Tuesday, April 28, 2026

जानी बातें फ़िर एक बार

वैसे तो नीचे लिखी गई बातें किताबों में उपलब्ध हैं और पिछले डेढ़ सौ बरसों में अनगिनत बार पढ़ी गई है। पर चूंकि, आज कल सामाजिक माध्यम ही इस तरह की बातचीत का प्रधान जरिया बन चुका है, किताबें भी लगभग सभी इंटरनेट पर उपलब्ध हैं, मई दिवस के दो दिन पहले इन बातों को लिखने की इच्छा हो रही है।

 

पृष्ठभूमि

हर जबाब के पहले एक सवाल होता है। और उस सवाल को बनते बरसों लगते हैं। समाधान या निदान हासिल करने के संघर्ष के पहले होता है समस्या को पहचान पाने का संघर्ष, प्रश्न को तार्किक रूप से सूत्रबद्ध करने का संघर्ष।

आठ घंटे के श्रमदिवस, या यूं कहा जाय, कानून के द्वारा सीमित किये गये श्रमदिवस की मांग उठने से पहले भी इस तरह के लम्बे वैचारिक संघर्ष चलते रहे। उन्नीसवी सदी के पूर्वार्ध में खुद मजदूर तो बोल ही रहे थे कि काम के घंटे कम करो, काम के घंटे तय होने चाहिये …, मानवतावादी, कल्पलौकिक समाजवादी बुद्धिजीवी-सांसद-पत्रकार-समाज सुधारक भी बोल रहे थे। संसद कानून बनाने पर चर्चा भी कर रहा था। यहां तक कि पूंजीपति भी बोल रहे थे, कि वे भी चाहते हैं कि नियम बने लेकिन सवाल है कि कितने घंटों पर।

आठ घंटे की अवधारणा भी दिन के नैतिक समविभाजन के माध्यम से आ चुकी थी – आठ घंटे काम + आठ घंटे आराम + आठ घंटे मनोरंजन! पर पूंजीपति बोल रहा था ‘वो सब तो ठीक है, लेकिन हमने उसके दिन भर के श्रम को खरीदा है, अब आप ही तय करके बताइये कितने घंटे तक काम करने पर वह, उसे दी गई मजदूरी को पैदा करेगा और उसके आगे और कितने घंटे तक काम करने पर वह लगाई गई पूंजी की भरपाई (उत्पादन के औजारों का क्षय + कच्चे माल की कीमत + जमीन का किराया आदि) करेगा और कुछ मुनाफा भी पैदा करेगा मेरे लिये। फिर तो उसकी छुट्टी। आराम करे!’

पूंजीवादी दुनिया में बरसों बहस चलता रहा इस पर। कितने घंटे मजदूर की मजदूरी के और कितने घंटे पूंजीपति की पूंजी और मुनाफे के।

उधर कार्ल मार्क्स पंद्रह वर्षों से ब्रिटिश म्युजियम के ग्रंथागार में पूंजी के उद्भव, विकास और अंत (यानि, दर्शन की भाषा में जिसे बोलते हैं ‘बिकमिंग’) के सवालों से जूझ रहे थे। इसी बीच 1860 के दशके के उथलपुथल (मुख्यत: अमरीकी गृहयुद्ध के कारण हुये कपास का अभाव, परिणामस्वरूप आर्थिक मंदी) से मजदूर वर्ग की गतिविधियों में भी तेजी आई।

यूरोप के कुछ मजदूर नेता आपस में बातचीत कर एक अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संघ बनाने को सोचे और इस काम के लिये उनके प्रतिनिधि मार्क्स से मिले। मार्क्स-एंगेल्स का आदर तो उनके बीच पिछले डेढ़ दशक से था। इस जोड़ी ने ही पंद्रह साल पहले दुनिया को ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ दिया था जिसके शीर्ष पर लिखा था ‘दुनियां के मजदूरों एक हो’।

खैर, उनकी मुलाकातों पर विस्तार से बाद में। मुख्य बात यह कि इन्टरनैशनल वर्किंगमेन्स एसोसियेशन, जिसका लोकप्रिय नाम पड़ा ‘पहला अन्तर्राष्ट्रीय’, की स्थापना हुई और इस ‘अन्तर्राष्ट्रीय’ की ही सभा में कार्ल मार्क्स ने एक लम्बा सा व्याख्यान पेश किया ‘मजदूरी, दाम और मुनाफा’। इस व्याख्यान में मार्क्स ने पहली बार (क्योंकि ‘पूंजी’ ग्रंथ तब तक बिखरे मसौदों के रूप में थी) दुनिया के सामने अन्य वातों के अलावे तीन प्रश्नों का उत्तर दिया और फलस्वरूप तीन सत्य उजागर हुए –

(1) श्रम और श्रमशक्ति में क्या फर्क है जिसके कारण मालों के बाजार में मानवश्रम नाम का माल अनोखा है;

(2) अतिरिक्त-मूल्य क्या है और क्यों उसका श्रमदिवस की अवधि से कोई संबंध नहीं है, और

(3) मजदूरी और कार्यदिवस के तय होने के कारक क्या हैं।

इन तीनों का उत्तर आप जानते हैं। नहीं भी जानते हैं तो उपरोक्त व्याख्यान जो अब एक विश्वप्रसिद्ध पुस्तक है, को खोल कर पढ़ लीजिएगा। सिर्फ तीसरे से संबंधित एक उद्धरण दूंगा –

“1.काम के दिन की सीमाएँ तय होने पर, मुनाफ़े की अधिकतम सीमा, मज़दूरी की न्यूनतम शारीरिक सीमा के बराबर होती है; और जब मज़दूरी तय होती है, तो मुनाफ़े की अधिकतम सीमा, काम के दिन को उतना बढ़ाने के बराबर होती है, जितना कि मज़दूर की शारीरिक क्षमता के अनुकूल हो। इसलिए, मुनाफ़े की अधिकतम सीमा, मज़दूरी की न्यूनतम शारीरिक सीमा और काम के दिन की अधिकतम शारीरिक सीमा द्वारा सीमित होती है। यह स्पष्ट है कि मुनाफ़े की अधिकतम दर की इन दो सीमाओं के बीच, बदलावों की एक बहुत बड़ी गुंजाइश मौजूद है। इसकी वास्तविक दर का निर्धारण केवल पूँजी और श्रम के बीच लगातार चलने वाले संघर्ष से ही होता है; जिसमें पूँजीपति लगातार मज़दूरी को उसकी न्यूनतम शारीरिक सीमा तक कम करने और काम के दिन को उसकी अधिकतम शारीरिक सीमा तक बढ़ाने की कोशिश करता रहता है, जबकि मज़दूर लगातार इसके विपरीत दिशा में दबाव डालता रहता है।

यह पूरा मामला, संघर्ष करने वाले दोनों पक्षों की अपनी-अपनी ताक़तों के सवाल पर आकर टिक जाता है।

“2. जहाँ तक इंग्लैंड में काम के दिन की सीमा तय करने का सवाल है — जैसा कि अन्य सभी देशों में भी होता है — यह कभी भी विधायी हस्तक्षेप (कानूनी दखल) के बिना तय नहीं हो पाया है। मज़दूरों के बाहर से लगातार दबाव डाले बिना, यह हस्तक्षेप कभी भी संभव नहीं हो पाता। लेकिन किसी भी स्थिति में, यह परिणाम मज़दूरों और पूँजीपतियों के बीच आपसी समझौते से हासिल नहीं किया जा सकता था। आम राजनीतिक कार्रवाई की यह अनिवार्य आवश्यकता ही इस बात का प्रमाण है कि, विशुद्ध रूप से आर्थिक मामलों में, पूँजी ही अधिक शक्तिशाली पक्ष है।

कुछ शब्दों पर जोर वर्तमान लेखक का है।

 

डेढ़ सौ बरसों का सफर

उपरोक्त स्पष्टीकरण के बाद ही:

1. इंटरनेशनल वर्किंगमेन्स एसोसिएशन ने 1866 में 8 घंटे के काम के दिन की मांग की।

2. यह आंदोलन मुख्य रूप से यूरोप और USA में शुरू हुआ, जहाँ आधुनिक मज़दूर वर्ग उभर चुका था।

3. 20 साल बाद, 1 मई 1886 को, शिकागो में मैककॉर्मिक फैक्ट्री के गेट पर एक खूनी दमन हुआ। कई लोग मारे गए। आठ लोगों को मनगढ़ंत आरोपों में जेल भेज दिया गया। चार लोगों—पार्सन्स, स्पाइज़, फिशर और एंगेल—को फाँसी दे दी गई। बाद में पता चला कि यह पूरा मामला न्याय का मज़ाक था। (इस पर मेरा एक पुराना आलेख है ‘हे मार्केट स्क्वायर’ को लेकर, जो इसी सामाजिक माध्यम में बरसों पहले मैंने पोस्ट किया था)

4. चूँकि यह घटना 1 मई को हुई थी, इसलिए 1889 में पेरिस में 'सेकंड इंटरनेशनल' ने फ्रेडरिक एंगेल्स की उपस्थिति में इस दिन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाने का प्रस्ताव पारित किया।

5. इस तरह, 1890 में पहली बार 'मई दिवस' मनाया गया। उस समय इसे सिर्फ़ एक बार का आयोजन माना गया था, लेकिन इसकी लोकप्रियता ने इसे एक नियमित वार्षिक कार्यक्रम बना दिया। हालाँकि मार्क्स की मृत्यु 1883 में हो चुकी थी, फिर भी लंदन के हाइड पार्क में हुई मई दिवस की रैली में एंगेल्स 'वरिष्ठ अतिथि' के तौर पर मंच पर मौजूद थे और मार्क्स की सबसे छोटी बेटी एलेनोर एवेलिंग, इंग्लैंड के गैस और पोर्ट मज़दूर संगठनों द्वारा निकाले गए उस दिन के सबसे बड़े जुलूस का नेतृत्व करते हुए पार्क पहुँचीं थी; मजदूर उन्हे ‘माँ’ कह कर बुलाते थे

6. भारत में, पहला मई दिवस 1 मई 1923 को चेन्नई (तब मद्रास) के मरीना बीच पर मनाया गया। इसका आयोजन कम्युनिस्ट नेता मलायापुरम सिंगारवेलु चेट्टियार के नेतृत्व वाली 'लेबर किसान पार्टी ऑफ़ हिंदुस्तान' ने किया था। इस ऐतिहासिक आयोजन में भारत में पहली बार 'लाल झंडे' का इस्तेमाल किया गया, जिसने 8 घंटे के काम के दिन पर केंद्रित संगठित मज़दूर आंदोलनों की शुरुआत का संकेत दिया। वैसे आठ घंटे के श्रमदिवस पर चर्चे पहले से हो रहे थे। 1920 में जब लाला लाजपत राय के नेतृत्व में ऑल इन्डिया ट्रेड युनियन कांग्रेस की स्थापना हुई, स्थापनागत मुद्दों में श्रमदिवस को पहले 10 और फिर 8 करने का मुद्दा शामिल था।

7. दिलचस्प बात यह है कि भारत की एक फैक्ट्री में 8 घंटे के काम का दिन इससे काफ़ी पहले ही लागू हो चुका था। टाटा स्टील ने वर्ष 1912 में 8-8 घंटे की तीन-शिफ्ट वाली कार्यप्रणाली लागू कर दी थी (इंटरनेट के अनुसार, यह भारत में फोर्ड मोटर्स से भी पहले हुआ था)।

8. बीस वर्षों तक श्रम संघर्षों के उपरांत, उल्लेखनीय है कि वह डॉ. बी.आर. अंबेडकर ही थे — जो वायसराय की कार्यकारी परिषद में 'श्रम सदस्य' के तौर पर कार्यरत थे — जिन्होंने नवंबर 1942 में काम के घंटों को 12 से घटाकर 8 करने में अहम भूमिका निभाई। बाद में, 1948 के 'फैक्ट्री अधिनियम' में इसे औपचारिक रूप से शामिल कर लिया गया।

 

आज की विडंबना

तो, आगे के इन लगभग 80 सालों में आखिर क्या हुआ? क्यों, जबकि श्रमदिवस टेक्नोलॉजी में ज़बरदस्त तरक्की की वजह से 6 घंटे का हो जाना चाहिए था (जैसा कि माना जा रहा था, और जिस पर शोध भी चल रहे थे कि 6 घंटे काम करने से काम और निजी ज़िंदगी में सही संतुलन बनता है और प्रोडक्टिविटी बढ़ती है), अचानक 12 घंटे का हो गया?

इसकी सीधी सी वजह है एक तरफ समाजवादी दुनिया का कमज़ोर पड़ना (खास कर सोवियत संघ का टूटना) और दूसरी तरफ पूँजीवादी दुनिया में नव-उदारवादी आर्थिक व्यवस्थाओं का उदय होना; जिन्होंने कल्याणकारी अर्थव्यवस्था की 'पुरानी' व्यवस्थाओं और परिकल्पनाओं की जगह ले ली।

साल 1991 को याद कीजिए। यह एक बहुत ही अहम मोड़ वाला साल था। ठीक इसी साल:

a) सोवियत संघ में समाजवाद खत्म हो गया।

b) भारत ने नरसिम्हा राव सरकार की नई आर्थिक नीति (New Economic Policy) को अपनाया; जिसे तीन साम्राज्यवादी संगठनों — विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन के शर्त व निर्देशानुसार तैयार किया गया।

c) संयुक्त राज्य अमरीका ने पहला इराक युद्ध शुरू किया — जिसमें इराक के राष्ट्राध्यक्ष को खुलेआम टीवी प्रसारण द्वारा दुनिया को दिखाते हुये मार डाला गया, और बाद में लीबिया के राष्ट्राध्यक्ष को भी गोली मार दी गई। मतलब कि विश्वपूंजी के आक्रामक तेवर को रेखांकित किया गया और चेतावनी दी गई।  

d) आईबीएम ने अपना पहला डेस्कटॉप, पर्सनल कंप्यूटर लॉन्च किया।

e) हाइपरटेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकॉल्स के ज़रिए 'वर्ल्ड वाइड वेब' यानि इंटरनेट की संभावना का पता चला। (छे साल बाद शुरू हुये)

यानि, हमेशा अधिकतम मुनाफे की प्यासी विश्वपूंजी के सामने आक्रामक गतिशीलता की नई संभावनाएं खुल गई। मरणासन्न पूंजीवाद को कुछ और दिनों तक जिंदा रहने का, अपनी मरणासन्नता से पूरी पृथ्वी को ग्रसित कर जिंदा रहने का रास्ता मिल गया। दर्ज हो कि उसके बाद, बस यूं ही समाजवाद नहीं आ जायेगा; जैसा 'कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र' वर्ग संघर्ष के बारे में कहता है, " … एक ऐसा संघर्ष जो हर बार या तो बड़े पैमाने पर समाज के क्रांतिकारी पुनर्गठन में, या संघर्षरत वर्गों के सामान्य विनाश में समाप्त हुआ।" या तो हम समाजवाद ला पायेंगे या उस सामान्य विनाश में विनष्ट होते जाएंगे। 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह नव-उदारवादी व्यवस्था (जिसे उस समय आम बोलचाल में LPG यानि ‘लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन’ या उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण कहा जाता रहा) 1998 और 2008 के आर्थिक संकटों से बच निकली (और इसके बाद आने वाला अगला दसवर्षीय संकट शायद कोविड की महामारी की वजह से टल गया)। अब इसे यह दिखावा करने की कोई ज़रूरत नहीं है कि यह इंसानियत की सारी समस्याओं को हल कर सकती है, लगातार आर्थिक विकास दे सकती है, या पूँजीवादी लोकतंत्र के दायरे में समाजवाद का कोई विकल्प बना सकती है... बिल्कुल नहीं। अब यह बड़े आराम से धरती को तबाह कर रही है, और सिर्फ़ अपना मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए इंसानी समाज को भी बर्बाद कर रही है।

पूरे समाज में जिस नैतिक गिरावट का माहौल पिछले बारह वर्षों से भाजपानीत मोदी सरकार ने पैदा किया है, उसमें भारत का बड़ा पूंजीपतिवर्ग अपने पाले पोसे हुये सरकार के द्वारा बड़े गर्व से 'व्यापार में आसानी' (ease of doing business) के नाम पर नए 'श्रम कानून' (Labour Codes) लागू कर सकता है; काम के घंटों को बढ़ाकर 12 कर सकता है; और पूरे भारत में अडानी द्वारा पहले से ही बनाए जा रहे बड़े-बड़े गोदामों (silos) के फ़ायदे के लिए, एक बार फिर से 'कृषि कानूनों' को लागू करने की कोशिश भी कर सकता है। अब तो इसने शर्म-हया का आखिरी पर्दा भी हटा दिया है — यह संसद के अंदर लोकतंत्र के सभी नियमों को कुचलकर अपने पाले हुये सरकार को बचाने के लिये विपक्ष को बदनाम करा सकता है; शासन-प्रशासन की एजेंसियों को दमन के औज़ार के तौर पर इस्तेमाल करवा सकता है; और विरोध की आवाज़ों को उठने से रोकने के लिए लोगों के बीच सांप्रदायिक नफ़रत भी फैलाने में सत्तासीनों की मदद कर सकता है। कोई भी घृणित अपराध अब इस मुनाफालोलुप वर्ग के लिये अछुता नहीं है। कभी भी अपनी सरकार को इसे यह कह कर सम्हालने की भी जरूरत नहीं है ‘अरे, ऐसा मत करो’।

अंत में मार्क्स का उपरोक्त कथन ही एक मात्र सत्य है। कोई नीति, मानवीयता … कुछ नहीं। मालिकों और उनकी सरकार के विरुद्ध कठोरतम संघर्ष ही तय करेगा श्रमदिवस की अवधि। (मजदूरी और सेवाशर्तें भी, पर वह इस आलेख का विषय नहीं है)।

 

28.4.26



Saturday, April 25, 2026

জন্মদাগ

বাংলার লড়াইয়ে খুব
কম আছি আমি
পাটনার মাটিতে দাঁড়িয়ে
প্রায় না থাকারই মতো।
এটা সত্যি,
তবে এমনকিছু বড়ো সত্যি নয়।
 
বড়ো সত্যিটা হলো,
বাংলার পুরো লড়াইটা আমার
ভিতরে চলছে প্রতিদিন
ঠিক বোঝাও যায় না সবসময় তার
হালহকিকৎ,
 
যেমন আমার শরীরের
ভিতরে কী চলছে,
হৃৎপিণ্ড, ফুসফুস, যকৃৎ বা প্লীহা
এবং সেরকমই আরো সব
কী বলছে,
ডাক্তার জানতে পারে,
আমি জানি না।
 
সকালে ডানহাতে কলের
জল নিতে নিতে
বাঁহাতে জানলা খুলি আকাশে,
তখনই হয়তো একটা আর্তস্বর
ছুঁচলো ব্যথার মতো
ভিতর থেকে চাগিয়ে উঠল;
কার আওয়াজ?
কারই বা,
পরের নীরবতা অনেকক্ষণ?
 
শেষটাও স্পষ্ট দেখতে পাই না,
না লড়াইয়ের না শরীরের।
 
এ মুহূর্তে এ কথাটা অবান্তর
যে ভারতের পুরো লড়াইটাও,
পৃথিবীর পুরো লড়াইটাও ইত্যাদি
ভাষাটা যে জন্মদাগ আমার!
 
নিউরন!
ঐ যার কৃত্রিমটা যুগ আজকাল
সে ভাষার দুশো বছর!
হাজার বললাম না, মগজের
             ধক লাগে। নেই।
আর পতাকা তো একটাই
লাল!

২৬.৪.২৬

Thursday, April 23, 2026

সর্বস্বে রয়েছ

যখন বিদায় নেবে, সন্ধে হয়ে থাকবে রাস্তাটা!
বাচ্চারা আঁধারে খেলবে দিনের শেষ খেলাটুকু,
নন্দুর মা দরজায় বসে ঘাসঝুড়ি বুনছেন
 
রাস্তা-মেরামতি ধুলোয় দুজনে নাকমুখ ঢেকে
মন্দিরের চাতাল পেরিয়ে হাত দেখাই অটোকে
সাবধানে যেও বলে চেয়ে দেখি দিগন্তে রক্তাভা
 
একটু গেলে দেখব শিমুল ছড়িয়ে গোরস্তানে
তবু যাই না, তুমি গেলে কই? সর্বস্বে রয়েছ
 
কিসের বিদায় নেওয়া, কেন, বুঝি না, বুঝবও না
বেশি বোঝাতে যেও না তো! হাত সরাও পিঠ থেকে!  
না থেকে থাকা তোমার তীব্রতর করি সারাদিন
 
ছড়িয়ে থাকা মক্‌শোগুলোয়, কাটাকুটি যুদ্ধেমুদ্ধে,
নিজের ভিতরে সত্যটা জিয়োতে তুমিও বুঝবে
ভালোবাসতে ভালোলাগাটাই ঋদ্ধি নশ্বরতার  
 
২৪.৪.২৬

Tuesday, April 21, 2026

ঘাতকের নাম

সে যে এক কাব্য হয় অন্তর্গত নিসর্গ নিরিখে
অশ্রুবর্ষণ করার, ঘাতকের নামটা না লিখে?
ঘাতকও উত্তরীয়ে মোছে চোখ, শিল্পীর সম্মানে!
 
শিক্ষানবিশ বালখিল্যেরা সূক্ষ্মতর ব্যথাহুতি ঘ্রাণে,
সত্বর এগোয় চাতুর্য চমকে হয় প্রতিবাদী!
ঘাতক বড়ই খুশি, ছাগলে সোনার ছাড়ে নাদি।
 
ঘাতকের নাম বলা ক্রমে হয় কুশিল্প ঘোষিত
শব্দ হোক, রঙ, হোক জীবনের অনিত্যে পোষিত!
নিহতের ঘরে দেখি, চোখে চোখে, ইঁটে, আসবাবে,
ঘাতকের নাম ঘৃণার অব্যক্ত আগুনে কিংখাবে।
 
ধূর্ত ধর্ষকও ক্রমে মুখ নেয় মৃত ধর্ষিতার
ঘটনার প্রতিশোধ চায়! শিল্পকর্ম নির্বিকার
নিষ্প্রাণ মুখটির দিকে ঈষৎ লজ্জানত চায়।
তারপর চিরন্তন সৌন্দর্য সন্ধানে চলে যায়। 
 
২১.৪.২৬

Friday, April 10, 2026

রাত হলে

রাত হলে ফিরে বসি এক ঘরে সবাই যখন
সেও বসে, যে যায় নি, সেলফোনে ছিল এতক্ষণ
সারি নৈমিত্তিক, শোনা-দেখা খবরে গল্পগুজব,
তখনি ছিন্ন মুন্ডু ও ফর্বেসগঞ্জের দুটো শব,
অথবা হুউউউৎশ্‌ বুম! রোজকার যুদ্ধে ওড়া গা,
ধপ করে মাঝে পড়ে; বাঁধা রাত বিঘ্নিত হয় না।

হয়তো দুর্বোধ্য ভবিষ্যৎ কাঁপে গেলাসের জলে,
তাৎক্ষণিক।
                  টের পাই না ভাবনার অনর্গলে,
কতটুকু অস্বাভাবিকতা কাল ঢুকবে অস্থির
আচরণে আর, উত্তরাধিকার হবে সন্ততি্র।

আর বাঁচাবে না বলা অন্য কেউ, অন্য কোনোখানে।
একগ্রহ পরস্পর গ্রন্থিত মগজ কালযানে,
একযোগে স্নায়ুতন্ত্রে পচনের ত্বরায় পৌঁছোচ্ছি   
পৃথিবীর যৌথ আবাসনে ঘাতক পারস্পরিক।

১১.৪.২০২৬

Saturday, April 4, 2026

আমার বাংলা

আমার বাংলা চুটি সিগারেট ভাগ,
বোঁটায় কয়টি ভাষার থুতুর দাগ,
অসুবিধে নেই, চলে
                         বন্ধুতা গাঢ় হলে
থাপ্‌ড়ে চেনাই ব্রিগেড আর শাহবাগ।
 
বলি, তোদেরকে বাংলা শেখাই চল।
তোরাই তো বস্‌ আমার ভাষার বল।
আমার বাচ্চা যদি
                         মাতৃভাষার নদী
না পায় স্বপ্নে, ছোঁবে বাঁচার অতল? 

ঐক্য বোঝাতে পিঠে বাঁধিস না কুঁজ
মানা-বলা-খাওয়া-পরায় মিলের বুঝ!
ধর্মের নামে ঘৃণার
                   শেষ চাওয়া দেশটার
মগজ ফাটাতে হাতে নিবি পিলসুজ?
 
অনেক ভাষার পড়া রে, এই ভারত,
অনেক আশায় বাঁধা প্রতিটির গৎ,
তারই একটির মা,
                      ছিন্ন বাঙালিয়ানা,
রক্তের মাটি-জল-আকাশের পথ।

৫.৪.২৬

Thursday, April 2, 2026

হাসি

আমার একটি নাম না জানা নদী আছে ঘুমে
খুঁজেও দেখিনি তার ধারাটির শুরু আর শেষ
বস্তুতঃ বিষয় নয় সে, স্বপ্নের মগ্ন পটভূমি
পাড়ের পাথরে বসে কথা বলি বহু উপন্যাসে
যেগুলো লিখি নি লিখবোও না সে ক্ষমতাই নেই
সে-সমস্ত উপন্যাসে মাঝে মধ্যে তুমি ঢুকে পড়ো
হাসতে হা-হা ধরিয়ে পাঠের কোথাও কোনো ভুল
ঘুম ভাঙায় প্রতিধ্বনিত চরাচরে সেই হাসি

ঘুম ভেঙে যায় স্বপ্ন ভাঙে না, হাসিও সারাদিন
ঘিরে থাকে ধরে থাকে জাপ্টে ব্যর্থতা সুদ্ধু আমাকে
সবচে খারাপ কাজ করো তুলে রাখো রাগে ছেঁড়া
অসহ্য নিষ্কৃতিহীন প্রত্যহ আমার লেখালিখি
৩.৪.২৬