Thursday, October 6, 2022

काज़ी नजरुल इसलाम द्वारा रचित ‘विद्रोही’ कविता का सौवाँ साल

बांग्ला में लिखी गई एक कविता के लिखे जाने की शताब्दी को हिन्दी में याद करने का क्या तुक है? भले ही वह कविता हिन्दी दुनिया में अत्यंत परिचित व लोकप्रिय कवि काज़ी नजरुल इसलाम की ही क्यों न हो! 

लेकिन सौ साल पहले किसी भी भारतीय भाषा के किसी कवि की कोई काव्यकृति जब्त नहीं हुई थी या कविता लिखने के कारण उन्हे जेल नहीं जाना पड़ा था। सरोजिनी नायडु एवं सुब्रह्मन्यम भारती उनके पहले जेल जा चुके थे जरूर। दोनों कवि थे, औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ क्रांतिकारी आवाज थे लेकिन अपनी कविताओं के कारण नहीं, राजनीतिक कार्रवाईयों में भाग लेने के कारण जेल गये थे। 

वैसे बांग्ला कविता के ऐतिहासिक विकास के कुछ खास आयाम तो जरूर हैं जिनका जिक्र किया जाना चाहिये। जरा सोचिये कि जिस भाषा में प्रारम्भिक काव्यग्रंथ के रूप में 1200 से 800 साल पहले तक, बौद्ध सिद्धाचार्यों द्वारा रचित 'चर्यापद’ का नाम आता है, उन्नीसवी सदी में उस काव्यधारा को आधुनिक काव्यवस्तु (मिथकों के पुनर्पाठ सहित), नाटकीयता, छंद व रूप मिलता है एक इसाई कवि माइकल मधुसूदन दत्त के हाथों, पहला एशियाई नोबेल पुरस्कार, अन्तरराष्ट्रीय गौरव एवं राष्ट्रीय कन्ठस्वर बनने का पल मिलता है एक हिन्दू कवि, रवीन्द्रनाथ ठाकुर की आवाज में तथा गुलामी, पुराने, सड़े-गले संस्कार एवं तमाम किस्म की धर्मांधता के खिलाफ गुस्से की अभिव्यक्ति मिलती है एक मुसलमान कवि, काज़ी नज़रुल इसलाम की कलम से।

भारत के बँटवारे के फलस्वरूप आज आधा बंगाल एक अलग देश है। फिर भी, उसी आधे, बांग्लादेश की देन है कि उसकी आज़ादी के संघर्ष का आगाज़ करने वाला शहीद दिवस, 21 फरवरी आज युनेस्को द्वारा स्वीकृत विश्व मातृभाषा दिवस है – आज पूरी दुनिया में पचासों भाषाई समुदाय उस दिवस को अपनी मातृभाषा की रक्षा के लिये संकल्प दिवस के रूप में मनाते हैं।

उन्नीसवीं व बीसवीं सदी में जब सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य में औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ उठने वाले स्वर आधुनिक मानवतावाद, तार्किकता, ओजस्वी तरुणाई व स्वस्थ्य वयस्क प्रेम जैसे नये मूल्यों को अपना अवलम्बन बनाने लगे, तब बांग्ला काव्यधारा से ही सबसे अधिक वे प्रेरित हुये। भारतेन्दु से निराला तक, सभी अगर बांग्लाभाषा व साहित्य के अच्छे जानकार थे, तो वह कोई संयोग नहीं था।

बहुत स्वाभाविक है कि सन 1921 में ‘विद्रोही’ कविता की रचना के कुछेक हफ्तों के बाद जब वह छपकर लोगों के हाथों तक पहुँची, तब मचने वाला भावनात्मक एवं वैचारिक बवंडर सिर्फ बांग्लाभाषी पाठकवर्ग तक सीमित नहीं रहा होगा।

जैसा कि कवि के दोस्त मुजफ्फर अहमद अपनी संस्मृतियों में जिक्र करते हैं – दिसम्बर [1921 के] में ही कवि इस कविता को पूरा कर चुके थे। पहले कविता एक पत्रिका में छपी। पत्रिका की सारी प्रतियाँ तत्काल बिक गई। दूसरा पुनर्मुद्रण आ गया। सरकार का माथा ठनका। हालाँकि औपचारिक तौर पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया लेकिन पत्रिका की सारी प्रतियाँ ढूंढ़ ढूंढ़ कर निकाल कर जब्त कर ली गई। तब दूसरी पत्रिकाओं में छपी वह कविता। उनकी भी सारी प्रतियाँ जब्त कर ली गई। अंतत: कवि का काव्यसंकलन ‘अग्निवीणा’ में शामिल कर ली गई ‘विद्रोही’। कहा जाता है कि अंग्रेज सरकार ने तत्काल उक्त संकलन को जब्त कर लिया। बाद के दिनों में बांग्लादेश के प्रख्यात विद्वान अहमद रफीक ने स्पष्ट किया (नजरुल संस्थान, ढाका द्वारा प्रकाशित ‘नजरुल शताब्दी अंक) “अग्निवीणा के साथ साथ, कवि के पाँच और ग्रंथ, विषेर बाँशि, भांगार गान, चन्द्रविन्दु, प्रलयशिखा और युगवाणी पर सरकार ने प्रतिबंध लगाये एवं वे जब्त कर लिये गये …”! यह भी आज तक के इतिहास का एक अनन्य तथ्य है। (दो साल बाद कवि की जेलयात्रा हुई ‘आनन्दमयीर आगमने’ जैसी कविता लिखने के कारण, पर वह अलग विषय है)।

क्या ‘विद्रोही’ कविता अराजकता या बल्कि और आगे बढ़ कर चौतरफा अव्यवस्था एवं आपदा को किसी न किसी तरह न्यायसंगत ठहराता है? ये जो पंक्तियाँ हैं: 

मैं दायित्वहीन क्रूर नृशंस / महाप्रलय का नटराज / मैं चक्रवात विध्वंस / मैं महाभय, मैं पृथ्वी का अभिताप / मैं निर्दयी, सबकुछ तोड़फोड़ मैं नहीं करता विलाप / मैं अनियम, उच्छृंखल / कुचल चलूं मैं नियम क़ानून श्रृंखल …

क्या ये किसी अत्याचारी के शासन की एवं आधुनिक उग्रवाद के विभिन्न रूपों को किसी भी तरह से तर्कसंगति का ओट देते हैं?

किसी बेखबर पाठक को ऐसा लग सकता है। अगर हम सतही तौर पर मान लें कि कविता सीधी तौर पर औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ लिखी गई थी या अपने अर्थविस्तार में, समकालीन पूंजीवादी दुनिया के शासकीय गिरोहों के खिलाफ लिखी गई थी। या विपरीत दृष्टि से, काव्य की रचना के चार साल पहले हुई दुनिया की पहली समाजवादी क्रांति से सतही तौर पर इसका रिश्ता ढूंढ़ें। हालांकि, एक कवि एवं नागरिक के तौर पर नज़रुल दिलोजान से क्रांति का समर्थन करते थे, क्रांतिकारी मजदूरों एवं किसानों के प्रबल पक्षधर थे, उनके द्वारा सम्पादित ‘लांगल’ पत्रिका ही थी जिस में मैक्सिम गोर्की, किसी भी भारतीय भाषा में पहली बार छापे गये थे, फिर भी, ‘विद्रोही’ कविता का लक्ष्य, विशेष तौर पर शासक नहीं, शासित था। इसका लक्ष्य था बंगाली बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों एवं सामान्यत: उस मध्यवर्ग की कायरता जिसमें से वे आते थे। जबकि विशद में जाती हुई यह कविता जनता की उस बेफिक्र मानसिक स्थिति पर भी प्रहार करती थी जो, सोचते थे, तुलसीदासजी की भाषा में, “कोउ नृप होउ हमहि का हानी”।

हाल में सोशल मीडिया पर एक पत्रिका के पृष्ठ की तस्वीर घूमने लगी। मेरठ के जिला कारागार से दिनांक 12॰ 7॰ 1931 को, बांग्ला के अप्रतिम हास्यलेखक शिबराम चक्रबर्ती लिखी गई एक चिट्ठी में मुजफ्फर अहमद (मेरठ कम्युनिस्ट षड़यंत्र मुकदमे के प्रधान आरोपी) लिखते हैं कि जब उन्होने अपने लेखक मित्रों से किताबें भेजने क कहा, किसी ने (नजरूल ने भी) जबाब नहीं दिया। अगली ही पंक्ति में उन्होने लिखा, “वैसे मैं जानता हूं कि हमारे देश में साहित्यकार, राजनीति से घबराते हैं।” 

नजरूल ने इस डर और घबराहट को बेमिसाल तरीके से तोड़ा। ‘विद्रोही’ कविता बगावत, जिहाद, हमलावर युद्ध, विध्वंस, पाशविकतायें, प्राकृतिक आपदायें, सर्वनाश … और फिर प्रेम का उन्माद, संगीत की उदात्तता, नृत्य का आवेश … यानि उन सभी परिघटनाओं की बात करती है जो आम जीवन के घरेलू, वनस्पतिक चरित्र को खतरे में डाल देता है। उन सभी परिघटनाओं को कवि इतिहास से जोड़ता है, दुनिया की सभी सभ्यताओं की मिथकीय एवं पौराणिक घटनाओं से, उन घटनाओं से सम्बन्धित पात्रों से जोड़ता है। अपनी अपनी संस्कृतियों को विकसित करने में जनता ने जो गहन जीवनमूल्य विकसित किये हैं उन मूल्यों को प्रसंग में लेती है कविता। विद्रोही को उन तमाम चीजों से आवश्यक जीवनीशक्ति लेने की जरूरत है। लेकिन क्यों? अंत में कविता कहती है:

“मैं महाविद्रोही अक्लांत / उस दिन होऊंगा शांत / जब उत्पीड़ितों का क्रंदन शोक / आकाश वायु में नहीं गूंजेगा / जब अत्याचारी का खड्ग / निरीह के रक्त से नहीं रंजेगा / मैं विद्रोही रणक्लांत / मैं उस दिन होऊंगा शांत”

कविता शुरु हुई थी “बोलो वीर / बोलो चिर उन्नत मेरा शीश” के आह्वान के साथ। खत्म होती है, “मैं उस दिन होऊंगा शांत / पर तब तक / मैं विद्रोही दृढ बन / भगवान के वक्ष को भी / लातों से देता रहूंगा दस्तक / तब तक मैं विद्रोही वीर / पी कर जगत का विष / बन कर विजय ध्वजा / विश्व रणभूमि के बीचो-बीच / खड़ा रहूंगा अकेला / चिर उन्नत शीश …”

[इस आलेख में उद्धृत ‘विद्रोही’ कविता की सारी पंक्तियां www.thelallantop.com/bherant/ vidrohi-poem-by-revolutionary-poet-qazi-nazrul-islam/ से ली गई हैं।]




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