Friday, November 4, 2022

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के भ्रष्ट उच्चाधिकारियों से कैसे निपटा जाय

 [प्रस्तुत निबन्ध में बनाई गई धारणायें एवं लिये गये निष्कर्ष लेखक के अपने है। उनमें से कई बीइएफआई से मेल नहीं खाते। फिर भी यह मुद्दा ऐसा है जो हम बैंक कर्मचारियों के आन्दोलन के एजेन्डा से बाहर नहीं है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर आज जो तीव्र हमले हो रहे हैं उसके प्रतिरोध में खड़े होकर हमें इस निबंध में उठाये गये कई सवालों का मुकाबला करना होगा। 

निबंध की एक बड़ी खामी है कि लेखक ने निजी क्षेत्र के बैंकों में और अधिक व्याप्त भ्रष्टाचार, अपारदर्शिता और यहाँ तक कि कार्यकुशलता के अभाव के सवाल पर भी चुप रहना मुनासिब समझा है। 

फिर भी, मुद्दे की गंभीरता को देखते हुये बेफीन्युज के हिन्दी विभाग में हम इस निबंध को प्रस्तुत कर रहे हैं – अनुवादक]

तमाल बन्दोपाध्याय


खराब ॠणों में बढ़ोत्तरी का औपचारिक कारण है लड़खड़ाती हुई अर्थव्यवस्था, पर कुछ और बातें भी हैं


अब आप जानते हैं कि क्यों भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में खराब (न चुकाये गये) ॠणों की राशि बढ़ती जा रही है एवं क्यों वित्त मंत्रालय व बैंकिंग नियंत्रक दोनों कई बैंक-प्रमुखों पर खफ़ा हैं।


खराब ॠणों में बढ़ोत्तरी का औपचारिक कारण है लड़खड़ाती हुई अर्थव्यवस्था, पर कुछ और बातें भी हैं।


हाँ, ऐसे बैंक-प्रमुख हैं इस देश में जो इमानदार नहीं हैं।


ये वैसे लोगों को कर्ज देते हैं जो कर्ज दिये जाने के लायक नहीं हैं, और इन सौदों से पैसे बनाते हैं। ये पैसे बनाते हैं जबकि इनके बैंक कीमत चुकाती हैं। भारतीय रिजर्व बैंक को पूरी जानकारी है ऐसे सौदों के वारे में। वित्त मंत्रालय को भी पूरी जानकारी है। लेकिन वे खुले तौर पर इसकी चर्चा नहीं करते क्योंकि चर्चा होने पर हमारी बैंकिंग प्रणाली पर से जनता का आस्था उठ जाने का खतरा है, और ऐसे सौदों का 70% सरकारी स्वामित्व वाले बैंकों में हो रहा है।


शनिवार को केन्द्रीय अन्वेषण ब्युरो (सीबीआई) ने 50 लाख रुपये घुस लेने के आरोप में सिन्डिकेट बैंक लिमिटेड के अध्यक्ष सह प्रबन्ध निदेशक सुधीर कुमार जैन को गिरफ्तार किया। आरोप है कि उनके साले इस लेनदेन में शामिल हैं। जैन ने सिन्डिकेट बैंक का कार्यभार जुलाई 2013 में ग्रहण किया। उन्हे घूस की यह रकम दिलवाने का प्रस्ताव बैंक के नियमकानूनों को धता बताते हुये कुछेक कम्पनियों की ॠण-सीमा (क्रेडिट लिमिट) बढ़ाने के लिये मिला था। जैन वाणिज्य में स्नातक थे एवं चार्टर्ड एकाउंटेंट थे। अपने बैंकिंग कैरियर की शुरुआत उन्होने वर्ष 1987 में देना बैंक से किया था। 


सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारियों के केन्दीय जाँच ब्युरो (सीबीआई) द्वारा गिरफ्तार किये जाने के बहुत अधिक उदाहरण नहीं हैं, लेकिन मुख्य कार्यपालक पदाधिकारियों के लिये कार्यकाल से पहले पदत्याग करना या बर्खास्त किया जाना कोई नई बात नहीं।


इस विषय पर चर्चा बाद में करेंगे। पहले इन भ्रष्टाचारियों के काम करने के तरीकों को समझने की कोशिश करें। पैसा कमाने का एक तरीका तो है वैसे कर्जदारों को कर्ज देना जो कर्ज प्राप्त करने के अयोग्य हैं। दूसरा लोकप्रिय तरीका है कर्ज की कीमत जो होनी चाहिये उससे कम में देना। दोनों ही स्थिति में लेनदेन कराने वाले (डीलमेकर) के पॉकेट में कुल अतिरिक्त कीमत, लोड वैल्यु (जो बड़े कर्ज के लिये कुछेक आधारविन्दु, बेसिस पॉयेंट्स, या छोटे कर्जों के लिये कुछेक प्रतिशत विन्दु, पर्सेन्टेज पॉयेंट्स, भी हो सकते हैं)। पैसा कमाने का तीसरा तरीका है कमज़ोर ॠण खाते को पुनर्गठित (रिस्ट्रक्चर) कर बदमाश कर्जदार को साँस लेने की फुरसत (यानि अधिक समय) मुहैया कराना। 


मुझे एक बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के भूतपूर्व मुखिया के वारे में पता है कि उनकी पत्नी इस तरह के लेनदेनों की सुत्रधार होती थी। बैंकिंग के शब्दकोष में ऐसे लेनदेन ‘ऐकोमोडेशन’ कहे जाते हैं, लेकिन सभी ऐसे लेनदेन में पैसे बनाये जाते हों यह भी जरुरी नहीं। अक्सर बैंकों के मुखिया ऐसे लेनदेन सत्ता पर बैठे राजनीतिज्ञों के प्रभाव डालने पर करते हैं ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रहे। एवं कई सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अधिकारी महाप्रबन्धक के पद पर आसीन होने के दिन से ही राजनीतिज्ञों को खुश करते रहते हैं क्योंकि ऐसा करने से उन्हे फिसलन भरे रास्ते से उपर चढ़ कर बैंक का अध्यक्ष बनने में मदद मिलती है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मुखिया के पद पर कई सारी नियुक्तियाँ इसी तरह के मदद-के-बदले-मदद (क्विड-प्रो-क्वो) लेनदेन होते हैं। मुखिया बनने में की गई मदद ॠणों के अनुमोदन एवं अन्य सुविधाओं (ऐकोमोडेशन्स) के माध्यम से लौटाई जाती है। 


पिछले साल सीबीआई ने भारतीय स्टेट बैंक, जो देश का सबसे बड़ा ॠण-संवितरक है, के एक उपमहाप्रबंधक श्यामल आचार्य को पकड़ा था। आरोप था सामानों की शक्ल में घूस लेने का – एक ओमेगा एवं एक रोलेक्स घड़ी; हरेक की कीमत थी 7·75 लाख रुपये। दोनो घड़ी को आचार्य के केबिन से सीबीआई ने जब्त किया था। आरोप यह था कि किसी ॠण को मंजूरी देने में आचार्य ने नॉर्मस का उल्लंघन किया था। भारतीय स्टेट बैंक ने मामले की छानबीन करने के लिये दो सदस्यीय आन्तरिक पैनेल का गठन किया लेकिन दिल्ली-स्थित वर्ल्ड विन्डो ग्रुप (डब्लु∙डब्लु∙जी) को संस्वीकृत किये गये रु∙ 75 करोड़ के इस ॠण में उन्हे कोई भी पद्धतिगत त्रुटि (प्रॉसिड्योरल लैप्सेस) नहीं मिली। सीबीआई ने आचार्य, डब्लु∙डब्लु∙जी के एक उपदेशक के∙के∙कुमरा एवं डब्लु∙डब्लु∙जी के संस्थापक पीयुष गोयल के खिलाफ मामला दर्ज किया था। प्रथम दृष्टया, गोयल ने बैंक से रु∙400 करोड़ का ॠण मांगा था एवं कुमरा जो एक भूतपूर्व बैंक अधिकारी था, आचार्य के साथ सम्पर्क स्थापित किया जबकि आचार्य पर आरोप था कि उसने अपने नीचे के अधिकारियों को प्रभावित कर रु∙75 करोड़ संस्वीकृत करवा लिया। सीबीआइ ने आचार्य, कुमरा एवं गोयल के दफ्तर एवं घर सहित विभिन्न ठिकानों पर एक ही साथ छापे मारे और आचार्य के घर से रु∙ 7 लाख बरामद किये। बैंक के भीतर के लोग बताते हैं कि आचार्य को ‘फँसाया’ गया। 


वर्ष 2013 में वित्त मंत्रालय ने कॉर्पोरेशन बैंक के अध्यक्ष सह प्रबन्ध निदेशक रामनाथ प्रदीप से, नॉर्मस के उल्लंघन किये जाने के, केन्द्रीय निगरानी आयोग (सीवीसी) द्वारा लगाये गये आरोप पर स्पष्टीकरण मांगा था। प्रदीप पर आठ मूल आरोप थे जिसमें शामिल था नियमों का उल्लंघन करते हुये कुछेक कम्पनियों को ॠण संस्वीकृत करना, एक ऐसे टावर-निर्माण कम्पनी को ‘बड़े-कर्ज’ की श्रेणी में आने वाला ॠण देना जो कम्पनी एक दूसरे सरकारी बैंक के ॠण की अदायगी में चूककर्त्ता रही थी तथा बैंक में एक उपदेशक की नियुक्ति के लिये नियमों में फेरबदल करना। उस मामले में आगे क्या हुआ इसकी अद्यतन जानकारी मुझे नहीं है। 


वर्ष 2011 के अन्त में सीबीआई ने राष्ट्रीयकृत बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों के आठ वरीय अधिकारियों को गिरफ्तार किया था। उन पर आरोप थे कि उन्होने निहित स्वार्थ वाले लोगों को ॠण देने के लिये प्रलोभन स्वीकर किये थे एवं जिन उच्चस्तरीय कमिटी में वे थे उस कमिटी की गुप्त सूचनायें बाहर पहुँचाई थी। यह सारा मामला घुस-के-लिये-ॠण घोटाले से सम्बन्धित था। बाद में उन्हे जमानत पर रिहा किया गया। 


कई ऐसे उदाहरण हैं जहाँ अनियमितताओं के आरोप पर बैंक के मुखिया का कार्यकाल सरकार द्वारा समय से पहले समाप्त कर दिया गया। उदाहरणस्वरूप, बैंक ऑफ महाराष्ट्र के एस∙सी∙बसु 2006 में अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये। दिल्ली के पंजाब एन्ड सिंध बैंक के एन∙एस∙गुजराल के साथ भी वही हुआ। युनाइटेड बैंक ऑफ इन्डिया के अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक अर्चना भार्गव ने भी, स्वास्थ का कारण दिखाते हुये समयपूर्व अपने कार्यकाल की समाप्ति को मान लिया। अन्य बैंकर कहते हैं कि उनके जाने के पीछे और भी बातें हैं लेकिन भ्रष्टाचार का जिक्र किसी ने नहीं किया। 


जहाँ असम्मान की बात आती है, इन्डियन बैंक के भूतपूर्व अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक एम∙ गोपालाकृष्नन के रिकार्ड को कोई तोड़ नहीं सकता है। वर्ष 1992 से वर्ष 1996 के बीच, बिना प्रतिभूति लिये ॠण संस्वीकृत कर बैंक को रु∙ 31∙75 करोड़ का चुना लगाने के  आरोप में सीबीआई अदालत ने उन्हे एक साल का वामशक्कत कैद की सजा सुनाई थी। अदालत ने उन्हे भारतीय दंड संहिता एवं भ्रष्टाचार निरोधक कानून के विभिन्न प्रावधानों के अन्तर्गत षड़यंत्र, आपराधिक विश्वासहनन, दोषपूर्ण आचरण एवं धोखाधड़ी का दोषी पाया था।


कैसे सभी बैंकरों को, जो जनता के पैसों के रखवाले हैं, इमानदार एवं भ्रष्टाचार के चपेट में कभी न आने वाला बनाया जाय? एवं कैसे एक भ्रष्ट अधिकारी को सजा दिया जाय? एक रास्ता हो सकता है कि उन्हे सम्मानजनक वेतन दिया जाय। अभी उनका वेतन दयनीय है। भारतीय स्टेट बैंक के मुखिया को देखिये जो रु∙ 22 खरब के तुलनपत्र का हिसाब रखते हैं। एवं इनकी तूलना कीजिये किसी नीजी क्षेत्र के बैंक के मुखिया के साथ जो उसके पाँचवाँ हिस्से या उससे भी छोटे तुलनपत्र पर काम करते हैं। हाँ बेशक, स्टेट बैंक के मुखिया मुम्बई के मालाबार हिल्स सरीखे रईसी इलाके में बड़े बंगले में रहते हैं जो उनके वेतन में नहीं जुड़ता है। अगर शुरुआती तौर पर सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मुखिया को मिलने वाली सारी सुविधाओं को पैसे में बदल देती है तो उनका वेतन कई गुणा बढ़ जायेगा। क्षेत्र को खोल दीजिये, बाजार से योग्य व्यक्तियों को उठाइये, मुख्य कार्यपालक पदाधिकारियों को और पैसे दीजिये, उन्हे खुश रखिये एवं उन्हे 24X7 निगरानी में रखिये। अगर वे पैसे लेते हुये पकड़े जायें तो सजा दीजिये। वे जनता की आस्था के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं अत: उन्हे ऐसी सजा मिलनी चाहिये जो मिसाल बने। 


इन्डियन एक्सप्रेस ने 11 अगस्त को लिखा था कि सिन्डिकेट बैंक के निलम्बित अध्यक्ष सह प्रबन्ध निदेशक एस∙के∙ जैन का 2013 में की गई नियुक्ति में “पारदर्शिता का अभाव है तथा अनुचित तौरतरीकों की बदबू” आती है। 


बिल्ली आखिर थैले से निकल ही गई।


सर्वोच्च अधिकारियों की अस्वच्छ नियुक्ति प्रक्रिया सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सबसे बड़ा अभिशाप है जिससे उद्योग का 70% ग्रसित है। कोई नियमकानून दिखता ही नहीं; अधिकांश नियुक्तियाँ इस प्रक्रिया में लगे अफसरशाहों की मर्जी पर होती है जबकि भारतीय रिजर्व बैंक नज़र फेरे रहता है। क्या किसी कार्यपालक अधिकारी को पहले किसी छोटे बैंक का सीएमडी बनाया जाना चाहिये और तब बड़े बैंक में भेजा जाना चाहिये? या उसे सीधा किसी बड़े बैंक का मुखिया बना दिया जाना चाहिये? एक बैंकर जो लगभग तीन दशकों तक एक छोटे बैंक में बिताया है, क्या उसे सीधा किसी बहुत बड़े बैंक के कोने वाले कमरे में बिठा देना चाहिये? या उसे, उसकी पृष्ठभूमि को देखते हुये किसी छोटे बैंक का मुखिया बनाया जाना चाहिये? 


कोई इन सवालों का उत्तर नहीं जानता है। नॉर्थ ब्लॉक, जहाँ इन चयनों को करने वाला वित्त मंत्रालय स्थित है, वहाँ के कुछ लोगों की मर्जी एवं खयालों के अनुसार नियम बनाये भी जाते हैं और तोड़े भी जाते हैं।


अक्सर, रिक्तियों के सृजन के एक वर्ष पहले सफल प्रत्याशियों की एक छोटी सूची (शॉर्ट-लिस्ट) बनाई जाती है। इसके चलते व्यक्तियों एवं औद्योगिक घरानों की गहन पैरवियों का सिलसिला शुरु होता है। मुफ्त कुछ भी नही होता है। इसलिये जो औद्योगिक घराना किसी प्रत्याशी के लिये पैरवी किया होता है वह अपना हिस्सा ॠणों के रूप में मांगता है और बैंकर के पास उसे यह सुविधा देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है। 


दक्षिण भारत के एक बड़े बैंक के कार्यपालक निदेशक ने मुझे बताया था कि सीएमडी के पद के लिये होने वाले उसके साक्षातकार के कुछ दिन पहले उसे एक अन्जान व्यक्ति का फोन मिला था जिसमें उसे आश्वस्त किया गया था कि उसकी नियुक्ति पक्की है। उस कार्यपालक निदेशक ने मुझसे कहा, “सच कहूँ तो उसने मुझसे कुछ मांगा नहीं था, पर मैं इस तरह आगे बढ़ना नहीं चाहता था”। वह साक्षातकार में गया पर सफल नहीं हो पाया। सीएमडीओं एवं कार्यपालक अधिकारियों की कई नियुक्तियाँ पैरवियों के ही नतीजे हैं। 


यह एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि पूरी प्रक्रिया ही सड़ी हुई है। ऐसे भी उदाहरण हैं जहाँ एक कार्यपालक निदेशक को किसी बैंक में कुछेक महीने बिताने के बाद उसी बैंक में  मुखिया बना दिया जाता है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि कितनी सेवा-अवधि बची होने पर कोई बैंक का मुखिया बन सकता है। नॉर्म दो वर्षों का है पर ऐसे उदाहरण हैं जहाँ डेढ़ बर्ष के लिये किसी बैंक का सीएमडी बना दिया गया है। एक वरीय बैंकर, जो खुद दो बैंकों का मुखिया रह चुके हैं, का कहना है कि पूरी प्रक्रिया ही सड़ी हुई है। 


बातें बहुत सामान्य तरीके से शुरु होती है। एक किसान जिसका ॠण संस्वीकृत हुआ वह कनीय कृषि अधिकारी को एक तरबूज देता है। जैसे जैसे वह अधिकारी अपने कैरियर में आगे बढ़ता है उसे दी जा रही चीज़ें कीमती होती जाती है। एक मुख्य प्रबंधक को दिवाली में दो ग्राम का सोने का सिक्का मिलता है जबकि एक महाप्रबंधक को पचास ग्राम का मिलत है। एक पतली सी रेखा होती है घूस और तोहफा के बीच में। अप्रैल के महीने में एक डिब्बा भर अलफांसो आम (जब अलफांसो की कीमत होती है रु· 1,600 प्रति दर्जन), दिवाली में चांदी के कटोरे में मेवे (ड्राई फ्रुट्स) या सोने का सिक्का, नये साल में बैंकर की बीवी के लिये एक कीमती साड़ी या हीरे की बाली – ये तोहफे हैं या घूस? 


इनका वर्गीकरण करना मुश्किल है पर मै जानता हूँ कि कुछ बैंकों में अधिकारियों के मैन्युवल में लिखा होता है कि वे क्या ले सकते हैं एवं क्या नहीं ले सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, अमरीका के फेडरल रिजर्व का एक अधिकारी डिनर का निमंत्रण कभी स्वीकार नहीं करेगा जबकि इंग्लैन्ड के फाइनैन्सियल सर्विसेज ऑथरिटी (एफ∙एस∙ए∙) का एक अधिकारी डिनर में जायेगा और अगले दिन ‘धन्यवाद’ लिखा हुआ एक पत्र भेजेगा। बैंकरों के लिये यह अच्छा होगा कि पारदर्शिता से काम लें तथा एफएसए के अधिकारियों की तरह जो भी वे स्वीकार करें उसका रिकॉर्ड रखें।


पारदर्शिता ही कुंजी है। दक्षता, जोखिम प्रबंधन एवं ॠण मॉनिटरिंग में कार्यकुशलता में कमी के साथ साथ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ॠण खातों के संचालन में भी पारदर्शी नहीं हैं एवं कोई तय नियम नहीं है कि किसे ॠण मिल सकता है और किसे नहीं, ॠणों की कीमतें क्या हैं और यहाँ तक कि जमानती प्रतिभूति (कोलैटेरल्स) की प्रकृति क्या होगी और कितने की होगी। कोलकाता स्थित एक बैंक के उपमहाप्रबंधक ने मुझसे कहा कि उनका बैंक ॠण-प्रस्तावों की समीक्षा नहीं करती है और यह मूल्यांकन नहीं करती है कि ॠणकर्ता को कितना ॠण देना चाहिये। उन्होने कहा, “हम उल्टा करते हैं। पहले यह अन्दाज करते हैं और तय करते हैं कितना हम दे सकते हैं और फिर छद्म-समीक्षा करते हैं”। जमानती प्रतिभूति के नॉर्म्स सिर्फ छोटे ॠणों के लिये हैं। फिर आगे वह उपमहाप्रबंधक महोदय जोड़ते हैं, “कितना सही होता है स्टॉक एवं लेनदारी (रिसिवेब्ल्स) का ऑडिट? और अक्सर हम नकली बही ॠण (बुक डेब्ट) के आधार पर ॠण देते हैं”।


कई ऐसे मौके होते हैं जब एक ॠणकर्ता को पहले लिये गये ॠण के ब्याज की अदायगी के लिये नया ॠण दिया जाता है। चक्र तब तक चलता रहता है जब तक ॠणकर्ता ॠण के बोझ तले दब न जाये और लौटाने में अक्षम न हो जाये। इस नज़र से देखा जाय तो कई ॠण खातों के मामलों में बैंक बाघ की सवारी कर रहे हैं।


जाँच एजेंसियाँ चुने हुये लोगों पर जाँच की कार्रवाई करती हैं। भुषण स्टील लिमिटेड को नया ॠण देने में घूस लेते हुये जैन को पकड़ा गया। लेकिन विभिन्न बैंकों में भुषण स्टील लिमिटेड की कुल ॠणराशि रु· 40,000 करोड़ की है और यह कम्पनी चूककर्त्ता (डिफल्टर) बनने के कगार पर है। उन दूसरे बैंकों का क्या होगा जिन्होने भूषण स्टील लिमिटेड को ॠण दे रखा है? उसी तरह, विजय माल्या के बैठ-चुकी कम्पनी किंगफिशर एयरलाइन्स लिमिटेड को ॠण देने के लिये आइ∙डी∙बी∙आई∙ बैंक लिमिटेड पर केन्द्रीय जाँच ब्युरो का अनुसंधान चल रहा है। कई दूसरे बैंकों ने भी किंगफिशर को ॠण दे रखा है। बल्कि भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व में बैंकों के एक सहायता-संघ (कॉन्सर्टियम) ने किंगफिशर एयरलाइन्स लिमिटेड के ॠण के एक हिस्से को अविश्वसनीय उँची कीमत पर हिस्सा-पूंजी (इक्विटी) में भी बदला है। क्या उन बैंकों में से किसी को गिरफ्त में लिया गया है? 


नवम्बर 2010 में सहायता-संघ के बैंकों ने 1,355 करोड़ रुपयों के ॠण को, किंगफिशर एयरलाइन्स के स्टॉक के बाजार-मूल्य से 61% अधिक (प्रिमियम) पर हिस्सापूंजी में तब्दील किया। इससे अलग, बैंकरों ने ॠण की अदायगी की अवधि को नौ साल कर दिया तथा दो साल का स्थगन (मोरैटॉरियम) भी दिया। साथ ही व्याज की दर में कटौती की तथा नया ॠण भी दिया। 


दलाल (ब्रोकर), जिनमें से कई संस्था के रूप में भी हैं, अपने कॉर्पोरेट ग्राहकों को ॠण की सुविधा दिलवाने के लिये बैंकरों को घूस देने के खेल में बड़ी भूमिका निभाते हैं। ऐसा एक दलाल संस्था, बैंकर को घूस देते पकड़े जाने के पहले तक, वर्ष 2008 से वर्ष 2011 तक की अवधि में, विभिन्न क्षेत्रों में 50,000 करोड़ रुपये तक का ॠण दिलवा चुका था। सामान्यत: दलाली की रकम संस्वीकृत ॠण की 2% होती है लेकिन वह क्षेत्र पर भी निर्भर करता है। उदाहरणस्वरूप, चुँकि बैंक रियल एस्टेट क्षेत्र में ॠण देना नहीं चाहते हैं इस लिये इस क्षेत्र में ॠण दिलवाने की दलाली 5% तक जा सकती है। इससे अलग, अगर ॠण की कीमत ॠणकर्ता की उम्मीद से कम होती है तो दलाल को कटमनी मिलता है। और यह रकम वे बैंकरों के साथ बाँटते हैं। 


ऐसे दलाल, शाब्दिक अर्थों में सुटकेस में रुपये लेकर बाँटने के लिये घूमते हैं। एक व्यक्ति हैं दलाल, जिनका मुम्बई एवं उसके मुफस्सिलों में सात फ्लैट हैं जहाँ वरीय बैंकरलोग नियमित तौर पर खुश किये जाते हैं। जबकि दूसरे एक दलाल हैं जो हेलिकॉप्टर पर विभिन्न शहरों में जाते हैं बैंकरों से मिलने एवं डील फाइनल करने। 


बैंकरों को खुश करने के दूसरे भै तरीके हैं। एक मीडिया कम्पनी एक ऐसे बैंक से 800 करोड़ रुपये ॠण लेना चाहती थी जिसके सीएमडी सेवानिवृत्ति के कगार पर थे। कम्पनी ने इंग्लैन्ड में आठ लाख पौंड या आठ करोड़ रुपये खर्च कर एक फ्लैट खरीदा, जहाँ बैंकर का बेटा रहता था। दोनों तरफ फायदे में रहे क्योंकि ब्रोकर के माध्यम से काम करवाने पर 2% यानि 16 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते। 


सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के ऐसे सेवानिवृत्त मुखिया हैं जो मुम्बई के पॉश इलाकों में बड़े फ्लैट में रहते हैं। क्या उनकी आय के मुताबिक है ऐसे फ्लैटों का मालिकाना या बिल्डर और बैंकर के बीच का कोई गँठजोड़ है? उत्तर नहीं है मेरे पास। काफी ऊँचे छूट वाली दर पर एपार्टमेंट देना बिल्डर का अपना तरीका हो सकता है एक व्यापारिक बैंकर को खुश करने का। उसी तरह, कुछ वित्तीय बिचौलिये हैं जो केन्द्रीय बैंकरों के बच्चों को अच्छी आमदनी वाली नौकरी का ऑफर देकर उन्हे प्रभावित करते हैं। यहाँ भी गलत उद्देश्य प्रमाणित करना बहुत कठिन है। 


ऐसी बातों का मुकाबला करने का एक तरीका हो सकता है कि प्रकटीकरण (डिसक्लोजर) वाध्यतामूलक बना दिया जाय। विदेशों में नियंत्रक संस्थायें ऐसा करती हैं। 


कैसे निपटा जाय भ्रष्ट बैंकरों से? शुरुआत के तौर पर, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अध्यक्ष एवं प्रबन्ध निदेशक के पदों को अलग अलग कर दिया जाय। अभी बहुत ज्यादा ताकत एक व्यक्ति में समाहित है और स्वच्छंद ताकत का इस्तेमाल सब के बस की बात नहीं। अध्यक्ष ताकत के गलत इस्तेमाल पर नजर रख सकते हैं। साथ ही, प्रबन्ध निदेशक की नियुक्ति दो या तीन सालों के लिये होनी चाहिये जिसका नवीकरण हो सके। जो भ्रष्ट होंगे उनकी अवधि की नवीकरण तो नहीं ही होगी बल्कि उनके सामने पहली अवधि खत्म होने से पहले ही बर्खास्त किये जाने का खतरा होगा। 


सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मुखियाओं क वेतन कई गुणा बढ़ाइये पर पूरा पैकेज हाथ में नहीं दीजिये। एक ‘खींच रखने’ (क्लॉबैक) का नियम होना चाहिये जिसके तहत, उनके वेतन का एक हिस्सा उनकी सेवानिवृत्ति के दो साल के बाद दिया जायेगा – जब यह स्पष्ट हो जायेगा कि उनके जाने के बाद बैंक की खराब सम्पत्तियों (बैड ऐसेट्स) में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। 


अन्त में, बोर्डों का पुनर्गठन अति अवश्य होना चाहिये। अभी जो स्थिति है, बोर्ड के कई सदस्य, नई दृष्टि देने या रणनीतिक सहयोग देने के बजाय अयोग्य ॠणकर्ताओं को सुविधा दिलवाने वाले होते हैं। यह चलन बन्द होना चाहिये।


[बैंकर्स ट्रस्ट रियलटाइम तमाल बन्दोपाध्याय का ब्लॉग है]


सूत्र:  http://www.livemint.com/Opinion/X4N7vFbyoLMXkBybupvX8N/How-to-deal-with-corrupt-bosses-of-stateowned-banks.html?utm_source=copy


 अंग्रेजी से अनुवाद – विद्युत पाल

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