Thursday, April 13, 2023

लेनिन के बारे में सोचते हुये

 वर्ष 1908 में लेनिन ने तत्कालीन संशोधनवादियों के खिलाफ संघर्ष करते हुये लिखा, “एंगेल्स ने अपने और अपने प्रख्यात मित्र को सन्दर्भ में लेते हुये कहा था कि हमारा सिद्धांत हठधर्म नहीं बल्कि कार्य का पथप्रदर्शक है । … इसकी अनदेखी कर … हम जमाने के निर्दिष्ट व्यवहारिक कार्यभारों से, जो इतिहास के हर नये मोड़ पर बदल सकते हैं, इसका [मार्क्सवाद का] सम्बन्ध मिटा देते हैं ।” [‘मेटिरियलिज्म ऐन्ड इम्पिरिओ-क्रिटिसिज्म’]
अब आइये जरा अपने अनुभवों से इस कथन का मिलान करें । जमीनी स्तर पर ट्रेड युनियन नेतृत्व में काम कर रहे कुछ साथी हैं जो विचार कर रहे हैं कि सदस्यता कैसे बढ़ाई जाय । संभावित नये सदस्यों की जो सूची उन्होने बनाई है उसमें कोई मुसलमान है, कोई दलित है, कोई ब्राह्मण है, कोई यादव …। अब चर्चा इस बात पर हो रही है कि किसके पास किसे भेजा जाय ‘मगजधुलाई’ के लिये । मुसलमान के लिये एक मुसलमान, दलित के लिये एक दलित, ब्राह्मण के लिये एक ब्राह्मण, यादव के लिये एक यादव ढूंढा जा रहा है । तभी कोई गुस्से से फट पड़ा, “यही हमारी सोच है ? इतनी घटिया ? और हम खुद को मार्क्सवादी कहते हैं !” तब एक दूसरा उसे समझाने लगा, “आप ख्वामखाह गुस्से में आ रहे हैं कामरेड । सिद्धान्त की बातें सुनने में बहुत अच्छी लगती है । लेकिन वे सिद्धान्त हैं । हम सब यहाँ मार्क्सवादी हैं और उन सिद्धान्तों को जानते हैं । आप व्यवहार की बात कीजिये । प्रैक्टिस में आइये । जो प्रैक्टिकल है हम वही कर रहे हैं ।… थोड़ा प्रैगमैटिक तरीके से सोचो यार !” 
सवाल यह है कि जो व्यवहारिक है वह अगर ‘मार्क्सवादी’ सिद्धान्त का क्रियान्वयन नहीं है तो हम किसका अचार डालें ? व्यवहार का या मार्क्सवाद का ? क्योंकि उपरोक्त बातचीत में दोनों व्यक्ति मार्क्सवाद को भाववादी ढंग से समझते हुये व्यवहार से अलग कर रहा है – एक ‘वाद’ का खम्भा पकड़कर तो दूसरा ‘व्यवहार’ का चादर खींच कर ।
और, किसने कह दिया कि एक खास तरह के सामाजिक/सांस्कृतिक माहौल में पले बढ़े आदमी को आन्दोलन में ले आने के लिये अनुरूप सामाजिक/सांस्कृतिक माहौल में पले बढ़े आदमी को भेजना गैर-मार्क्सवादी आचरण है ?
गतिशील पदार्थ के बने इस सृष्टि में कोई भी गति दिशाविहीन नहीं है । वो क्या कहते हैं, वेक्टर, वह भौतिक परिमाण जिसकी मात्रा भी हो एवं दिशा भी ! हर कण, हर पदार्थ की गतिरेख एक वेक्टर है । जीवन की गति भी दिशाविहीन नहीं होती है । कहने को हम कह जरूर देते हैं – कोई अपने जीवन को लेकर खिलवाड़ कर रहा है देख कर, लक्ष्यविहीन कहते कहते दिशाविहीन भी कह देते हैं । लेकिन इतिहास में किसी भी मनुष्य का जीवन दिशाविहीन नहीं है, किसी न किसी ओर है - गौर करेंगे ।
लेनिन ने कहीं कहा भी था कि देखो वो किधर जा रहा है । अगर एक व्यक्ति अपने सामाजिक/ सांस्कृतिक कुन्ठाओं, कूपमन्डुकताओं के भीतर से मजदूर वर्ग के संगठन में, आन्दोलनों में हिस्सा लेने के लिये आ रहा है और दूसरा उसकी ओर मित्रता का हाथ बढ़ाने के लिये उसके घर जा रहा है तो इसमें दोनों की दिशा पूंजी के खिलाफ मजदूरवर्ग की एकता को बढ़ाने की ओर है, और यह जमाने के निर्दिष्ट व्यवहारिक कार्यभारों को पूरा करने के लिये मार्क्सवाद के प्रयोग का छोटा सा उदाहरण है ।
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लेनिन ने मार्क्सवाद के क्रान्तिकारी सारतत्व की रक्षा की, कि यह मताग्रह या हठधर्म नहीं बल्कि कार्य का पथप्रदर्शक है । उसी पथप्रदर्शन पर उन्होने रूस में समाजवादी क्रान्ति की सफलता के लिये रूसी मेहनतकशों की पार्टी की अगुआई की । क्रान्ति को सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ाने के लिये उन्हे निरन्तर, आजीवन, मार्क्सवाद के क्रान्तिकारी सारतत्व को बचाने के लिये वैचारिक संघर्ष करना पड़ा । लेकिन क्रान्तिकारी सारतत्व की रक्षा सिर्फ मार्क्स और एंगेल्स के कथन को दोहराने से तो नहीं हो जाता है । कार्ल मार्क्स के जीवन और विचारों पर लिखते हुये लेनिन ने कहा कि “समग्रता में मार्क्स के विचार ही, जो दुनिया के सभी सभ्य देशों के मज़दूरवर्ग-आन्दोलन के सिद्धांत एवं कार्यक्रम है, आधुनिक भौतिकतावाद एवं आधुनिक वैज्ञानिक समाजवाद हैं” । लेकिन, लेनिन के समय में वैचारिक तौर पर मार्क्सवादी सिद्धांत भी और विश्व का मज़दूरवर्ग आन्दोलन भी दुश्मनों से घिर चुके थे । दुनिया के साम्यवादी, समाजवादी व मज़दूर पार्टियों का वैश्विक मंच द्वितीय अन्तरराष्ट्रीय संशोधनवादियों का गढ़ बन चुका था, योरप के समाजवादी पार्टियों का बड़ा हिस्सा ‘युद्धकालीन राष्ट्रभक्ति’ के नाम पर शासकीय युद्ध-कार्रवाईयों का साथ देने लगा था एवं खुद रूस में, संशोधनवाद के नये नये किस्म व साथ में अति-वामपंथ भी, मार्क्सवाद पर हमले बोल रहे थे । कितना दर्दनाक रहा होगा लेनिन के लिये वह क्षण जब उन्हे प्लेखानोव (जिन्हे वह शिक्षक का दर्जा देते थे) या मैक्सिम गोर्की (विश्व भर में मज़दूरवर्ग के सबसे प्रिय लेखक) के खिलाफ लड़ना पड़ा, या आगे चल कर नवोदित सोवियत राष्ट्र को बचाने के लिये क्रॉन्साड्ट वगावत को कठोर हाथों से कुचलने का आदेश देना पड़ा !
बीसवीं सदी का पहला दशक और खास कर 1905 का वर्ष विज्ञान के इतिहास में प्रमुख स्थान रखता है तथा, फलस्वरूप, इतिहास में विज्ञान (जे॰डी॰बर्नाल के ग्रंथ का शीर्षक उधार लेते हुये) की भूमिका को भी उजागर करता है । वर्ष 1905 में अलबर्ट आइनस्टाइन का ‘सापेक्षता का विशेष सिद्धांत’ प्रकाशित हुआ । बीसवीं सदी की शुरुआत के एन पहले परमाणु के भीतर के कणों, खास कर इलेक्ट्रॉन की खोज हो चुकी थी । रेडियोधर्मी क्षय को कणों के विकीरण ले रूप में परखा गया ठीक सदी की शुरुआत पर । दूसरी ओर, इसी अवधि में, मनोविज्ञान के क्षेत्र में भी सुदूर-प्रभावी काम, एक तरफ सिगमन्ड फ्रॉयड के स्वप्न व यौनता सम्बन्धी प्रतिपादनों के रूप में तो दूसरी तरफ इवान पावलोव के शास्त्रीय अनुबन्धन व अन्य सिद्धान्तों के रूप में हुये ।
ये सभी काम दार्शनिक भौतिकतावाद को ही पुख्ता कर रहे थे पर आम बौद्धिक बहसों में इनका इस्तेमाल उल्टा किया जा रहा था । जैसे:-
-         ‘मैटर तो अब रहा नहीं’
-         ‘तो मार्क्सवाद तो स्वीकारता है कि हमारी सोच के परे भी चीजें हैं – यानि इम्मैनुवल कान्ट वाला थिंग-इन-इट्सेल्फ हो गया’
-         ‘मैटर नहीं, इनर्जी (भौत-पदार्थ नहीं ऊर्जा) ही महाविश्व का मूल है’
-         ‘और फिर ऊर्जा भी तो अक्षय नहीं रहा, वह कहाँ गया विकीर्ण होकर, यानि जगत एक नहीं है’
-         ‘तो फिर, शाश्वत सत्य तो कुछ भी नहीं, पदार्थ भी नहीं, उसकी गतिशीलता भी नहीं’   
-         ‘हमारी नज़र, हमारा ध्यान, हमारे अनुभव, हमारे सेन्स-डाटा कुछ भी विश्वसनीय नहीं, भौतिकता को समझने में अक्षम क्योंकि उसी गतिशील जगत के हम हिस्सा हैं’
वगैरह, वगैरह ।
ऐसी स्थिति में इन हमलों, या इन हमलों से अधिक विज्ञान के नये आविष्कारों के आलोक में मार्क्सवादी दर्शन, द्वन्दात्मक भौतिकतावाद को खड़ा करना जरूरी था । इसी काम को लेनिन ने किया जो हमें ‘मेटिरियलिज्म ऐन्ड इम्पिरियो-क्रिटिसिज्म’ नाम के पुस्तक एवं कई लेखों में देखने को मिलता है ।
लेनिन द्वारा किये गये इस दार्शनिक प्रतिपादन, अर्थनीति में पूंजीवाद के चरमावस्था के रूप में साम्राज्यवाद (एवं उसके आर्थिक सारतत्व के रूप में इजारेदार पूंजी) की पहचान तथा राजनीतिक अर्थशास्त्र में एक पिछड़े हुये देश को समाजवादी क्रान्ति की ओर अग्रसर करने रणनीतिक व कार्यनीतिक सिद्धान्त के कारण ही उनके समय के उपरांत दुनिया का मज़दूरवर्ग अपने क्रांतिकारी सिद्धान्त को मार्क्सवाद-लेनिनवाद का नाम से जानने लगा ।



Tuesday, April 4, 2023

পিচ্ছিলতা আছে

‘চোখ গেল’ পাখিটার ডাক যে ঈষৎ বদলেছে খেয়াল রাখিনি
রেলগাড়ির নতুন রঙে আর কখনো সবুজ কখনো বিষন্নতার
সাথে তার নতুন ঘষার
                              বিতর্কে মজে গিয়েছিলাম
অথচ বোরওয়েলের গর্তে বাহাত্তর ঘন্টা আটকা পড়েছিল শিশু
দিগন্তে ধুলো উড়িয়ে আসছিল সেনার ত্রাণদল জেলা প্রশাসন
ওটা যে সময়ের ধুলো খেয়াল ছিল না
 
হঠাৎ মাথার ওপর দিয়ে আরবার উড়ে গেল পাখিটা
এবার স্পষ্ট শুনলাম ‘যুগ গেল’
এখন স্পষ্ট মনেও রাখতে পারি না ক’বছর সোভিয়েত যুগে বাঁচলাম
ক’বছর শুনলাম সে সোভিয়েত সামাজিক সাম্রাজ্যবাদী
আর ক’বছর ইয়েল্‌তসিনের বিয়ারের হ্যাঙোভার কাটালাম
সামূহিক প্রতিবাদোৎসবে …
 
শুধু আমাদেরই নয় খোদ রবিঠাকুরের
গা ঘেঁষে ঘুরছে খুনে পান্ডারাও ইতিহাসের পরিখায়
‘ভারততীর্থ’ ডাক দেওয়া কোনো পাখি নেই সরীসৃপও নেই
আমি আছি অথবা এবং আমিই আছি কিছু কম নই
রাতের প্ল্যাটফর্মে, বাসস্ট্যান্ডে, তাঁবুতে লাল ঝান্ডায়
আর পিচ্ছিলতা আছে উঠে আসা জল আছে পরিখায়

৪.৪.২৩ 



Thursday, March 30, 2023

साम्राज्यवाद पर लेनिन के काम को समझते हुये

“इस केन्द्रीकरण या कुछेक पूंजीपतियों द्वारा बहुत सारे पूंजीपतियों के सम्पत्तिहरण के साथ साथ निरन्तर विस्तृत होते हुये पैमाने पर विकसित होता जाता है श्रम प्रक्रिया का सहकारी रूप, विज्ञान का सचेत प्रौद्योगिक प्रयोग, जमीन की व्यवस्थित जुताई और श्रम-साधनों का सहाधिकार में ही व्यवहारयोग्य श्रम-साधनों में बदलाव । उत्पादन के सभी साधनों का इस्तेमाल संयुक्त, समाजीकृत श्रम के उत्पादन के साधन के तौर पर करते हुये खर्च कम किये जाते रहते हैं । सभी देशों की जनता विश्वबाज़ार के जाल में फँसती जाती है । साथ ही विकसित होता जाता है पूंजी के शासन का अन्तरराष्ट्रीय स्वरूप । बदलाव की इस पूरी प्रक्रिया के सारे लाभ को हड़पने और अपनी इजारेदारी में कर लेने वाले पूंजी के थैलीशाहों की निरन्तर कम होती संख्या के साथ साथ आम तौर पर बढ़ती है बदहाली, अत्याचार, गुलामी, पतन और शोषण । लेकिन इसी के साथ मज़दूरवर्ग का विद्रोह भी बढ़ता है । मज़दूरवर्ग, जो एक ऐसा वर्ग है जिसकी संख्या हमेशा बढ़ती रहती है और जिसे पूंजीवादी उत्पादन प्रक्रिया का तंत्र ही संगठित, एकताबद्ध और अनुशासित करते रहता है । पूंजी की इजारेदारी उसी उत्पादन प्रणाली के लिये बन्धन बन जाती है जिस उत्पादन प्रणाली के साथ साथ व छत्रछाया में वह पनपी थी और विकसित हुई थी । उत्पादन के साधनों का केन्द्रीकरण एवं श्रम का समाजीकरण अन्तत: एक ऐसे बिन्दु पर पहुँचता है कि उनके पूंजीवादी आवरण के साथ उनका मेल खत्म हो जाता है । अत: आवरण फट कर अलग अलग हो जाता है । पूंजीवादी निजी सम्पत्ति का शोकवाद्य बज उठता है । सम्पत्तिहरण करने वालों की सम्पत्ति जब्त कर ली जाती है ।”

उपरोक्त पंक्तियाँ मार्क्स की ‘पूंजी’ खन्ड 1 के अन्तिम अध्याय से ली गई है और पिछले 155 वर्षों में असंख्य बार दुनिया की विभिन्न भाषाओं में उद्धृत की गई हैं । पंक्तियाँ हैं ही ऐसी ! महाकाव्यीय विराटता की जिस भाषा में मार्क्स इजारेदार पूंजी के उद्भव से अंत तक का द्वन्दात्मक वर्णन करते हैं वह स्वभावत: रोमांचित करता है ।

लेकिन जिस समय ये पंक्तियाँ लिखी जा रही थी उस समय तक उपनिवेशवाद या साम्राज्यवाद इस इजारेदार पूंजी की साम्राज्यवाद या वित्तपूंजी के उपनिवेशवाद में तब्दील नहीं हुआ था ।

पूंजी का कुछेक हाथों में केन्द्रीकरण, उद्योगों व सेवाओं का आलम्ब व क्षैतिज जोड़, कीमतों व आपूर्ति पर नियंत्रण के लिये कार्टेल व सिन्डिकेटों की स्थापना और इस ताकत के आधार पर बैंकों और औद्योगिक पूंजी के गँठजोड़ों का बनना और वित्तपूंजी की ताकत में तेजी से वृद्धि… यह सब उन्नीसवीं सदी के अन्तिम दशकों में होने लगा । बीसवीं सदी शुरू होते होते इन प्रवृत्तियों पर योरोपीय बौद्धिक हलकों में बात होने लगी । फिर आ गया युद्ध, जिसे हम प्रथम विश्वयुद्ध के रूप में जानते हैं ।

लेनिन के नेतृत्व में बॉलशेविक पार्टी अपने देश में मज़दूरों, किसानों, तमाम मेहनतकशों की एकता कायम कर जारशाही का खात्मा और जनवादी प्रजातंत्र की स्थापना के लिये काम कर रही थी । सन 1913 में आर॰एस॰डी॰एल॰पी॰ (यानि जिसे हम बॉल्शेविक पार्टी कहते हैं) के पार्टी अधिकारी एवं केन्द्रीय कमिटी के संयुक्त सम्मेलन में ‘मौजुदा स्थिति में आन्दोलन का कार्यभार’ शीर्षक अपने नोट के चौथे बिन्दु में लेनिन लिखते हैं, “चुँकि सामान्य रूप से यही हालात हैं, सामाजिक-जनवादियों का कार्यभार बनता है कि राजतंत्र को उखाड़ फेंकने के लिये एवं जनतांत्रिक प्रजातंत्र (या गणराज्य) की स्थापना के लिये आम जनता के बीच व्यापक क्रांतिकारी आन्दोलन चलाना जारी रखें” (लेनिन, संगृहित रचनायें, खंड 19) ।

लेकिन पूंजीवादी योरोप में मज़दूरवर्ग के अगुवा दस्तों, सामाजिक-जनवादी या समाजवादी पार्टियों में कुछ भ्रम की स्थितियाँ थी जो लेनिन को परेशान कर रहे थे । 1912 में बैसेल में सम्पन्न, दूसरे अन्तरराष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन के घोषणापत्र में मज़दूरवर्ग का आह्वान किया गया था कि युद्ध शुरू होने की स्थिति में वे अपने अपने देश के सरकारों के युद्ध-प्रयासों का विरोध करें । रूस का राजतंत्र भी तो युद्ध में शामिल होने की तैयारी कर रहा है ! तो रूसी मज़दूरवर्ग का नारा क्या हो ? ‘जार, खबरदार, तुम युद्ध मत शुरू करो’ या सीधा, ‘चलो साथियो, जारशाही पर हमला बोलो’ ? और फिर, बहुत सारे भ्रामक सुझाव थे उस बैसेल घोषणापत्र में जो अन्तत: सामाजिक-जनवादी या कम्युनिस्टों को शांतिवाद के नाम पर अपने अपने देश के जनसंघर्षों को क्रांति की दिशा में आगे बढ़ने से रोक रहे थे । उस दस्तावेज एवं तत्काल प्रकाशित कुछ अन्य पुस्तिकाओं का अध्ययन कर लेनिन को स्पष्टत: दिखने लगा कि एक भयानक कमी है समझदारी में । ‘पूंजीवाद’, ‘इजारेदारी’, ‘साम्राज्यवाद’, ‘युद्ध’ ये सारी अवधारणायें हैं, मौजूद हैं, चर्चा में हैं लेकिन अलग अलग । साम्राज्यवाद जैसे एक बीमार प्रवृत्ति हो सरकारों की जो युद्ध पैदा कर रही हों । गोया पूंजीवाद की ही प्रवृत्तियों हों लेकिन ऐसी जिससे निजात पाया जा सके, और फिर हर एक देश की पूंजीवादी सरकारें हों, अलग-अलग, जिनके खिलाफ उन देशों का मज़दूरवर्ग एवं मेहनतकश अवाम संघर्ष तीव्र करे और जीत हासिल करे ! ये बिल्कुल लोग देख नहीं रहे थे कि पूंजीवाद की स्वाभाविक (बेशक द्वंद्वात्मक विपरीत, प्रतिस्पर्धाविरोधी) परिणति है इजारेदारी, इजारेदार पूंजी ही साम्राज्यवाद का आर्थिक सारतत्व है (यहाँ भी एक द्वन्दात्मक वैपरीत्य है रूप और सारतत्व का, राष्ट्रीय स्तर पर इजारेदारी बनाम अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा का) और साम्राज्यवाद की राजनीति का विस्तार है युद्ध ।

तब लेनिन ने अध्ययन शुरु किया । और वह लेनिन का अध्ययन था । प्रासंगिक पुस्तक व दस्तावेजों के अलावे सभी विकसित पूंजीवादी देशों में बैंकों के निवेश की बढ़ती भूमिका, बैंकों व औद्योगिक पूंजी के गँठजोड़, अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर रेलमार्ग का विकास (क्योंकि जैसा लेनिन खुद कहते हैं कि रेल बुनियादी तीन उद्योग – कोयला, लोहा और इस्पात – का जोड़ है तथा विश्वव्यापार और पूंजीवादी-जनवादी सभ्यता का सबसे महत्वपूर्ण सूचक है) आदि का विशद अध्ययन किया । इसी अध्ययन के फलस्वरूप आई वह छोटी सी पुस्तिका – ‘साम्राज्यवाद, पूंजीवाद की चरम अवस्था’ - जिसकी भाषा को लेकर लेनिन को खेद रह गया कि जारशाही सेन्सर के कारण बातें घुमाफिरा कर करनी पड़ी थी, लेकिन जिस पुस्तिका ने पूरे विश्व में कम्युनिस्ट आन्दोलन के सामने बीसवीं सदी की पूंजीवाद का चरित्र और क्रांति की दिशा को रौशन कर दिया ।

आप गौर करेंगे कि मूलत: अर्थशास्त्र सम्बन्धी काम होते हुये भी मार्क्सवादी दर्शन, द्वन्दात्मक भौतिकतावाद के प्रयोग का एक अनूठा पाठ है यहाँ । 'ठोस परिस्थितियों का ठोस विश्लेषण' करते हुये लेनिन ने पूरे यथार्थ के अन्तर्सम्बन्धों को स्थापित किया (पूंजीवाद की ही गति के विकासक्रम में इजारेदारी, साम्राज्यवाद और युद्ध को उन्होने दिखाया), विपरीतों की – प्रतिस्पर्धी पूंजी और इजारेदारी की प्रवृत्ति की - एकता और संघर्ष में धीरे धीरे एक ऐतिहासिक क्षण में साम्राज्यवाद का वर्चस्व इजारेदारी पूंजी, बैंकों और सरकारों के गँठजोड़ से स्थापित हुआ – परिमाण गुण में परिवर्तित हुआ और अन्तत: इसी साम्राज्यवादी सत्ता को उखाड़ कर श्रम और श्रम के फलों के समाजीकरण को संरक्षित करना संभावित हुआ (निषेध का निषेध), जो लेनिन के नेतृत्व में रूस के मज़दूरवर्ग ने कर भी दिखाया । 

किताब तो साथियो, सब को पढ़नी पड़ेगी । मैं कोई निचोड़ नहीं रखने जा रहा हूं । वह दु:साहस भी मैं नहीं करूंगा । पर उस किताब को पढ़ते हुये आप पायेंगे कि किस तरह आँकड़ों व तथ्यों के सहारे वे साबित करते हैं कि साम्राज्यवाद का आर्थिक सारतत्व है इजारेदार पूंजी; इजारेदार पूंजी और बैंकों का गँठजोड़ किस तरह एक नये किस्म की पूंजी को पैदा करता है वित्तपूंजी, जो उजरती पूंजी के रूप में पूरी दुनिया में फैलता है, यही वित्तपूंजी ‘दरबारी पूंजी’ नाम की परिघटना को जन्म देता है और बेरोक मुनाफा, सूद लाभांश और भाड़े के लिये पूरी दुनिया को विध्वंसक युद्ध के सामने खड़ा कर देता है, जिसमें जीत सिर्फ साम्राज्यवाद की होती है – अब किसी मुल्क का मेहनतकश अवाम हिम्मत करें तो पूंजीवाद की इस मरणासन्न अवस्था के जकड़जाल को तोड़ते हुये समाजवादी क्रांति की ओर बढ़ जाये ! लेनिन ने भी तो यही किया !    

‘साम्राज्यवाद: पूंजीवाद की चरम अवस्था’ में लेनिन कहते हैं, “पूंजीवाद का विकास एक ऐसे स्तर तक पहुँच चुका है जहाँ, माल का उत्पादन अभी भी ‘राज’ करता है आर्थिक जीवन की बुनियाद माना जाता है लेकिन यथार्थ में यह कमजोर हो चुका है और मुनाफे का अधिकांश वित्तीय तिकड़म के ‘प्रतिभाओं’ के पास जाता है । इन तिकड़मों और ठगियों के आधार में है समाजीकृत उत्पादन; लेकिन मानव की जिस विपुल प्रगति से यह समाजीकरण हासिल हुआ, वह प्रगति… सट्टेबाजों के फायदे में चला जाता है ।”

फिर कहते हैं, “बैंकों एवं उद्योंगों के बीच का ‘व्यक्तिगत मिलाप’ का अनुपूरक होता है इन दोनों का सरकार के साथ ‘व्यक्तिगत मिलाप’ ।” एक जर्मन लेखक ज़ेइडेल्स को आगे लेनिन उद्धृत करते हैं, “सुपरवाइजरी बोर्डों में सहजता से रसूख वाले लोगों को, भूतपूर्व लोकसेवकों को जगह दी जाती है, जो प्राधिकारियों के साथ सम्बन्ध बनाने में मदद करते हैं…… सामान्यत: बड़े बैंकों के सुपरवाइजरी बोर्डों में एक सांसद या बर्लिन नगर पार्षद हुआ करता है” ।

किताब के अन्तिम अध्याय में पूंजीवाद की इस मरणासन्न अवस्था के बारे में लेनिन कहते हैं:-

“जैसा कि हमने देखा, साम्राज्यवाद का गहनतम आर्थिक बुनियाद है इजारेदारी । यह पूंजीवादी इजारेदारी है, यानि ऐसी इजारेदारी जो पूंजीवाद से ही पनपा है और पूंजीवाद के सामान्य परिवेश – माल-उत्पादन और प्रतिस्पर्धा – में, इसी सामान्य परिवेश के साथ स्थाई एवं असाध्य अन्तर्विरोध में मौजूद रहता है । फिर भी, हर इजारेदारी की तरह, यह अवश्यम्भावी तौर पर गतिहीनता एवं क्षय की प्रवृत्ति पैदा करता है । चुँकि इजारेदारी पर कीमतें तय की जाती हैं, इसलिये, तात्कालिक तौर पर ही सही, प्रौद्योगिक एवं फलस्वरूप सारे विकास का प्रेरक कारण एक हद तक अदृश्य हो जाते हैं, बल्कि जानबूझ कर प्रौद्योगिक विकास को धीमी करने की आर्थिक संभावना उत्पन्न हो जाती है…”

“इजारेदार पूंजी ने पूंजीवाद के सभी अन्तर्विरोधों को किस हद तक तीव्र कर दिया है यह सामान्यत: ज्ञात है । अन्तर्विरोधों की यह तीव्रता ही इतिहास के उस संक्रमणकाल का सबसे अधिक ताकतवर चालिका बल है जो विश्व वित्तपूंजी के अन्तिम* विजय से शुरू हुआ था ।”

अन्त में, बेहतर होगा कि हम किताब के जर्मन संस्करण की भूमिका में सन 1920 में लेनिन ने जो कहा उसे उद्धृत करें, “साम्राज्यवाद, सर्वहारा की सामाजिक क्रांति की पूर्वसंध्या है । इसकी पुष्टि विश्वव्यापी पैमाने पर 1917 में हो चुकी है ।”

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*यहाँ ‘अन्तिम विजय’ से उस ऐतिहासिक क्षण को सूचित किया गया है जब पहली बार समूची दुनिया कुछेक उपनिवेशवादी ताकतों के कब्जे में उपनिवेश/अर्ध-उपनिवेश/बर्चस्वक्षेत्र आदि के रूप में बँट गई । 

Tuesday, March 28, 2023

ন্যায়ের মৌলিক অধিকারের গান

ধুলোহাওয়ায় ভরা এক দুপুরে 
হঠাৎ সে আজ আমায় ডাকল, 
পথের ওপার থেকে এগিয়ে এসে 
মামলা জেতার খবর শোনাল।

মামলা জেতা তার নিঃস্ব মুখে 
দেখলাম এক নিদারূণ পরিহাস 
তেরটা বছর তার ন্যায়ের আঁতে 
পুষ্ট ভেড়ার মত হজম হল।

মহান এ দেশের ন্যায় যে মহান 
নিজের বেতো লাশে সাড় জাগাতে 
প্রমাণ দিতে যে সে মদ্দ-জোয়ান 
তেরটা বসন্তের শরীর খেল।

শুনি অনেকে হয় বদ্ধ পাগল, 
অনেকেই শেষরাতে দড়িতে ঝোলে, 
আবার বাঁচার কথা চিন্তা করে 
(এই) ন্যায়ের শিকার, এর পিলে জোরালো।

জানিনা বছর তের আগের রাতের 
ঘটনায় তার হাত ছিল কিনা।
যারা হল খুন তাদের বাঁচার 
দাম তের দিনও কিনা জানি না।

যেদিন এ শহরের পাড়ায়, মোড়ে
ভেসে এসেছিল এক স্বপ্নের ডাক, 
বোমার গুলির ধোঁয়া পাতলা হতে 
কেউ গেল জেল, কেউ হল পলাতক।

চালাক ছিল যারা খুঁটি নাড়িয়ে 
গগলস পরে হল সহমরমী, 
বোকা ছিল যারা খুঁটি পেলনা, 
মাথায় হাত বোলাল ধর্মযাজক।

দেখি কি আমরা এই আকাশে, পথে 
সবচেয়ে বড় জেল খোলা হাওয়ায়, 
সমান ন্যায়ের মৌলিক অধিকার 
খাটাতে বছর তের সাফ হয়ে যায়।

মহান এ স্বদেশের ন্যায় যে মহান, 
(তার) চোথায় যে ধুলো চাটে অনেক জীবন,
একথা বুঝতে, দিয়ে তেরটা বছর, 
নিঃস্ব ঘোরে সে আজ দুপুরবেলায়।

২১.৮.৮৩

Thursday, March 23, 2023

বিকেলে এসো

তোমার হাতেই হাত দশ-জনার।
সংগঠনের ডাকে
টালবাহানার আগে   
ভেবো তাদের নাম-ধাম-সংসার।  
 
এগারো দশও হয়, হতেই পারে।
তা’বলে বন্ধুমুখ
হারিয়ে যাবে? অসুখ  
ভীড় না হওয়ার চেষ্টাতেই তো সারে!
 
না যদি আসো, এড়িয়ে যাও,
দুপুরে রোজ সাথে
খাওয়া রুটির স্বাদে,
বুকের তেতো, কষাবে মুখটাও।
 
না এলে সবাই একটু হারব।
এলে সভার শেষে
ছড়িয়ে রুমাল পেতে
ইয়ারির মুড়ি জম্পেশ করে মাখব।     

২৬.৯.৮৫/২৩.৪.২২/২১.৩.২৩



Wednesday, March 22, 2023

কাজলকালো হাসি

এমন কাজলকালো হাসিতে সকাল আজ 
ভরিয়েছিল আকাশ
যেন কালো বাচ্চাটার পিঠেপাছায় সর্ষের
তেল দলেমলে বহুক্ষণ
ঘুরিয়ে নাকে নাক ঘষলো তার মা …

অশত্থের নতুন পাতাগুলোর ফিকেসবুজ
চকচক করছে প্রায় ঠোঁটের নাগালে –
শুকোলে এগুলোরও শিরাজাল 
ডাইরির ফাঁকে বুদ্ধচিহ্ন হবে।

বেলা দশটার ভিড় ঠেলছে স্কুলের মেয়েদের
প্রভাতফেরি মাখানিয়াকুঁয়ায় –
আমিও পিছনে; আজ বিহার দিবস,
ওদিকে খিচুড়ি চেপেছে মধ্যাহ্ন ভোজনের।

ইদানিং বাড়ছে –
যখনি ফিরি এসব মাঝপথে ছেড়ে প্রতিদিন
চিড়বিড় শব্দগুলো অজস্র অযুত 
শিকড় ছেঁড়ার গায়ে-পায়ে,
শুনতে পাই; চাইও হয়ত শুনতে অভিমানে –
কোথায় ছিল এত তন্তুসম্ভার? 

২২.৩.২৩



Friday, March 17, 2023

সৃষ্টিছাড়া

আজ একটু বেরুব।
রাস্তাগুলো সবই তো পুরোনো,
নিজেকেই নতুন করে নেওয়া ছাড়া
উপায় নেই আকাশের ঘড়ির দিকে তাকাবার।
তাও ভালো যে আকাশের
              ঘড়িটা পুরোনো হয় না কোনোদিন।
সে ঘড়ি পুরোনো হলে
সৃষ্টিই যে হত সৃষ্টিছাড়া!
 
তবে মায়ের বকুনি বুকে নিয়ে বলা যায়
সৃষ্টিছাড়াই বিশ্ব কাঁপায় তার দুরন্তপনায়।
মা জানে,
সৃষ্টির উপায় নেই সৃষ্টিছাড়া হওয়ার।
ঘরের ছেলেমেয়েরা হয়।
তাদেরই মুখ চেয়ে তো কক্ষনো
পুরোনো হয় না আকাশের ঘড়ি।
 
বিকেলে বেরুবার সময়
কোনো এক সৃষ্টিছাড়ার কথা আগে ভাবব চৌমাথায়।
তারপর আকাশের ঘড়ির দিকে তাকাব।
জানি, নতুন
এক টুকরো গোলাপি মেঘ সে আমাকে দেবেই।
 
১৮.৩.২৩