्मेलन है; आपको थोड़ा फोटो खींच देना है’! वहीं मैंने पहलीबार कॉमरेड (कैप्टेन) लक्ष्मी सहगल को देखा था, उनकी तस्वीर भी ली थी! … तब से शुरु हुआ था मेरा ऐडवा के कार्यक्रमों में एवं साथियों के बीच आनाजाना! … लेकिन अब, अपने डिजिटल संग्रह के लिये मुझे औरों के साथ साथ सुधाजी की तस्वीर लेने का मौका मिल गया। बाहर झंडोत्तोलन के समय कुर्सी पर बैठी हुई और फिर अन्दर में कॉमरेड सुभाषिणी अली से लिपटी हुई।

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हम इसी समाज में जीते हैं तो इसकी बीमारियाँ भी साथ लिये चलते हैं। कभी पार्टी के ही बड़े नेता को अधिक श्रद्धा जताने के लिये बोल देते हैं, ‘कॉमरेड सरजी!’ सेल्फी खींचने के लिये लालायित रहने पर भी सबको बेहिचक बोल नहीं पाते हैं, ‘दादा, एगो फोटो खींचवाना चाहते थे आपके साथ!’ सारे नेता भी एक जैसी आत्मीयता नहीं बिखेर पाते हैं। बड़े नेताओं एवं आम कार्यकर्त्ताओं के बीच एक दूरी बनती जाती है हमारे (हम यानी कार्यकर्त्ता भी और नेता भी)। इस प्रवृत्ति को सीपीआई(एम) नोट भी करती है एवं इसे दूर करने का उपाय भी बताती है। उस पर चर्चा करना प्रसंगांतर होगा। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि उपर कही गई इस समाज की बीमारियाँ, प्रवृत्तियाँ एक तरफ और कुछ कुछ नेताओं की सहजात आत्मीयता एक तरफ। उन पर कोई दूसरा रंग चढ़ ही नहीं पाता है। कॉमरेड सुधाविन्दु मित्रा उसी धारा की नेता थीं। किसी की दादी, नानी, किसी की माँ, मौसी, फुआ किसी की दीदी या उनसे बड़े किसी की बहन और मजबूत मेहनती कदकाठी की एक कार्यकर्त्ता, एक मिठास भरी मुस्कान लिये साँवले सुन्दर चेहरेवाली अनुभवी कॉमरेड … इसके अलावा वह अलग से कुछ नेता-वेता टाइप की लगती ही नही थी। सभाओं में उन्हे ओजस्वी भाषण देने की जरूरत पड़ती होगी, लेकिन एक रंगरुट कॉमरेड को बस उनके मुस्कराहट भरे आत्मीय कुशल-विनिमय से ही सांगठनिक उर्जा का अमृतस्पर्श मिल जाता था। 

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कॉमरेड सुधाविन्दु मित्रा के बारे में संस्मरणों के इस संग्रह का प्रकाशन एक प्रशंसनीय उद्यम है। सिर्फ इसलिये नहीं कि यह सुधाजी के बारे में है। बल्कि इसलिये भी कि यह मूलत: स्थानीय है। हमारे लिये अफसोस की बात है कि औरों की बात तो दूर, हम आज तक न तो कॉमरेड अजीत सरकार की एक प्रामाणिक जीवनी (संस्मरण एवं क्रॉनोलॉजी समेत) प्रस्तुत कर पाये और न ही कॉमरेड रामनाथ की। ये दोनों श्रमजीवी जनता के आन्दोलन के शहीद हुये। 

हमें स्थानीय जीवनियों की सख्त जरूरत है। पार्टी के, जनसंगठन के नेताओं से अलग, स्थानीय जनता द्वारा याद रखे गये कोई स्थानीय शिक्षक रहे हों जो बच्चों को घर-घर से खींचकर ले आते रहे हों अपनी पाठशाला में, समाज-सुधारक रहे हों, सेवाभाव से काम करने वाले डाक्टर रहे हों, लेखक, कवि या कलाकार रहे हों … किसी न किसी तरीके से प्रेरणास्रोत रहे हों मानवीय मूल्यों के पक्षधर एक जीवन जीने के लिये, उन सबकी छोटी छोटी जीवनियाँ, संस्मरण स्थानीय प्रयासों के माध्यम से उपलब्ध होने चाहिये। तभी असली भारत उसकी जड़ों में दिखेगा।

कॉमरेड सुधाविन्दु मित्रा के बारे में संस्मरणों के इस संग्रह के प्रकाशन का प्रशंसनीय उद्यम लेने वालों को मेरा हार्दिक अभिनन्दन!




‘হিন্দিভাষী’ বিদ্যাসাগর

হিন্দিভাষাকে হাতিয়ার করে বর্তমান কেন্দ্রীয় সরকার এবং হিন্দুত্বের কর্পোরেট-ফ্যাসিবাদী শক্তিরা হিন্দি-হিন্দু-হিন্দুস্তানের মেকি জাতীয়তা চাপানর যে তান্ডব শুরু করেছে তার মুখোমুখি দাঁড়িয়ে ওপরের শীর্ষকটা দেখে অনেকেই রক্তচক্ষু হবেন। কিন্তু যেমন বলে থাকি, আমার মায়ের ভাষাও আমার এবং আমার ধাইমায়ের ভাষাও আমার। ওই ফ্যাসিবাদী হামলা থেকে বাংলা এবং অন্যান্য ভাষাকে বাঁচানোর লড়াইটা যেমন আমার, হিন্দিকেও (সেই হিন্দি যেটি উর্দুর সহোদরা হিন্দুস্তানি হয়ে ভারতবর্ষের স্বাধীনতা সংগ্রামকে ঐক্যবদ্ধ করেছিল, এবং যে ভাষা আজও উত্তরভারতের অনেক বড় অঞ্চলে গণতান্ত্রিক সংগ্রামের প্রধান ভাষা) বাঁচানোর লড়াইটা আমার।

ঈশ্বরচন্দ্র বিদ্যাসাগর যখন ১৮৪১ সালে ফোর্ট উইলিয়াম কলেজে সংস্কৃত বিভাগের প্রধান হিসেবে যোগ দিলেন তখন তিনি নিজের মাতৃভাষা বাংলা ছাড়া সংস্কৃত জানতেন। সে ভাষার বিদ্বানই ছিলেন, তাই তো একুশ বছর বয়সে বিভাগীয় প্রধান হলেন! কলেজের সেক্রেটারি জি. টি. মার্শাল তাঁর পান্ডিত্যে প্রভাবিত হয়ে তাঁকে ইংরেজি আর হিন্দিটাও শিখে নিতে বললেন। চট করে দুটোই শিখে নিলেন তিনি। সে সময় ফোর্ট উইলিয়ামে বাংলায় হিতোপদেশ পড়ানো হত। সে বইয়ের, বিদ্যাসাগর নিজেই বলছেন, রচনা অতি কদর্য্য [বেতালপঞ্চবিংশতির প্রথম সংস্করণের বিজ্ঞাপন]। হয়ত মার্শাল সাহেবও তাই ভাবতেন। হতে পারে বিদ্যাসাগর তাঁকে বলেছিলেন। কিন্তু দুজনেই একমত হলেন যে আরেকটি বই থাকা উচিৎ ছাত্রদের পড়ানোর জন্য। তৎপরিবর্ত্তে পুস্তকান্তর প্রচলিত করা উচিৎ ও আবশ্যক বিবেচনা করিয়া, উক্ত বিদ্যালয়ের মহামতি শ্রীযুত মেজর জি. টি. মার্শল মহোদয় কোনও নূতন পুস্তক প্রস্তুত করিতে আদেশ দেন।[ওই] তখন বিদ্যাসাগর কী করেন? সদ্য শেখা হিন্দি ভাষায় লেখা বৈতালপচীসী নামের বইটা পড়ে, ১৮৪৭ সালে বাংলায় লেখেন বেতালপঞ্চবিংশতি তদনুসারে আমি, বৈতালপচীসী নামক প্রসিদ্ধ হিন্দী পুস্তক অবলম্বন করিয়া, এই গ্রন্থ লিখিয়াছিলাম।[ওই] কেন হিন্দী পুস্তক? তার উত্তর দিয়েছেন তিনি ১৮৫২ সালে তাঁর সম্পাদনায় প্রকাশিত হিন্দী বৈতালপচীসীর ইংরেজি মুখবন্ধে : The Original of these tales is to be found in the Katha Sarit Sagara, an ancient and voluminous Collection of Tales ans Legends in Sanskrit verse, by Somadeva Bhatta, under the title of Betalapanchavinshatika. There exists also under the same title, a Sanskrit prose version. 

In the reign of Muhammad Shaha, Surat Kabishwar, by order of Raja Jye Singh, translated the work from Sanskrit into Braj Bhakha. This version was translated, by direction of Dr. Gilchrist, in the time of Marquis Wellesley, into Hindoostanee by Muzhar Ali Khan, whose poetical name was Vila, aided by Lallu Lal Kab, the elegant writer of Premsagar, both Moonshees of the College of Fort William. This translation …… was printed in 1805 ……

A Bengalee version of this translation was made, by the Editor of the present edition, in the year 1947, by directions of Major G. T. Marshall …” 


যদিও বইটার অনুবাদের ইতিহাসে পরবর্ত্তীকালে হিন্দীসাহিত্যের সুবিখ্যাত বিদ্বান রামবিলাস শর্মা নিজের ভারতেন্দু যুগ বইটিতে একটি সংশোধন আনেন। উনি বলেন যে সুরাট কবিশ্বর নিজেই বইটা হিন্দীতে অনুবাদ করেছিলেন এবং তা থেকে উদ্ধৃতি দিয়ে দেখান যে কথিত ভাবে লাল্লু লালের যে অনুবাদ, সেটা ওই অনুবাদেরই ফেরবদল। সে যাই হোক, ওটা প্রসঙ্গান্তর। মোদ্দা কথা হল, বেতালপঞ্চবিংশতি রচনা করার সময় তিনি হিন্দি বা হিন্দুস্তানি নিছক একটি ভাষা হিসেবেই জানতেন না, জানতেন জনতার সাহিত্যবোধের বিকাশের বাহক রূপে যেমন বাংলা তেমনই হিন্দি। ভাষার ইতিহাস ভুগোল দুইই তাঁর গোচরে ছিল। তাই সংস্কৃত কথাসরিৎসাগর সামনে থাকা সত্ত্বেও ওই কলেজেরই শিক্ষক লাল্লু লালের হিন্দি বইটা তুলে নিলেন। এবং হিন্দি যে তিনি কতটা গভীরভাবে জানেন তার প্রমাণ দিলেন পাঁচ বছর পর, সেই হিন্দি বইটার নতুন সংস্করণের সম্পাদনা করে। এবং সে সম্পাদনায় তিনি হিন্দি বইটারও দুটো সংস্করণের তুলনামূলক অধ্যয়ন করলেন, In bringing outh the edition now presented to the public, the Original text of 1805 and the Agra Edition of 1843, have been carefully collated.


করুণাসাগর বিদ্যাসাগর গ্রন্থে লেখক ইন্দ্রমিত্র একটি প্রসঙ্গের উল্লেখ করেছেন। 

একদিন একজন হিন্দুস্থানী পন্ডিত বিদ্যাসাগরের সঙ্গে দেখা করতে এসেছেন। হিন্দুস্থানী পন্ডিতজী সংস্কৃতে কথা বলতে লাগলেন। আর বিদ্যাসাগর সব কথার জবাব দিতে থাকলেন হিন্দীতে। 

ভুল সংস্কৃত বলছেন কিন্তু পন্ডিতজী। পাশেই বসে ছিলেন কৃষ্ণকমল ভট্টাচার্য। পন্ডিতজীর সঙ্গে কথা কইতে-কইতে একফাঁকে বিদ্যাসাগর কৃষ্ণকমলকে বললেন এদিকে কথায়-কথায় কোষ্ঠশুদ্ধি হচ্ছে, তবুও হিন্দী বলা হবে না।[করুণাসাগর বিদ্যাসাগর, পৃ ৩৮২; প্রমাণপঞ্জীতে সূত্র দেওয়া আছে বিপিনবিহারী গুপ্ত, পুরাতন প্রসঙ্গ, প্রথম পর্যায়, (কলকাতা, ১৩২০), পৃ ৪৯]  


ভারতেন্দু হরিশচন্দ্রকে আধুনিক হিন্দী সাহিত্যের পিতামহ বলা হয়। তিনি কলকাতায় আসতেন, এবং সেসময়কার কলকাতার অনেক নবজাগরণী ব্যক্তিত্বের সাথেই তাঁর সম্পর্ক ছিল। সুবল চন্দ্র মিত্র বিদ্যাসাগরের যে ইংরেজী জীবনী লিখেছেন তার অধ্যায় ৩১শে এশিয়াটিক সোসাইটির ঘটনাটার বর্ণনা রয়েছে কিভাবে চটিজুতো পরে থাকার জন্য বিদ্যাসাগরকে ঢুকতে দেওয়া হয় নি। পরে ক্ষমা-টমা চাওয়া, বিদ্যাসাগরের সেই এশিয়াটিক সোসাইটিরই তত্ত্বাবধানে গ্রন্থসম্পাদনা ভার নিতে রাজি হওয়া সেসব অন্য প্রসঙ্গ। কিন্তু বর্ণনায় উল্লেখ রয়েছে যে বিদ্যাসাগরের সঙ্গে ছিলেন ভারতেন্দু হরিশচন্দ্র। তরুণ হরিশচন্দ্র কলকাতায় এলেই সব নতুন চিন্তাভাবনা করা মানুষদের সান্নিধ্য পেতে চাইতেন। বিদ্যাসাগরের সান্নিধ্য বিশেষভাবে চাইতেন। আর উনিশ শতকের সত্তরের দশকে বিদ্যাসাগরও বার বার বেনারস যাচ্ছিলেন বাবাকে দেখতে এবং আনুসঙ্গিক নানা কাজকর্ম সারতে। তখনও ভারতেন্দুর সাথে দেখা হত। ভারতেন্দুর পিতার বড় সংগ্রহ ছিল সংস্কৃত পূঁথির। সেসব ঘেঁটে দেখার এবং প্রয়োজনে ব্যবহার করার অবাধ অধিকার ছিল বিদ্যাসাগরের। বিধবা বিবাহ প্রবর্তনে বিদ্যাসাগরের ভূমিকার কথা মুখে মুখে ছড়িয়ে পড়েছিল সারা ভারতবর্ষে। হরিশচন্দ্র যখন আমির খুসরু প্রবর্তিত একটি বিশেষ ছন্দ ও বয়ানের রীতি প্রয়োগ করে নতুন কিছু বলার চেষ্টা করছিলেন তখন লিখলেন

সুন্দর বাণী কহি সমুঝাবৈ।

    বিধবাগন সোঁ নেহ বঢ়াবৈ।

দয়ানিধান পরম গুণ-আগর। 

    সখি সজ্জন, নহিঁ বিদ্যাসাগর।। 


এ প্রসঙ্গের অবতারণা এজন্য করলাম না যে বিদ্যাসাগর হরিশ্চন্দ্রের সাথে হিন্দীতে কথা বলতেন। না, তার প্রয়োজন একেবারেই হত না হয়ত কেন না হরিশচন্দ্র খুবই ভালো বাংলা জানতেন। 

কিন্তু বিদ্যাসাগরের হিন্দী জ্ঞানের প্রয়োজন যে হরিশচন্দ্রের পড়ত তার একটা প্রমাণ আছে অন্য জায়গায়। হরিশ্চন্দ্র সারা জীবনে অনেক পত্র-পত্রিকা প্রকাশ করেন। একটি পত্রিকার নাম ছিল হরিশ্চন্দ্র ম্যাগাজিন যেটির নাম ১৮৭৪এর জুন মাস থেকে হয় হরিশ্চন্দ্র চন্দ্রিকা। বাবু শিবনন্দন সহায় রচিত এবং উত্তরপ্রদেশ সরকারের অধীন হিন্দী সমিতি কর্তৃক ১৯৭৫ সালে প্রকাশিত (১৯০৫ সালে প্রকাশিত গ্রন্থের পুনঃপ্রকাশ) ভারতেন্দু হরিশ্চন্দ্রের একটি জীবনী লিখছে যে হরিশ্চন্দ্র চন্দ্রিকাসহায়ক সম্পাদক (contributors) ছিলেন শ্রী বাবু ঐশ্বর্যনারায়ণ সিং, শ্রী পন্ডিত ঈশ্বরচন্দ্র বিদ্যাসাগর …” এবং অন্যান্যরা।      

শেষমেশ। 

আজকাল হিন্দী-আধিপত্যবাদীদের আক্রমণে নাজেহাল অনেককেই বলতে দেখি যে আমরা দেবনাগরী লিপিতে সংস্কৃত কেন লিখব (বা কেন সইব)। আগে তো বাংলা লিপিতে সংস্কৃত লেখার পরম্পরা ছিল। একশোবার লিখুন। তবে বিদ্যাসাগর যে দেবনাগরীতে লিপিতে সংস্কৃত দিব্যি শুধু পড়তেনই না, ভাবধারাগত লড়াইয়ের বৃহত্তর প্রেক্ষাপটে তার প্রয়োজনটাও ভালো মত বুঝতেন তার প্রমাণ আমরা পাই যখন মাধবাচার্য বিরচিতসর্বদর্শনসংগ্রহ সম্পাদনার কাজ হাতে নেন। উনি বুঝছিলেন বইটার প্রয়োজনীয়তা। ভারতীয় দর্শন নিয়ে তখন অব্দি আবিষ্কৃত প্রথম আকর-গ্রন্থ। বিদ্যাসাগরের সম্পাদনায় প্রকাশিত হওয়ার পর যে গ্রন্থ পড়ে সব কজন ভারতবিদ চার্বাক দর্শনের একটা ঝলক দেখতে পেয়েছেন এবং সবিস্ময়ে পেয়েছেন যে যে ভারতের ভাববাদ নিয়ে এত সাতকাহন, তার ষড়দর্শনের সাড়েতিনখানাই তো নিরীশ্বরবাদী। আর চার্বাকের তো কথাই নেই। সবার চক্ষুশূল, (হয়ত সত্যিই পুড়িয়ে মারা হয়েছিল) চাঁচাছোলা বস্তুবাদী! 

মুখবন্ধে লিখছেন, কলকাতায় পাওয়া দুটো পূঁথিতে বড় বেশি রকমের প্রভেদ দেখতে পেয়ে বেনারস চলে গেলেন। সেখানে পাওয়া পূঁথিটা মনঃপূত হল। কোত্থেকে উদ্ধার করলেন লেখেন নি বেনারসের সংস্কৃত কলেজ থেকে, ভারতেন্দুর বাবার সংগ্রহ থেকে না অন্য কোনো পন্ডিতের কাছ থেকে। কিন্তু সম্পাদিত সংস্করণ তৈরি করলেন দেবনাগরী লিপিতে জানতেন বলে শুধু নয়, একটি বহুল-প্রচারিত লিপিতে ভারতের পরবর্তী প্রজন্মের হাতে ভাবধারাগত যুদ্ধের অস্ত্র যোগানোর ছিল।  


৩১.১০.২২




Friday, October 28, 2022

প্রদর্শনী

পার্টি অফিসে ঢুকতেই বীরু দেখল শঙ্করদা পান খেতে বেরুচ্ছেন; মুখ ঘুরিয়ে সুবোধজিকে জিজ্ঞেস করলেন, আপনার জন্য আনব? পানের অভ্যেসটা শঙ্করদার আগে ছিল না। এখন সারাদিন অফিসের কাজে বন্দি থাকতে থাকতে হাওয়া লেগেছে। এই বয়সে বিড়ি, সিগরেট বা খৈনির অভ্যাস করা ওনার পক্ষে মুস্কিল, কিন্তু কিছু একটা মুখে দরকার। তাই পান। আর পান মানে একটু ভালো পান, মগহি পাতা, বাবাজর্দা, ভেজা সুপুরি
  • ডেকেছিলেন?

  • হ্যাঁ। ল্যান্ড স্ট্রাগলের মার্টিয়ার্সদের নিয়ে একটা প্রদর্শনী তৈরি করুন না! 

  • আমি? কিভাবে?

  • ভাবুন! তথ্যগুলো যোগাড় করুন, কোথায় কোথায় লড়াই হয়েছিল, কারা শহীদ হল, খুঁজে বার করতে হবে তো! অফিসে জেলার ফাইলগুলোতে দেখুন কী পাওয়া যায়। 

বলে বেরিয়ে গেলেন। বীরু ধপ করে তোবড়ানো সোফাটায় বসে পড়ল।

সামনে শ্রমিকদের সর্বভারতীয় সম্মেলন, সে নিজেও অভ্যর্থনা কমিটির সদস্য। আর শঙ্করদাকে তাকে বলছেন মানে কিছু বুঝেই বলছেন, কিন্তু সে-ই নিজেকে বুঝে উঠতে পারছে না। না বলে বেরিয়ে যাওয়া ওর ধাতেও নেই আর এধরণের কাজে অনিচ্ছেও নেই। কিন্তু, দুএকটা পোস্টার মাঝে মধ্যে আঁকলেও সে শিল্পী নয়, শিল্প ভালো লাগা, শিল্প নিয়ে পড়াশোনা করা আলাদা কথা। আর, আঁকবেই বা কী? লিখবেই বা কী? হাতে কয়েকদিন মাত্র সময়। শহীদদের ছবি, আন্দোলনের ছবি আর রিপোর্ট-টিপোর্ট যোগাড় করা থাকলে না হয় ভাবা যেত। অভ্যর্থনা কমিটি টাকা মঞ্জুর করলে বরং চলে যেত শিবা আর্টসের অর্জুনবাবুর কাছে; ব্যানার, সাইনবোর্ড তৈরি করেন কিন্তু কমার্সিয়াল আর্টের জগতে আছেন তো। বাজারে আছেন। নিজে না করলেও তৈরি করিয়ে দিতে পারতেন পঁচিশ-ছাব্বিশটা পোস্টার। টিনের ফ্রেম করা বোর্ড তো করান যাবে না, অনেক পয়সার ব্যাপার।

এটা সে সময়কার কথা যখন শহরের বাজারে ফ্লেক্স, ভিনাইল ইত্যাদি আসেনি, কম্পিউটারও আসেনি। বাবরি মসজিদ ভেঙেছে দুবছর হল, কিন্তু সারা ভারতে তার প্রভাব অন্ততঃ বীরুদের রোজকার জীবনে খুব বেশী পড়েনি। মন্ডল বনাম কমন্ডলকে কাটাকুটি মনে করছে অনেকেই। ঐক্য ধরে রাখার একটা চ্যালেঞ্জ এলেও তার মুখোমুখি হতে সাহায্য করছে নতুন অর্থনীতির আক্রমণ। রাজ্য সরকারও মন্ডলের দিকে আর নতুন অর্থনীতির বিরুদ্ধেই একরকম। ওই তো সেদিনই লালুজি মৌর্য হোটেলের ঘ্যাম আলোচনাচক্রে সবাইকে ধুয়ে রেখে দিলেন। পাটনা এখন শ্রমিক কর্মচারীদের বড় বড় সম্মেলনের ফেভারিট ডেস্টিনেশন।


বীরু গিয়ে দাঁড়াল চন্দ্রপ্রকাশজির পাশে, কিছু আছে, জেলাগুলোর ফাইলে? ভূমি সংঘর্ষের রিপোর্ট-টিপোর্ট? কোন জেলায় কত বিঘা জমির লড়াই, কোথায় কোথায় কী কী সাফল্য এসেছে কতটা বাসগীতের জমি আর কতটা চাষের জমি কব্জা করা গেছে হামলার ঘটনাগুলো, জমিদারের লোক না পুলিস শহীদদের নাম…”

চন্দ্রপ্রকাশজি টাইপ করছিলেন। রেমিংটনের হিন্দি টাইপরাইটার। রোলারে সাতটা পাতলা কাগজ আর প্রত্যেকটির পর (শেষটা ছাড়া) কোরেসের পাতলা ব্ল্যাক কার্বন শিট। তখন একবারে বেশী সংখ্যায় চিঠি বার করতে হলে এ কাগজ আর এ কার্বনগুলোই ব্যবহার করতে হত। নীল কার্বনগুলো বেশী ব্যবহার করা গেলেও একটু মোটা বলে নেওয়া হত না। বীরু তো নিজের কাজের জায়গায় বরুণদার কাছ থেকে শিখেছিল চার সাত্‌তে আঠাশ। ছোট ছোট করে মিটিংএর নোটিশ। সাত কপিতে চার বার টাইপ করে স্কেল রেখে ছিঁড়ে নাও। সদ্য সদ্য দুএকটা জেরক্সের ফটোকপিয়ার এসেছে বাজারে। কালো দানাগুলো ঝাড়তে হয়। কাগজ শুকনো রাখতে ট্রেতে বাল্ব জ্বালিয়ে রাখতে হয়। এক একটা কাগজ ফ্রেমে খাড়া করে লাগাতে হয়। কী দরকার? সে তো বড় অফিসে ইলেকট্রনিক টাইপরাইটার, ডটম্যাট্রিক্সের প্রিন্টারও আসছে! আর আমাদের বড় ভরসা গেস্টেটনারের ডুপ্লিকেটিং মেশিন তো আছেই। এখানেও আছে, সংগঠনের দপ্তরেও একটা কেনা হয়েছে সেকেন্ড হ্যান্ড সব কটা ইউনিটের কাজ ওতেই চলে। 

তবে, নিজের আয়ত্তে যেটুকু, সেটুকুর জন্য কোথাও যাওয়ার দরকার পড়ে না। আর বীরু বিশ্বাস করে গরীব ফোর্থ গ্রেড কর্মচারি, চাপরাশি, সুইপারদের দিকে নজর দিতে হবে। ওদের কাছে টানতে গেলে ইংরেজি চলবে না। অথচ বীরু হিন্দি টাইপ জানে না। তাই চন্দ্রপ্রকাশজি ব্যস্ত থাকলে বীরু নিজেই একটা পরিষ্কার সাদা কাগজে গোটা গোটা হিন্দি অক্ষরে তিনবার নোটিশ লেখে আর ফটোকপিয়ারের দোকানে গিয়ে ফটোকপি করিয়ে, ছিঁড়ে আলাদা আলাদা করে নেয়।  

চন্দ্রপ্রকাশজি চোখ তুলে হাসলেন। ওই তো জেলার ফাইল, সার দিয়ে রাখা। নিজেই খুঁজে নিন! যদি কিছু পান! 

বুঝে যায় বীরু। তবু খোঁজে। ভোঁ ভাঁ! কিচ্ছু নেই। কেননা সামনে পার্টির সম্মেলনও নেই। কিসানসভার ফাইলে কিছু পাওয়া যাবে?

  • ওই তো। নিচেই তো অফিস। গিয়ে দেখে নিন। 

সেখানেও কিছু নেই। সম্মেলন যখন হবে তখন হয়ত কিছু আসবে। কিন্তু প্রদর্শনী তো করতে হবে সাত দিনের মধ্যে! ধূর ! নেতাদের সাথে কথা বললে হয়ত কিছু পাওয়া যেত। কিন্তু রেগে মেগে বাড়ি চলে গেল বীরু। ওসব আনডকুমেন্টেড গল্প নিয়ে একজিবিশন করা যায় না। 


ব্যাপারটা যখন বিধানসভায় উঠেছিল সে সময়কার ঘটনাগুলোর মোটামুটি রেকর্ড আছে বীরুর কাছে। মুখ্যমন্ত্রী প্রদেশের ২৯জন বড় জমিদারের নামের লিস্ট রেখেছিলেন বিধানসভায়। বামদলগুলো তার বিরুদ্ধে তা থেকে বড় লিস্ট রেখেছিল। সে সবের পেপার কাটিং আছে। এদিককার পার্টি সার্কুলারে জেলাগুলোয় চলা জমির লড়াইয়ের উল্লেখ রয়েছে। শহীদদের নামও আছে, যা জানা গেছে। কিন্তু ছবি? ছবি ছাড়া, শুধু লেখা আর ডিজাইন দিয়ে প্রদর্শনী? হতেই পারে। বীরু নিজের টেবিলে বসে ভাবছিল। আজ রোববার। আজকেই ভাবতে হবে। কাল থেকে আর ভাবার সময় পাবে না। 

আবার সময়ের কথা বলতে হয়। কেননা তখনও, দেশের সবার একটা ছবি থাকাও জরুরি হয়ে ওঠেনি।  ১৯৯৩ সালে ভারতের একমাত্র যাকে নির্বাচন কমিশনার বলা যায় সেই টি.এন.শেষন সাহেব সিদ্ধান্ত নিলেন সবার ছবিসুদ্ধু ভোটার কার্ড থাকতে হবে। আর এখন ১৯৯৪ সাল। কাজেই জেলা থেকে শহীদদের কোনো ছবি এসে কখনো পৌঁছবে রাজ্য অফিসে এরকম ভাবা বোকামি। শহরের মানুষও নয়। গ্রামের চাষি। কলেজে পড়ে হবে, আইকার্ডের জন্য ছবি তুলিয়ে হবে, সেরকম ভাবাও বোকামি। আগে সবার ছবি থাকত নাকি? হ্যাঁ, গ্রামে গেলে, মা-বাবা, আত্মীয়স্বজন বা বন্ধুবান্ধবদের সাথে কথা বললে মানুষটার একটা আদল, একটা চেহারা ফুটে উঠবে, তেমন শিল্পী বা প্রফেশনাল পুলিস শিল্পী হলে এঁকে নেবে। আর পুলিসের কথা যখন উঠলই, তাদের রেকর্ডে তো লাশের ছবি থাকবেই গুলিচালনা বা হত্যার ঘটনা তো! কিন্তু এসব ভেবে লাভ? 

ফোনটা বেজে উঠল। শঙ্করদা। কী হল, ভাবলেন কিছু?

  • ও হবে না। কিছুই তো নেই অফিসে, জেলার ফাইলে নেই, নিচে কিসানসভার অফিসে নেই। এই শুধু দুটো পার্টি সার্কুলার আর খবরের কাগজের কাটিং।

  • আচ্ছা, আচ্ছা, (ফোন থেকে মুখ ঘুরিয়ে) কী কশ্যপজি, আজ আসতে বলব? কাল? বিকেলে? ঠিক আছে। (ফোনে মুখ এনে) কাল বিকেলে আসুন, কশ্যপজি কিছুটা সাহায্য করে দেবেন। 

যাক এতক্ষণে একজন ভরসা করার মত লোকের নাম বললেন শঙ্করদা। এখন আর ভেবে লাভ নেই। বরং কবিতার মকশো করা যাক ডাইরিতে। সাধারণত ও পুরোনো ডাইরিগুলোই ব্যবহার করে। তাই আগে তারিখ লেখে; সালটা শুরু করার দিন শুধু লেখে। 

দু-দশ বছরে হঠাত কিছু পাল্টে যাবে না মানুষের মুখ।

লাল জামার নিচে রুদ্রাক্ষের মালা যাদের রাখার তারা রাখবে।

আমরা সত্ত্বায় ভাঙচুর চালাব সাথী ও সহচরদের 

                    আন্দোলন গড়ে নিরন্তর,

ফসল বোনার ও তোলার মাস বাদ দিয়ে …’


একটা নাম লিখল ওপরে, মুক্তির দৃষ্টিধ্যুৎ, কবিতা হারিয়ে ফেলছি ক্রমাগত। আবার একটা নাম লিখল, নালা রোড


এই পথ দিয়ে আমাদের

সৃজনের তটের ভেজা বালিতে পা ডুবিয়ে এগোনো

শুরু হত; পায়ে ফুটত ভাঙা শঙ্খ।

ঝুঁকে কুড়িয়ে ছুঁড়ে মারতাম সময়ের নিস্তরঙ্গে ছপ

কলিমের বাপের দোকানে এক একটা সিগরেট ধরাতাম।

আসবাবের দোকানগুলো ঝলমলে হয়ে উঠল কত তাড়াতাড়ি!

প্রফেসর্স লেনে আর কবিতার আসর নেই

            ভেনেস্তার ফুল এবারেও প্রচুর ফুটেছে দোতলায়।

ইতিমধ্যে অনেক শোকসভা আমরা সুষ্ঠুভাবে সম্পন্ন করেছি।  


মেয়ে চলে এসেছে টেবিলের কাছে। বাইরেও শব্দ পাচ্ছে, ছেলেকে নিয়ে বৌয়ের ঢোকার সময় হয়ে গেছে। ডাইরি বন্ধ করে উঠে পড়ল বীরু।


পরের দিন বিকেলে গেল পার্টি অফিসে। কশ্যপজি নীরবের তার জন্যই একটা নোটবুকে তথ্য লিখে চলেছিলেন। আলতো করে হেসে বললেন, বসুন! দেখুন তো এটা! আপনার কোনো কাজে আসে কিনা? বলে কোনো ওষুধ কোম্পানির নাম লেখা দুটো ছোট্টো নোটপ্যাড এগিয়ে দিলেন। বীরু ওপরে চোখ বোলাল। বেরিঙ্গার ম্যানহেইম। ক্যালাপ্টিন ১২০ এসআর। এমআর কমরেডদের কাছ থেকে ও নিজেও মাঝে মধ্যে যোগাড় করে, কখনো কোনো সুদৃশ্য নোটপ্যাড দেখতে পেলে। তবে বিশেষ পছন্দ করে না। যেমন এটাও ওর পছন্দ হল না। চওড়ায় বেশি, পকেটে আঁটবে না। অথচ বইয়ের আকারেও নয়। ওর ভালো লাগে পকেটে রাখার মত পাতলা ছোট্টো নোটবুক যা সিগরেটের প্যাকেটের পাশাপাশি থাকতে পারে। আর সুন্দর এক পৃষ্ঠায় এক তারিখ দেওয়া বই সাইজের ডাইরি। আগে প্রতি বছর ইগলের ডাইরি কিনত। এখন পুরোনো হলেও চলে, বরং পছন্দ করে। তাহলে পাতা নষ্ট হয় না। যখন লেখে, পাতায় নিজের তারিখ দিয়ে নেয়। দুএকবার তো তারিখ ছাড়া মোটা রুলটানা নোটবুক কিনেছিল। তার পর মনে হল এটাও অপচয়, ডাইরি তো পেয়েই যায় মাঝে মধ্যে।

নোটপ্যাডটার প্রথম পাতা ওল্টাল। প্রথমে হিন্দিতে। দ্বারভাঙা। রামশরণ চৌপাল কমা ৫৫ কমা হরিজন কমা খেত মজদুর। দ্বিতীয় লাইনে হিন্দিতে লেখা ভবানিপুর, প্রখন্ড সিহওয়ারা। তারপর ইংরেজিতে। সিলিংএর বেশি জমি, ৬০ একর, ২৫০টি পরিবার লাভবান হবে এক বছরে দশ হাজার মানুষকে মোবিলাইজ করা গিয়েছে সংঘাত হয় ৩০শে মে, ৯৩ জনসভায় বোমা ফেলে ওরা একজন ছাত্র আহত হয় ছয় ঘন্টা লড়াই চলে শত্রু

  • কোথায় এগোয়?

কশ্যপজি দেখে গ্রামের নামটা বলেন। 

যুবসংগঠনের জেলা সচিব এর ওপরও বোমা ছোঁড়া হয়। ২.৬.৯৩ তারিখে কমরেড চৌপাল যখন সন্ধ্যে আটটা নাগাদ নিজের কুঁড়েঘরের সামনে অন্যান্য কমরেডদের সাথে আলোচনা সারছিলেন তখন তাঁর ওপর বোমা চার্জ করা হয়, তিনি মারা যান। শেষ লাইন লেখা আছে, ২৪শে ফেব্রুয়ারি ৯৩ তারিখে সাইকেলের দোকানের সামনে তার ছেলেকে পিছন থেকে ছোরা মারা হয়েছিল; জমি আমাদের কব্জায় আছে। 

এভাবেই একের পর এক পৃষ্ঠা। 

বীরুর ভিতরে একটা ছবি জেগে উঠছিল। 

  • এটা নিয়ে যান। এরপর আরো যদি খবর পাই, আপনাকে জানিয়ে দেব।

পিছনের ঘরটা থেকে একটা নীল লুঙ্গি আর স্যান্ডো গেঞ্জি গায়ে বেরিয়ে এসেছিলেন চন্দ্রপ্রকাশজি, আগেও তো লড়াই হয়েছে ওই জেলায়, শহীদ হয়েছে পার্টির কমরেডরা …”

কশ্যপজি ভুরু কুঁচকে তার দিকে তাকালেন, এ কথাটার মানে কী? আগে হয়েছে পরেও হবে! যে অভিযানটা হল ১৯৯৩ সালে সেটারই খতিয়ান দিতে হবে তো? নাকি ? (বীরুর দিকে তাকিয়ে) আপনি নিয়ে যান কমরেড। কাজ শুরু করুন, আমি দেখছি (বলে আরেকটা ঠিক ওই একই রকম নোটপ্যাড ড্রয়ার থেকে বার করে নাচিয়ে হাসলেন)।


সিঁড়ি বেয়ে নিচে নামতে নামতে বীরুর মনে হচ্ছিল ব্যাগে একটা বিরাট সম্পদ নিয়ে নামছে। যেন তার ওজনটা কাঁধে চাপ দিচ্ছে। যে ঘটনাগুলোর সংক্ষিপ্ত সূত্র ওই নোটপ্যাডের প্রতিটি পৃষ্ঠায় লেখা, তার প্রতিটির শীর্ষে, কাঁধে লালঝান্ডা নিয়ে এগিয়ে যাওয়া এক একজন ক্ষেত মজুর বা প্রান্তিক চাষির নাম, বয়স, ঠিকানা। আর শেষে তার মৃত্যুর খবর, হয় জমিদারের গুন্ডাদের আক্রমণে নয় তো, (এখনো দেখেনি ঠিক) পুলিসের আক্রমণে। ছত্রিশজন। বার বার ভাষণে শুনে সংখ্যাটা মনে আছে। নোটপ্যাডটা অবশ্য পাতলা। হয়ত পরের নোটপ্যাডে বাকি বৃত্তান্তগুলো থাকবে। 

পুলিসের আক্রমণে মৃত্যু আছে? দেখতে হবে। কেননা মুখ্যমন্ত্রী নাকি বিধানসভায় বলেছিলেন পুলিস শুধু আইনশৃংখলা দেখবে, জমিদারদের স্বার্থরক্ষায় এগোবে না। 

তবে সবচেয়ে আগে মুখ। 

মাড়োয়ারি কলোনির রাস্তাটা দিয়ে হাঁটতে হাঁটতে, কাঁধে ছত্রিশটা মৃত্যুর ভার বলে কিছু হয় নাকি ভাবতে চাইছিল বীরু। 


দুদিন ছুটি নিল। অফিসে গিয়ে কাজ করে তারপর রাত্রে নাঃ, সে হবে না। এমনিতেও রাজ্যে মধ্যবিত্ত কর্মচারি সংগঠনগুলো নতুন অর্থনীতির ব্যাখ্যা করতে গিয়ে, তার বিপদ বোঝাতে গিয়ে বার বার কর্মসংস্কৃতির প্রশ্নের সম্মুখীন হচ্ছে। পিছিয়ে থাকা প্রদেশ। সামন্ততন্ত্র রয়েছে শহুরে মধ্যবিত্তের আচরণেও। বীরু ধীরে ধীরে নিজেকে বদলেছে। ফাঁকিবাজ নেতাগিরি তার কখনোই পছন্দ ছিল না। এখন নিজের কাজের জায়গায় নিজেকে চিহ্নিত করতে পেরেছে। অফিসের কাজের সময় শুধু অফিসেরই কাজ, কেউ বলুক আর না বলুক। ইউনিয়নের কাজ টিফিনে বা ছুটির পর। 

ঘরে ঢুকে পড়ার টেবিলের ওপর র‍্যাকটা হাতড়াল। সাদা চার্টপেপারের রোলটা পড়ে আছে। আগে ওগুলো শেষ হোক তারপর কিনে আনা যাবে। কিন্তু আদৌ ওতেই আঁকবে কি? কী আঁকবে, সেটা বুঝবে তবে তো!

সামনের বইগুলো হাতড়াল। ছোট ছোট প্রচারপুস্তিকাগুলোর মধ্যে কিসানসভারও বই রয়েছে কয়েকটা। দূর! কোথাও কোন কাজের ছবি নেই।

বসে একটা সিগরেট ধরাল। ধরা যাক রামশরণ চৌপাল, পঞ্চান্ন বছর। লম্বা রোগাটে মুখ? কদমছাঁট চুল? কাঁচাপাকা? শরীরটা রোগা, মাঝারি? 

নোটবইয়ের পাতা ওল্টাল। চোখে পড়ল, কিশনগঞ্জ। দিলীপ কিস্কু, ভূমিহীন আদিবাসী, বয়স আঠাশ। এর চেহারাই বা কেমন হবে? আদিবাসী যুবক, কাজেই কালো মেদহীন গাল, থুতনি, টানা চোখ, কোঁকড়া চুল? কিন্তু বীরুর অফিসে ওর কমরেড একজন আছে শীতল কিস্কু, এবারে অফিসারের পরীক্ষা দিয়েছে, পূর্ণিয়ায় বাড়ি, তার তো চাপা চুল, মুখটাও ভোঁতা। মধ্যবিত্ত জীবনের প্রভাব? 

পূর্ণিয়ার পাতাটাই উল্টে এল। রাজেন্দ্র হেম্ব্রম। দশ বছর? এ তো শিশু! বাদরপুর, মরঙ্গা অঞ্চলে নিবাস। বুধৌলিএস্টেটের লড়াইয়ে । গ্রামের ওপর গুন্ডাদের হামলা। ২১.৯.৯৩। তার নিচেই আবার ফাগু বাস্কি, ভূমিহীন, ১৫.৪.৯৩।

অসম্ভব! এদের ছবি যদি কেউ আঁকতে পারে তো আঁকবে কোনোদিন। বীরু পারবে না। অন্য ভাবে ধরতে হবে পোস্টারে। তথ্য একটু বেশি দিয়ে সাজাতে হবে ফ্রেমগুলো। 

হঠাত খেয়াল হল ১৯৯২ সালের ডাইরিটার কথা। ভূমিসংস্কার কনভেনশন হয়েছিল, বিধায়ক ক্লাবে। ও তো গিয়েছিল। দেখি কিছু লেখা আছে নাকি? পাতা ওল্টাতে ওল্টাতে পৌঁছোল ১৬ জুলাইয়ে। দেখল কনভনশনেরই নোট। মহলানবিশ কমিটি, সারপ্লাস ল্যান্ড, রাজ্যে আশি লক্ষ হেক্টেয়ার কৃষিযোগ্য জমি, সিলিং এক্ট ১৯৬০ বলবৎ করতে গিয়ে সরকার বলেছিল, ভূমিহীনদের মধ্যে বিতরণের জন্য ৮ লক্ষ একর জমি বেরুবে। কিন্তু ১৯৬০ থেকে ১৯৯০ অব্দিকার সময়ে মাত্র ৪,৭৪,০২১ একর জমি সারপ্লাস ঘোষিত হয়েছে এবং তার মধ্যে থেকে ২,৪৫,৩৪৫ একর জমি বিতরণ করা হয়েছে। তারপর বক্তাদের ভাষণ।  

আবার পাতা ওল্টাতে ওল্টাতে এক জায়গায় পেল, ৫ আগস্টে এ দফার জমির লড়াই শুরু করবে তিনটে বাম দল মিলে। আবার পেল আরে এ তো বিরাট জিনিষ! এসব লিখে রেখেছে? ওর নিজেরও মনে ছিল না। কোনো জিবির রিপোর্টিং হবে হয়ত, বা কে জানে !

২৩শে সেপ্টেম্বর ১৯৯২ অব্দি তার দলের লড়াইয়ের খতিয়ান সাহারসা ৩২৭ একর, সিতামাঢ়ি ৩৭৪ একর, সিংভুম ৩২৭ একর, পশ্চিম চম্পারণ ৪২৬ একর, ভাগলপুর ১৭২২ একর, দ্বারভাঙা ২৯৪৩ একর, গয়া ১৪৩ একর, কিশনগঞ্জ ৫৪৬ একর, পূর্ণিয়া ৪৪৫৬ একর, মুজফফরপুর ৫১৬ একর, খাগাড়িয়া ২৪৫ একর, গোপালগঞ্জ ৯১ একর, মাধেপুরা ২৩০ একর, হাজারিবাগ ৫০০ একর

৫০০ একর? ধ্যাত, এটা হাওয়ায় ছোঁড়া মনে হচ্ছে, একটা পাকা হিসেব হবে তো? কে জানে!

ভোজপুর ৭৫ একর

হুম্ম্‌, ও জেলায় মালেরই বেশি দবদবা। ওরা বেশি জমিতে লড়াইয়ে ছিল হয়ত। মাঝে একটা কথা উঠেছিল না? ওরা নাকি জমির জাতীয়করণের প্রশ্ন তুলে আলাদা হয়ে গিয়েছিল? কোথায় ঢুকছি! শেষে কাজটাই হবে না। আপাততঃ ছবির মত তথ্য চাই। বরং একটা আলাদা কাগজে পয়েন্টগুলো লিখে ফেলি।

কাগজ বার করে কনভেনশন থেকে এখন অব্দিকার তথ্যগুলো লিখে নিল বীরু। বাঁদিকে চৌখুপি এঁকে এক নম্বর পোস্টার, দু নম্বর পোস্টারের বিষয় লিখে নিল (১) সিলিং এ্যাক্ট এবং ভূস্বামী, (২) সরকার এবং ভূমি সংস্কার, (৩) দারিদ্র্য এবং ভূমি বন্টন, (৪) ৫ আগস্ট ৯২, দাবীপত্র, লড়াই শুরু হল। (৫)

বীরু ফিরে এল ২৩শে সেপ্টেম্বরের চার্টটায়। এটাই থাকবে পাঁচ নম্বরে। ভোজপুরের পর? মধুবনি ১৮০ একর, জমুই ১৫০ একর, নালন্দা ৩০৫ একর, বৈশালি ১৩৫ একর, সারণ ৬৫ একর আরো কিছু মিলিয়ে ২৩টা জেলায় ১৪৮৩২ একর জমি লড়াই করে কব্জা করা হয়েছে, বাসযোগ্য জমিতে পঞ্চাশ হাজারের কাছাকাছি ঘর তোলা হয়েছে, চাষযোগ্য জমিতে চাষ হচ্ছে, কৃষকেরা ফসল তুলতে বদ্ধপরিকর। 

এ পোস্টারটা বড় হবে, বা দুভাগে হবে। ৫এ আর ৫বি। ব্যাস, এরপর এক এক করে একেকটা জেলা ধরে এবং সম্ভব হলে একেকজন শহীদকে নিয়ে আলাদা করে। কিন্তু মুখ?

আবার অথৈ জলে পড়ল বীরু।


দুপুরে একবার গেল বাকরগঞ্জে, কেসরিজির দোকানে। কেসরিজি মানুষটা ভাল। ব্যাবসাদারদের মধ্যে আরো কয়েকজন পরিচিত ভালো লোক ছিল। শিখবিরোধী দাঙ্গায় অনেকে পাটনা ছেড়ে দিল। কী শিখ আর কী দাঙ্গা! ওমপ্রকাশজি তো শিখ ছিলেন না। সুযোগ বুঝে তাঁর রেডিও-টিভির দোকানটা ভেঙে লুটপাট করল। ওমপ্রকাশজি সপরিবার চলে গেলেন। স-মিলটা ছিল মোড়ের ওপর, আগুন লাগিয়ে দিল। সে ভদ্রলোকও চলে গেলেন। দাঙ্গা বীভৎস রকম হয়েছিল বোকারোতে বোহহয়। সবচেয়ে খারাপ লেগেছিল যখন মনজিত সিংকে দেখল দাড়িগোফ কামিয়ে। মনজিত সিং চাকরি, ব্যাবসা ছাড়ার বদলে ধর্ম ছেড়ে দিল বা লুকিয়ে নিল, সে সমস্যা পরে। মনজিত সিং যখন হেসে নমস্কার করল বীরু লজ্জায় মরমে মরে গিয়েছিল একজন সহনাগরিক হিসেবে। এই তার দেশ! তারপর আবার ধাপে ধাপে মরল ১৯৮৯ থেকে ১৯৯২ অব্দি রামশিলা মিছিল থেকে বাবরি ধ্বংস অব্দি। স্‌সালা। মুখ থেকে কয়েকটা গালিগালাজ বেরিয়ে এল।  

কেসরিজির দোকানে সবচেয়ে বড় সুবিধে কী চাই তা বলতে হয় না। নিজেই দোকানে ঢুকে দেখতে দেখতে মনস্থির করা যায় কী চাই। আর সত্যিই, হয়েও গেল মনস্থির। চার্টপেপারের একটাও রঙ পছন্দ হল না। ব্রাউন পেপারে ওপর সাদা কাগজ কেটে ডিজাইন করেছিল একবার, সেই ১৯৮৭ বা ৮৯তেই বোধহয়। সাম্প্রদায়িকতাবিরোধী। আবার একটা ম্যাগাজিন থেকে সানাইয়ের ছবি কেটে সেটাকে দুভাগ করে সেঁটেছিল। কিছু লিখেছিল ওস্তাদ বিসমিল্লা খাঁকে নিয়ে। সেসব ধরণের কাজ তো চলবে না এবার। লেখার ব্যাপার আছে অনেক কিছু। প্লেন সাদা কাগজ, কিন্তু সাদা নয়, একটু অফ, হলদেটে পেয়ে গেল। এই তো! ফার্স্ট ক্লাস। এই কাগজে মাপ মতন লিখে কালো চার্ট পেপারে সাঁটিয়ে দেবে, চারদিকে দুইঞ্চি মত মাস্ক ছেড়ে। কালো চার্ট পেপার ব্যবহার করার ইচ্ছে ছিল বীরুর বহুদিন থেকে। যবে থেকে দেখত যে নাটকের দলগুলো কালো চার্ট পেপারে পোস্টার তৈরি করে বেশি। লেখাগুলো, বিভিন্ন রঙের এ্যাক্রিলিক দিয়ে, ডানদিকে এলাইন করে লেখা। কী সুন্দর দেখায়! ডানদিকে এলাইন করে ও অবশ্য একবার লিখেছিল একটা পোস্টার, ১৯৮৭তে, মে-দিবসের শতাব্দী উদযাপনে। এক ডজন কালো চার্ট আর ছয়টা ওই হলদেটে পাতলা কাগজ কিনে বেরিয়ে এল। লাগলে আবার নিয়ে নেবে।

আচ্ছা, যে জেলাগুলোর বেশি ডিটেল আছে, সেই ডিটেল দিয়ে পোস্টার হতে পারে না? যেমন, পূর্ণিয়া। এস্টেট ধরলে বিশুনপুর, বুধৌলি, কাঝা, চম্পানগর, শ্রীনগর, জালালগড়, সাহু পরবত্তা, ব্রহ্মজ্ঞানী, কুরসেলা, পারোরা, কাঝা-গনেশপুর, রাজা পি সি লাল, জয়নারায়ণ মেহতা এস্টেট। ৬০০০ হাজার একর কব্জা করে ১০,০০০ ঘর তোলা হয়েছে। ৯০০০ একর আরো চিহ্নিত করা হয়েছে। নাঃ, নেতাদের বুলি মনে হচ্ছে। আরেকটা পোস্টার ৬ই এপ্রিল আর ১২ই এপ্রিল পূর্ণিয়ার জমিদারেরা কংগ্রেস আই আর বিজেপির নেতাদের সাথে বসে হামলার ছক কষেছিল। সুপৌল ত্রিবেণীগঞ্জের জমিদার মহাবীর আগরওয়ালের ৪৭৫ একরে কব্জা। সাহারসায় মহেসি এলাকায় প্রদেশ কংগ্রেসের প্রেসিডেন্টের জমিতে কব্জা হ্যাঁ, এইটা ভালো ২রা মে ৯৩ তারিখে পুলিস এল এবং গ্রামের মহিলারা প্রতিরোধ করল। আর এটা? সমস্তিপুরের হাসানপুর অঞ্চলে পি সুন্দরাইয়া বস্তি তৈরি হল ৪ঠা জুলাইয়ে ঘর উঠল এবং ১৯শে জুলাই জনসভা হল।

ঠিক আছে, ঠিক আছে, এসবও থাকবে, হাতে সময় থাকলে সামিয়ানায় জায়গা থাকলে। শঙ্করদা বলেছিলেন, কতটা জায়গা চাই কমরেড ব্রহ্মচারীকে বলে দিতে। বইয়ের যে দোকানটা হবে তার পাশেই ততটা জায়গা সামিয়ানা, কানাত দিয়ে ঘিরে দেবে। সেটাও হিসেব করতে হবে।

তবে সবচেয়ে ঠোস তথ্য হল লড়াইয়ে মানুষের অংশগ্রহণ, শ্রেণীশত্রুর হামলায় মৃত্যুবরণ। একেকটা মানুষের মৃত্যুকে সামনে আনতে হবে। হঠাত মনে পড়ল গত রাত্রে দেখা কিসানসভার একটা বই। কোনো সম্মেলনের প্রতিবেদন। হাত বাড়িয়ে তাক থেকে টেনে বার করল।

প্রচ্ছদে পাগড়ি পরা এক কৃষক যুবকের ছবি, পাঞ্জাবের দিকের। আরে! এটা ভগত সিংএর ছবি না? সে যা হোক, এটা তার কৃষক-পরিচয়েরই ছবি। আর, ছবিটায় রেখা আর রঙের ব্যবহার ভালো করে দেখে মনে হল, মোটামুটি সে উতরে দিতে হয়ত পারবে। এমনিই একটা কাগজে কালো স্কেচপেন দিয়ে মুখের ছবিটা নকল করল। আপাততঃ রঙ ব্যবহার না করে লাল স্কেচপেনই একটু ঘষে দিল জায়গা মত। এবার। এটা যদি রামশরণ চৌপালের পোস্টারে থাকে তাহলে এ মুখে ডানদিক থেকে তেরছা রোদ্দুর পড়লে বাঁদিকে নিচে পঞ্চান্ন বছর বয়সী রোগা একজনের মুখের কালো প্রোফাইল ফুটবে এই রকম? কালো পেন্সিল ঘষে ঘষে আঁকার চেষ্টা করল। দেখল ঘুরিয়ে ফিরিয়ে। নাঃ, মন্দ লাগছে না। ডিসাইডেড। এভাবেই করতে হবে। আগে খেয়ে আসা যাক। তখন থেকে বেশ কয়েকবার মেয়ে এসেছে বলতে, মা ডাকছে। 


শেষ অব্দি ওভাবেই এক এক করে অনেকগুলো পোস্টার তৈরি করল বীরু। মুখ এক, পাগড়ি পরা যুবক চাষীর, পাঞ্জাবের আর ছায়া বিহারের, নানা রকমের যুবক, শিশু, প্রৌঢ়, বৃদ্ধ তাদের বিভিন্ন ধরণের চুল। তার নিচে লড়াইয়ের যাবতীয় তথ্যের বর্ণনা, যতটুকু জোটাতে পেরেছিলেন কশ্যপজি। কিন্তু যে নামগুলোর সাথে তথ্য ছিল না সেগুলো জেলাওয়ারি একজায়গায় শুধু সাজিয়ে দিল। এ ছাড়া আরো সাত আটটা পোস্টার শুধু বিভিন্ন তথ্যসম্বলিত। আর সব শেষে একটা পোস্টার, গাছের নিচে ইষৎ উঁচু একটা ঢিবির ওপারে দেখা যাচ্ছে লাল ঝান্ডা নিয়ে মিছিল আসছে। ব্রহ্মচারীজি এসে দেখে গেলেন। শঙ্করদা আর কশ্যপজিও এসে দেখে গেলেন। কিন্তু বীরু অপেক্ষা করছিল পশ্চিমবঙ্গের প্রতিনিধিদের জন্য। ওর গাটফিলিং বলছিল ওদের মধ্যেই কেউ না কেউ বাঁকা মন্তব্য করবে। কে জানে পোঁদপাকা কয়েকটা কি করে ঢুকে যায় শ্রমিক-কর্মচারি সংগঠনের প্রতিনিধি হয়ে। বীরু জানে বাকি কাশ্মীর থেকে কন্যাকুমারি আর কেউ, বিশেষ এপ্রেসিয়েট না করলেও বিরূপ মন্তব্য করবে না। 

ঠিক তাই হল। দুপুরে খাবার সময়ে পশ্চিমবঙ্গের কয়েকজন প্রতিনিধি ঘুরতে ঘুরতে এলেন। তারই মধ্যে একজন, দেখে নিজেদের মধ্যেই মন্তব্য করলেন, কাঁচা কাজ। বীরু বসে বসে শুনতে পেল কথাটা। বলল না কিছু। অভ্যর্থনা সমিতির ব্যাজ লাগান ছিল। নইলে নির্ঘাত পিছন থেকেই গলা তুলত, পুরো বিহারটাই কাঁচা কাজ এখনো কমরেড! কবে আসবেন, আপনি? 


রাতে বসে ডাইরিতে লিখল

একটা ছোট নোটপ্যাড – / খন্ডকাহিনী, ছত্রিশটি খন্ডযুদ্ধের, / এবং মৃত্যুর; জীবন যারা মনে রেখেছে / তাদের কাছে কে যেত আর, কেনই বা? / দিনবদলের লড়াইয়ে শামিল জীবনে / পাড়ার দুএকজন ছাড়া কি আর বলার থাকে কাউকে? 

মাথায় লাল পাগ ভগৎ সিং! / বার বার সেই রেখাচিত্র নকল করে কাগজে, / হরেক রকম ছায়া ফোটালাম পৃথিবীমুখী – / বয়স্ক, শিশু, হিন্দু, মুসলমান, পুর্ণিয়া, সমস্তিপুর,/ চম্পারণ, বেগুসরাই, নালন্দা, নওয়াদা, হাজারিবাগ,/ সিংভুম, সাঁওতাল পরগনা ও আরো কয়েকটি / জেলার মানুষের উসকোখুসকো ছায়া

কাঁচা কাজ। যাহোক, / পতাকা কাঁধে এক বিপ্লবী মুখের ছায়া হতে আমায় / কতবার সুযোগ দিল ওই শহীদেরা! / আর, সে ছায়া হতে হতে চিনলাম / আমাদের প্রদেশের জেলাগুলোর /

মাটি আর জলের রঙ, রক্তের দর্প, রাতের গর্জন। 


২৮.১০.২২