Friday, December 25, 2020

খবরগড়ের কথা

খবরগড়ের নবাবেরা চালান খবরকল,
সেই কলে ব্যস্ত তাঁদের কুশল কর্মীদল।
থাকে তাদের ভাবনায় বাদশাহী-মঙ্গল।
 
ফোটায় তারা খবর-শতদল!
বুনতে সেসব মারকাটারি সত্যকথার রোমাঞ্চ-চিত্র,
উড়োজাহাজ ছুঁয়ে আসে কেনেডি, দ্য-গল,
বেইজিং, হীথ-রো।
 
খবরগড়ের কলগুলোর দিনবচ্ছর কাবার
মুছতে দেশের অন্ধকার,
আলো করতে বসার ঘর,
শোয়ার ঘর, হোটেল ঘর, ব্রিজের নিচে তাঁবু ...
বাদশাহীর প্রজারা সব সেই আলোতে কাবু।
 
প্রতিদিনের জুলুমবাজির আর্তি,
বেড়ে গেলে, চাপা দিতে বিজ্ঞাপনের বাড়তি
পেয়ে বাজায় খবরকল দিব্যজ্ঞানের ঘন্টি –
ঘন্টি শুনে বাদশা গলায় পরেন তুলসী কন্ঠি,
 
পুরোনো সেই রক্তখিদে যোগব্যায়ামে চেপে,
মিষ্টি মিষ্টি মনের কথা ফাঁদেন, ময়ুরকে দেন দানা,
খবরগড়ের নবাবেরা প্রজাদেরকে মিষ্টি-কড়া বকেন –
“এত ভালো বাদশা তোদের সইছে না আর, না?”

 

ব্যাঙ্গালোর
২০.১১.২০

 


জেনারেল

জেনারেল তো জেনারেলের মতই –
এক আদেশে সৈন্যদল ভিন্ন পথ ধরে।
ভাবেন নি ফ্রেড একদিন তাঁর জেনারেলি গুণ
ফলাবেন নিজেরই ওপরে।

‘পারত না মুর, নিজের যত্ন নিতে?
মরার ছিল, কাজের মাঝপথে?’

জেনারেল তো যুদ্ধে থাকতে চাইতেন,
শ্রমিকদলের বিপ্লবী অভিযানে!
পরে আবার খবর লিখতে,
মহাদেশে দৌড়োতে চাইতেন,
যখনি লড়ত রাজার গুষ্টি, তাল দিত ধনিক,
নতুন দেশের দখলসন্ধানে ... !

খুঁজছিলেন ইতিহাসে মেহনতের গীতি;
প্রকৃতিতে খুঁজছিলেন জন্মযাপন রীতি;
শ্রমমুক্তির যোদ্ধা দুজন বন্ধুত্বের প্রগাঢ় বন্ধনে,
আজীবন নির্বাসিত, বাঁচছিলেন দিনবদলের পথের উদ্ভাবনে। ...  
মুরটা সব পন্ড করল মরে।
খোঁজো রাস্তা এবার তার পান্ডুলিপি ধরে!

আঠেরো বছর কেরানিগিরি করলেন
যাতে মুর থাকে নিজের কাজে;
কাজটা পুরো না করে, এখন মরাও সাজে? ...

কেমন ব্রিটিশ ম্যুজিয়ামে পাগল হয়ে ছুটত!
রুটির পয়সা নেই, ওষুধের ঠিক নেই,
বিকিয়ে যাচ্ছে ঘরের বাসনপত্র।  
মেয়েগুলো ঘরে, ওদের স্কুলের মাইনে নেই,
ছেলেটা তো মরেই গেল …
তাগাদাওলা সামলে যাচ্ছে জেনি,
পুরোনো ঝি হেলেনও তৎপর। ...
মূর শুধু দু হাত দিয়ে মানবসম্ভাবনার
উৎসমুখের সরিয়ে যাচ্ছে পাথর।
...
কি আর করেন, বিপাকেই যাহোক,
দশ বছরে গড়ে তুললেন মূরের মহাগ্রন্থে –
দুই বন্ধুর যুগ্ম সফলতা।
পারলেন। – জেনারেল বলে কথা।

ব্যাঙ্গালোর
২৯.১১.২০ 



 

রাজীব ব্যানার্জি

কাল সন্ধ্যেয় ওই ছবিটা দেখছিলাম রাজীব।
বর্ষণক্ষান্ত ভোরে নন্দনকাননের
প্রায়ান্ধকার দোতলার ঘরে জানলার সামনে বুদ্ধদেব ঘোষ,
আধছায়ে ডানে তপনবাবু (সেনগুপ্ত), দিল্লীর, বাঁয়ে তুমি,
আমি ক্যামেরার পিছে অদৃশ্য অবধারিত ...
 
জানলার বাইরে নিচে বাগান – বৃষ্টি দু’দিনের
বুঝতে দিচ্ছেনা আশ্বিনের ছোঁয়াচ – ওখানেই
ছোটো গেট ছিল একটা দেয়ালে; বিদ্যাসাগরমশাই
হাতে হোমিওপ্যাথির বাক্স, তেলের বাটি এবং/অথবা
কোঁচড়ে কলকাতা থেকে আনা উন্নত শস্যবীজ নিয়ে বেরুতেন –
 
এখন সেসমস্ত গ্রাম তিনটে ব্লকে ভাগ হয়ে গেছে;
কর্মাটাঁড় বিদ্যাসাগর ব্লক ইদানিং ...
আমরা বসে আছি যেন বুঝতেও পারিনি আজ
তাঁর দ্বিশততম জন্মদিনেও তিনি বেরিয়ে যাবেন
তাও এত ভোরে – শুনলাম মারাঠি গ্রামটায়,
তাই বেলা করে ফিরবেন।
 
বসে আছি, উনি এলেই ধরব, পায়ের ধুলো নেব, মালা
পরাব গলায় আর মানে ওই সব যা যা করি আমরা আজকাল ...
তুমি তো আবার সমালোচনা থেকে বেশি
কাজ করায় বিশ্বাস করতে, ভাগলপুরের গাছগুলোর রক্ষণ,
বিদ্যালয় জীর্ণোদ্ধার, রোজ সকালে তুলসীর একটি করে দোহা ফেসবুকে,
সারা বিহারে বাঙালি সমিতির বলতে গেলে সাংবাদিক ...

একদিন আগেই তো মেয়ের পাশে দাঁড়িয়ে বলেছিলেঃ
রক্তদানী মেয়ের গর্বিত পিতা আমি ... আর
কাল ভোরে বাইকে ভাগলপুর থেকে ফরবেসগঞ্জ যেতে যেতে  
ছবি থেকে অদৃশ্য হয়ে গেলে হঠাৎ কুয়াশায়!
এ কেমন কুয়াশা আমাদের চারদিকে?

ব্যাঙ্গালোর
২২.১২.২০



ছায়াহীনতার অবিরাম

কেন যে প্রতিদিন সকালে তাড়ার সময়
ভীড়ের রাস্তায় কেউ না কেউ এত ধীরে হাঁটে।
 
এ তো স্বীকৃত যে আমাদের ভালোবাসাগুলি
ঠিক তেমন নয় যাকে ভালোবাসা বলে
 
এই মহাবিশ্বের যা কিছু জানিনা তার পরিমাণ
জানার সাথে তাল রেখে বেড়েই চলেছে
 
যে পথে কোনো প্রাচীন গাছের গহীনে ফোটেনি অর্কিড
রোদের খিলানও ওঠেনি ... এত ধীরে হাঁটে মানুষ
 
সময় নেই যদি কিছু করে নিতে হয়
সময় নেই যদি কিছু করে যেতে হয়
সময় নেই যদি সব ভুলে যেতে হয়
সময় নেই যদি সব ফিরে পেতে হয়
 
পথে তবু কেন যে কিছু মানুষ ...
পিছন থেকে শুনলে বিরক্তির কোনো প্রকাশ
পাশ না দিয়ে দাঁড়িয়ে যায় বরং, ঘুরে তাকায়
যেন কিছু বুঝতে পারেনি
 
এত আস্তে হাঁটে তারা
যেন আমাদের ছায়ার নিরন্তরতার ফাঁকে ফাঁকে  
ছায়াহীনতার অবিরাম জেগে ওঠে
 
জানুয়ারি ১৯৯৪/৯৫ 



Sunday, December 20, 2020

प्रारंभिक ईसाइयत – फ्रेडरिक एंगेल्स

प्रारंभिक ईसाइयत का इतिहास और आधुनिक श्रमिक वर्ग आन्दोलन के बीच सादृश्य के उल्लेखनीय बिंदु मौजूद हैं। ईसाइयत भी मूलत:, श्रमिक वर्ग आन्दोलन की तरह, शोषित जनता का आन्दोलन था। सबसे पहले इसका आविर्भाव, गुलामों एवं गुलामी से छुट चुके लोगों, सभी अधिकारों से वंचित गरीब जनों, रोम के अधीन की गई या विस्थापित की गई जनता के धर्म के रूप में हुआ। ईसाइयत एवं श्रमिकों का समाजवाद, दोनों गुलामी एवं बदहाली से होने वाली मुक्ति का पाठ पढ़ाते हैं; ईसाइयत इस मुक्ति को, मृत्यु के बाद स्वर्ग में जिए जाने वाले एक जीवन में दिखाता है जबकि समाजवाद इस मुक्ति को इसी दुनिया में, समाज के बदलाव में दिखाता है।  दोनों तंग किए और सताए जाते हैं, उनके अनुयायी निर्वासित किए जाते हैं और अनोखे कानूनों के शिकार बनाये जाते हैं, एक को मानव जाति के दुश्मन के तौर पर तो दूसरे को राज्यसत्ता, धर्म, परिवार और सामाजिक व्यवस्था के दुश्मन के तौर पर। और इस तरह सताये जाने के बावजूद, बल्कि सताए जाने के कारण और अधिक तेजी से दोनों, विजयपताका फहराते हुए, अप्रतिरोध्य रूप से आगे बढ़ते हैं। आविर्भाव के तीन सौ सालों के बाद ईसाइयत, रोमन विश्वसाम्राज्य का स्वीकृत राज्यधर्म था, और महज साठ वर्षों में समाजवाद ने ऐसी स्थिति हासिल कर ली है कि उसका विजय सुनिश्चित हो चुका है।

इसलिए, अगर प्रोफेसर एन्तोन मेंजेर अपने “श्रम के पूर्ण उत्पाद पर अधिकार” में विस्मित होते हैं कि क्यों, रोमन सम्राटों के अधीन भूस्वामित्व की इतनी विशाल केन्द्रीकरण और उस समय के श्रमिक वर्ग – जिनमें अधिकांश दास थे – की अन्तहीन यंत्रणाओं के बावजूद, “प्रतीच्य के रोमन साम्राज्य के पतन के उपरांत समाजवाद नहीं आया”, वह इसलिए विस्मित होते हैं क्योंकि वह देख नहीं पाते हैं कि जितना ‘समाजवाद’ उस समय सम्भव था, उतना ईसाइयत में था और, बल्कि उसके आधिपत्य का भी विस्तार हुया था। बस, बात यही थी कि यह ईसाइयत, जैसी की बन्दिशें थी ऐतिहासिक परिस्थितियों की, इस दुनिया का सामाजिक बदलाव हासिल करना नहीं चाहा, बल्कि इस दुनिया के बाद स्वर्ग में, आने वाली “सहस्राब्दि” में, मृत्यु के बाद शाश्वत जीवन में मुक्ति पाना चाहा।

दो ऐतिहासिक परिघटनाओं के बीच की समानताएं बिल्कुल स्पष्ट हो जाती हैं मध्ययुग में, उत्पीड़ित किसानों और खास कर शहरी आमजनों के शुरुआती बगावतों में। मध्ययुग के सभी जनान्दोलनों की तरह इन बगावतों को भी धर्म का मुखौटा पहनना था और फैलती हुई अधोगति से प्रारंभिक ईसाइयत के पुनरुद्धार के रूप में दिखना था, लेकिन धार्मिक उल्लास के पीछे हर समय ठोस दुनियावी हित होते थे। स्मृति के शानदार पन्नों में देखें तो इसका उत्कृष्टतम प्रदर्शन ज़ान ज़िज़का के नेतृत्व में बोहेमियाई टैबोराइटों के संगठन में हुआ था। लेकिन यह प्रवृत्ति पूरे मध्ययुग में दिखती है। अन्तत:, जर्मन किसान युद्ध के बाद यह उत्तरोत्तर फीकी पड़ती जाती है। फिर इस प्रवृत्ति का पुनराविर्भाव होता है सन 1830 के बाद, श्रमिक कम्युनिस्टों के बीच। अर्नेस्ट रेनन ने जो कहा, “जब आप कोई धारणा बनाना चाहें कि शुरुआती ईसाई समुदाय कैसे थे, तो अन्तरराष्ट्रीय श्रमिक समिति के स्थानीय किसी भाग को देख लें” … उसके काफी पहले फ्रांसीसी क्रांतिकारी कम्युनिस्ट और खास कर वेटलिंग एवं उनके समर्थक भी शुरुआती ईसाइयत का हवाला दे चुके हैं।

............

अत: हम देखते हैं कि उस समय का ईसाइयत, जो तब तक अपने बारे में अनजान था, बाद के ‘निसेने परिषद’ द्वारा कट्टर ढंग से तय कर दिये गये वैश्विक धर्म से उतनी ही भिन्न था जितना स्वर्ग भिन्न है धरती से। एक को दूसरे में ढूंढ़ा ही नहीं जा सकता है। उस ईसाइयत में बाद के ईसाइयत की ना तो कट्टरता है और ना नीतिशास्त्र। बल्कि एक एहसास है कि कोई पूरी दुनिया के खिलाफ संघर्ष कर रहा है और उस संघर्ष को विजय प्राप्त होगा ही। संघर्ष के लिये वह आतुरता और निश्चितता, की जीत होगी ही, जिसका आज के ईसाइयों में बिल्कुल ही अभाव है, हमारे समय में समाज के सिर्फ दूसरे छोर पर, समाजवादियों के बीच दिखेगी।

दर असल शुरु में, बलशाली एक दुनिया के खिलाफ संघर्ष, और साथ ही साथ खुद प्रवर्तकों के आपसी संघर्ष, प्रारम्भिक ईसाइयों एवं समाजवादियों, दोनों की चारित्रिक विशिष्टता है। दोनों महान आन्दोलनों में से कोई भी नेताओं या पैगम्बरों के बनाये नहीं हैं – हालाँकि दोनों में पैगम्बर बहुतायत में हैं – दोनों जनान्दोलन हैं। और जनान्दोलन शुरु में भ्रमित होते ही हैं, क्योंकि आमजनों की सोच शुरु में अन्तर्विरोधों, अनिश्चितताओं एवं असम्बद्धताओं में घूमती है; साथ ही, भ्रमित होने का दूसरा कारण बनती है उन्हे शुरु में प्रभावित करती पैगम्बरों की भूमिकाएँ। भ्रम की यह स्थिति उन असंख्य पंथों के निर्माण में दिखती है जो कमसे कम उतने ही उत्साह के साथ एक दूसरे के साथ लड़ते हैं जितना बाहरी शत्रु के खिलाफ। ऐसा ही प्रारम्भिक ईसाइयत के साथ हुआ था, ऐसा ही समाजवादी आन्दोलन की शुरुआत में हुआ। एकता उनमें सम्भव ही नहीं थी, चाहे कितनी भी चिंतित हुए हों एकता का उपदेश देने वाले सदाशय सुयोग्य व्यक्तिगण।

तो, क्या अन्तरराष्ट्रीय किसी समरूप मताग्रह में बँधा हुआ था? बिल्कुल विपरीत। उसमें सन 1848 के पहले की फ्रांसीसी परम्परा के कम्युनिस्ट थे, उनमें भी अलग अलग रंग के थे: पुनरुज्जीवित कम्युनिस्ट लीग के वेटलिंग-धारा के कम्युनिस्ट एवं दूसरे लोग, फ्रांस और बेल्जियम में आधिपत्य रखने वाले प्रुधोंवादी, ब्लांक्वीवादी, जर्मन श्रमिक पार्टी, और अन्तत: बाकुनिनपंथी अराजकतावादी जिन्हे कुछ दिनों के लिए स्पेन और इटली में बढ़त हासिल था … इतने तो सिर्फ मुख्य गुट थे। पचीस साल लगे अन्तरराष्ट्रीय की स्थापना के बाद, सभी जगह अराजकतावादियों को पूरी तरह और अंतिम तौर पर अलग थलग करने में एवं कम से कम, अति सामान्य आर्थिक नजरियों के आधार पर एकता कायम करने में। और वह भी हमारे समय के संचार माध्यमों – रेलमार्ग, तार, विशालकाय औद्योगिक शहर, छापाखाना एवं संगठित जनता के समावेशों – के माध्यम से।

प्रारम्भिक ईसाइयों में भी उसी प्रकार अनगिनत पंथों का विभाजन था, उन्ही के बीच बहस हुए और बाद में एकता बनी।

……………

किस तरह के लोग थे वे जो सबसे पहले ईसाई बनें? मुख्यत:, निम्नतम स्तर में जीने वाले समुदाय के “मेहनत करनेवाले और बोझ से दबे” सदस्य थे वे, जैसे कि क्रांतिकारी तत्व हुआ करते हैं। और, कौन थे उनमें? शहरों से हों तो दासता से मुक्त दरिद्रतम लोग – दक्षिणी स्लाव राज्यों के औसतन गोरे, योरोपीय समुद्रतटों की रेत पर कीमती चीजें बिनने वाले, चीनी और औपनिवेशिक बन्दरगाहों पर किस्मत आजमाने वाले, इटली, सिसिली और अफ्रिका के बड़े गुलाम-खटानेवाले जायदादों से दास और दासता से मुक्त – सभी किस्म के होते थे वे। और, प्रांतों के ग्रामीण जिलों से हों तो छोटे किसान जो कर्ज लेते लेते बँधुआ होते जा रहे हों। इन तमाम तत्वों की मुक्ति के लिये कोई सामान्य रास्ता बिल्कुल ही नहीं था। उन सबके लिए स्वर्ग उनके पीछे खो चुका था – टूटे हुए मुक्त दासों के लिए वह स्वर्ग प्राचीन यूनान के नगर-राज्य थे (शहर और राज्यसत्ता दोनों के लिहाज से), जिनमें उनके पूर्वज मुक्त नागरिक थे। युद्ध-बन्दी गुलामों के लिए वह स्वर्गीय समय उनके पराधीन होने और बन्दी बनाये जाने के पहले का समय था। छोटे किसानों के लिये वह स्वर्ग थी खत्म की जा चुकी गोत्र-केन्द्रित सामाजिक व्यवस्था एवं सामुदायिक मालिकाना। वह सब कुछ जो विजेता रोम के लौह-मुष्टि के द्वारा धूल में मिला दिया गया था। प्राचीन काल सबसे बड़ा जो सामाजिक जमाव हासिल कर पाया था वह था कबीला एवं आत्मीय कबीलों का संघ। बर्बरों में जमाव आधारित था परिवारों के नातों पर और शहर बसाने वाले यूनानी और इतालवियों में यह आधारित था नगर-राज्यों (पॉलिस) पर, जिनमें एक या अधिक आत्मीय कबीले होते थे। फिलिप और ऐलेकजैन्डर ने यूनानी (हेलेनिक) उपमहाद्वीप को राजनीतिक एकता जरूर दिया था लेकिन उससे यूनानी राष्ट्र नहीं बना था। राष्ट्रों का बनना रोम के वैश्विक आधिपत्य के पतन के द्वारा ही सम्भव हुआ।

रोम का यह वैश्विक आधिपत्य एकबारगी सारे छोटे जमावों को खत्म कर दिया था। सैन्यशक्ति, रोमक अधिकार-क्षेत्र एवं कर-अदायगी तंत्र ने पारम्परिक अन्दरूनी संगठन को पूरी तरह विघटित कर दिया था। स्वतंत्रता और स्वतंत्र पहचान वाले संगठनों की समाप्ति के साथ जुड़ गई रोमक सेना एवं नागरिक प्राधिकारियों की बलपूर्वक लूट। पहले तो उनकी धनसम्पत्ति उनसे छीन ली गई और फिर वही धन उन्हे महाजनी ब्याज पर कर्ज में दिया गया ताकि और भी उनसे ऐंठा जा सके। करों का दबाव एवं इसके चलते नगद पैसों की जो जरूरत उन इलाकों में पैदा हुई जहां पहले प्राकृतिक अर्थनीति का आधिपत्य था, और वह जरूरत किसानों को महाजनी कर्ज में बांधता चला गया। इसके परिणामस्वरूप, धन की बढ़ती विषमताएं पैदा हुईं, धनी और धनी होते गए जबकी गरीब पूरी तरह कंगाल हो गए। दैत्याकार रोमक विश्वशक्ति के खिलाफ, एकांत में बसे किसी छोटे कबीले या शहर के प्रतिरोध का कोई भविष्य नहीं था। तो फिर क्या रास्ता था इससे निकलने का? कैसे होती गुलाम बनाए गये, उत्पीड़ित एवं कंगाल किये गए लोगों की मुक्ति? क्या होता एक सामान्य रास्ता जनता के इन भिन्न भिन्न प्रकार के जमावों के लिये जिनके हित एक दूसरे के लिये न सिर्फ अजनबी थे बल्कि विपरीत भी थे? और फिर भी, अगर किसी क्रांतिकारी आन्दोलन को जनता के इन विभिन्न समूहों को अपने आगोश में लेना था तो उस रास्ते को तलाशना था।

रास्ता ढूंढ़ा गया। मगर इस दुनिया में नहीं। जो स्थिति थी उस समय, यह रास्ता धार्मिक ही हो सकता था। तब एक नई दुनिया का आलिंगन किया गया। पूरी रोमक दुनिया में शरीर की मृत्यु के बाद आत्मा के जीवित रहने की निरन्तरता क्रमश: एक स्वीकृत धर्मसिद्धांत बन चुकी थी। पृथ्वी पर जीवनकाल में कृतकर्मों के लिए मृत-आत्माओं की सजा या उनसे ली जाने वाली भरपाई की धारणा को भी अधिक से अधिक सामान्य स्वीकृति मिलने लगी थी। जहाँ तक भरपाई का सवाल है, मानी हुई बात है कि सम्भावनाएं अच्छी नहीं थी – अत्यधिक आदिम तौर पर भौतिकतावादी था पुराकाल – साये में जीने से कहीं ज्यादा मोल था उनके लिए पृथ्वी पर जीवन का। यूनानी तो मृत्यु के बाद जीवन को बल्कि दुर्भाग्य मानते थे। तब ईसाइयत आया, जिसने परलोक में सजा और भरपाई को गंभीरता से लिया। स्वर्ग और नरक बनाया गया, और एक रास्ता दिखाया गया जिस पर चल कर मेहनत करने वालों और बोझ तले दबे हुओं को तकलीफों के इस दर्रे से मुक्ति मिलेगी एवं शाश्वत स्वर्ग हासिल होगा। परलोक में पुरस्कृत होने की सम्भावना से ही सन्यासी एवं ‘स्टोइको-फिलोनिक’ (बैरागी एवं दार्शनिक फिलो के मतावलम्बी) नए विश्वधर्म के बुनियादी नैतिक सिद्धांत पर उल्लसित हो पाते क्योंकि वह उत्पीड़ित जनता को उत्साहित करता।

 

[एंगेल्स रचित “ऑन द हिस्ट्री ऑफ अर्ली क्रिश्चियनिटी” से चुने हुए अंश; टिप्पणियाँ हटा दी गई हैं। - अनुवादक]

Photo courtesy: https://mronline.org/2019/06/05/engels-on-the-importance-of-hegel-to-marxism/ & https://www.crystalinks.com/romeslavery.html



Friday, December 11, 2020

রাণা

রাণা সেবার মা’কে নিয়ে গেল – রাজপিপলায়।
মাটি হয়ে লাগতে পারছে সে,
মাটি পাচ্ছে নিজের শিকড়ে –
এখানে যে এসেছিল, বুক যেন বনস্পতি,
                                   দুলছে রসের ঝড়ে ...
জানবে না মা? বাউন্ডুলের পথচক্রে ছেলে
কোথায় থাকে! কিই বা রেঁধে খায়!...
 
বাসটা গিয়ে পৌঁছে হবে দুপুর রোদের ঝিমে।
“বোসো মা! আজকে শুধুই বসো। আমিই ভাত চাপাই।  
এই যে আমার ঘর, দপ্তর –
সাথিরা সব আসবে সাঁঝে, আসবে মগন ভাই।” ...
ছোট ছোট ঢেউ দু’কথার,
গান বলতে সাইকেল আর
নিমজানা এক ভাষার পাথার ...
নাগাল বলতে সমুদ্রও সে রাখত পশ্চিমে। 

মাকে সে বুঝিয়ে হবে এনজিও – তার কাজের ঝকমারি।
সংগঠনেই কর্মচারি হওয়া
শ্রমবিভাগে, ট্রাইব্যুনালে, কাজকর্মে ... বিকেল হলে খাস বড়োদায়
লেনিনবাদের বিতর্কে সৎ বন্ধু পাওয়া ...
মাকে সে বুঝিয়ে হবে পটভূমি –
ভীল, গুর্জর, মেধা পাটকর,
দুধ সমবায়, শিল্পে মুখর
ঈষৎ অচিন রোদ্দুরে তার অন্তর্গত পাড়ি।
......
তার আগে লখনো গিয়েও ছিল কয়েকটি মাস।
পোস্টকার্ডে জানিয়েছিল অতুল সেনের বাড়ির চিহ্ন নাশ।
বিষ হল কিসের অভাব – ভালোবাসা? কাজ?
সাইন্স কলেজের মাঠে তার চোখে পেলাম
ক্ষোভ নয়, নেশাখোরের ঝাঁজ!
এবং সেদিন এল যে লাশ, গঙ্গা থেকে উঠে
কী উত্তর ছিল তার সে ঠান্ডা হলুদ ঠোঁটে?

রইল অচিন, দোস্ত, দূরত্বের এই আঁধার।
পাটনায় রইল তোমার গান ও রাজনীতি,
বিশ বছরের প্রগতি সংস্কৃতি,
ঘরে বা সভায় সঙ্গে গাওয়ার সুখস্মৃতি,   
মনের জ্বালা, ধরে তোমায় রাখতে না পারার। 

পুনর্লিখন, ব্যাঙ্গালোর
১১.১২.২০



राणा

राणा अपनी माँ को ले कर गया राजपिपला उस बार!
मिट्टी बनकर लग पा रहा था वह,
मिट्टी पा रहा था अपनी भी जड़ों में –
जब आया था यहाँ, सीना ज्यों दरख्त हो
डोल रहा था रस की उफान में …
माँ जानेगी नहीं? आवारापन के चक्कर में बेटा
आखिर रहता कहाँ है! क्या खाता है पका कर! …

बस जा कर पहुँची होगी दोपहर की धूप के सन्नाटे में।
“बैठो माँ! आज बस बैठी रहो! मैं ही चढ़ाउंगा भात।
यही है मेरा घर, दफ्तर,
साथी सब आयेंगे शाम को, मगनभाई भी।” … 
छोटी छोटी लहरें दो-चार बातों की,
गीत कहने को साइकिल और
नीम-मालूम एक भाषा की अपार …
करीब कहने को एक समन्दर भी रखा था वह पश्चिम की ओर।

माँ को समझाया होगा वह एन॰जी॰ओ॰ - उसके कामों का झंझट।
संगठन का ही कर्मचारी बनना
श्रमविभाग में, ट्राइब्युनल में, कामकाज में … शाम होने पर खास बड़ौदा में
सच्चे दोस्तों का मिलना लेनिनवाद पर बहस के लिये …
माँ को वह समझाया होगा माहौल –
भील, गुर्जर, मेधा पाटकर, दूध सहकारिता, उद्योगों से गूंजती
थोड़ी अजनबी धूप में उसकी आन्तरिक यात्रायें। 
……………
उसके पहले लखनऊ जा कर भी रहा था कुछेक माह।
पोस्टकार्ड पर बताया था अतुल सेन के मकान के नामोनिशान का मिटना।

किस चीज का अभाव बना जहर – प्यार? काम?
साइन्स कॉलेज के मैदान में उसकी आँखों में मुझे
नशाखोरी का झांझ मिला! 
और उसदिन उसकी लाश जो आई, गंगा से उठ कर,
क्या उत्तर था उसके उन ठंडे पीले होंठों पर?
……………
अनजाना ही रह गया दोस्त, दूरी का यह अंधेरा।
पटना में रह गए तुम्हारे गीत और राजनीति,
बीस सालों की प्रगति संस्कृति,
घर या सभा में साथ गाने की सुखभरी यादें,
मन की ज्वाला, तुम्हे पकड़ कर रख नहीं पाने की। 

2.2.22


চলো দিল্লী – নভেম্বর ১৯৯২

 

একটি দেশের অনেক ভাষায় বাঁচার বহর মেলে

স্লোগান কিছু তুলি, কিছুর ছন্দ নিতে যাই;

চলো দিল্লী! হাওয়া ওঠে দেয়ালে হ্যান্ডবিলে –

কথা কিছু বলি, কিছুর আভাস নিতে যাই।

 

টিকিট কেটে, বেটিকিটে, গালি খেয়ে ট্রেনে

অপমান যা সই আরো হদিশ নিতে চাই;

গুন্ডা-পুলিস-প্রশাসনের হামলাবাজি সয়ে

নিগড় কিছু ভাঙি কিছু বাজিয়ে দিতে যাই।

 

রুটি বেঁধে, ঝান্ডা ব্যানার – উড়াল কিম্বা আড়াল –

খিদে যা, মেটাই, আরো চাগিয়ে নিতে যাই;

গানের দল, ধনুক, নাচ, তাশা, ঢোলে তুলি

জয়ের গান, সঙ্গে অনেক ব্যর্থতাও দাগাই।

 

সাথে যায় উদাসিয়ানা, বৌ, ছেলে, মেয়ে –

মায়া যা কাটাই, অনেক নতুন ফিরে পাই;

হত্যা, জেল, পরোয়ানা, বুজরুকির কানুনের

ঘা কিছু সারাই, বাকি পুড়িয়ে নিতে যাই।

 

যে গেল না তার আগামিকালটা নিয়ে গিয়ে

ঘুণ কিছু মারি, কিছু খুঁচিয়ে দিতে যাই।   

 

[১৯৯৬]