Tuesday, January 15, 2019

॥ 9 ॥ शिक्षा : कर्माटाँड़ में किये गये शैक्षणिक कार्य

पाठक शायद जानते होंगे कि झारखंड के जामताड़ा जिले में स्थित कर्माटाँड़ कस्वे में विद्यासागर ने जमीन सहित एक मकान खरीदा था। दिनांक 2 अप्रैल 1974 का हिन्दुस्तान स्टैन्डर्ड अखबार में छपी एक खबर के अनुसार इस मकान का नाम ‘डायस बंग्लो’ था। खरीदने के बाद (एवं शायद कुछ परिवर्तन के साथ) विद्यासागर ने मकान का नाम रखा था ‘नन्दन कानन’। उस वक्त यह स्थान बंगाल प्रेसिडेन्सी के अन्तर्गत बिहार इलाके के संथाल परगना जिले में आता था। विद्यासागर ने यह सम्पत्ति उन्नीसवीं सदी में सत्तर की दशक की शुरुआत में किसी समय खरीदी थी। सन 1874 से उनके यहाँ रहने के तथ्य मिलते हैं। बीच बीच में काम से वह कलकत्ता, बर्धमान या और किसी जगह जाया करते थे। फिर जब ज्यादा बीमार पड़ने लगे तो उन्हे कलकत्ता जाकर रहना पड़ा। मोटे तौर पर जीवन के अंतिम 18 वर्ष वह इसी तरह गुजारे।
कर्माटाँड़ आने के कई कारण थे। कलकत्ते के हिन्दु मध्यवर्गीय लोगों की कूपमन्डुकता, रुढ़िवाद एवं उनके द्वारा किये जा रहे सुधार-प्रयासों के विरोध से विद्यासागर उकता गये थे। अपने परिवार से भी वह परेशान थे। नीतियों पर अड़े रहने की अपनी जिद पर वह कभी समझौता नहीं किये। बड़े बेटे को उन्होने वजायाफ्ता इच्छापत्र (विल) बनाकर सभी सम्पत्ति से अलग कर दिया था इसी कारण से। खैर, वह एक अलग कहानी है।
यहाँ जिक्र करने लायक एक ही बात है कि कर्माटाँड़ में उन्होने शैक्षणिक कार्य छोड़ा तो नहीं ही, बल्कि उसके नये आयाम खुले। उन्होने यहाँ के संथाल घरों की बेटियों के लिये कन्या विद्यालय शुरू किया। साथ ही, वयस्क संथालों के लिये शाम को प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम शुरू किया।
उनके इन दोनों कार्यों का जिक्र समकालीन लेखन में मौजूद है। लेकिन अधिक जानकारी अनुपलब्ध है, जैसे, कितनी बालिकायें आती थी या कितने प्रौढ़ आते थे, उन्हे किस किस विषय का पाठ दिया जाता था, दिन के किस समय से किस समय तक चलते थे विद्यालय आदि। लेकिन गौर तलब है कि मिशनरियों से अलग, तत्कालीन बंगाल प्रेसिडेन्सी के आदिवासियों में किसी भारतीय द्वारा किया गया यह पहला कन्या-शिक्षा कार्यक्रम था। प्रौढ़ शिक्षा का कार्यक्रम तो सभी पैमाने पर इस देश का पहला था।
उनके इस ऐतिहासिक कार्य को सम्मानित करने के लिये 100 वर्षों बाद 1979 में जब स्वतंत्र भारत के बिहार सरकार ने प्रौढ़ शिक्षा के तत्कालीन कार्यक्रम को लागू करने को सोचा तो उसका उद्घाटन कर्माटाँड़ स्थित ‘नन्दन कानन’ में ही किया गया। ज्ञातव्य हो कि उस समय तक, बिहार बंगाली (अविभाजित बिहार की) समिति ने ‘नन्दन कानन’ को खरीद लिया था। धरोहर को बचाने का यही एकमात्र तरीका था एवं बिहार सरकार ने इस पुनीत कार्य में पूरी तरह सहयोग किया था। बल्कि, बिहार बंगाली समिति द्वारा लगातार किये गये आवेदनों को स्वीकारते हुये केन्द्रीय सरकार ने रेलवे स्टेशन का नाम भी ‘कर्माटाँड़’ से बदल कर ‘विद्यासागर’ कर दिया था।     




॥ 8 ॥ शिक्षा : महाविद्यालय की स्थापना


पाठक अगर इन्टरनेट का इस्तेमाल करने वाले हों तो गुगल सर्च में अंग्रेजी में लिखें ‘मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन’। शुरु में ही दिखेगा विकिपिडिया पृष्ठ, ‘विद्यासागर कॉलेज’। ऐसा क्यों? पाठक पृष्ठ को खोलेंगे तो निम्नलिखित बातें लिखी मिलेंगी:
“विद्यासागर कॉलेज, उत्तर कोलकाता में, पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के नाम पर, कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध एक सरकार-प्रायोजित कॉलेज है। यह भारत का पहला निजी कॉलेज था जो भारतीयों के द्वारा चलाया जाता था, जहाँ भारतीय पढ़ाते थे एवं जिसका वित्त-पोषण भारतीयों के द्वारा होता था। पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने वर्ष 1872 में इस कॉलेज को स्थापित किया था। पहले यह ‘मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन’ के नाम से जाना जाता था।”
विकिपिडिया के उल्लिखित पृष्ठ पर यह भी लिखा मिलेगा कि आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द, आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय, आचार्य यदुनाथ सरकार, राम मनोहर लोहिया, बाबु जगजीवन राम एवं अन्य कई महत्वपूर्ण व्यक्ति इस संस्थान में छात्र बने।
विद्यासागर के जीवनीकार सुबल चन्द्र मित्र ‘मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन’ के जन्म की कहानी बताने के क्रम में तत्कालीन मुद्रित एक पर्चे को उद्धृत करते हैं। पर्चे का शीर्षक था, ‘मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन से सन्बन्धित तथ्यों पर वक्तव्य’। पर्चा कहता है:
“1॰ सन 1859 में, कलकत्ता के उत्तरी भाग मे स्थित शंकर घोष लेन में कलकत्ता ट्रेनिंग स्कूल के नाम से एक विद्यालय स्थापित किया गया था। स्थापित करने वाले थे बाबु ठाकुरदास चक्रवर्ती, बाबु माधवचन्द्र धाड़ा, बाबु पतितपावन सेन, बाबु गंगाचरण सेन, बाबु यादवचन्द्र पालित एवं बाबु वैष्णवदास आढ्य या वैष्णवचरण आढ्य; सभी दिवंगत हो चुके हैं।”
पर्चा आगे यह बताता है कि संस्थापकों ने खुद विद्यालय की स्थापना का सारा खर्च उठाया था ल्रेकिन अन्य कई गण्यमान्य [भारतीय] व्यक्तियों ने कई तरीके से आगे मदद किया। यह भी कि विद्यालय का उद्देश्य था ‘बिना लाभ कमाये मध्यवर्गीय हिन्दु युवाओं के लिये कम खर्च में अंग्रेजी शिक्षा’ जो कि मिशनरी विद्यालयों के ईसाई धर्म प्रचार से खतरे से मुक्त हो।
धारा 4 में पर्चा कहता है:
“4॰ विद्यालय का प्रबन्धन पहले संस्थापक खुद सम्हालते थे लेकिन स्थापना के कुछ महीनों के उपरान्त उन्होने देखा कि पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जो सरकारी संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य एवं सरकारी बालिका विद्यालयों के अधीक्षक के तौर पर विद्यालय प्रबन्धन में सबसे अधिक अनुभवी थे, अब सरकारी सेवा से इस्तीफा देने के बाद काफी फुरसत में हैं। तो संस्थापकों ने उन्हे एवं बाबु राजकृष्ण बनर्जी को अनुरोध किया कि वे उन्हे मदद करें। उनकी रजामन्दी प्राप्त करने के बाद, संस्थापकों, उपरोक्त दो भद्रमहाशयों एवं कुछ और सदस्यों को लेकर एक प्रबन्ध-समिति बनाई गई। उक्त समिति ने विद्यालय का मार्च 1861 तक प्रबन्ध किया।”
यहीं से इस संस्था के साथ विद्यासागर के रिश्ते की शुरुआत हुई। अगले 11 वर्षों का इतिहास का पूरा बयान जरूरी नहीं। जैसा अक्सर होता है, संस्थापकों में विद्यालय के सचालन के विभिन्न मुद्दों को लेकर विवाद हुये, कुछ छोड़ कर चले गये, कुछ नये लोग जुड़े, फिर कुछ गुजर गये… सन 1972 आते आते विद्यासागर अकेले इस संस्था के साथ खड़े थे। तब तक विद्यालय का नाम ‘कलकत्ता ट्रेनिंग स्कूल’ से, कुछ अन्य नामों से गुजरते हुये ‘मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन’ हो चुका था। विद्यालय का प्रबन्ध, इसका मालिकाना सब कुछ विद्यासागर के कंधों पर डाल दिया गया, जबकि बैंक में विद्यालय का खाता पैसों के अभाव में बन्द हो चुका था।
लेकिन ईश्वरचन्द्र अपने स्वभाव से मजबूर थे। अगर किसी काम में हाथ डाल दिया तो बस डाल दिया। पीछे हटने का कोई सवाल पैदा ही नहीं होता था उनके सामने। उन्होने अपने पैसे भी लगाये लेकिन आगे उसकी जरूरत नहीं पड़ी। छात्रों की संख्या बढ़ने लगी और विद्यालय स्वावलम्बी हो गया। विद्यासागर अब तक, विद्यालय की बदलती हुई विभिन्न प्रबन्ध समितियों में सचिव के तौर पर काम करते हुये विद्यालय में कई सुधार ला चुके थे। अब उन्होने इसे महाविद्यालय बनाने को ठान लिया। 25 जनवरी 1872 को उन्होने अपने अलावे द्वारका नाथ मित्र एवं क्रिष्टोदास पाल को लेकर एक प्रबन्ध समिति का गठन किया एवं कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलसचिव के पास सम्बद्धता के लिये आवेदन किया।  उन्होने विद्यालय की ओर से कलकत्ता विश्वविद्यालय को पत्र लिखा कि इस विद्यालय से परिक्षार्थियों को स्नातक (कला) प्रथम की परीक्षा देने की अनुमति दी जाय्। उन्हे मालूम था कि विश्वविद्यालय का सिन्डिकेट, जो अंग्रेजों से भरा था, भारतीयों द्वारा चलाये जा रहे संस्था की गुणवत्ता पर कभी भरोसा नहीं करेगी एवं सम्बद्धता नहीं मिलेगी। इसलिये विद्यासागर ने औपचारिक पत्र के अलावा सिन्डिकेट के प्रभावशाली सदस्य ई॰ सी॰ बेली को अलग से पत्र लिख कर उन्हे प्रभावित करने का प्रयास किया।
अन्तत: सम्बद्धता मिल गई और उसके बाद के पहले ही वर्ष में (1874) मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन परीक्षाफल के हिसाब से सभी सम्बद्ध महाविद्यालयों में दूसरे नम्बर पर आया। सब अचंभे में थे। भारतीयों द्वारा चलाया जा रहा भारत का पहला महाविद्यालय और पहले ही वर्ष में दूसरे नम्बर पर! जीवनीकार सुबल चन्द्र मित्र जिक्र करते हैं कि प्रेसिडेन्सी कॉलेज के प्राचार्य एवं कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलसचिव मिस्टर सटक्लिफ ने कहा, “पंडित ने तो गजब कर दिया!”  
फिर क्या था। महाविद्यालय तो चल निकला। सन 1881 से सन 1892 तक मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन के 498 छात्र स्नातक एवं 33 छात्र स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण हो चुके थे। सन 1885 से स्नातक-सम्मान भी शुरू हो चुका था। सन 1885 से सन 1892 तक 86 छात्र स्नातक-सम्मान उत्तीर्ण हुये। सन 1882 में ही कानून की पढाई के लिये भी कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्धता मिल गई थी। अगले दस वर्षों में 513 छात्र कानून में स्नातक हुये। बल्कि सन 1883, 1885 एवं 1886 में इसी महाविद्यालय के छात्रों ने प्रथम स्थान प्राप्त किया एवं उन्हे छात्रवृत्ति मिली।



॥ 7 ॥ शिक्षा : शिक्षण सम्बन्धी बदलाव


शिक्षण सम्बन्धी बदलावों में सिर्फ दो पहलुओं को हम रेखांकित करना चाहेंगे। पहला, छात्रों की भर्ती में जातिगत प्रतिबंध पर प्रहार – संस्कृत कॉलेज का सचिव बनते ही उन्होने छात्रों की भर्ती में जातिगत प्रतिबन्ध को हटाने की मांग की थी। आज के कुछ इतिहासकार इस वाकया को छोटा कर आँकते हैं। उनका कहना होता है कि विद्यासागर ने ऐसा क्या किया। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैद्य परिवार से छात्र पहले से जा ही रहे थे, उन्होने सिर्फ कायस्थ को शामिल किया।
संस्कृत कॉलेज में छात्रो की भर्ती कम होती जा रही है इस पर चिन्ता व्यक्त करते हुये कुछेक सुधारों के साथ साथ भर्ती सम्बन्धित प्रतिबन्ध को हटाये जाने का प्रस्ताव विद्यासागर ने शिक्षा परिषद को भेजा था। शिक्षा परिषद ने उनसे प्रतिवेदन मांगा। उन्होने 20 मार्च 1851 को यह प्रतिवेदन सौंपा। इस प्रतिवेदन के बारे में विद्यासागर के जीवनीकार सुबल चन्द्र मित्र लिखते हैं, “अन्य बातों के अलावा, उन्होने लिखा, ‘जब वैद्यों को, जो शुद्र से बेहतर नहीं हैं (वैद्य जाति कथित तौर पर प्राचीन चिकित्सकों, रसायनशास्त्रियों के वंशज हैं और उन्हे शवों के चीड़फाड़ से कोई परहेज नहीं, अत: वे शुद्र हुये, यही विद्यासागर का श्लेष है), कॉलेज में पढ़ने की अनुमति दी जाती है, तो मुझे कोई कारण नहीं दिखता है कायस्थों को अनुमति नहीं देने का। आगे यह बात भी है कि जब अमृतलाल मित्र को, जो शोभाबाज़ार के राजा राधकान्त देव बहादुर के दामाद हैं और हाल तक हिन्दु स्कूल के छात्र थे, संस्कृत कॉलेज में पढ़ने की अनुमति दी गई है तो कायस्थों को अनुमति नहीं देने का कोई कारण नहीं है।” जीवनीकार यह भी कहते हैं कि विद्यासागर ने प्रतिवेदन म्रें यह भी लिखा कि कॉलेज ही क्यों, अन्य शिक्षण संस्थानों के अध्यापक भी उनके इस प्रयास के विरोध में हैं। और उनका विरोध है कि नीची जातियों के लोग संस्कृत पढ़ेंगे तो हिन्दु धर्म अपवित्र हो जायेगा। उन्होने शास्त्रों से ही ऐसी गलत व दूषित सोच के खिलाफ उद्ध्वरण दिये। विद्यासागर ने अध्यापकों से पूछा कि अगर उन्हे लगता है कि शूद्रों को संस्कृत शिक्षा का अधिकार नहीं है तो फिर कैसे राजा राधाकान्त देव, जो शुद्र हैं, संस्कृत का पाठ ग्रहण किये और अध्यापक लोग उनके द्वारा किये जा रहे शास्त्रों पर बातचीत का विरोध नहीं करते? विद्यासागर ने यह भी पूछा अध्यापकों से कि अगर वे शुद्रों एवं अन्य नीची जातियों लड़कों को को संस्कृत पढ़ाने के विरोधी थे तो कैसे वे योरोपीय लोगों को देवभाषा सिखाने में विवेक का कोई कचोट नहीं महसूस किये, जबकि वे तो हिन्दु ही नहीं हैं! सिर्फ यही नहीं, देवभाषा सिखाने की मजदूरी के एवज में पैसे भी लिये!
इतिहास बताता है कि आगे चल कर उनकी सोच भारी पड़ी। संस्कृत कॉलेज के दरवाजे सभी जातियों के लिये खुल गये। बाद में खोले गये आदर्श विद्यालय तो सभी जातियों एवं सभी धर्मों के लिये ही बने।
दूसरा बदलाव भी बहुत दूरदर्शी था। सख्त अनुशासन-पसन्द वो जरूर थे लेकिन छात्रों पर शारीरिक प्रहार करने के उतने ही सख्त विरोधी थे। अनेकों कहानियाँ हैं जिसमें बच्चों को पीटने वाले मास्टरों के प्रति एवं इस प्रवृत्ति के प्रति उनकी नापसन्दगी दर्शाई गई है। उनका तरीका था दोस्ती, मेलजोल। जब तक कॉलेज चल रहा हो, कॉलेज परिसर में वह सख्त रहते थे। समय पर आना, समय से जाना, सभी क्लासों का समय पर होना… सारा कुछ उन्होने लागू करवा दिया था। लेकिन कॉलेज शुरू होने के पहले और बाद में? एक कहानी है कि किसी गाँव के विद्यालय का परिदर्शन कर कलकत्ता लौटते हुये देर हो गई। घर जाने का समय नहीं था। घुस गये लड़कों के हॉस्टल में। कूँये पर भींगे कपड़े ओढ़ कर नहा लिया, लड़कों के थालियों में से एक एक मुट्ठी चावल लेकर खाना खा लिया और घन्टी बजने से पहले अपने प्राचार्य वाले चेम्बर में सबसे पहले हाजिर हो गये।
तो यह धारा शुरू किया विद्यासागर ने कि बच्चों से मित्रवत घुल मिल कर उन्हे अनुशासित किया जाय या पढ़ाई के प्रति ध्यान दिलवाया जाय पर किसी भी स्थिति में उन पर शारीरिक आघात नहीं किया जाय।




॥ 6 ॥ शिक्षा : पाठ्यपुस्तक लेखन


महत्व की दृष्टि से, पाठ्यक्रम रचना एवं डेढ़ सौ के आसपास विद्यालय व बालिका विद्यालय स्थापित करने के बाद, शिक्षा के क्षेत्र में विद्यासागर का तीसरा महत्वपूर्ण काम है पाठ्यपुस्तकों की रचना। उनकी रची हुई लगभग सभी पुस्तकें, अगर समाज-सुधार से सम्बन्धित बहसों में प्रतिपक्ष को परास्त करने के लिये किये गये शास्त्रों का विवेचन नहीं है तो पाठ्यपुस्तकें ही हैं। यह काम हिन्दी के पाठकों के लिये उतना स्पष्ट नहीं हो पाता है क्योंकि बंगाल भाषा से सम्बन्धित है। फिर भी जानना जरूरी है कि विद्यासागर ने पाठ्यपुस्तकों की रचना के माध्यम से, शिक्षा में प्रगति के लिये (1) बंगला वर्णमाला का सुधार किया, (2) बंगाल की गद्यरीति का आधुनिकीकरण किया एवं विराम चिन्हों (कॉमा, सेमिकोलोन आदि) का यथोचित प्रयोग करना सिखाया, (3) बंगला शिक्षण-पद्धति को बदला एवं बंगला-माध्यम से, यानी मातृभाषा-माध्यम से संस्कृत सीखने की शुरूआत की।
जो पाठ्यपुस्तक वह लिखे उनमें भी एक क्रमबद्धता है। विद्यासागर के सौवीं मृत्युवार्षिकी के अवसर पर एक संकलन का प्रकाशन हुआ था, ‘प्रसंग: विद्यासागर’। उसका प्राक्कथन प्रख्यात विद्वान एवं अर्थशास्त्री भवतोष दत्त ने लिखा था। विद्यासागर रचित पाठ्यपुस्तकों के बारे में उन्होने लिखा, “किताबें इस कदर सिलसिलेवार लिखी गई है (हालाँकि प्रकाशन सिलसिलेवार नहीं हो पाया) कि इनके आधार पर एक धारावाहिक व्यवस्थित शिक्षण (जिसे आजकल ‘प्रोग्राम्ड लर्निंग’ कहा जाता है) बचपन से किशोरावस्था तक दी जा सकती है। पहले ‘वर्णपरिचय’ दोनों भाग, उसके बाद ‘कथामाला’, उसके बाद ‘बोधोदय’। जो बच्चा ‘बोधोदय’ तक पहुँच गया उसका भाषाज्ञान वांछित स्तर पर आ गया। उसके बाद [पढ़ने के लिये होगा] ‘आख्यानमंजरी’, ‘चरितावली’, ‘सीतार वनवास’, ‘शकुन्तला’। साथ ही साथ, संस्कृत सिखाने के लिये ‘उपक्रमणिका’, ‘व्याकरण कौमुदी’, ‘ॠजुपाठ’। सिर्फ विद्यासागर रचित पुस्तकों के आधार पर बंगला एवं संस्कृत के ज्ञान को कॉलेज-स्तर तक पहुँचा देना संभव हो गया। [भवतोष दत्त, प्रसंग: विद्यासागर, सम्पादन: बिमान बसु, प्रकाशक: बंगीय साक्षरता प्रसार समिति, 1970]
हम प्रकाशन के क्रमवार सिर्फ उन्ही पुस्तकों का जिक्र करें जो पाठ्यपुस्तक बनने के उद्देश्य से रचे गये या बाद में इस्तेमाल पाठ्यपुस्तक के रूप में होने लगा।
1-  बेताल पंचविंशति, 1847, (फोर्ट विलियम विद्यालय में शिक्षणरत लल्लू लाल रचित हिन्दी बेताल पचिसी के आधार पर स्वतंत्र रचना)
2-  बांगालार इतिहास, द्वितीय भाग, 1848, (मार्शमैन की किताब ‘हिस्ट्री ऑफ बेंगॉल’ के अन्तिम नौ अध्याय पर आधारित; सिराज-उद-दौला के सिंहासन-आरोहण से विलियम बेंटिंक के शासनकाल तक)
3-  जीवनचरित, 1849, (‘चेम्बर्स बायोग्रफी’ का अनुवाद; गैलिलिओ, न्यूटन, जोन्स आदि महानुभवों की जीवनकथा)
4-  बोधोदय (या शिशुशिक्षा, 4था भाग), 1851, (विभिन्न नैसर्गिक व सामाजिक परिघटनाओं, वस्तुओं एवं धारणाओं की तर्कपूर्ण व्याख्या)
5-  संस्कृत व्याकरणेर उपक्रमणिका, 1851
6-  ॠजुपाठ (भाग 1 – 3), 1851-52, (पंचतंत्र की कथायें)
7-  व्याकरण कौमुदी, प्रथम एवं द्वितीय भाग, 1853
8-  व्याकरण कौमुदी, तृतीय भाग, 1854
9-  शकुन्तला, 1854, (कालिदास रचित ‘अभिज्ञानशकुन्तलम’ नाटक की कहानी)
10-  वर्णपरिचय, प्रथम भाग, 1855 (बंगाल भाषा सीखने की प्राथमिक पुस्तिका जो आज भी अप्रतिद्वन्दी है)
11-  वर्णपरिचय, द्वितीय भाग, 1855
12-  कथामाला, 1856, (इसप्स फेबल्स के एक हिस्से का अनुवाद)
13-  चरितावली, 1856, (प्रख्यात व्यक्तियों की संक्षिप्त जीवनी)
14-  पाठमाला, 1859, (कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रवेश परीक्षार्थियों के लिये संकलन)
15-  महाभारत (उपक्रमणिका भाग), 1860,
16-  सीतार वनवास, 1861
17-  व्याकरण कौमुदी, चतुर्थ भाग, 1862
18-  आख्यानमंजरी, प्रथम भाग, (कुछेक अंग्रेजी पुस्तकों की कहानियों के आधार पर)
19-  आख्यानमंजरी, द्वितीय भाग, 1868
20-  आख्यानमंजरी, तृतीय भाग, 1868
21-  रामेर राज्याभिषेक, 1869
22-  भ्रान्तिविलास, 1869, (शेक्स्पीयर रचित ‘कॉमेडी ऑफ एरर्स’ की कहानी)
23-  वाल्मिकीर रामायण, (प्रकाशन वर्ष अज्ञात), (टीका-टिप्पणी के साथ)
24-  कथित है कि राजकृष्ण बंदोपाध्याय रचित ‘नीतिबोध’ का कुछेक हिस्सा विद्यासागर का लिखा है। फुरसत न रहने के कारण उन्होने राजकृष्णबाबु को पुस्तक पूरा करने का भार दे दिया। कथित है कि ‘बच्चों के प्रति व्यवहार’, ‘परिवार के प्रति व्यवहार’, ‘परिश्रम’, ‘स्वचिन्ता’, ‘स्वावलम्बन’, ‘प्रत्युत्पन्नमतित्व’ एवं ‘विनय’ शीर्षक प्रस्ताव उन्ही के द्वारा लिखा गया है)



॥ 5 ॥ शिक्षा : जनशिक्षा की दिशा में


अंग्रेज सरकार की नीतियों में इंग्लैन्ड में हो रहे हलचलों का थोड़ा बहुत प्रभाव पड़ता रहता था। ऐसे ही एक प्रभाव के कारण सरकारी महकमों में चर्चा होने लगी कि शिक्षा को गरीब, श्रमजीवी, आम जनता के बीच पहुँचाई जाय। सम्बन्धित परिपत्र विद्यासागर के पास भी पहुँचा। विद्यासागर न तो कुलीनतावादी थे और न ही निराशावादी। लेकिन उन्हे बिल्कुल ही विश्वास नहीं था कि अंग्रेज सरकार जनशिक्षा को लेकर वास्तविक तौर पर गंभीर है, क्योंकि वह स्पष्टत: जानते थे कि जनशिक्षा तभी सफल होगी जब वह पूर्णत: नि:शुल्क हो। दूसरी तरफ उन्हे लगता था कि भारत में अभी (यानी उस समय) पूरी जनता की सामान्य साक्षरता या कामचलाऊ शिक्षा से अधिक जरूरी है, बच्चों को पढ़ाने में सक्षम वर्गों से आ रहे छात्र-छात्राओं की, प्राचीन भारतीय वाङमय एवं आधुनिक योरोपीय ज्ञान, दोनों से लैस, गुणवत्ता पूर्ण उच्चशिक्षा ताकि वे समाज को सामाजिक-सांस्कृतिक नेतृत्व एवं दिशा दे सकें। उन्होने सरकार को भेजे गये एक प्रतिवेदन में कहा भी, कि गरीब जनता के बीच शिक्षा ले जाने के लिये उसे पूर्णत: नि:शुल्क होना होगा, जबकि कोई सरकार उस खर्च को वहन नहीं करना चाहती। उन्होने खुद इंग्लैन्ड का उदाहरण दिया! पूछा, कि जिसकी सरकार यहाँ जनता को शिक्षित करना चाहती है उसकी अपनी धरती पर क्या हाल है? इतने बड़े विद्वानों को पैदा करने वाले देश में, दुनिया पर राज करने वाले देश में इतनी अधिक संख्या में निरक्षर और अनपढ़ लोग क्यों हैं?
दिनांक 29 सितम्बर 1859 को उन्होने बंगाल सरकार के कनीय सचिव रिवर थॉम्पसन को जो पत्र लिखा वह हमें इन्द्र मित्र रचित जीवनी, ‘करुणासागर विद्यासागर’ से मिला। पत्र में विद्यासागर कनीय सचिव द्वारा जारी गश्तीपत्र संख्या 288, दिनांकित 17 जून 1859  की प्राप्ति स्वीकारते हैं। आगे लिखते हैं कि “प्रति विद्यालय 5 से 7 रुपयों के सीमित माहवार खर्च पर बंगाल की आमजनता के लिये सस्ते विद्यालय खोलने का प्रस्ताव, देश की वर्तमान अवस्था में लगभग अव्यवहारिक है। क्योंकि, महज पढ़ना, लिखना और थोड़ा अंकगणित भी सफलता के साथ सीखा पाने वाला आदमी इतने कम वेतन पर सेवा स्वीकार नहीं करेगा, चाहे उसका अपने गाँव से कितना भी जुड़ाव हो।“   
फिर आगे वह जनशिक्षा पर अपनी सोच रखते हैं।
“पश्चिमोत्तर प्रान्तों में चलने वाले हलकाबन्दी विद्यालयों की प्रणाली के बारे में सही सूचनायें मुझे उपलब्ध नहीं है। लेकिन यह मानते हुये कि वही प्रणाली बिहार के विद्यालयों में भी लागू की गई है, मैं कहना चाहूंगा कि वह बंगाल में चलने वाले देशी विद्यालयों [पाठशालाओं – लेखक] की ही जैसी है। बिहार के विद्यालयों में, मैं जितना समझ रहा हूँ, पुरा पाठ्यक्रम सिर्फ पत्र लिखने एवं जमींदार व दुकानदारों का खाताबही लिखने तक सीमित है। इन विद्यालयों से बंगाल के विद्यालयों का बस इतना फर्क है कि बिहार के विद्यालयों में कुछ बेहतर, छपी हुई किताबें नाम के वास्ते इस्तेमाल की जाती है। अगर शिक्षा की ऐसी ही प्रणाली बंगाल में लागू करना सरकार का उद्देश्य है तो [पाठशालाओं के] गुरुमहाशयों को थोड़ा माहवारी वेतन दे देने, कुछ छपी किताबों को उन विद्यालयों में चालू करने एवं उन स्कूलों को सरकारी अधीक्षण के अन्तर्गत लाने से ही उद्देश्य पूरा हो जायेगा। लेकिन मैं जरूर कहूंगा कि वैसी शिक्षा, महत्वहीन तो होगी ही, जनता के बीच, अगर जनता का अर्थ श्रमजीवी वर्ग हैं तो, प्रसारित भी नहीं होगी। क्योंकि, अभी भी इन वर्गों के छात्र, बंगाल और बिहार के विद्यालयों में नाममात्र ही मिलते हैं।
“इस यथार्थ का कारण है श्रमजीवी वर्गों की स्थिति। उनकी स्थिति इतनी बुरी है कि अपने बच्चों की शिक्षा पर वे कुछ भी खर्च नहीं कर सकते। न ही वे अपने लड़कों को, किसी भी किस्म का काम करने लायक उम्र तक पहूँचने के बाद, विद्यालय में रखेंगे। क्योंकि तब वे कुछ कमायेंगे, कितना भी कम क्यों न हो। वे सोचते हैं, और शायद सही सोचते हैं कि उनके बच्चे थोड़ा लिखना पढ़ना सीख जाने से उनकी स्थिति बेहतर नहीं हो जायेगी। इसी लिये उन्हे अपने बच्चों को विद्यालय भेजने में कोई आग्रह नहीं होता। यह उम्मीद करना अतिशय होगा कि सिर्फ ज्ञान प्राप्त करने के लिये वे अपने बच्चो को शिक्षित करेंगे जबकि उच्चतर वर्ग भी अभी तक शिक्षा के लाभों को सही ढंग से नहीं समझते हैं। ऐसी परिस्थिति में श्रमजीवी वर्गों को शिक्षित करने की कोशिश अनावश्यक है। हाँ अगर सरकार वास्तव में इस दिशा में प्रयोग करना चाहती है तो उसे पूर्णत: नि:शुल्क शिक्षा देने को तैयार होना होगा।”
इस दिशा में, यानि गरीबों के लिये पूर्णत: नि:शुल्क शिक्षा मुहैया कराने की दिशा में, विद्यासागर द्वारा उनके अपने पैत्रिक गाँव वीरसिंहो में किये गये काम का ऐतिहासिक महत्व है। विद्यासागर के प्रथम जीवनीकार, उनके अपने सहोदर शम्भुचन्द्र विद्यारत्न इस प्रसंग पर लिखते हैं:
“अग्रज महाशय बचपन से ही इस बात को लेकर मन ही मन आलोड़ित रहते थे कि अपनी जन्मभूमि वीरसिंहो एवं आसपास के गाँवों के निवासी लोगों एवं बालकों के दिमाग का अंधेरा दूर करने के लिये विद्यालय स्थापित करेंगे। लेकिन पैसों के अभाव के कारण यह बात वह कभी किसी से बोल नहीं पाये। अभी उन्हे महीना में तीन सौ रुपये वेतन मिल रहा था और बेतालपंचविंशति, जीवनचरित, बांग्लार इतिहास, उपक्रमणिका, बोधोदय आदि पुस्तकों की बिक्री से लाभ भी अच्छा हो रहा था। इसी करण से, चारों भाईयों के साथ फागुन के महीने में जलमार्ग से उलुबेड़े, गेँयोखालि, तमोलुक, कोला, बाकसी, गोपीगंज होते हुये तीसरे दिन घाँटाल में नाव से उतरे और घर पहुँचे। घर पहुँचकर पिता से उन्होने कहा, ‘एक अरसा पहले आप अक्सर इच्छा व्यक्त करते थे कि गाँव में टोल [परम्परागत ग्रामीण विद्यालय] बना कर आप गाँव के लोगों को विद्या दान करेंगे। अब आपके आशीर्वाद से मेरी स्थिति अच्छी हुई है, इसलिये वीरसिंहो में एक विद्यालय खोलना चाहता हूँ।’ यह सुन कर माँ और पिताजी बहुत खुश होकर भैया का चेहरा चूम कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त किये। अगले दिन विद्यालय का स्थान तय हुआ। जमीन के मालिक रामधन चक्रवर्ती एवं अन्यान्य को कीमत चुका कर भैया जमीन की बिक्री का केवाला लिखवा लिये। उसके अगले दिन मजदूर नहीं मिला देखकर भैया खुद सभी भाईयों को लेकर मिट्टी कोड़ने में लग गये। बाद में, जल्द से जल्द विद्यालय के निर्माण के लिये पिताजी को एक हजार से कुछ अधिक रुपये देकर कलकत्ता वापस चले गये। “सन 1853 के चैत में गर्मी की छुट्टी के पूर्व, मध्यम और तीसरा भाई तथा उस समय घर के जो भी सगे-सम्बन्धी संस्कृत कॉलेज के उच्च कक्षाओं पढ़ रहे थे, उन सब को उन्होने गाँव के बालकों की शिक्षा का कार्य करने के लिये भेजा। विद्यालय का भवन तैयार होने में और चार महीने लगते, इसलिये गाँव में अपने आवास तथा आसपास के पड़ोसियों के आवासों में फागुन की माह में वीरसिंहो का विद्यालय प्रारंभ हुआ। इसके पहले इस इलाके में कोई विद्यालय स्थापित नहीं हुआ था। स्थानीय लोगों के मन में अंधविश्वास था कि विद्यालय में पढ़ाई करने से वे इसाई बन जायेंगे। कुछ लोग कहते थे कि बच्चे नास्तिक हो जायेंगे। किसी किसी भट्टाचार्य का संस्कार था कि जाति भ्रष्ट हो जायेगा। और भी कैसी कैसी बातें करने लगे लोग। “उस समय वीरसिंहो गाँव के लोगों की आर्थिक स्थिति बुरी थी। सद्गोप लोग कृषिकर्म कर दिन बिताते थे। उनके बच्चे चरवाही करते थे; कई दूसरों के खेतों में मजदूरीकरते थे। कई परिवारों को शाम तक अन्न जुटाना दुभर हो जाता था। जो भी हो, विद्यालय स्थापित होने के पाँच-सात दिनों के अन्दर सौ से अधिक बच्चे पढ़ने के लिये विद्यालय में प्रवेश किये। क्रमश:, आसपास के पथरा, उदयगंज, कुराण, गोपीनाथपुर, यदुपुर, दन्डीपुर, इड़पाला, दीर्घग्राम। साततेँतुल, आमड़ापाट, पुड़शुड़ी, मामरुल, आकपपुर, आगर, राधानगर, क्षीरपाई आदि गाँवों से काफी बालक विद्यालय में प्रवेश लेने लगे। बहुतों की ऐसी स्थिति नहीं थी कि पाठ्यपुस्तक खरीदें। विद्यालय नि:शुल्क किया गया। अग्रज महाशय, कलकत्ता से तीन सौ से अधिक बालकों के लिये पाठ्यपूस्तक, कागज एवं स्लेट आदि बेझिझक भेजते थे। अपने गाँव में जिन छात्रों को पहनने के कपड़ों का अभाव था, उन्हे कपड़े खरीद देने के लिये उन्होने मुझे आदेश दिया। उस समय, दूर दराज में अध्यापन कार्य करने वाले कई शिक्षकों के पुत्र इस विद्यालय में अध्ययन हेतु चले आये।
“जो लोग दूसरों के घरों में, मजदूरी लेकर दिन में उनकी चरवाही करते थे, उन्हे पढ़ाईलिखाई सिखाने के लिये अग्रज ने नाईट-स्कूल स्थापित किया। उस स्कूल में शाम से रात के दो पहर तक के लिये दो शिक्षक नियुक्त थे, नि:शुल्क पुस्तकें देनी पड़ती थी, और इन सभी चीजों में जो खर्च होता उसका निर्वाह स्वयं अग्रज महाशय करते थे। …
“उस समय इस प्रांत की महिलायें लिखती-पढ़ती नहीं थी। वीरसिंहो में सबसे पहले बालिका विद्यालय की स्थापना हुई। सभी बालिकाओं को नि:शुल्क पुस्तकें मिलती थी। जिस समय कलकत्ता में पहली बार बेथुन-फिमेल-स्कूल स्थापित हुआ, उस समय कलकत्ता-निवासी सम्भ्रान्त दलपतिगण एवं अन्यान्य सम्भ्रान्त लोग बहुतेरे किस्म के हंगामा किये थे। लेकिन वीरसिंहो में बालिका विद्यालय स्थापित होने पर, पड़ोसी सन्तोष के साथ अपनी कन्याओं को विद्यालय भेजा करते थे। इसके चलते, आसपास के दूसरे गाँव के लोग भी किसी प्रकार की आपत्ति नहीं जताये थे।”



॥ 4 ॥ शिक्षा : शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालयों की स्थापना


लगातार मातृभाषा पर आधारित आदर्श विद्यालय एवं आगे बालिका विद्यालय स्थापित करने का सिलसिला शुरू करते ही उन्हे प्रतीत हुआ कि इन विद्यालयों के लिये सही ढंग से प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता होगी और इसके लिये विशेष शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालयों की आवश्यकता होगी। इन विद्यालयों को उस समय नॉर्मल स्कूल कहा जाता था। आज भी बिदेशों में कहा जाता है। भारत में हम इन्हे टीचर्स ट्रेनिंग स्कूल या कॉलेज के नाम से जानते हैं।
नॉर्मल स्कूल खोलने के लिये विद्यासागर ने सरकार से बातचीत शुरू की। संस्कृत कॉलेज के भीतर पहले से एक पाठशाला चल रहा था। वह खुद कॉलेज के सचिव थे। सो, उन्हे बस सरकार से अनुमति प्राप्त करनी थी। अन्तत: कागजी कार्रवाईयों के पूरे होने के बाद, सन 1855 के 17 जुलाई को संस्कृत कॉलेज के परिसर में, हर छ: माह पर 60 शिक्षक प्रस्तुत करने वाला भारत का पहला शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय या नॉर्मल स्कूल खोला गया, जिसमें उच्च श्रेणियों का जिम्मा था स्कूल के प्रधानाध्यापक अक्षय कुमार दत्त (बंगाल भाषा के एक प्रख्यात लेखक) पर एवं निम्न श्रेणियों का भार था शिक्षक मधुसूदन वाचस्पति पर। यह पहला नॉर्मल स्कूल सिर्फ पुरुषों के लिये (एवं तत्कालीन सीमाओं में सिर्फ हिन्दु उँची जातियों के लिये) था।
महिलाओं (शिक्षिकाओं) को प्रशिक्षित करने के लिये नॉर्मल स्कूल बनने की अलग ही कहानी है। एक योरोपीय महिला थी मिस मेरी कार्पेन्टर जो 1866 में भारत आई थी; वह भारतीय नारियों की शिक्षा को लेकर काफी उत्साही एवं प्रयत्नशील थीं। विद्यासागर के बारे में जान कर वह विद्यासागर से मिली, उनसे मित्रता की एवं उनके साथ घूम घूम कर कई बालिका विद्यालयों का परिदर्शन किया। परिदर्शन के दौरान दोनों की बातचीत भी हुई कि महिलाओं को प्रशिक्षित करने के लिये भी एक नॉर्मल स्कूल होना चाहिये। यह भी सोचा गया कि इसके लिये बेथून स्कूल ही बेहतर परिसर होगा। मिस कार्पेन्टर ने अपने उत्साह से इस बात को अपने कुछ ब्राम्हो समाजी मित्रों के बीच रखा। उन्होने इसे सहर्ष स्वीकार लिया एवं जल्दी जल्दी में एक बैठक बुला कर प्रस्ताव बनाया एवं सरकार के पास भेज दिया। उन्होने जो कमिटी सुझाई थी उसमें विद्यासागर का भी नाम था लेकिन उन्होने इस कमिटी से अपना नाम वापस ले लिया। बाद में सरकार के द्वारा उपरोक्त प्रस्ताव पर जब उनकी राय मांगी गई तब उन्होने स्पष्ट कहा कि इस तरीके से जल्दी जल्दी में प्रस्ताव लिये जाने से उनका विरोध है। जो उच्च जाति के हिन्दु परिवार अपनी बेटी को शैशवावस्था में विद्यालय भेजने से कतराते हैं वे युवावस्था में बेटियों को शिक्षिका बनने के लिये नॉर्मल स्कूल भेजेंगे? हाँ, हो सकता है कि कुछ हिन्दु विधवायें आयें। पर क्या उनसे स्कूल संभलेगा? इसीलिये, विद्यासागर ने लिखा, कि उन्होने स्पष्ट राय दी थी कि हिन्दु समाज के कुछ गण्यमान्य व्यक्तियों को आमंत्रित कर, उन से राय विचार कर, उनकी सहमति से प्रस्ताव बनाया जाय। फिर भी, विद्यासागर इस काम में जो भी सहयोग मांगा जायेगा, देंगे। वैसे, वह समझते हैं कि इस तरह बनाया गया महिलाओं का नॉर्मल स्कूल चल नहीं पायेगा।
हुआ भी यही। सरकार द्वारा सहयोग दिये जाने के बावजूद, पढ़ी लिखी लड़कियाँ भी शिक्षिका बनने के लिये कम ही आईं और कुछेक वर्षों के बाद वह महिलाओं का वह फिमेल नॉर्मल स्कूल 1871 में बन्द हो गया।
लेकिन विद्यासागर चाहते थे कि फिमेल नॉर्मल स्कूल चले। इसलिये उनकी मृत्य के बाद कलकत्ता की महिलाओं द्वारा बनाई गई विद्यासागर स्मृतिरक्षा समिति के सम्पदक की ओर से बेथून स्कूल कमिटी को 1670 रुपये भेजे गये। आशय था कि कोई हिन्दु बालिका विद्यालय की छात्रा अगर शिक्षिका बनने के लिये प्रवेशिका परीक्षा देने को आग्रही हो तो इस राशि की आय से उसे अगले दो वर्षों तक वृत्ति दी जाय।      
यहीं पर यह भी बता दें कि उपरोक्त मेरी कार्पेन्टर को विद्यालय परिदर्शन कराने के दौरान ही विद्यासागर एक दुर्घटना का शिकार हुये। घोड़ागाड़ी से गिर पड़े एवं पेट व पैर में गंभीर चोट के कारण बेहोश हो गये। इस चोट ने विद्यासागर को बाकी जीवन के लिये पेट से बीमार एवं एक पैर से थोड़ा कमजोर कर दिया। इस दुर्घटना के बाद वह आजीवन थोड़ा अधिक अस्वस्थ भी रहने लगे।   



॥ 3 ॥ शिक्षा : बालिका विद्यालयों की स्थापना


बालिकाओं के लिये भी सीमित संख्या में मिशनरी स्कूल थे और बड़े लोगों के निजी उद्योग से स्थापित हिन्दु लड़कियों के लिये बालिका विद्यालय थे। सन 1824 में छपा था ‘स्त्रीशिक्षा विधायक’ नाम के एक पर्चे का तीसरा संस्करण। यह पर्चा हिन्दु स्त्रियों को पढ़ाई के लिये प्रेरित करने हेतु बनाया गया था। उसी में जिक्र है कि 1820 में पहला विद्यालय ‘जुवेनाइल विद्यालय’ बनने के बाद लड़कियों के लिये भी विद्यालय खोले गये। सन 1823-24 में पचास बालिका विद्यालय थे जिनमें कुल मिला कर 800 लड़कियाँ पढ़ती थीं। लेकिन बालिकाओं का पाठ्यक्रम बस बोलने लिखने लायक मातृभाषा, धर्मग्रंथ, सिलाई, कढ़ाई सिखाने वाला था था। विद्यासागर का मॉडल बेंगॉली स्कूल वाला नया पाठ्यक्रम नारीशिक्षा में क्रांतिकारी गति ले आया।
जीवनीकार ब्रजेन्द्रनाथ बंदोपाध्याय ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का प्रिय एक संस्कृत श्लोक का हिस्सा उद्धृत करते हैं, “कन्यापेवं पालनीया शिक्षणियातियत्नत:”; कि यही विद्यासागर को प्रेरित करता रहा। वह बताते हैं कि सन 1849 में सर जे॰ ई॰ डी॰ बेथुन [जीवनी रचना के समय उच्चारण शायद ‘बीटन’ रहा होगा – लेखक] ने कलकत्ते में एक बालिका विद्यालय स्थापित किया। शुरू से ही उन्हे विद्यासागर का सहयोग मिला। बेथुन साहब अंग्रेज सरकार के शिक्षा परिषद के भी अध्यक्ष थे। उन्होने विद्यासागर से आग्रह किया कि वह बेथुन गर्ल्स स्कूल [पहले ‘हिन्दु गर्ल्स स्कूल’] के मानद सचिव बन जायें। विद्यासागर ने सचिव के रूप में काम शुरू किया। शहर के परिवारों को आकर्षित करने के लिये उन्होने लड़कियों को स्कूल ले आने वाली गाड़ी के दोनों ओर उपरोक्त श्लोक “कन्यापेवं पालनीया शिक्षणियातियत्नत:” खुदवा दिया। बेथुन साहब के जिन्दा रहते एवं उनके मरने के बाद जब सरकार ने स्कुल का परिचालन सिसिल बीडन के हाथों में सौंपा तब भी स्कुल को बेहतर बनाने में, छात्राओं की संख्या बढ़ाने में, परिचित परिवारों को प्रोत्साहित करने में कि वे अपनी बच्चियों को स्कूल भेजें, व्यक्तिगत यतन के साथ विद्यासागर जुटे रहे।
उधर इंग्लैन्ड के सरकारी महकमे में एक पक्ष भारत में नारीशिक्षा को आगे बढ़ाने की वकालत कर रहा था। बंगाल के लेफ्टेनैंट गवर्नर हैलिडे चूंकि खुद इस पक्ष में थे इसलिये उन्होने विद्यासागर से सहायता मांगी। बस, और क्या चाहिये था! नारीशिक्षा के प्रबल समर्थक तो वह थे ही। बालिका विद्यालय खोलने कि दिशा में वह तेजी से आगे बढ़ गये।
ब्रजेन्द्रबाबु लिखते हैं, “नवम्बर 1857 से मई 1858 – इन कुछ महीनों में विद्यासागर ने 35 बालिका विद्यालय खोला, उनमें हुगली जिला के विभिन्न गाँवों में 20, वर्धमान जिले में 11, मेदिनीपुर जिले में 3 और नदिया जिले में 1 विद्यालय शामिल थे। विद्यालयों के लिये महीने में 845 रुपये खर्च होते थे, छात्राओं की संख्या थी लगभग 1300।”
शायद रुचिकर हो, उन विद्यालयों की तालिका भी ब्रजेन्द्रनाथ बंदोपाध्याय की उपरोक्त जीवनी के सौजन्य से नीचे प्रस्तुत है।
गाँव/जिला   स्थापना की तारीख   गाँव/जिला    स्थापना की तारीख
हुगली जिला
पोटवा     24 नवम्बर 1857  दासपुर    26 नवम्बर 1857
बैंची      01 दिसम्बर 1857 दिगशुइ   07 दिसम्बर 1857
तालान्डु    07 दिसम्बर 1857 हातिना   15 दिसम्बर 1857
हयेरा     15 दिसम्बर 1857 नवपाड़ा   30 जनवरी  1858
उदयराजपुर 02 मार्च   1858  रामजीवनपुर 16 मार्च    1858
आकाबपुर  28 मार्च    1858 शियाखाला  01 अप्रैल   1858
माहेश    01 अप्रैल1858  बीरसिंहो   01 अप्रैल   1858 
गोयालसारा 04 अप्रैल   1858 दन्डीपुर   05 अप्रैल   1858
देपुर      01 मई     1858 राउजापुर   01 मई1858 
मलयपुर   12 मई     1858 विष्णुदासपुर15 मई     1858
                  वर्धमान जिला
रानापाड़ा   01 दिसम्बर 1857 जामुइ     25 जनवरी  1858
श्रीकृष्णपुर  26 जनवरी  1858 राजारामपुर 26 जनवरी  1858
ज्योत-श्रीरामपुर27 जनवरी1858 दाँइहाट    01 मार्च    1858
काशीपुर     01 मार्च    1858 सानुइ    15 अप्रैल   1858
रसुलपुर     26 अप्रैल   1858 बन्तीर    27 अप्रैल   1858
बेलगाछी   01 मई     1858
                  मेदिनीपुर जिला
भांगाबांध   01 जनवरी  1858 बदनगंज   10 मई    1858
शान्तिपुर   15 मई     1858
                  नदिया जिला
नदिया    01 मई     1858  
गौरतलब है कि ब्रजेन्द्रनाथ बन्दोपाध्याय के पुस्तक में सरकारी दस्तावेज के हवाले जो सूची उपलब्ध कराई गई है उसमें हर विद्यालय के स्थान एवं स्थापना की तारीख के साथ उस विद्यालय पर आ रहे मासिक खर्च का भी जिक्र है। यह इसलिये कि यही खर्च बाद में विद्यासागर का अंग्रेज सरकार से क्षुब्ध होते हुये नौकरी से इस्तीफा देने का मुख्य कारण बना।
दर असल विद्यासागर, अंग्रेज सरकार का नारीशिक्षा के प्रति झुकाव एवं लेफ्टेनैंट गवर्नर हैलिडे का उनके काम के प्रति पूर्ण समर्थन के भरोसे बालिका विद्यालय स्थापित करते चले गये एवं समय समय पर प्रतिवेदन सरकार को भेजते चले गये। यह सरकार की भी लापरवाही थी कि उसने इसके खर्च पर दिल्ली सरकार से स्पष्ट निर्देश नहीं प्राप्त किये। जब यह सवाल आया तब तक कुल खर्च, सभी विद्यालयों का मिलाकर तीन हजार रुपयों से अधिक हो गया। ऊधर दिल्ली की सरकार 1857 के गदर के दमन के बाद तंगी में भी आ गई थी और नारीशिक्षा ही क्यों, शिक्षा के ही सवाल पर उदासीन हो गई थी। बंगाल सरकार की अनुशंसा के बावजूद दिल्ली ने बालिका विद्यालयों का खर्च देने से इन्कार कर दिया। विद्यासागर ने क्षुब्ध होकर बंगाल सरकार को पत्र लिखा। अन्तत: बंगाल सरकार के विशेष अनुरोध पर दिल्ली की सरकार ने तीन हजार रुपये तो दे दिये पर आगे का खर्च उठाने से मना कर दिया। सरकारी दस्तावेज में छपी सूची में खर्च का जिक्र आया ही इसलिये था कि सूची, सरकारी महकमे में खर्च के जिक्र के साथ बनी थी।
खैर, क्षुब्ध होकर विद्यासागर ने एक एक कर सहकारी स्कूल इन्स्पेक्टरी छोड़ दी, संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य का पद छोड़ दिया (नवम्बर 1858), बाद में उसके परीक्षकों के बोर्ड से भी पदत्याग कर दिया, यानी पूरी तरह से सरकारी नौकरी छोड़ दी।
पदत्याग करते समय साहबों ने समझाया कि अभी पदत्याग करने पर पेंशन नहीं मिलेगी, थोड़ा रुक जाइये पर विद्यासागर ने साफ जबाब दिया कि जरूरत पड़ेगी तो भूखे रहेंगे पर नीतियों पर मतविरोध हो गया तो एक क्षण अब इस पद पर नहीं रहेंगे। इन्स्पेक्टरी भी इसी तरह छोड़ा क्योंकि सरकार ने यथोचित कोष मुहैया कराना बन्द कर दिया था। फिर भी, सरकार ने जब भी शिक्षा के क्षेत्र में उनको सुझाव देने के अनुरोध किये उन्होने सुझाव दिया। ज्ञातव्य हो कि बाद में ‘वूड्स डेसपैच’ के नाम से प्रख्यात जिन अनुशंसाओं के तहत अंग्रेज सरकार ने पूरे भारत में सरकारी विद्यालय खोलने, कन्या विद्यालय खोलने, निजी प्रयासों से खोले जाने वाले विद्यालयों को आर्थिक मदद देने आदि की नीति अपनाई, उक्त ‘वुड्स डेसपैच’ का आधार था ईश्वरचन्द्र विद्यासागर द्वारा दिये गये सुझाव।
अब विद्यासागर ने अपने ढंग से काम करना शुरू किया। सबसे पहले उन्होने बालिका विद्यालयों का खर्च उठाने के लिये एक ‘नारीशिक्षा प्रतिष्ठान भंडार’ स्थापित किया। इस भंडार में कई बड़े जमींदार (राजा), सम्भ्रांत लोग एवं उँचे पद पर बैठे सरकारी कर्मचारी नियमित चन्दा देते थे। यहाँ तक कि तत्कालीन लेफ्टेनैंट गवर्नर सेसिल बीडन भी महीने में 55 रुपये देते थे।
कुछ दिनों बाद सर बार्टल फ्रियर को लिखे गये एक पत्र में विद्यासागर ने लिखा, “सुनकर आप प्रसन्न होंगे कि मुफस्सिल के जिन बालिका विद्यालयों के लिये आपने चन्दा दिया था, वे बढ़िया से चल रहे हैं। आस पास के जिलों के लोग नारीशिक्षा के महत्व को समझने लगे हैं। बीच बीच में नये विद्यालय भी खोले जा रहे हैं।” [विद्यासागर प्रसंग, ब्रजेन्द्रनाथ बंदोपाध्याय, पृ: 57-58]
नारीशिक्षा पर विद्यासागर ने जितनी तेजी से व्यापक पैमाने पर काम किया यह तो उनके चरित्र का गुण था। साथ ही, उनके काम का महत्व इसमें था कि जबकि पहले के बालिका विद्यालयों, पाठशालाओं आदि में सामान्य अक्षरबोध, धर्मग्रंथों का पाठ वगैरह सिखाया जाता था, विद्यासागर द्वारा खोले गये बालिका विद्यालय उनके नये पाठ्यक्रम पर आधारित थे जिसमें गणित, विज्ञान, राजनीतिक अर्थशास्त्र, साधारण ज्ञान आदि शामिल था। इसी का फल था कि उनके दिशानिर्देशानुसार बने बेथुन कन्या विद्यालय से उत्तीर्ण होकर भागलपुर की बेटी कादम्बिनी बसु (गांगुली) आगे चल कर न सिर्फ भारत बल्कि एशिया की पहली महिला चिकित्सक बनी।