उद्वोधन
तुम्हारे देह त्यागने
के तीसवें दिन तुम्हारे साथ जो मेरी बातचीत हुई, उस दौरान तुमने कहा था कि अगर शुद्धाचार,
शुद्धचिंता और शुद्ध आचरण न हो तो तुम्हारे साथ आगे और मिलन की संभावना नहीं होगी।
तुमने यह भी कहा था कि तुम्हारी तरह न होने पर उन्नत मिलन की भूमि पर नहीं पहुंच पाउंगा।
उस दिन से तुम्हारी
तरह होने के लिये मैं और भी व्याकुल हुआ। फिर उसी दिन से न जाने क्यूँ तुम्हारे गुणों
का वर्णन करने लगा। उसी वर्णन के क्रम में इस जीवनी के लेखन की शुरुआत हुई। कितनी ही
बार ऐसा हुआ कि तुम्हारे गुणों का वर्णन करने में मैं मग्न हो गया। जब अपने देह में
थी तब मिलित जीवन की इस कहानी को तुम कितनी चाह से सुनती थी। कितनी बार पत्रों में
मैंने इस कहानी का वर्णन तुम्हे सुनाया है। आज तुम मेरे कितने पास हो! आओ, दोनों मिल
कर फिर से उस चिरपरिचित पवित्र कहानी की चर्चा करें।
जितने दिन तुम देह
में थी, हम दोनों ने सदा एक दूसरे के जीवन के साथ जुड़ने का प्रयास किया। आज भी मैं
वही कर रहा हूँ। इसी में हमारी उन्नति है, हमारी अनंत आशा है। पूरी तरह आत्मविस्मृत
हो कर, गंगा और यमुना की तरह एक दूसरे में मिलते हुए सागर में जा मिलने में अभी भी
शायद काफी विलम्ब है। तब तक, देखो, मैं तुम्हारी प्रकृति पाने के लिये यतन कर रहा हूँ:
इस बुढ़ापे में निरंतर भिक्षा मांग रहा हूँ ताकि तुम्हारी तरह, सेवा करने के लिये पागल
बन सकूँ। ईश्वर करें, इसी तरह मैं तुमसे मिल सकूँ। ईश्वर करें, इस युग्म-जीवन की कहानी
नरनारियों के काम आए।
अ: प्र:
सूचीपत्र
उद्वोधन
शुरूआत
वधु
पहला परिच्छेद 1866 विवाह
दुसरा परिच्छेद 1867 ससुराल
तीसरा परिच्छेद 1868-71 नवजीवन
चौथा परिच्छेद 1872-74 पहली गृहस्थी
पांचवां परिच्छेद 1874-75 अकेली
गृहिणी
छठा परिच्छेद 1875-76 मोतिहारी में पहली बार
सातवां परिच्छेद 1877-79 बांकीपुर में पहली बार
विकास
गृहस्थ बैरागिन
आठवां परिच्छेद 1880-81 मन का विस्तार
नौवां परिच्छेद 1882-83 तपस्या
का आरम्भ
दसवां परिच्छेद 1884 दैनिक जीवन और बेटी सुसार
का विवाह
इग्यारहवां परिच्छेद 1884-1886 मोतिहारी में दूसरी बार व आस्था
की परीक्षा
बारहवां परिच्छेद 1887-89 बांकीपुर में दूसरी बार
तेरहवां परिच्छेद 1889 राजगृह की तीर्थयात्रा
चौदहवां परिच्छेद 1889 सिमला
के पहाड़
पन्द्रहवां परिच्छेद 1890 राजगृह में दूसरी बार
सोलहवां परिच्छेद 1889-1890 रोग,
शोक में संगिनी
सतरहवां परिच्छेद 1890 देवी
अठारहवां परिच्छेद 1891 आध्यात्मिक विवाह
सेविका बनने की राह
पर
उन्नीसवां परिच्छेद 1891 सेविका
बनने का उद्यम व लखनऊ की यात्रा
बीसवां परिच्छेद 1891 लखनऊ
के कॉलेज में दैनिक जीवन
इक्कीसवां परिच्छेद 1891 दूर या निकट?
बाइसवां परिच्छेद 1891 लखनऊ
के कॉलेज में पहला छ: महीना
तेइसवां परिच्छेद 1891 पत्र-लेखन का परित्याग
चौबीसवां परिच्छेद 1891 पत्र-लेखन
के परित्याग का एक महीना
पच्चीसवां परिच्छेद 1891 लखनऊ के कॉलेज में आखरी
महीना
छब्बीसवां परिच्छेद 1891 लखनऊ के कॉलेज में छोटी
छोटी परीक्षायें
सत्ताइसवां परिच्छेद 1891 बेटी सुसार की परीक्षा
अट्ठाइसवां परिच्छेद 1891 लखनऊ से विदाई और लखनऊ
के परिणाम
उनतीसवां परिच्छेद 1891 लखनऊ से लौटते हुए
परिणति
सेविका
तीसवां परिच्छेद 1892 शिक्षिका
इकतीसवां परिच्छेद 1892 गुप्त गोदावरी
बत्तीसवां परिच्छेद 1893 बीमारी एवं पैसे की चिंताओं
का बोझ
तैंतीसवां परिच्छेद 1893 हीरानन्द
चौंतीसवां परिच्छेद 1893 और अधिक त्याग, और अधिक
आस्था
पैंतीसवां परिच्छेद 1894 पीड़ित
मित्रबंधु
छत्तीसवां परिच्छेद 1894 चिन्मय योग में वृद्धि
सैंतीसवां परिच्छेद 1895 ध्वजा वहन की शक्ति
अड़तीसवां परिच्छेद 1895 ‘तुम्हारे हाथों से वेदना का दान’
उनतालीसवां परिच्छेद 1896 ‘अपने आलय की ओर’
चालीसवां परिच्छेद 1896 मृत्यु की छायाओं से भरी
घाटी
इकतालीसवां परिच्छेद 1896 आनन्द धाम
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पहला खंड – वधु
पहला परिच्छेद – विवाह
तुम्हारे पिता के घर पर कोई भी तुम्हारे जन्म की सही तारीख नहीं बोल पाया था। [बांग्ला]
वर्ष 1263 के बैसाख में या अंग्रेजी वर्ष 1856 के मई-जून के महीने में, चौबीस परगना
जिले के अन्तर्गत माईहाटी परगना के श्रीपुर गांव में तुम्हारा जन्म हुआ था। एक तो कन्यासंतान,
उस पर गांवदेहात में जन्म, कैसे याद रहे तारीख? तुम्हारे पितामह हरचंद्र बसु समझदार
आदमी थे। गांव में उनकी हिम्मत और दानशीलता की चर्चा करते हैं लोग। स्थानीय पूजा और
पर्व आदि खूब मनाया करते थे। तुम्हारे घर पर दुर्गापूजा का उत्सव काफी धूमधाम से होता
था। शायद वर्ष 1862 में तुम्हारे घर पर जो पूजा हुआ था, उसमें निमंत्रण रखने के लिये
मैं तुम्हारे घर गया था और धूमधाम देख, थोड़ा भौंचक होकर आया था। तब नहीं जानता था कि
तुम्हारे साथ मेरा विवाह होगा। तुम्हारे पिता विपिनचंद्र बसु खुद उपार्जन करते थे।
कॉंट्रैक्टरी का काम कर कईयों की मदद किया करते थे। उन्होने स्वयं हमारे विवाह की बात
पक्की की थी।
वर्ष 1847 के जुलाई महीने में बहरमपुर में
मेरा जन्म हुआ। मेरे पिता स्वर्गीय प्राणकाली राय वहाँ कलक्टर के दफ्तर में काम करते
थे। परोपकारी व शुद्धाचारी के रूप में उनकी ख्याति थी। मैं उनका आठवां संतान हूँ। मेरे
सझले भैया पूर्णचंद्र राय भी बहरमपुर में काम करते थे। हमारा भी पैत्रिक निवास श्रीपुर
गांव में है। उस समय हमारी कुछ सांसारिक संपत्तियां थीं।
सोलह साल उम्र थी मेरी, जब पिताजी का स्वर्गवास
हुआ। बालक के तौर पर मेरी पढ़ाई का अच्छा इंतजाम नहीं हो पाया। पढ़ने के बजाय खेलने में
ही ज्यादा मन लगता था। सड़कों पर आवारागर्दी और बुरे लड़कों से मेलजोल बढ़ाने के कारण,
कई बुरी आदतें लग गई थी। बचपन में हमारे बहरमपुर वाले घर के निकट एक मंदिर था, उस मंदिर
में स्थापित रघुनाथजी की प्रतिमा पर मेरे मन में गहरी आस्था पनपी थी। एकबार विद्यालय
की परीक्षा के समय रघुनाथ से बहुत विनती की थी कि मुझे अव्वल दर्जा मिल जाए। ऐसा संयोग
हुआ कि परीक्षा के पहले मैं बीमार पड़ गया। अव्वल दर्जा नहीं मिला। इस कारण रघुनाथ जी
के प्रति मेरी श्रद्धा कम हो गई।
पिताजी के स्वर्गवास के बाद सझले भैया की बदली
हो गई जसोर। हमें भी बहरमपुर छोड़ना पड़ा। पढ़ाई के लिये मैं कलकत्ता आ गया। परिवार के
लोग अपने देश चले गये। हेयर साहब के स्कूल से सन 1864 में मैंने प्रवेशिका की परीक्षा
दी थी। किसी तरह दुसरी श्रेणी में पास किया। चरित्र मेरा जैसा था वैसा ही रहा। अगले
साल एफ-ए की परीक्षा के लिये फिर बहरमपुर गया। विश्वविद्यालय की प्रवेशिका परीक्षा
के पहले ही मैंने Tom Payne के Age of Reason शीर्षक पुस्तक का पाठ किया। पाठ के उपरांत
ईश्वर के अस्तित्व पर संदेह हुआ। वह संदेह और बढ़ने लगा जब दर्शन शास्त्र पढ़ने लगा।
क्रमश: मैं घोर धर्मद्वेषी बन गया। सभी के साथ बहस करता था और लगता था कि बहस में मैं
जीत भी रहा हूँ।
कुछ समय के बाद सझले भैयाजी कलकत्ता रेवेन्यु
बोर्ड का कर्मचारी बन कर कलकत्ता आए। एक दिन मैं कलकत्ता वाले घर में बैठा हुआ था।
अचानक स्वर्गीय गोपीनाथ रायचौधरी चाचाजी (तुम्हारे प्रिय फूफाजी) सझले भैया के साथ
कुछ सलाहमशविरा कर मेरे पास आये और पूछे, “प्रकाश, विवाह करने में क्या तुम्हे कोई
आपत्ति है?” मैंने सिर्फ कहा, “नहीं”। पता नहीं क्यों कहा “नहीं”। तय हो गया कि विवाह
होगा। सामानों की खरीद होने लगी।
विवाह एक नई बात थी। मेरा मन बहुत उत्सुक हो
उठा। बहरमपुर कॉलेज से छुट्टी लेकर श्रीपुर गया। घर घर घूम घूम कर न्योता खाते रहा।
सभी ने खूब खातिरदारी की। सिर्फ एक जगह पर, हमारे परिवार के गुरुजी घर पर थोड़ी अलग
बात हुई। उन दिनोम मैं नास्तिक था, कुछ भी नहीं मानता था। माता की इच्छा और आज्ञानुसार
गुरुजी के घर पर न्योता खाने गया। मेरी पालकी पहुँची; किसी ने खास स्वागत नहीं किया।
मैं बैठकखाने के अन्दर गया तो भीतर जाने की आज्ञा मिली – में जनानखाने में प्रवेश किया।
कुछेक औरतें झंझट करने लगीं, फिर कुछ मिठाइयां दी गई। दिन भर तो खाने का ही सिलसिला
चला था, वहां भी कुछ खा लिया। सोचा था कि खाने के बाद छुट्टी मिल जाएगी लेकिन आदेश
हुआ, “जूठे बर्तन उठाकर ले जाओ।“ उस घर में नौकर थे, मेरे साथ भी नौकर था। लेकिन मुझे
ही उठाने पड़ेंगे। कितनी अजीब बात थी! जिस वर को सभी जगहों पर दुलार और सम्मान मिला,
जो आज सभी के बीच श्रेष्ठ है, गुरु के घर में उसकी यह दुर्दशा! गुरुगिरी को धिक्कारा। जो कुछ करने पर इस गुरुगिरी की
मदद न हो उन पर नजर गई। पर मजबूर था। डर के मारे जूठा उठा लिया।
हम घर लौट आए। वरण
के उपरांत पुत्र और वधु को घर के अन्दर लिया गया। अगले दिन भर भर कर फूलशय्या के सामान
आते रहे। पहनने के बहुत सारे कपड़े मिले पर उनकी ओर मेरी नजर नहीं थी। मैं बस प्रयास
में था कि किसी तरह तुम्हारे मुंह से कोई बात निकले। कितनी कोशिश की, उपाय साधे पर
सफल नहीं हो पाया। नहीं जानता हूँ तुम्हारे पिता के घर पर तुम्हे किसने क्या सिखा दिया
था। हमारे विवाह के नौ-दस दिन बाद हमारे गांव में एक और विवाह सम्पन्न हुआ। तुम्हारे
हरनाथ चाचाजी की बेटी का विवाह। उस विवाह में टाकी के विपिन बसु बारात आये थे। बाकी
बारातियों के साथ सोने में दिक्कत होगी जान कर वह हमारे घर आये और अपनी दीदी (मेरे
मझले भैया की पत्नी) से बोले कि वह रात में हमारे घर पर सोयेंगे। घर में अतिरिक्त कमरा
नहीं था। चाहे मुझे परेशान करने के ख्याल से हो या भाई के स्वागत के ख्याल से, मझली
बहु ने सीधा कह दिया, ‘छोटेबाबु के साथ सो जाना’। यह बात मुझे अच्छी नहीं लगी। एक दिन
के बाद तुम अपने पिता के घर चली जाओगी, मैं भी अपनी पढ़ाई की जगह पर चला जाउंगा, इस
बीच अब ये क्या विपत्ति आ गई! मैं अपना बिस्तर छोड़ दिया लेकिन तुम्हारी निकटता नहीं
छोड़ पया। मझली बहु को मैंने कहा, “बीच वाले बड़े घर में जमीन पर मेरा बिस्तर बनाया जाय।”
वही हुआ; लेकिन इतने प्रयासों का कोई पुरस्कार नहीं मिला। तुमसे एक भी शब्द मैं नहीं
कहलवा सका। लौट कर पिता के घर चले जाने के पहले वाली रात को सिर्फ बोली, “कल मैं चली
जाउंगी।” उसी से मैं कृतार्थ हुआ। कितना आशीर्वाद किया तुम्हे। तुम चली गई पिता के
घर। मैंने भी संकल्प किया, इस पत्नी के लायक बनुंगा, अपने चरित्र को पवित्र करुंगा।
उन दिनों धर्म-कर्म से कोई वास्ता नहीं, ईश्वर को नहीं जानता था। पवित्रता मेरा लक्ष्य
बना तुम्हारे लिए।
सझले भैया तब कलकत्ता
में काम कर रहे थे। मुझे अपने पास रखने के लिये उन्होने बहुत कहा। लेकिन मेरा मन उसके
लिये तैयार नहीं हुआ। बहरमपुर वाले घर में थोड़ी आजादी के साथ रह पाउंगा सोच कर वहीं
चला गया।
दूसरा परिच्छेद – ससुराल
पहले ही कह चुका हूँ
कि उन दिनों दार्शनिक पुस्तकें पढ़ कर मेरा धर्मभाव शुरू हो गया था। मैं नास्तिक हुआ
था। मन की वही गति अगर हमेशा रहती, तुम्हारी और मेरी क्या दशा होती! लेकिन भगवान ने
वैसा होने नहीं दिया। बहरमपुर में तब पादरी थे आदरनीय एस जे हिल साहब। उनसे मेरा परिचय
हुआ; घनिष्टता बढ़ी। वह खुद और उनकी पत्नी, दोनों मुझे अपने संतान की तरह देखते थे।
हिल साहब के पास बाइबिल पढ़ने लगा तथा उनके संत चरित्र का अध्ययन करने लगा। ईश्वर की
कृपा से अब समझ में आई कि संत चरित्र किसे कहते हैं। ईसा मसीह को उन्होने अपने जीवन
में पाया था, भारतवासियों से बहुत प्यार करते थे। बांग्ला ऐसी बोलते थे कि लगता था
बिल्कुल एक बंगाली बात कर रहा है।
अगले दो महीनों में
तुमलोगों के घर पर बड़ी विपत्ति आ गई। तुम्हारे पिता चेचक की बीमारी से भयानक रूप से
ग्रसित हुए। उनकी मृत्यु हुई। शोक के आवेग में तुम आंगन पहुंच कर पिता के मृत शरीर
से लिपट गई। नतीजे में तुम्हे भी चेचक हुआ। क्रमश: तुम्हारी बहन यामिनी और भाई ज्ञान
को भी हुआ। खबर मिलते ही मैं देखने जाने को बेचैन हुआ। लेकिन सझले भैया की अनुमति नहीं
मिलने के कारण जा नहीं पाया। मन का कष्ट मन में ही रख कर चुप रहा।
तुम दो बहनें जल्द
स्वस्थ हो उठीं पर भाई ज्ञान की तबियत खराब होती गई। ज्ञान की सेवा में तुम्हे व्यस्त होना पड़ा। विधवा मां अन्य संतानों को लेकर व्यस्त
रहती थी। ज्ञान का समूचा भार तुम्हारे ही उपर आ पड़ा। उस वक्त तुम्हारी भी उम्र मात्र
दस वर्ष थी। ज्ञान को लेकर भवानीपुर में तुम्हे नाना के घर पर आना पड़ा। काफी परिश्रम
और सेवा के उपरांत ज्ञान बच गये लेकिन उनकी एक आंख चली गई।
विवाह के कुछ दिनों के बाद तुम्हारे चरित्र
का एक सुलक्षण समझ में आया। बहुत कम उम्र में तुम्हे उस्ताद रसोइया होने की ख्याति
मिली थी। काम वाले घर में बहुत सारा काम कर सकती हो ऐसी ख्याति फैल गई थी। एक दिन किसी
कामकाज में बुलाये जाने पर मोहल्ले के कुटुम्ब के घर गई थी। रसोई का काम समाप्त होने
के बाद आंगन में देखने गई कि निमंत्रित महिलाओं का आदर-सत्कार किस प्रकार हो रहा है।
आश्चर्य आचरण देखा तुमने – जो अच्छे कपड़े, अच्छे अलंकार पहन कर आ रहे हैं उनका आदर
किया जा रहा है और जो महिलाएं सामान्य कपड़ों में, बिना गहनों के आ रहे हैं उनका निरादर
किया जा रहा है। भोजन के समय भी आचरण की यह भिन्नता देखी गई। तुम बालिका थी, तुम्हारे
मन में गहरी चोट पहुँची। धन का इतना सम्मान? कैसा अन्याय है यह! उसी दिन तुमने ठान
लिया, जितना हो सके दुखियों की मदद करोगी।
कुछ महीनों के बाद मैं भी बहरमपुर त्याग कर कलकत्ता आ गया। उस वक्त तक हिल साहब के चरित्र की तस्वीर मेरे हृदय में अंकित हो चुकी थी। समझ चुका हूँ कि ईशा के धर्म से मनुष्य की भलाई हो पायेगी। कलकत्ता आ कर ईसाई भाईयों के साथ बातचीत और धर्म की चर्चा करने लगा। उस समय मैं ब्राह्मो धर्म का विरोधी था। जिस धर्म में शास्त्र नहीं है उस धर्म के सहारे मुक्ति कैसे मिलेगी समझ में नहीं आता था। स्वयं ईश्वर ही शास्त्र हैं यह बात मेरी बुद्धि के बाहर की थी। और एक कारण यह था कि ब्राह्मोंजनों में जो अच्छे लोग थे उनमें से किसी के साथ मेरा परिचय नहीं हुआ था। बहरमपुर के ब्राह्मोधर्म में मेरा जी नहीं लगा। वहां एक ब्राह्मोसमाज था लेकिन वहाँ जा कर सुख नहीं मिलता था। जीवनशून्य धर्म मेरे मन को आकर्षित नहीं कर पाता था। फलस्वरूप हिल साहब का, जीवन से जुड़े धर्म के लिये मैं लालायित होने लगा। अनेकों ईसाई पुस्तक पढ़ने लगा। ईसाई बनने के लिये मन तैयार होने लगा। समझा कि पापों से मुक्ति के बिना मनुष्य का चलता नहीं। एक दिन रात के ग्यारह बजे पाठ समाप्त कर मैंने कहा, कल मैं ईसाई धर्म में दीक्षाप्राप्त (baptised) होउंगा। मेरे कमरे में एक मेरे बालसखा सोये हुये थे। उन्होने कितना समझाया। तुम्हारे साथ उस समय मेरा नया नया विवाह हुआ था; तुम्हारी बात भी उन्होने याद करा दिया। लेकिन किसी भी तरह मेरा मन नहीं माना। कैसे मुझे पापों से मुक्ति मिलेगी यही सोच मेरे मन को अधिकार कर रखा था। बालसखा के साथ बात करते हुये याद आया कि मेरे प्रिय शिक्षा-गुरू आदरणीय ईशानबाबु कहते थे, कोई गंभीर कार्य करने से पहले 24 घंटा समय लेना। 24 घंटे का इंतजार मैंने स्वीकार किया। इतने दिन जब बीत गये तब और 24 घंटे इंतजार करने से क्या फर्क पड़ेगा? एक दिन के लिये मैं रुक गया। उस रात को अगर ईसाई बन जाता तो क्या होता पता नहीं। जो भी हो, मेरे मन का यह भाव तब देख नहीं पाती। तुम मेरे साथ आती भी या नहीं, कौन जानता है? वही जो 24 घंटे का समय लिया, उसी के चलते बच गया। अगले दिन अपराह्न में सुनने को मिला कि एक ईसाई सहपाठी ने प्रश्नपत्र की चोरी की है। परीक्षा के दिन रजिस्ट्रार सटक्लिफ साहब ने उसे बहिष्कृत कर दिया। हमारी परीक्षा बंद हो गई। हुक्म जारी हुआ कि फिर से परीक्षा ली जाएगी। जब ईसाई भाई को भगा दिया गया, मेरा मन घबराने लगा। सोचने लगा कि ईसाई होने पर भी चोरी करने की इच्छा से त्राण नहीं मिलता है, ईसाई धर्म में दीक्षा नहीं ले पाया।
उसके बाद
1867 की गर्मी की छुट्टी के समय मेरे गांव में तुम्हारे साथ मेरी भेंट हुई। विवाह के
बाद तुम्हारे साथ यह मेरी पहली भेंट थी। तब तक भी तुम्हारे साथ अच्छी तरह मेरी पहचान
नहीं हुई थी। एक बार में, या एक दिन में तुम मेरे हाथों में आत्मसमर्पण नहीं कर पाई
थी। यहां तक कि उस समय एक दिन मुझ पर नाराज हो कर बोली, “ये सारे बिस्तर बगैरह कहां
से मिले? मेरे पिता दिये तभी तो मिला तुम्हे?”
वर्ष
1867 के मध्य में देश से पूरा परिवार कलकत्ता ले आए। भवानीपुर में घर लिया गया। और
सभी के साथ तुम भी आए। विवाह के बाद यह दूसरी बार तुम्हारे साथ मेरा रहना हुआ। तुम्हारे
साथ रहने की इच्छा होती थी, लेकिन उपाय नहीं थे। उन दिनों घर के सभी लोग तुम्हारी बहुत
निंदा करते थे। ससुराल आने के बाद वधु शुरू शुरू में जैसे निंदित होती है, वैसी निंदा।
मुझे कष्ट होता था और सोचता था, तुम्हारे जो दोष हैं सारे शायद मीठी बातों से सुधर
सकते हैं। दिन में तुम्हारे साथ भेंट नहीं होती थी। नींद से थोड़ा पहले भेंट होती थी।
ऐसी स्थिति में समझ ही रही हो, प्यार पनपने में कितने दिन लग जाते हैं। एक तुम और एक
मैं जैसे दो स्वतंत्र जीव बन कर रहते थे।
उन दिनों
तुम कितनी बुद्धि रखती थी बताने के लिये एक कहानी कहूंगा। तीसरी बहु की बुढ़ी दाई घर
के पीछे वाले तालाब में कपड़े फींच रही थी। तुम भी उस घाट पर काम करने गई थी। अचानक
तुम्हारे हाथ के पानी का छींटा उसके शरीर पर पड़ा। कम उम्र की नई बहु की परवाह कोई भी
नहीं करता है। वह बूढ़ी तुम्हे कस कर डांट पिला दी। तुम क्या कहोगी समझ नहीं पाई तो
बोल दी, “इतना डांट क्यों रही हो? सौतन हो क्या मेरी?” ‘सौतन’ से अधिक तीखा शब्द शायद
तुम्हे मिला नहीं। मिले भी तो कैसे? ‘सेँजुति’ व्रत, और भी कितने सारे व्रत कर तुम
बाल्यावस्था से ही सौतन से नफरत करना सीखे थे। खैर, तुम्हे उस बात पर ढेर सारी बातें
सुननी पड़ी। ऐसी थी तब तुम, और वही तुम बाद में कितनी बुद्धिमान महिला के
रूप में जानी जाने लगी।
जो भी हो,
इसी बार तुम्हारे साथ मेरी आत्मीयता बनने लगी। तुम समझने लगी कि मैं तुम्हारा अपना
हूँ। लेकिन ज्यादा दिन हम एक साथ नहीं रह पाए। सझले भैया की पत्नी की मृत्यु हुई। पूरे
परिवार को कलकत्ता से देश भेज दिया गया।
ईसाई बनने के संकल्प
को तिलांजलि दे चुका हूँ, लेकिन किसी दूसरे धर्म में भी मन नहीं बैठ रहा था तब तक।
ऐसी अवस्था में सन 1867 के जाड़े की छुट्टियों में देश गया। एकदिन घर पर बैठा हूँ, एकाएक
हमारे गाँव के कुछ साथी मुझे बुलाने आये। उनमें थे, आगे के दिनों में
कलकत्ता स्थित हेयर व हिंदु स्कूल के शिक्षक बने केदार नाथ राय, मेटिरिओलजिकल ऑफिस
के किरानी बनने वाले (बाद में राव साहब) फणींद्रमोहन बसु और पटलडांगा के कविराज पंचानन घोष कविरत्न। उन्होने
कहा, योगीन्द्र चौधुरी के घर पर बालिका विद्यालय के लिये बैठक होगी, तुम भी चलो। नास्तिक होने के बावजूद इस तरह के सामाजिक
विषयों के प्रति मेरी पूर्ण सहानुभूति थी। बैठक के जो भी कार्य थे हमने किये, फिर सभी
नदी तट पर घूमने गये। उसके कुछ ही दिन पहले जेठ का बड़ा तुफान आया था। हरि दत्त महाशय
के मकान के बाहरी घर का छप्पर गिर गया था। सभी उस गिरे हुए घर में प्रवेश किए। देखादेखी
मैं भी प्रवेश किया। कुछेक खाट थे अन्दर; अंधेरे कमरे में खाट पर सभी बैठे, मैं भी
बैठा। एक-दो गीत हुए ब्राह्मो समाज के। मुझे कोई खास अच्छी नहीं लगी। उसके बाद सभी
प्रार्थना करने लगे। उनके बीच मैं विद्यालय के सबसे ऊंचे कक्षा में पढ़नेवाला था। मेरे
मन में अभिमान जगा, “ये लोग प्रार्थना कर सकते हैं, मैं नहीं कर सकता हूं?” मैंने भी
प्रार्थना की। मैंने कहा, “ईश्वर, तुम्हारे पास सभी ने प्रार्थना की। मैं तुम्हे पहचानता
नहीं हूं, जानता भी नहीं हूं, अगर तुम हो और तुम्हारी इच्छा हो तो मुझे तुमको देखने
और पहचानने दो।” इस तरह अनिश्चित, अंजाने और अपरिचित ईश्वर से मैंने प्रार्थना की।
प्रार्थना का कारण था अभिमान – सब करेंगे, मैं नहीं करुंगा? लेकिन ज्यों ही किया, पकड़ा
गया। उस दिन से उन प्रिय मित्रों का संगत मेरे मन को आकृष्ट करने लगा।
धर्म को ले कर मेरे
मन में इसी प्रकार का आंदोलन चल रहा था। उस समय तक तुम्हारे साथ ऐसे संबंध नहीं बने
थे कि तुम्हे मेरे इन संघर्षों का हिस्सा दूं। दूसरी ओर तुम उस समय तक नववधु थी; तुम
पर मेरा खास कुछ अधिकार नहीं था। संयुक्त परिवार में अगर प्रेम का राज न हो तो जो दशा
होती है वही मेरे घर की दशा थी। सब अपना अपना ले कर व्यस्त थे। बल्कि, एक साथ रहने
के कारण एक दूसरे से अपेक्षा और आरोप के भाव अक्सर दिखते रहते थे। ऐसे परिवार में नई
असहाय कोई बालिका आ जाए तो आसानी से किसी को वह अपना नहीं मान पाएगी। तुम्हारी भी हालत
वही हुई।
इन्ही दिनों हमारी
पारिवारिक स्थिति और भी खराब हुई। तुम्हे भी उसका परिणाम भुगतना पड़ा। जायदाद को ले
कर बड़े भैया और सझले भैया में कलह शुरू हो गया। मैं बीच में रह कर बहुत प्रयास किया
लेकिन कलह दिन प्रति दिन बढ़ता ही गया। अदालत ने कहा कि जायदाद में सभी भाइयों का अधिकार
है। लेकिन अदालत के कहने से क्या होगा? जब इच्छा ही वही हो तो सम्पत्ति बर्बाद करने
में कितने दिन लगते हैं? देखते देखते उतना सुन्दर पुश्तैनी जायदाद नष्ट होने लगा। मैंने
भरसक कोशिश की कि बचे। इसमें मेरी पढ़ाई को भी काफी नुकसान पहुँचा। पर कुछ भी हो नहीं
पाया। मेरी आंखों के सामने 60/70 हजार रुपयों का जायदाद 5 हजार की देनदारी के चलते
हुई डिक्री में बिक गया। तब सिर्फ हाय हाय बाकी रहा। जो भी हो, नश्वर जायदाद गया तो
मेरा मंगल हुआ। रहता तो शायद ईश्वर के प्रति मन आगे अधिक आकर्षित नहीं होता।
जायदाद गई। घर की
स्थिति और खराब हुई। तुमोलोगों की मेहनत बढ़ी। उस समय तक भी तुम वधु के उपयुक्त सारे
आचरण अच्छी तरह सीख नहीं पाई थी। इसलिए ससुराल में बहुत डांट फटकार भी सुननी पड़ती थी।
मुकदमे के झंझटों में मेरी भी पढ़ाई लिखाई लगभग खत्म ही हो गई।
सझले भैया दूसरी बार
विवाह किए। छोटी सी दुल्हन अकेली कैसे विदेश में रहेगी यह सोच कर तय हुआ कि पूरे परिवार
को कलकत्ता लाया जाएगा। सझले भैया की सुविधा में मेरी भी सुविधा हुई। फिर तुम्हारे
साथ रहने का मौका मिला। लेकिन इस घर में भी मेरी कोई मर्यादा नहीं थी क्योंकि पढ़ाई
लिखाई लगभग खत्म हो गई थी, जबकि कोई कामकाज मैं शुरू नहीं किया था। फलस्वरूप तुम्हारी
भी कोई मर्यादा नहीं थी। इस घर में भी तुम्हारे लिये कुछ करने की क्षमता मुझ में नहीं
थी। सारा दिन तुम्हे रसोई आदि के काम में जुटा रहना पड़ता था। कुछ खाई या नहीं खाई मैं
जान भी नहीं पाता था हर वक्त। मेरी इच्छा होती थी तुम्हे पढ़ना लिखना सिखाऊं। दिन में
मौका नहीं मिलता था। सभी के सो जाने के बाद जब तुम सोने के लिये आती थी, तब तुम्हारी
पढ़ाई शुरू होती थी। मैं गुरू बन कर अलग बैठता था, तुम छात्रा बन कर डरती हुई दूर में
बैठती थी। पूरे लगाव के साथ अपना पाठ सीखती थी। इस तरह तुम्हारा क, ख, शुरू हुआ; क्रमश:
प्रथम भाग, द्वितीय भाग समाप्त हो गया।
कुछ दिनों के बाद
तुम देश लौट गई, मैं कलकत्ता में रह गया। पर तुम्हारी खबर मिलनी चाहिए थी। लिफाफे पर
अपना पता लिख कर चिट्ठी में भर कर भेज देता था। कहां से जुटता था यह खर्च? लड़कों को
पढ़ाता था। कभी 10 कभी 15 रुपए मिलते थे। विद्यालय की फीस आदि का भुगतान उसी से हो जाता
था, बाकी जो कुछ रहता था उस में से हर महीने तुम्हे 5-5 रुपए भेज कर खुद को बहुत सुखी
महसूस करता था। पढ़ाई के समय विवाह होने पर क्या स्थिति होती है मैं विलक्षण समझ गया
था। हमेशा तुम याद आती थी। पढ़ रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ, अचानक तुम्हारी एक बात याद आई,
बस, पढ़ाई बन्द हो गई। बहुत देर तक बस सोचता ही रहा। किताब खुली कि खुली पड़ी रही। खास
कर उन दिनों ससुराल में तुम्हारा जीवन कोई सुख का जीवन नहीं था। नतीजतन अक्सर तुम्हारे
लिये मुझे चिंतित होना पड़ता था। इस तरह मेरा कितना समय बर्बाद होता था उसका कोई हिसाब
नहीं है। तब मैं बीए पढ़ रहा था। मुकदमे के बाद भी सझले भैया मुझे दूसरे कई प्रकार के
काम में लगा देते थे। परिणति यही हुई कि मैं बीए की परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाया।
तीसरा परिच्छेद – नवजीवन
धर्म को ले कर मेरे
मन में जो हलचल मचा था, वह पहले ही कह चुका हूँ। हमारे गाँव के उन मित्रों के साथ मेरी
नजदीकी दिन प्रति दिन बढ़ने लगी। जितनी बार देश जाता था, इनके ही संग संग रहता था। इसी
समय केदार प्रचारक बनने के लिये श्रीपुर गए। उनका उत्साह, उद्यम, व्याकुलता, फणी का
नि:स्वार्थ प्रेम, पंचानन की सरलता मेरे लिये बहुत ही सहायक हुई थी। पंचानन तो मेरा
साथ लगभग छोड़ते ही नहीं थे। हम दोनों अक्सर नदी के तट पर भ्रमण करते थे। वह गीत गाते
थे, मुझे बहुत अच्छे लगते थे वे गीत। मुझे लौटाकर लाने के लिये सभी कोशिश कर रहे थे।
देवता पता नहीं कहाँ से इनलोगों को जैसे भेज दिये थे मेरे पास।
इस समय की और एक घटना
याद आ रही है। एकदिन ससुराल से मेरे लिये निमंत्रण आया है, मैंने निमंत्रण ग्रहण किया
है। उसके बाद सुना कि टाकी ब्राह्मोसमाज का वार्षिक उत्सव होगां। मैंने कहा मैं भी
जाउंगा। जाने पर तुम्हे छोड़ कर जाना होगा। उस जाड़े में रात के तीन बजे बिस्तर छोड़ कर
नदी पार करना होगा, नहीं तो उत्सव की जगह पर पहुँचने में विलंब होगा। समझ ही सकती हो
कि रात के 11 बजे भोजन और उसके बाद शयन होने पर रात के तीन बजे उठना कितना कष्टदायक
है। जीवन भर के मित्र फणी से कहा, “मुझे बुलाना।” फणी ने स्वीकार किया। वह मेरे परम
सहायक थे। तुम्हारे पिता के घर पर ऊपरी कमरे में सोया हुआ था। फणी ने आ कर पुकारा।
उस दिन की उस पुकार ने न सिर्फ मेरे शरीर बल्कि मेरी आत्मा को भी सचेत कर दिया था।
उठ कर तुम्हे बिना बताए आहिस्ते आहिस्ते भाग गया। प्राण में ऐसा एक आवेग आया, लगा जैसे
किसी मायाविनी ने आ कर पुकारा, मैं भी भूला सा उसके संग चला गया। यमुना नदी पार करते
करते किसी ने एक गीत गाना शुरू किया, “बलिहारी हो तुम्हारी”। पहले वह गीत मैंने कभी
सुना नहीं था। मुग्ध हुआ मेरा प्राण। मन में कितने प्रकार के भावों की लहरें उठी थीं,
कहुंगा तो खत्म नहीं कर पाउंगा। उसके बाद जब गीत का वह हिस्सा आया, “न था यह सबकुछ,
अंधेरा था बहुत”, मैं रो दिया। टाकी पहुंचा। श्री हरलाल राय तब हमारे इलाके के श्रेष्ठ
ब्राह्मो थे। उन्होने ही उपासना की। उपासना के बाद खड़ा हो कर जो प्रार्थना की उन्होने
वह अति अद्भुत थी। दोनों हाथ उठा कर, आंखें बंद कर कितनी अपूर्व शोभा में शोभित हो
कर वह प्रार्थना कर रहे थे, बोल नहीं पाउंगा। नहीं देखने पर समझ में नहीं आती है बात।
उस दिन टाकी में ही भोजन आदि सम्पन्न हुआ; शाम को घर लौट आया।
फणी का घर हमारे मिलने की जगह थी। एक दिन शाम
के समय धर्मबंधुओं ने संकीर्तन किया; मैं भी एक तरफ बैठा हुआ था। उनका एक कमरा उस वक्त
नया बन रहा था, पूरे फर्श पर मिट्टी बराबर नहीं की गई थी, उसी कमरे में संकीर्तन हुआ।
पहले बैठ कर हो रहा था, फिर धीरे धीरे सब खड़े हो गये। गीत गाया जा रहा है, “पंगु
को पर्वत पार कराते हो तुम, बौने के हाथों में चांद देते हो, हे नाथ।” थोड़ी देर के बाद दीप बुझा दिया गया। अंधेरे
में उनका वह मतवाला कीर्तन मैं कभी नहीं भूलूंगा। उनका मतवालापन देख मैं छुप कर बोलने
लगा, “भगवन, इन्हे जो सुख
दिया है तुमने, मुझे नहीं दोगे?” जितनी बार बोल रहा था आंसुओं से मेरा वक्ष भीग रहा
था। इतना मीठा रोना मैं कभी नहीं रोया।
इस तरह क्रमश: मैं
ब्राह्मोधर्म की ओर आकर्षित होने लगा। एक तरफ तुम्हारा आकर्षण, दूसरी तरफ ब्राह्मोबंधुओं
का आकर्षण, दोनों बढ़ने लगा। कलकत्ता आ कर ब्राह्मोबंधुओं के साथ उत्सव में हिस्सा लिया।
वर्ष 1868 का माघोत्सव एक यादगार बन गया। उसी बार पहला नगर संकीर्तन हुआ। “तुम सब आओ
भाई, इतने दिनों में दुख की रात का अंत हुआ, नगर में उठा ब्रह्मनाम” – यही गीत हुआ
था। मेरा मन इस गीत में रम गया। उस समय से नियमित तौर पर भवानीपुर ब्राह्मोसमाज की
उपासना में जाने लगा। मित्र फणी इस समय मेरी बहुत सहायता करने लगे।
वर्ष 1868 के अंत
की छुट्टियों में देश गया। उस समय एक और परीक्षा से गुजरना पड़ा था। तय था कि वर्ष
1869 में, कलकत्ता में होने वाले माघोत्सव में मैं जाउंगा। तभी तुम एक दिन जहरीले बेर
खा कर बीमार हो गई। दो-तीन डाक्टर बुलवा कर इलाज कराया गया। जहर बाहर नहीं आया पर दवा
के प्रभाव से नष्ट हुआ। उसके बाद तुम्हे बुखार आया। उसी दिन मुझे कलकत्ता जाना था।
मन बहुत बेचैन हुआ। कलकत्ता जाउं या गंभीर रूप से बीमार पत्नी की सेवा करूं! रात के आहार के बाद सारे लोग सो गये। तुम्हे सावधानी के साथ बिस्तर पर लिटा दिया।
मच्छरदानी गिरा कर चारो तरफ ठीक कर दिया, फिर घर छोड़ा। मा कितनी बार मना की, तुम्हारे
बारे में याद कराती रही। उत्तर
में मैने कहा, “नदी में ज्वार आया है, अब मैं देर नहीं कर पाउंगा”। कलकत्ता का उत्सव बीत रहा है, क्या अब रुक सकता हूँ मैं? तुम्हे छोड़ आया जरूर,
लेकिन नाव पर आ कर अंधेरे में आंसू बहाते रहा। बहुत देर के बाद नींद आई। उस बर कलकत्ते
का उत्सव अत्यंत विलक्षण होने का एहसास होने लगा। विधाता के लिए पहली बार जो त्याग
स्वीकार किया, फलस्वरूप प्रभू की करुणा का भोग अधिक मात्रा में किया।
जब नई सझली बहु के साथ तुम कलकत्ता आई, तब
से प्रयास करने लगा कि मेरा धर्म तुम्हे भी दूं। हर दिन सुबह एक न एक गीत गाता था और
थोड़ी प्रार्थना करता था। “गाओ उन्हे गाओ सदा
तरुण भानु” – यह गीत मैं लगभग रोज गाता था। तुम उठ कर बैठती, तब प्रार्थना होती थी।
उसी अवधि में एक दिन माँ तुम्हे षष्ठी व्रत करने को बोली। षष्ठी में भात नहीं खाया
जाता है – मुझे लगा यह अंधविश्वास है। मैं कहा, तुम्हे भात खाना होगा। तुम दुतरफा संकट
से घिरी – सास की बात रखें या पति की बात रखें। उस समय मैं यह बात जान नहीं पाया। बाद
में सुना कि तुमने दोनों तरफ की बात रखने की कोशिश की थी। अपराह्न में भात खा कर रात
को पुरी खाई थी। मैंने जब पूछा तो तुमने कहा भात खाई हो। मां से तुमने क्या कहा था
मालूम नहीं। बालिका थी, उम्र कम थी इसलिए समझ नहीं पाई थी कि दो तरफ की रक्षा आदमी
के लिये संभव नहीं।
इस घटना के कुछ दिनों
बाद घर बदला गया – माणिकतला से मिर्जापुर। औरतों को ले कर जाने
का जिम्मा मुझे मिला। इसमें नया कुछ नहीं था। सभी मुझसे प्यार करते थे और इस किस्म
के कार्यभार अक्सर मुझे ही दिए जाते थे। मैं भी इस तरह के कामों से कभी कतराता नहीं
था। हमलोग पैदल जा रहे थे – मैं आगे आगे, माँ और बहुएं पीछे पीछे। एक बार नजर घुमा
कर देखा तुमलोगों ने अपने अपने कपड़े एक दुसरे से जोड़ लिए हैं। जैसे मनुष्यों के एक
समुह से बनी जंजीर चल रही थी। देख कर बड़ी हँसी आई। पूछने पर जाना कि कोई रास्ता खो
न जाए इस डर से तुमलोगों ने ऐसा किया है। बाल्यावस्था में यह स्थिति थी, और अंतिम जीवनकाल
में अकेले ही कितनी बार ट्रेन से चली गई हो। जहाँ भी निडर होने की जरूरत पड़ी, तुम कभी
पीछे नहीं हटी।
कालांतर में, संतान का जन्म देने के लिये तुम
पिता के घर गई। वहाँ जा कर तुम्हे बुखार हुआ। जब तुम्हे आठ महीने का गर्भ था तब बहुत
अधिक बुखार आया और दिन प्रति दिन बढ़ता रहा। इधर कलकत्ता वाले घर में नई सझली बहु चल
बसीं। तुम्हारी स्थिति भी गंभीर रूप से संकटमय हो गई। जीवन की आशंका उत्पन्न हुई। अंत
में तुम्हारे मौसाजी डाक्टर श्री गोविंद चंद्र दत्त, तुम्हारे प्राणरक्षा की जरूरत
के कारण गर्भ के शिशु को नष्ट करने कृतसंकल्प हो उठे। सारी व्यवस्था हो गई। किस घर
में वह काम होगा, किस दवा की जरूरत पड़ेगी सब कुछ तय हो गया। इतना बड़ा काम अकेले करना
ठीक नहीं इसलिए टाकी से लखनऊ-प्रवासी बड़ा डाक्टर श्री चंडीचरण घोष महाशय को लाने आदमी
भेजा गया। टाकी जाने के लिये नदी पार करना पड़ता है। नदी में तुफान उठा, इसलिये उस रात
को वह डाक्टर को नहीं ला पाया। सारा आयोजन किया गया कि पौ फटते ही डाक्टर आयेंगे और
दवा के प्रयोग द्वारा गर्भ के शिशु को वध किया जायेगा। मनुष्यों ने संतान-वध के सारे
उपकरण तय किये, लेकिन भगवान तो मनुष्य के हिसाब से नहीं चलते हैं। रात में ही दर्द
शुरू हो गया। प्रसूता तुम थी और तुम डाक्टरों का पूरा षड्यंत्र सुन चुकी थी। किसी को
कुछ कहे बिना रात के दो बजे अकेले दौड़ कर नीचे के कमरे में आई। बिना कोई क्लेश दिये
तुम्हारा पहला संतान सुसारवासिनी जन्म लीं। जिस कमरे को उनकी मृत्यु का कमरा निर्धारित
किया गया था उसी कमरे में उनका जन्म हुआ। गोविंद डाक्टर सबेरे आ कर देखे कि घर से धुँआ
निकल रहा है। सभी आनंदित हुए। खबर मिलने पर मैने भगवान को कितने धन्यवाद दिए उसका हिसाब
नहीं है। इसी तरह मैंने जाना कि उनका जो विधान होता है उसकी अन्यथा नहीं होती।
ये सारी बातें तुम्हारे ही मुख से मैंने सुनी
है, फिर तुम्हे ही कह रहा हूँ। इस घटना के द्वारा पहली बार तुम्हारी इच्छाशक्ति का
जन्म हुआ। अगर तुम्हारे मन में प्रबल वेग का संचार नहीं हुआ होता, शिशु के प्राण की
रक्षा के लिए इतनी व्याकुलता नहीं आई होती, तब उस रात को बेटी सुसार की कैसे रक्षा
होती, बोलो? इस इच्छाशक्ति की
ताकत से ही बाद के जीवन में तुम संयम सीख पाई थी; शरीर की सभी आसक्तियों से उत्तीर्ण
हो पाई थी।
वर्ष 1870 के जाड़े
की छुट्टियों में देश गया था। उस समय स्वर्गीय राजनारायण बसु महाशय का भाषण पढ़ना अच्छा
लगता था। एक दिन शाम के बाद, भोजन आदि सम्पन्न कर, नींद के पहले ध्यान से उक्त पुस्तक
का पाठ कर रहा था। भीषण श्मशान के बारे में पढ़ रहा था, उसी समय तुम शयनकक्ष में प्रवेश
की और मुझे ध्यान लगा कर पाठ करते देख उपहास के तौर पर कुछ बोलने लगी। उससे मेरे मन
को बहुत कष्ट पहुंचा। अच्छी तरह मैंने कहा कि धर्म को ले कर कोई कौतुक करे तो बहुत
कष्ट होता है। वही जो तुमने खुद को रोका, फिर कभी मेरा विरोधी नहीं बनी। उसके बाद से
मैं तुम्हारे चरित्र की उन्नति के लिये जो कुछ प्रयास करता था, तुम मेरे पक्ष में रहती
थी। बचपन से गाँव में प्रतिपालित होने के कारण तुम भी छोटी छोटी बातों में झूठ बोलती
थी। मुझे बहुत क्लेश होता था। मेरे कहने पर तुमने झूठ बोलना एक्दम छोड़ दिया। क्रमश:
तुम मेरे सारे धर्म-विश्वास ग्रहण करने लगी, मैं फूला नहीं समाता था। उन दिनों भी रात
में सब की नजर से बचते हुए, बिस्तर पर बैठ कर मैं तुम्हे पढ़ाता था और तुम्हे साथ ले
कर प्रार्थना करता था। उस समय तक तुमने ब्राह्मोसमाज का चेहरा भी नहीं देखा था। ब्राह्मोसमाज
की पुस्तकें बहुत कम ही पढ़ी थी। पढ़ने की क्षमता भी उतनी थी नहीं।
मेरा धर्म ग्रहण करने
के बाद जल्द ही तुम्हारी परीक्षा की घड़ी आ गई। वर्ष 1871 का फरवरी महिना आया। मेरी
भतीजी वसंत के विवाह की तैयारी चल रही थी। विवाह आदि के समय हमारे देश में जलसहा के
नाम से एक कार्यक्रम होता है। पांच घरों से भीख मांग कर पानी ली जाती है और उस पानी
से कन्या को विवाह के एक दिन पहले स्नान कराया जाता है। पानी की भिक्षा मांगने के समय
वादक वाद्य बजाते हैं और कुल की औरतें कुत्सित गीत गाती हैं। यह प्रथा मुझे बहुत ही
गलत लगता था। मैंने तुमसे कह दिया, तुम इस कार्यक्रम में भाग नहीं लोगी। मेरी बात रखने
में तुम अत्यंत तिरस्कृत हुई थी। इस बारे में कन्या वसंत खुद ही लिखी है, “मेरा विवाह सन
1277” [बंगला साल] ”के फागुन महीने में 16 तारीख, सोमबार
को हुआ। मेरी उम्र उस समय थी 11 वर्ष। जलसहा के लिये चाची को बहुत अत्याचार सहना
पड़ा था। विवाह के एक दिन पहले रात को जलसहा होता है और सुबह को बड़ी और क्षीर बनाई
जाती है। दादी ने कहा, ‘बसंत की माँ नहीं है और यहाँ पर दूसरी कोई बड़ी या छोटी चाची
भी नहीं। शास्त्र सम्बंधित सारा काम तुम्हे ही करना होगा। अगर नहीं करती हो तो घर
से निकल जाओ। अगर कन्या का कोई अमंगल होता है, तो जान जाओगी।‘ उसी समय सझली
चाची भी आई और बोली, ‘छी: तुम्हे शर्म नहीं आती? किसी अघाट” [जो घाट न हो, यानि खतरनाक किनारा हो] ”पर जा कर, गले
में घड़ा बांध कर डूब मरो।‘… आदि। पर इतने अत्याचार के बाद भी चाची का विश्वास अटल रहा।
उस दिन पूरा दिन वह बस रोते हुए, अनाहार में बिताई थी। चाची क्यों उस दिन किसी की
आज्ञा नहीं मान रही थी, उस समय मैं कुछ भी समझ नहीं पाया था। रात में जब जलसहा का
समय आया, सबों ने उन्हे बुलाया। जब वह जाने से इंकार की तो सब उन्हे जबर्दस्ती
खींचते खींचते ले जाने लगे। मैं बीच वाले दालान में थी। जब उन्हे खींचतान किया गया, मैं देखी
थी।” तुम्हे तो इस तरह वलपूर्वक ले जाया गया; मैं
अपने मन का क्षोभ और असंतोष जताने का दूसरा कोई जरिया न पा कर अपने कमरे का दरवाजा
बंद किए रहा। रात में जब तुम्हे ले कर सब घर लौटे, मैं फिर तुम्हे कमरे में घुसने नहीं
दिया। दोष तुम्हारा नहीं था, और सबों के प्रति असंतोष जताने में अक्षम होने के कारण
तुम्हे ही थोड़ा और कष्ट दिया। जो भी हो, इस घटना के बाद आगे तुम्हे और मुझे अंधविश्वासों
के विरुद्ध अनेकों बार खड़ा होना पड़ा था। मेरा अनुगत हो कर तुम हर बार हमारे विश्वास
की रक्षा करने पर ध्यान रखी हो। इस घटना के बाद से, ऐसे संग्रामों का सामना करते वक्त
तुमसे मुझे आश्चर्यजनक सहायता मिली है। पूर्व में तुम्हे बिल्कुल ही कोई शिक्षा प्राप्त
नहीं हुई थी, लेकिन अंधविश्वासों के विरुद्ध खड़ा होते समय तुम्हारी जो दृढ़ता देखने
लगा, वह मुझे अत्यंत विस्मित किया। आगे के जीवन में इस साहस का ऐसा विकास हुआ था कि
देख कर अन्य सभी भी चमत्कृत होते थे।
उस अवस्था में, एक
विरोधी समाज, बड़े परिवार और सब की लांछना और तिरस्कार के बीच तुम्हे अकेले छोड़ कर मैं
कलकत्ता चला आया। इसी समय देश में एक और बड़ा बवाल खड़ा हुआ। हमारा मित्र केदार ब्राह्मोसमाज
में विवाह किया। कलकत्ता में हमलोग खुशी से फट पड़े। कुछ दिन हमारे उसी खुशी और उत्साह
में बीते। दिवंगत ब्रजसुंदर मित्र महाशय की कन्या के साथ केदार का विवाह हुआ। हमारे
देश में तब तक और किसी ने ब्राह्मोविवाह नहीं किया था। देश में सभी ने, खास कर टाकी
के बाबुओं ने कोशिश चलाई ताकि अपराधियों को समाज से बहिष्कृत हो कर रहना पड़े। लेकिन
पता लगा कर उन्होने जाना कि लगभग सभी घरों से एक-दो आदमी विवाह में गये थे, सजा देने
की बात हो तो कई सारे घरों को बहिष्कृत करना पड़ेगा। इसलिए उनके दिल की चाह पूरी नहीं
हुई। तुम एक मुख्य अपराधी की पत्नी थी; खुद भी कई बार गुनाह कर चुकी थी; तुम्हारी लांछना
बढ़ने लगी। इसी समय हमारे मित्र मोहिनीमोहन की साध्वी पत्नी भी अकेले देश के घर पर अपने
विश्वास की रक्षा करती हुई जी रही थी। चारों तरफ विरोधी समूह, उन्ही के बीच वह किस
तरह रोज की उपासना और प्रार्थना करती थीं, तुम विलक्षण जानती हो। तुम्हारे साथ जो उनका
मिलन हुआ उसे भी ईश्वर की कृपा माननी पड़ेगी। नहीं तो कौन तुम दोनों को, बीच वाले घर
के तालाब की घाट पर एकत्र हो कर धर्म की बातचीत करने का उपाय बताता? यह सब उन्ही की
कृपा थी!
इधर मेरा जीवन संग्राम घनीभूत होने लगा। बीए की पढ़ाई खत्म हो गई थी। कुछ दिन कानून पढ़ा था। तब सोचता था कि वकील बनूंगा, खुब पैसे कमाउंगा, परिवार के लोगों का भरण पोषण करुंगा, बहुतों की सहायता करुंगा। पागल की तरह कितना कुछ सोचता था; तुम्हे कहने में कोई संकोच नहीं है इसीलिए कह रहा हूँ – हाइकोर्ट का जज बनने की बात भी सोचता था। ब्राह्मो बनने के बाद कानून की व्यवसाय को ले कर सदेह उत्पन्न हुआ। हमारे गाँव के हरि दत्त महाशय वकील थे। उन्होने कहा, कानून के व्यवसाय में विवेक को सही नहीं रखा जा सकता है। क्या करूँ! इधर सुसारवासिनी जन्म ली हैं, मेरी भी उम्र बढ़ चली है, बेरोजगार भाई की पत्नी होने और ब्राह्मोधर्म ग्रहण करने के कारण परिवार में तुम्हारी स्थिति भी अच्छी नहीं है। ये सारे सोच मन को बहुत ही आंदोलित करने लगे। तुम्हे ले कर एक साथ रहने का भी कोई उपाय नहीं। तुम्हे धर्म की शिक्षा देने, पढ़ाई लिखाई सिखाने के लिये मन व्याकुल होता, लेकिन कोई उपाय नहीं दिख रहा था। अन्तत: पोस्ट ओफिस का काम सीखना शुरु किया। दो महीना शिक्षार्थी रह कर वर्ष 1871 के दिसम्बर महीने में परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ और अस्थाई तौर पर वर्द्धमान का पोस्टमास्टर हो गया।