Tuesday, October 25, 2022

पार्टी पुनर्गठन के प्रारम्भिक वर्ष – उमाकांत शुक्ल

संशोधनवाद के विरूद्ध लम्बे संघर्ष के बाद सन्‌ 1964 में कलकत्ता पार्टी कांग्रेस के साथ ही भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के रूप में पार्टी का पुनर्गठन हुआ। दरअसल उस पार्टी कांग्रेस तक पार्टी का नाम भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ही था। सन 1965 में केरल विधानसभा चुनाव के समय चुनाव आयोग ने संयुक्त पार्टी का नाम और चुनाव-चिन्ह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पक्ष में मान लिया और इसी परिस्थिति में हमारी पुनर्गठित कम्युनिस्ट पार्टी का नाम भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) पंजीकृत कराना पड़ा तथा हमें अलग चुनाव चिन्ह आवंटित हुआ। यह तो सर्वविदित ही है कि 1965 के केरल विधानसभा चुनाव में हमारी पार्टी की भारी जीत हुई। पार्टी 40 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के द्वारा नाम और पुराने चुनाव चिन्ह को प्राप्त कर लेने के बावजूद भा.क.पा. मात्र तीन सीटें ही जीत पाई और ज्यादातर क्षेत्रों में अपनी जमानत तक बचा पाने में नाकामयाब रही। राष्ट्रीय स्तर पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के रूप में कम्युनिस्ट पार्टी के पुनर्गठन और बाद के लगभग 43 वर्षों के इतिहास के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है।

बिहार में किन परिस्थितियों में पार्टी का पुनर्गठन हुआ और पुनर्गठन के शुरूआती वर्ष कैसे रहे, इन सब बातों के बारे में

कोई ब्योरेवार आलेख उपलब्ध नहीं है। इस दिशा में आवश्यक सूचनाएं प्राप्त कर आलेख तैयार करने की आवश्यकता है।

प्रस्तुत लेख में पार्टी निर्माण के शुरूआती वर्षों की मात्र  एक झलक प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। बिहार के पार्टी नेताओं और कार्यकर्त्ताओं का नाम गिनाना संभव नहीं है और उचित भी नहीं है। यह सब बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वांगीण इतिहास का विषय है। संयुक्त पार्टी में अन्दरूनी पार्टी संघर्ष की शुरूआत पार्टी के निर्माण के साथ ही हो चुकी थी।

दरअसल अन्दरूनी पार्टी संघर्ष एक जीवन्त, विकासशील और क्रांतिकारी पार्टी की पहचान्त है। जनवादी केन्द्रीयता के सिद्धान्तों के अनुसार पार्टी के अन्दर जनवाद विकसित होता है। लेकिन संयुक्त पार्टी के नेतृत्व के एक हिस्से ने पार्टी के तमाम सांगठनिक उसूलों को ताक पर रख कर पार्टी-संगठन पर कब्जा करने का अभियान चलाया, 32 नेशनल काउंसिल के शीर्षस्थ साथियों को तिलम्बित किया और मार्क्सवाद-लेनिनवाद को तिलांजलि देकर वर्ग सहयोग का कार्यक्रम अपनाया। इतना ही नहीं, तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नन्दा के सुर में सुर मिलाकर पार्टी के अन्दर संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष करनेवाले नेताओं ओर कार्यकर्त्तओं को चीन का एजेन्ट कहकर जेलों में नजरबन्द कराने में सरकार की मदद की। इन्ही हालात में संशोधनवाद के विरूद्ध संघर्ष उस ऊंचाई पर पहुंच गया जहां पार्टी के पुनर्गठन के सिवा कोई और विकल्प नहीं बचा था।

बिहार में संयुक्त पार्टी का नेतृत्व पूरी तरह संशोधनवाद के साथ था। जिन 32 नेशनल काउंसिल सदस्यों को निलंबित किया गया था उनमें एक भी बिहार से नहीं थे। ये 32 साथी वैसे हैं जिनमें का. बी. टी. रणदिवे, का. पी. सुन्दरैया, का. एम. बासवपुन्नैया, का. ए. के. गोपालन, का. पी. राममूर्ति, का. प्रमोद दासगुप्त, का. हरेकृष्ण कोनार, का. हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के अग्रणी शामिल हैं। इन्हीं नेताओं में से का. प्रमोद दासगुप्त और का. हरेकृष्ण कोनार ने बिहार में पार्टी के पुनर्गठन का मार्गदर्शन क्रिया। यहां कुछ जिला स्तर के नेता संशोधनवाद के खिलाफ लड़ाई में शामिल हुए। शुरू-शुरू में लड़ाई इस बात की थी कि तत्कालीन पार्टी का राष्ट्रीय परिषद्‌ 32 साथियों के निलम्बन का प्रस्ताव वापस ले और पार्टी कार्यक्रम पर बहस के लिए पार्टी कांग्रेस आयोजित हो। संशोधनवादियों का 'राष्ट्रीय जनवाद' का कार्यक्रम था तो दूसरी तरफ 'जनता के जनवाद' का कार्यक्रम था। राष्ट्रीय जनवाद के कार्यक्रम में था कि नेतृत्व राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग का होगा जिसमें साझेदारी मजदूर वर्ग की होगी जबकि जनता के जनवाद में मजदूर वर्ग के नेतृत्व में जनता का जनवादी मोर्चा होगा जो साम्राज्यवाद विरोधी, इजारेदार विरोधी ओर सामन्‍तवाद विरोधी होगा। उन दिनों संशोधनवाद के विरूद्ध संघर्ष में यही मांग की जा रही थी कि 32 साथियों का निलम्बन वापस हो, पार्टी कांग्रेस में बहस के लिए दोनों कार्यक्रम पेश किए जायें ओर गिरफ्तार साथियों की रिहाई के लिए आन्दोलन हो। बिहार में भी इन्ही मांगों के आधार पर साथियों को एकजुट किया जाने लगा। बिहार में का. प्रमोद दासगुप्त की उप्रस्थिति में सन 1963 में आरा में पहली बैठक हुई जिसमें क़ई जिलों से नेतृत्वकारी साथियों ने भाग लिया। उसी बैठक में पहली बार संगठित रूप से संशोधनवादी नीतियों के खिलाफ संघर्ष करने का निर्णय लिया गया। उन दिनों बिहार में संयुक्त पार्टी का नेतृत्व विभिन्न स्तरों पर बैठकों आयोजित कर मुख्यतः 32 साथियों के निलम्बन के पक्ष में तर्क पेश कर रहा था। अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में छिड़ी सैद्धांतिक बहस में यह नेतृत्व सोवियत रूस की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व के साथ था। इन्हीं दिनों चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने सैद्धांतिक सवालों पर 13 जून 1963 को कुछ चिट्ठियाँ सोवियत यूनियन की कम्युनिस्ट पार्टी को लिखीं थीं और उसके पहले ' लेनिनवाद जिन्दाबाद' (Long live Leninism) शीर्षक एक पुस्तक प्रकाशित की थी। इन दस्तावेजों से संशोधनवाद के विरूद्ध संघर्ष में काफी मदद मिली। गरचे का. ई. एम. एस. नम्बूदिरिपाद और का. ज्योति बसु को संयुक्त पार्टी के नेतृत्व ने निलम्बित नहीं किया था, ये दोनों नेता संशोधनवादी कार्यक्रम से असहमत थे और अपने 11 साथियों द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम के मसविदे से एकाध बिन्दुओं को छोड़कर आम सहमति रखते थे। सन 1963-64 में संयुक्त पार्टी के विभिन्न स्तरों पर इन्हीं सारे मुद्दों पर काफी तीव्र बहस चल रही थी।

संशोधनवादी नेता, जिन्हें उने दिनों हम दक्षिणपंथी कम्युनिस्ट कहा करते थे, सैद्धान्तिक सवालों पर कमजोर पड़ते थे। वे हमें पार्टी तोड़क कह कर अनुशासन का डंडा भांजते थे। आखिरकार बिहार के अधिकांश जिलों में पार्टी के ।। साथियों द्वारा प्रस्तावित कार्यक्रम, मजदूर वर्ग के नेतृत्व में जनता के जनवादी मोर्चे का निर्माण कर जनता का जनवाद स्थापित करने के कार्यक्रम को आधार मानकर जिला सम्मेलन हुए जिनमें शामिल साथियों का उत्साह देखने लायक था। इन सम्मेलनों द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों को लेकर रजौली में राज्य पार्टी सम्मेलन हुआ और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की बिहार राज्य कमिटी चुनी गई जो आगे चलकर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की बिहार राज्य कमिटी के नाम से जानी गई। इस राज्य सम्मेलन से चुने गये प्रतिनिधियों ने नवम्बर 1964 में आयोजित कलकत्ता कांग्रेस में भाग लिया। इस पार्टी कांग्रेस में 11 साथियों द्वारा प्रस्तावित कार्यक्रम को पारित किया गया जो आज भी पार्टी का कार्यक्रम है, गरचे इस कार्यक्रम को बदली हुई परिस्थितियों में सन 2000 में मूल स्थापना को बदले बगैर अद्यतन किया गया हे।

सन 1964 की कलकत्ता पार्टी कांग्रेस के शीघ्र बाद 29 दिसम्बर की रात में पूरे हिन्दुस्तान में पार्टी कार्यालयों और पार्टीनेताओं के घर पर छापा मार कर सभी नेतृत्वकारी साथियों को गिरफ्तार कर अंग्रेजों द्वारा बनाये गये काले कानून डी.आई.आर. (भारत सुरक्षा अधिनियम) के तहत जेलों में नजरबन्द कर दिया गया। भारत सरकार की इस जनतंत्र विरोधी कार्रवाई की सर्वत्र निन्दा हुई। ताज्जुब की बात यह रही कि संशोधनवादियों ने उन दिनों कांग्रेसी सरकार द्वारा लगाये गये आरोपों का परोक्ष रूप से समर्थन ही किया। गृह मंत्रालय का आरोप था कि चीन के इशारे पर देश में सशस्त्र क्रांति के उद्देश्य से संयुक्त पार्टी को तोड़कर वामपंथियों ने नई कम्युनिस्ट पार्टी बनायी है जिससे देश की सुरक्षा को खतरा है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का भी यही दुष्प्रचार चल रहा था कि चीन के इशारे पर पार्टी तोड़कों ने नई पार्टी बनाई है और सशस्त्र क्रांति का दुस्साहसिक कदम उठाया है। सच्चाई यह थी कि हमारे कार्यक्रम से ही स्पष्ट है कि हमने अपने जनवादी क्रांति के कार्यक्रम में रूस और चीन इन दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के मूल्यांकन से अलग अपना मूल्यांकन किया था। बाद में बर्द्धमान प्लेनम में पारित "हमारी और चीन की पार्टी के जुदा-जुदा विचार' शीर्षक दस्तावेज से यह बात आइने की तरह साफ है। सच्चाई यह है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार भी जानती थी कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से देश की सुरक्षा को कोई खतरा नहीं हैं, अगर खतरा है तो कांग्रेस पार्टी की सत्ता के एकाधिकार पर है, उसकी जनविरोधी नीतियों को है और देश के पूंजीपति-जमीन्दार वर्ग को है।

बिहार में राज्य कमिंटी के सभी सदस्य और जिला सचिवमंडल के सभी सदस्य नजरबन्द किए जाने वाले की सूची में थे जो लगभग सभी 29 दिसम्बर की रात में ही गिरफ्तार कर लिए गए। जो दो-चार साथी बच गये थे, उनमें से भी अधिकांश कुछ ही महीनों में गिरफ्तार कर नजरबन्द कर लिए गए। ऐसी स्थिति में जो साथी बच गये थे उनकी पहली प्राथमिकता नागरिक आजादी के सवाल पर यथासंभव व्यापक एकजुटता कायम करने की थी और कांग्रेसी सरकार को बेनकाब करना था। बचे हुए साथियों को लेकर कार्यकारी राज्य कमिटी और जिला सचिवमंडल बने। उन दिनों ज्यादा से ज्यादा आम-सभाएं की गई जिनमें पार्टी कार्यकर्त्ताओं और आम जनता ने उत्साह के साथ भाग लिया। मई 1965 में राज्य स्तरीय प्रदर्शन पटना में किया गया था जिसमें गिनती के तीन हजार लोगों ने भाग लिया। मुख्य बात यह रही कि सड़क के दोनों किनारे हजारों लोगों ने खड़े होकर जुलूस का उत्साह बढ़ाया। यही दृश्य 9 अगस्त 1965 को बिहार के चार केन्द्रीय जेलों के समक्ष प्रदर्शन के समय था। मुजफ्फरपुर में तो जितने प्रदर्शनकारी थे उनसे अधिक पुलिस और अर्द्धसैनिक बल दोनों ओर से कतारबन्दी कर चल रहे थे। साफ दिखाई दे रहा था कि एक जुझारू पार्टी अपने निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रही है। 9 अगस्त 1965 को बिहार बन्द का आहवान संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) द्वारा किया गया था। इस सिलसिले में भी काफी गिरफ्तारियां हुई और पार्टी के कूछ नेतृत्वकारी साथियों को उसी काले कानून डी.आई.आर. के सहारे नजरबन्द किया गया। इन तमाम दमनात्मक कार्रवाइयों का सामना करते हुए पार्टी आगे बढ़ती रही। सन 1966 में सभी नजरबन्द साथियों को रिहा किया गया और सन 1967 के चुनाव में सत्ता पर कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हुआ। पहली बार 9 राज्यों में कांग्रेस पराजित हुई। केरल और बंगाल में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाला मोर्चा विजयी रहा और इन दोनों राज्यों में इसी मोर्चे की सरकारें बनी। बिहार में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी ) के चार विधायक चुनकर आये। यहां संयुक्त विधायक दल (संविद) की सरकार बनी। हमारी पार्टी को भी सरकार में शामिल होने का निमंत्रण मिला, लेकिन पार्टी ने सरकार में शामिल होने से इन्कार कर दिया। उस समय से लेकर अब तक इस मामले में हमारी नीति यही रही है कि हम किसी भी ऐसी सरकार में शामिल नहीं होंगे जिसकी नीतियों के निर्धारण में हमारी निर्णायक भूमिका नहीं हो। इसीलिए आज भी पार्टी केरल, बंगाल और त्रिपुरा को छोड़कर किसी अन्य राज्य सरकार या केन्द्र सरकार में शामिल नहीं हुई।

सन 1967 के बाद के वर्षों में प्रान्त के कई जिलों में जमीन, खेत-मजदूरी और अत्याचार तथा सामाजिक उत्पीड़न

इत्यादि सवालों पर पार्टी ने बड़े-बड़े आन्दोलन किये। जन आन्दोलनों की आधारशिला पर ही पार्टी खड़ी हुई और आज भी खड़ी है। 

इस बीच नक्सली भटकाव से भी पार्टी को लड़ना पड़ा और बहुत-सी विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू यह है कि मार्क्सवादी-लेनिनवादी समझ पर आधारित पार्टी कार्यक्रम से इरादे की एकता बनी और पार्टी के विकास की व्यापक संभावनाएं पैदा हुई। हम पिछले 4 दशकों में इन संभावनाओं का कितना लाभ उठा सके, यह अलग से विस्तृत समीक्षा का विषय है। 


[लोकजनवाद, वसंत विशेषांक 2008 से साभार]




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