Friday, May 23, 2025

बाबासाहब अम्बेदकर: जीवन एवं विचार - कपिल कृष्ण ठाकुर

बाल्यावस्था एवं शिक्षा

छुआछूत की पाबंदियाँ अगर न होतीं, उन्नीसवीं सदी के महाराष्ट्र में भीमराव का परिवार निश्चय ही पर्याप्त सम्मान और मर्यादा के हकदार समझे जाते। उनके दादा मालोजी शकपाल ब्रिटिश फौज के सदस्य थे। पिता रामजी शकपाल नॉर्मल स्कूल से शिक्षकता में डिप्लोमा प्राप्त किये थे और लगातार 14 वर्षों तक मिलिटरी स्कूल के प्राचार्य थे। नौकरी में उन्हे द्वितीय पैदल सेना के सुबेदार मेजर के पद पर प्रोन्नति भी मिली थी। रामजी शकपाल अंग्रेजी भाषा के बहुत ही प्रवीण थे। पुत्र भीमराव ने बाद के दिनों में उन्ही से अंग्रेजी लिखने का कौशल अर्जित किया था।

सिर्फ पिता का वंश ही नहीं, भीमराव की माता का वंश भी संपन्न और प्रतिष्ठित था। उनकी माता थीं थाणे जिला के मुरवाद गाँव की बेटी भीमाबाई। भीमाबाई के पिता और उनके छे भाई ब्रिटिश फौज में सुबेदार मेजर थे। ऐसे परिवार का संतान होने के बावजूद भीमराव (1891-1956) को जिस प्रकार छुआछूत का शिकार होना पड़ा, सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि किसी सामान्य दलित परिवार में बड़े हो रहे बच्चे को कितना अपमानित होना पड़ता होगा।

भीम अपने पिता और माता के चौदहवां संतान होते हुये भी जीवितों में पांचवां और अंतिम संतान थे। उनका जन्म मध्यप्रदेश के मऊ शहर में हुआ था जहाँ उनके पिता कार्यरत थे। पर उनकी पितृभूमि थी महाराष्ट्र के कोंकण खंड के रत्नागिरि जिले में स्थित छोटा शहर मनदानगढ़ से पांच मील दूर, अम्बावाद गाँव। धार्मिक प्रवृत्ति के दृष्टिकोण से परिवार संत कबीर के उदार पंथ का अनुयायी था। सन 1893 में नौकरी खोने के बाद, रामजी शकपाल महाराष्ट्र के दापोली में आकर रहना शुरू किये। वहीं स्थानीय प्राथमिक विद्यालय में भीमराव का, अड़चनों से भरा विद्यालय-जीवन शुरू हुआ।

सिर्फ बाहर ही नहीं, शकपाल परिवार के इस नन्हे बच्चे के लिये विघ्न-बाधा की दीवारें घर के अंदर भी खड़ी हो गई। मात्र पांच साल की उम्र में भीम ने अपनी स्नेहमयी माँ को खो दिया। इस बीच सैन्य-आवास परिसर में एक नौकरी की जुगाड़ कर रामजी सपरिवार सतारा आ गये थे। दो बेटियों का विवाह भी उन्होने इसी अवधि में संपन्न किया था। पत्नी की मृत्यु के बाद भीम की फुआ मीराबाई आ कर भैया की गृहस्थी सम्हाल ली थी। लेकिन, दो साल बीतते न बीतते रामजी ने पुन: विवाह किया। इस घटना को आसानी से पचा नहीं पाये बालक भीमराव। उधर नया माहौल और नये विद्यालय के अनुभव भी उनके लिये डरावने हो उठे थे। छुआछूत की मर्मांतिक यंत्रणा को अपने भीतर झेलते हुये, बड़े भैया आनन्द और वह, दोनों किसी तरह विद्यालय में टिके हुए थे।

प्राथमिक शिक्षा पूरी कर दोनो भाई सताराके हाईस्कूल में भर्ती हुए। तब तक उनके पिता रामजी नया एक काम ढूढ़ कर गोरेगांव चले गये थे। एक बार विद्यालय की छुट्टी थी, भीम और आनन्द दोनों की ईच्छा हुई कि पिता का कार्यस्थल, गोरेगांव चला जाए। पिता को यह सूचना चिट्ठी के माध्यम से पहुंचाई भी गई। एक भांजे को साथ लेकर, तय दिन पर वे स्टेशन पर उतरे, पर पिता नहीं मिले। दर असल, चिट्ठी सही वक्त पर पहुँची ही नहीं थी। फलस्वरूप गोरेगांव जाने के लिये एक बैलगाड़ी किराये पर लेना पड़ा। सुन्दर पोशाक पहने, सुसंस्कृत तीन लड़कों को देख कर गाड़ीवान सोच भी नहीं पाया था कि ये अछूत होंगे। थोड़ी दूर जाने के बाद, लड़कों की बातचीत सुन कर उसे संदेह हुआ। तुरंत आगबबूला होकर उसने निर्दोष बच्चों को सामान सहित इस आरोप के साथ सड़क पर फेंक दिया कि उनके स्पर्श से उसका गाड़ी और दोनों बैल अछूत हो गये हैं। बाद में, बहुत गिड़गिड़ाने और दोगुना पैसा लेने के बाद गाड़ीवान उन्हे गोरेगांव पहुंचा तो दिया लेकिन गाड़ी हांक कर नहीं, गाड़ी के साथ साथ, दूरी बना कर पैदल चलते हुए। फलस्वरूप बालक सवारियों को ही गाड़ीवान की जिम्मेदारी पूरी करनी पड़ी। गर्मी के दिन थे। अपराह्न से मध्यरात्रि तक यूँ चलते हुए प्यास से छाती फटने लगी लेकिन पीने को पानी नसीब नहीं हुआ। अछूत जान कर हर जगह लोग दूर भगाते रहे, या गंदा पानी दिखाते रहे।

जीवन के ऐसे असंख्य कड़ुवे अनुभवों के बीच विद्यालय के दिनों में कुछ ऐसी घटनायें भी भीमराव के जीवन में घटित हुई जो अपवाद थीं। उसी विद्यालय में अम्बेदकर पदवीवाले एक उदारचित्त, छात्रों के हमदर्द ब्राह्मण शिक्षक थे। सामाजिक अनुशासन की बिल्कुल ही परवाह न करते हुए अक्सर वह अपने टिफिन का हिस्सा इस अछुत छात्र के हाथों में रख दिया करते थे। शायद अपने प्रिय छात्र को छुआछूतवालों से तात्कालिक तौर पर बचाने के लिये ही उन्होने विद्यालय की पंजिका में उसके नाम के साथ, अपनी ब्राह्मण पदवी को जोड़ दिया था। जिस पदवी से भीमराव रामजी पूरी दुनियां में जाने गये, वह पदवी ‘अम्बेदकर’ इसी शिक्षक का दान है।

भीमराव के पिता रामजी शकपाल, गोरेगांव की नौकरी खोने के बाद बम्बई (अभी मुम्बई) चले आने को मजबूर हुए। वहां लोअर परेल की बस्तियों में एक कमरे का एक घर उनका ठौर बना। भीम और उसके बड़े भाई को मराठा हाईस्कूल में भर्ती करा दिया गया। पढ़ाई के प्रति भीम का आग्रह देख कर कुछ दिनों के बाद रामजी ने उसे बम्बई का सबसे अच्छा विद्यालय, एलफिनस्टोन स्कूल में भर्ती करवा दिया।     

पर, अच्छे विद्यालय में भर्ती होने से ही तो सब कुछ नहीं हो जाएगा! बस्ती के प्रतिकूल वातावरण में, एक कमरे के घर में, जहाँ सभी के लिये सोने-बैठने की भी जगह नहीं है, बालक भीमराव कहाँ बैठ कर पढ़ाई करेगा? सोच-विचार कर रामजी ने एक उपाय ढूंढ़ निकाला। अपने बेटे को उन्होने शाम को जल्दी सो जाने का आदेश दिया। खुद रात के दो बजे तक जगे रहने के बाद, बेटे को जगा दिया करते और लालटेन की धीमी रोशनी में उसे पढ़ने के लिये बैठा देते। फिर बेटे के खाली बिस्तर पर जा कर खुद सो जाते। सूरज के उगने तक बालक भीमराव गहन अध्ययन में डूबे रहते।

ऐसा नहीं कि सरकारी एलफिन्स्टोन स्कूल में भीमराव को वर्णद्वेष का शिकार नहीं होना पड़ा। जन्मचिह्न की तरह उस कलंक का बोझ उसे हमेशा ही ढोना पड़ा। एक बार एक शिक्षक ने उन्हे ब्लैकबोर्ड पर एक हिसाब बनाने को कहा। तत्काल इसके विरdह में पूरे क्लास में शोरगुल शुरू हो गया। बोर्ड के पीछे ही सभी के टिफिन का डब्बा रखा था। भीमराव बोर्ड छुते ही पीछे रखा भोजन दूषित हो जायेगा! … सहपाठियों की इतनी ही निर्मम घृणा और उपेक्षा झेलते हुये दिन प्रति दिन भीमराव को ज्ञानार्जन का प्रयास जारी रखना पड़ता था। कभी कभी किसी शिक्षक के द्वेषपूर्ण सवाल भी सुनने पड़ते थे – ‘तू क्यों बेकार पढ़ाई करने को आया इधर?  पढ़लिखकर तू करेगा क्या?”

सारी बाधाओं को पार कर, एलफिनस्टोन स्कूल से ही सन 1907 में भीमराव मैट्रिक की परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। उसी समय, तत्कालीन महार समाज की रीति के अनुसार पिता के द्वारा भीमराव के विवाह की व्यवस्था की गई। दपोलीके भीकु वालंगकर की दूसरी बेटी नौ वर्ष की रामी (रमाबाई) के साथ भीमराव का विवाह हुआ। वर्णव्यवस्था से अंधा हो चुका समाज अछूतों के विवाह के लिये किसी प्रकार के सजावट या लुभावने माहौल की अनुमति नहीं देता था। फलस्वरूप, भविष्य के ‘भारतरत्न’ और ‘द ग्रेटेस्ट इंडियन’ का विवाह खुले शेड के नीचे, रात के थके भायखला बाजार में, मछलीवाले बरामदे के दुर्गंध, कीचड़ और सीलन भरे वातावरण में हुआ।

एलफिनस्टोन कॉलेज से आई.ए. पास करने के बाद, आर्थिक तंगी के कारण जब उच्चशिक्षा के सभी मार्ग भीमराव को बंद नजर आने लगे, तब उनकी मदद के लिये आगे आए विलसन कॉलेज के उदार-हृदय शिक्षक, कृष्णाजी अर्जुन केलुसकर। केलुसकर भीमराव के पूर्वपरिचित थे और भीमराव में पढ़ने की व्यग्रता देख कर कभी गौतम बुद्ध की जीवनी दिये थे उपहारस्वरूप। समस्या से जूझ रहे अम्बेदकर को साथ ले कर यह ब्राह्मण शिक्षक बड़ोदा के महाराजा शिवाजीराव गायकवाड़ के पास चले गये। महाराजा के पास उन्होने अम्बेदकर के लिये शिक्षा वृत्ति का आवेदन किया। महाराज के द्वारा अम्बेदकर से कुछ सवाल पूछे गए। उन सवालों का जवाब सुन कर महाराज इतना प्रसन्न हुए कि तत्काल उन्होने अम्बेदकर के लिये हर महीना पचीस रुपये की छात्रवृत्ति स्वीकृत किया।    

उच्च शिक्षा के लिए भीमराव का स्वप्न सफल हुआ। लेकिन समस्याओं का अंत नहीं हुआ यहाँ। कॉलेज के कैंटीन की जिम्मेदारी एक कट्टर ब्राह्मण पर थी। कभी ऐसा न हुआ कि उनका विवेक जगा हो और कम से कम एक बार के लिये उन्होने अम्बेदकर को कैंटीन में चाय पीने या नाश्ता करने का मौका दिया हो। सन 1912 में अम्बेदकर बीए पास किये। उन्हे मिली वृत्ति के शर्तों के मुताबिक सन 1913 के जनवरी महीने में उन्होने बड़ौदा के महाराजा के अधीन नौकरी ली। महाराजा ने उन्हे अपनी सैन्यवाहिनी में लेफ्टेनैंट के पद पर नियुक्त किया। लेकिन पहली नौकरी की यादें भी उनके लिये सुख देनेवाली नहीं रही। लेफ्टेनैंट जैसा महत्वपूर्ण पद भी उनकी अछूत पहचान को ढक नहीं पाया। मात्र पन्द्रह दिनों के बाद पिता के अस्वस्थ होने का टेलिग्राम पा कर वह घर आये। मृत्युशय्या पर पिता रामजी जैसे प्रिय संतान की प्रतीक्षा में ही थे। अंतिम मुलाकात पूरी होते ही 2 फरवरी 1913 को उन्होने अंतिम सांस ली। जीवन के सबसे बड़े सहारे को खो कर अम्बेदकर जीवनसंग्राम में और भी अकेला हो गये।

दुख की रात हालांकि अधिक लम्बी नहीं हुई। सन 1913 के जून महीने में ही उन्हे महाराज की वृत्ति पर कोलम्बिया विश्वविद्यालय में उच्चतर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल गया। शर्त तय हुआ कि शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत उन्हे न्यूनतम दस वर्षों तक बड़ौदा एस्टेट में नौकरी करनी पड़ेगी। अमरीका पहुँच कर अम्बेदकर को नये अनुभव हुये। अब्राहम लिंकन, बुकर टी वाशिंगटन के मुल्क में जाकर उन्होने महसूस किया कि वहां कोई उन्हे अछूत कहकर घृणा के साथ दूर नहीं हटा रहा है। एक साथ चलना फिरना, एक साथ भोजन करना … जैसे यह एक नई धरती हो।

सन 1915 में, अम्बेदकर ने कोलम्बिया विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री प्राप्त की। उनके थीसिस का विषय था, ‘प्राचीन भारत के व्यवसाय व व्यापार’। सिर्फ डिग्री प्राप्त करने में ही उनकी ज्ञान की तृष्णा चरितार्थता नहीं तलाश पाई थी। और अधिक ज्ञानचर्चा की उपज के तौर पर विश्वविद्यालय के मानव-शास्त्र विभाग के सेमिनार में उन्होने ‘भारत की जातिव्यवस्था – उनका तंत्र, उत्पत्ति और विकास’ विषय का संदर्भ प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति पर उन्हे गुणीजनों की प्रशंसा मिली। उसी साल उन्होने विश्वविद्यालय में ‘भारत का राष्ट्रीय लाभांश – एक ऐतिहासिक और विश्लेषणात्मक अध्ययन’ शीर्षक एक शोध-पत्र जमा दिया।

अमरीका में पढ़ाई के लिये जो वृत्ति अनुमोदित की गई थी उसकी अवधि पूरी नहीं हुई थी। इसलिये समय नष्ट किये बिना बाकी अवधि लंदन जा कर शोध करने का मन बनाया उन्होने। इसके लिये बड़ौदा महाराज को चिट्ठी लिख कर आवश्यक अनुमति भी ले ली। अमरीका में रहते हुए दो घटनाओं का उन पर काफी प्रभाव पड़ा। पहली घटना थी, अमरीका के संविधान में 14वां संशोधन, जिसके तहत अमरीका में रहनेवाले सारे काले लोगों की आजादी स्वीकार कर ली गई। दूसरी घटना थी, सन 1915 में काले लोगों की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक व राजनैतिक संग्राम के महान शिक्षक व मार्गदर्शक बुकर टी वाशिंगटन की मृत्यु। याद करा देना बिल्कुल अप्रासंगिक नहीं होगा कि अमरीका में काले आदमियों का संग्राम एवं विजय का पूर्वोदाहरण, बाद के दिनों में उन्हे भारत के दलितमुक्ति आन्दोलन में प्रबल रूप से प्रेरित किया था और उनका आत्मविश्वास बढ़ाया था।

सन 1916 में लंदन आ कर अम्बेदकर ने एक ही साथ, बैरिस्टरी पढ़ने के लिए ‘ग्रे’ज इन’ तथा अर्थनीति की पढ़ाई के लिए ‘लंदन स्कूल ऑफ इकॉनमिक ऐंड पौलिटिकल साइंस’ में दाखिला ले ली। समय व पैसे की कमी के कारण उन्होने दोनों जगह एक ही साथ पढ़ाई करने की जोखिम उठा ली थी। अर्थनीति विषय पर अम्बेदकर के सहज-ज्ञान से लंदन स्कूल के अध्यापक इतने अधिक मुग्ध हुए कि उन्होने इन्हे डीएससी करने की अनुमति दे दी। लेकिन इस बीच वृत्ति की अवधि खत्म हो जाने के कारण थीसिस का काम अधूरा छोड़ कर अम्बेदकर भारत लौट आए।

सन 1917 के अगस्त महीने में अम्बेदकर पानीवाले जहाज से बम्बई लौट आए। उच्चतर शिक्षा की वृत्ति के शर्तों के अनुसार वह बड़ौदा महाराज के सैन्य-सचिव के पद पर अपना योगदान दिए। लेकिन, बड़ौदा में वह रहेंगे कहां? अछूत परिचय के कारण शहर के सारे होटल उनका चेहरा देखते ही अपने दरवाजे बंद कर लेते थे। अंतत: अपना परिचय छुपा कर एक पारसी सरायखाने में उन्होने जगह ली। एक ही कारण से दफ्तर में भी उन पर अत्याचार चलता रहा। दफ्तर में उन्हे पीने का पानी नहीं मिलता था। पिउन-दफ्तरीलोग बिना टेबुल छुए, दूर से फेंका करते थे फाईल और कागजात। यह सब भी वह मानते जा रहे थे। लेकिन एक दिन, पारसी युवकों का एक झुंड सरायखाने में घुस कर उन्हे भद्दी भद्दी गालियाँ दी और तुरंत उन्हे सरायखाना छोड़ कर चले जाने को कहा। महाराज को सब कुछ बताया गया; महाराज ने अपने दीवान को आदेश दिया कि वह वैकल्पिक आवास की व्यवस्था करें। लेकिन दीवान ने भी अपनी असमर्थता जताई। नतीजे के तौर पर दो महीने में ही नौकरी वाला जीवन समाप्त कर अपमानित अम्बेदकर अपने घर लौट गये।

बम्बई लौट आने के बाद जीवन धारण के लिये अम्बेदकर ने दो ट्यूशन का काम जुटाया। अर्थनीति विषय पर उनका सहज-ज्ञान लंदन के अध्यापकों को मुग्ध किया था। अपने उसी ज्ञान पर भरोसा कर के उन्होने स्टॉक व शेयर डीलरों को परामर्श देने वाला एक संस्था खोल लिया। लेकिन डीलरलोग भी उनका पांडित्य नहीं जानना चाहते थे; जानना चाहते थे जातिगत पहचान। जातिगत पहचान जानने के बाद सारे डीलरों ने एक साथ उनका बहिष्कार किया। फलस्वरूप उस संस्था को बन्द करने के लिये वह बाध्य हुए। जिन्दा रहने के लिये इसके बाद, भारतीय अर्थनीति का यह श्रेष्ठ पंडित एक भद्र पारसी महोदय के यहाँ हिसाब लिखने लगे।

इतनी प्रतिकूलता के बावजूद उनकी सृजनशीलता बाधित नहीं हुई। इन्ही दिनों उन्होने एक एक कर तीन रचनाओं को पूरा किया – बर्ट्रंड रसेल की ‘रिकॉन्स्ट्र्क्शन ऑफ सोसायटी’ पर एक टिप्पणी, ‘कास्ट इन इन्डिया’ और ‘भारत में छोटी छोटी जमीनों की समस्या और उसका समाधान’। एक साल से अधिक समय इस तरह बीत जाने के बाद उन्हे खबर मिली कि सिडेनहैम कॉलेज ऑफ कॉमर्स ऐंड इकॉनमिक्स में शिक्षक का एक पद खाली हुआ है। आवेदनपत्र जमा देने के बाद वह सीधा बम्बई के भूतपूर्व गवर्नर सिडेनहैम के पास चले गये। योग्य व्यक्ति के लिये सिफारिश करने में सिडेनहैम नहीं हिचकते थे। सन 1918 के नवम्बर महीने में अम्बेदकर उस कॉलेज में अध्यापक के तौर पर अपना कार्यभार ग्रहण किए।     

सिडेनहैम कॉलेज में भी उनके लिए लगभग बड़ौदा जैसा अनुभव प्रतीक्षा कर रहा था। साथ के अध्यापक उन्हे पानी छुने नहीं देते थे। सहकर्मियों की घृणा और अवज्ञा के साथ, अतिरिक्त उन्हे मिला सवर्ण छात्रों में उनके प्रति श्रद्धा का अभाव। वर्णद्वेष में अंधे हो चुके ये छात्र शुरू शुरू में इस गुणवान अध्यापक के क्लास का बहिष्कार करते रहे। लेकिन जल्द ही उनका भ्रम टूट गया। अम्बेदकर के व्याख्यान इतने आकर्षक होते थे कि दूसरे कॉलेजों से छात्र विशेष अनुमति लेकर क्लास में आने लगे। अध्यापन के कार्य में यश तो मिला पर उससे संतुष्ट नहीं थे अम्बेदकर। उनका मन पड़ा था लंदन में, अपनी अधूरी शिक्षा और शोधकार्य में। पौने दो साल की नौकरी में जब कुछ पैसे की बचत हुई, तो कोल्हापुर के साहू महाराज से कुछ आर्थिक मदद और नवल भथेना नाम के एक मित्र से 5000 रुपये कर्ज लेकर वह फिर इंग्लैंड की यात्रा पर निकल गये। सन 1920 के सितम्बर महीने में वह दोबारा, ‘लंदन स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स ऐंड पॉलिटिकल साइंस’ में अर्थशास्त्र और ‘ग्रे’ज इन’ में बैरिस्टरी की पढ़ाई पूरी करने में जुट गये।

पैसों के अभाव के कारण आधा पेट खा कर रह जाना लंदन में उनकी दिनचर्या में शामिल था। पढ़ने के लिये बाकी सभी से पहले सुबह आठ बजे ब्रिटिश लाइब्रेरी, इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी या लंदन युनिवर्सिटी लाइब्रेरी पहुंच जाते थे। रात में लाइब्रेरी बन्द करने का समय होने पर, दरवान उन्हे कुर्सी से उठा देता था। इस अवधि में सिवाय पानी के उन्हे कुछ भी नहीं मिलता था पेट में डालने के लिये। इसी तरह अंतहीन कठोर तपस्या से गुजरते हुये वर्ष 1921 को अपने ‘ब्रिटिश भारत में पूंजी का प्रांत-आधारित आवंटन’ शीर्षक थीसिस के लिये अम्बेदकर को लंदन विश्वविद्यालय से एमएससी की डिग्री मिली। सन 1922 में उन्होने अपना चर्चित शोधपत्र ‘द प्रॉब्लम ऑफ रुपी” लिख कर खत्म किया। लंदन विश्वविद्यालय में उस शोधपत्र को जमा करने के उपरांत अम्बेदकर जर्मनी जा कर, भारतविद्या में उच्चशिक्षा के लिये बॉन विसशविद्यालय में भर्ती हुए। लेकिन तीन महीने के अंदर वह फिर लंदन आये प्रोफेसर एडुइन कन्यान के बुलाने पर। आने के बाद उन्हे सुनने को मिला कि थीसिस के जिस हिस्से में उन्होने ब्रिटिश साम्राज्यवाद का वास्तविक चेहरा उद्घाटित किया है, उस हिस्से को ले कर ब्रिटिश परीक्षक क्षुब्ध हैं, उनका कहना है कि उस हिस्से को नये ढंग से लिख कर जमा देना होगा।   

उस समय उनके पास लंदन में रहने लायक पैसे नहीं बचे थे। इस कारण से शोध-पत्र साथ में लेकर अम्बेदकर भारत लौट आये। साल था 1923। भारत लौटने के बाद कुछ ही दिनों के अंदर उन्होने अपना थीसिस संशोधित कर लंदन भेज दिया। उसी साल उस शोध-पत्र के लिये उन्हे डीएससी की डिग्री दी गई। विश्वविद्यालय के स्तर पर उनके विद्यार्थी जीवन की यहीं समाप्ति हुई।

कई तरह के सुधारों की प्रचेष्टा

सन 1923 में भारत लौटने के बाद उन्होने नौकरी की और तलाश नहीं की, बम्बई हाई कोर्ट में बैरिस्टरी करना शुरू किया। दर असल उनके मन में ऐसा किसी काम की इच्छा थी, जिसके माध्यम से वह समाज सेवा एवं सामाजिक पुनर्गठन के कार्य के साथ खुद को जोड़े रख पायेंगे। सर्वव्यापी उद्यम का प्रारंभ सन 1923 में जरूर हुआ लेकिन इसकी तैयारी पहले ही शुरू हो चुकी थी।

भारत में स्वायत्त शासन लागू किए जाने पर विभिन्न धर्मों एवं जनसमुदायों के प्रतिनिधि चुने जाने के तरीके क्या होंगे यह तय करने के लिए सन 1919 में साउथबरो कमिटी भारत आई थी। कईयों से राय लिये गए। अछूत समाज की तरफ से राय देने के लिये डा. अम्बेदकर आमंत्रित किये गये थे। कमिटी के सामने उन्होने दलित वर्ग (डिप्रेस्ड क्लास) के लिये अलग चुनाव एवं पूरी आबादी में उनकी संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व की मांग की थी। कुछ दिनों के बाद, टाइम्स ऑफ इंडिया में एक निबंध लिख कर अपना वक्तव्य वह स्पष्टता के साथ जनता के बीच रखे। उन्होने लिखा, “जो अछूत एक ही धर्म के कहे जाते हैं, जो एक ही देश के निवासी हैं और स्वतंत्रता व स्वायत्त शासन की एक जैसी ही आकांक्षा रखते हैं, स्वायत्त शासन की मांग करने से पहले समाज के आगे बढ़े हुए हिस्से का कर्तव्य बनता है उनके लिये सामाजिक समता की व्यवस्था करना। स्वायत्त शासन जिस तरह ब्राह्मणों का जन्मसिद्ध अधिकार है, अछूतों का भी जन्मसिद्ध अधिकार है। इसलिये, अछूतों को शिक्षित होने, प्रबुद्ध होने और विकसित होने का अवसर प्रदान करना समाज के आगे बढ़े हुये हिस्से का तात्कालिक कर्तव्य है”।

उल्लेखनीय है कि प्रथम विश्वयुद्ध के तुरंत बाद, सन 1919 में जो भारत शासन कानून जारी किया गया, उसमें केंद्रीय एवं प्रांतीय विधायिकाओं में पहली बार अछूतों की, अलग प्रतिनिधि भेजने की मांग, स्वीकार कर ली गई थी। प्रत्याशा के अनुरूप न होने पर भी डा. अम्बेदकर को इसमें आशा का किरण दिखा था। वह पूरा आश्वस्त थे कि देश के पांचवें हिस्से को उपेक्षा के अंधेरे में डुबो कर किसी नये भारत का निर्माण संभव नहीं। उन्हे प्रेरित किया था पाश्चात्य की राजनीतिक शिक्षा, लिंकन, वाशिंगटन, जेफर्सन की जीवनी। विशेष तौर पर, काले गुलामों की मुक्ति के लिये आंदोलन के श्रेष्ठतम योद्धाओं में से एक, ब्रुकर टी वाशिंगटन के जीवन, विचार और सांगठनिक पद्धति से वह प्रभावित थे।

समाज के पुनर्गठन के उद्देश्य से, कोल्हापुर के साहु महाराज की आर्थिक मदद प्राप्त कर उन्होने सन 1920 के जनवरी महीने में, ‘मूकनायक’ नाम से एक मराठी पाक्षिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया था। संपादक के रूप में उनका नाम नहीं होता था लेकिन ‘मूकनायक’ के प्रधान लेखक एवं संचालक वही थे। भारत के सभी हिस्से के लोगों को समान धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक अवसर एवं सम्मान मिले, इसी उद्देश्य को सामने रख कर उन्होने कलम उठाई थी। सन 1920 के मध्य से सन 1922 के अंत तक वह लंदन में थे, फिर भी पत्रिका का प्रकाशन जारी रहा। लंदन प्रस्थान करने से पहले ही सिडेनहैम कॉलेज के अध्यापक डा. अम्बेदकर, कोल्हापुर के मनगांव एवं नागपुर में अछूत समाज के दो बड़े सम्मेलनों में हिस्सा लिये थे। दलित समाज के भीतर एक नई आशा एवं उत्साह जगा पाये थे। सन 1923 में लौट कर उसी अधूरे कार्यभार को उन्होने स्वेच्छा से अपने कंधों पर उठा लिया।

सन 1923 में, बम्बई विधान परिषद में एक महत्वपूर्ण फैसला पारित किया गया। उसमें कहा गया कि सरकारी कुआं, जलाशय, धर्मशाला, स्कूल, ऑफिस, अदालत, अस्पताल सभी जगहों पर अछूतों को बराबर की सुविधा देनी होगी। कहीं सरकारी आदेश कागजों पर ही न रह जाए, इसके लिये डा. अम्बेदकर ने सन 1924 में ‘वहिष्कृत हितकारिणी सभा’ गठित किया। सभा का उद्देश्य था अंत्यज समाज के विकास में एवं उनके अधिकारों को अर्जित करने में सहायता। साथ ही साथ समाज के भीतर से उद्यमी कार्यकर्ताओं को आगे ले आना। विकास की इस कार्ययोजना में सवर्ण हिंदुओं की सहायता लेने से इंकार, आत्महत्या जैसी बात होगी। ऐसा उन्होने सभा के प्रथम वार्षिक प्रतिवेदन में ही कहा था। ‘वहिष्कृत हितकारिणी’ के इस प्रथम सभा में ही उन्होने युगद्रष्टा का वह मंत्र दिया – ‘एजुकेट, एजिटेट, ऑर्गानाइज’ [शिक्षित हो, आंदोलित हो, संगठित हो]। संगठन का मुख्य उद्देश्य था, (क) दलित वर्गों में शिक्षा का विस्तार एवं छात्रावासों का निर्माण; (ख) स्टडी सर्कल, क्लास, कम्युनिटी सेंटर एवं पाठागार की स्थापना के माध्यम से सांस्कृतिक विकास; (ग) उद्योग व कृषि विद्यालयों के माध्यम से दलितों कि आर्थिक उन्नति; और (घ) दलितों पर हो रहे अत्याचारों के बारे में प्रचार। सिर्फ घोषणा ही नहीं, अविलंब सभा के उद्यम से कुछेक छात्रावास के गठित होने पर अंत्यज समाज में नवजागरण का प्रारंभ हुआ।

वर्ष 1925 में भारत में ‘रॉयल कमिशन’ आया, भारतीय मुद्रा एवं आर्थिक नीति निर्धारित करने के लिए। डा. अम्बेदकर उस कमिशन के सामने रखे गये अपने सुविचारित वक्तव्य में विश्लेषण के द्वारा प्रदर्शित किये कि ब्रिटिश अर्थनीति तथा रूपया और पौंड के बीच का आपसी संबंध किस तरह उस देश के उद्योगपतियों को सुविधा पहुंचा रहे हैं एवं भारतीय जनता पर शोषण के बोझ डाल रहे हैं। उन्होने मांग किया कि इस शोषण-नीति का बदलाव होना चाहिए।

एक पेशेवर वकील के रूप में वर्ष 1926 डा. अम्बेदकर के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण एक समय था। इस साल अत्यंत संवेदनशील एक मुकदमा उनके हाथ में आया। पुणे के कुछेक ब्राह्मणों ने, गैर-ब्राह्मण कुछ नेताओं के खिलाफ आरोप दायर किया था। आरोप था कि उन गैर-ब्राह्मण नेताओं ने एक पर्चा वितरित किया। पर्चे में कहा गया है कि ब्राह्मणों ने ही समाज को बड़ी क्षति पहुंचाई है। आरोपकर्ताओं के पक्ष में थे बम्बई के शीर्षस्थ वकील, एल भी वोपटकर। निरुपाय होकर प्रतिवादी डा. अम्बेदकर के शरण में आये।    

मुकदमे के सवाल-जवाब के दरम्यान, कई हजार सालों का इतिहास, शास्त्र व पुराणों से लिये गये अंजाने तथ्य उद्धृत कर डा. अम्बेदकर जब अपने तर्कों का जाल फैलाते थे, अंग्रेज हाकिम मुग्ध श्रोता की तरह सुनते रहते थे। यहां तक कि वादी पक्ष के वकील, कट्टर ब्राह्मणों के प्रतिनिधि वोपटकर तक चुप रह कर सुनते रहते थे। इस घटना के बाद से ही वह अम्बेदकर के भक्त हो उठे। बाद में यही वोपटकर, जो किसी एक समय प्रदेश कांग्रेस के सभापति भी बने थे, कांग्रेस छोड़ कर ‘डेमोक्रैटिक स्वराज पार्टी’ गठित किये। उनकी गुण-मुग्धता के कारण ही सन 1937 के चुनाव में डा. अम्बेदकर की लेबर पार्टी के साथ उनकी पार्टी का चुनावी समझौता सम्पन्न हुआ था। खैर, सन 1926 में उपरोक्त मुकदमे का फैसला होने पर देखा गया कि अंतिम तौर पर, डा. अम्बेदकर के तर्क और बहस की ही विजय हुई है।

सन 1926 के दिसम्बर महीने में बम्बई के गवर्नर ने डा. अम्बेदकर को विधान परिषद का सदस्य मनोनित किया। नये विधान परिषद का पहला अधिवेशन वर्ष 1927 के फरवरी में सम्पन्न हुआ। वह बजट अधिवेशन था। शुरू से ही डा. अम्बेदकर सरकार की कर-नीति का विरोध करते रहे। खास कर, कम जमीन के मालिक और हजार हजार बीघा के मालिक दोनों को एक ही दर से कर देना पड़ता था। ताहम, बाढ़-सूखे में फसल हो न हो, किसान को मालगुजारी से छुटकारा नहीं मिलता था। अम्बेदकर ने इस प्रथा को खत्म करने की मांग उठाई। इसके अलावे भी, विधान परिषद अधिवेशन में अपनी पहली उपस्थिति में ही डा. अम्बेदकर ने अनुदान सहित राशन व्यवस्था की शुरुआत, नि:शुल्क शिक्षा एवं चिकित्सा के क्षेत्र में आवंटित व्यय में बृद्धि के पक्ष में जोरदार मांगें उठाईं।

वर्ष 1923 के बाद 1926 में, और एक वैधिक संशोधन के माध्यम से अछूतों के अधिकार की बुनियाद मजबूत की गई। लेकिन उसे यथार्थ में लागू करना सम्भव नहीं हो रहा था। ऐसी ही एक जगह थी महाड़ नगर निगम परिषद के अन्तर्गत चवदार तालाब। नगर निगम प्रबंधन के द्वारा चवदार तालाब अछूतों के लिये खोल दिये जाने के बावजूद कट्टरपंथी सवर्ण उनके अधिकार मानने को राजी नहीं थे। इसके प्रतिकार हेतु कोलावा जिले के अछूत समाज ने महाड़ में एक बड़ा सम्मेलन करने का फैसला लिया। वर्ष 1927 के 19 और 20 मार्च को 10,को लोग उस सम्मेलन में उपस्थित हुए। डा. अम्बेदकर को सभापति का कार्यभार सौंपा गया। उल्लेखनीय है कि उस सम्मेलन में अछूतों के अधिकार एवं विकास के समर्थन में कुछेक उच्चवर्ण के नेता भी उपस्थित थे।

पहला दिन, अछूतों के विकास के लिये क्या क्या करणीय है उसकी रूपरेखा सम्मेलन में रखी गई। रात में नेताओं ने फैसला किया कि अगले दिन चवदार तालाब अभियान चलाया जायगा। समाज सुधार को लक्ष्य रखते हुए, मानवाधिकार की मांग पर, तालाब का पानी छूने का यह अभियान शांतिपूर्ण होगा। योजना के अनुसार दस हजार लोगों के जुलूस को नेतृत्व देते हुए डा. अम्बेदकर चवदार तालाव गये और उन्होने खुद ही सबसे पहले पानी को छूआ और पिया। कहा जाता है कि इस अभियान के बाद ही उन्हे ‘बाबासाहब’ की उपाधि से भूषित किया गया।

चवदार तालाब अभियान अंत तक शांतिपूर्ण नहीं था। सम्मेलन के अंत में जब कई लोग घर के रास्ते पर निकल पड़े हैं, कई वहीं लेट कर आराम कर रहे हैं, सम्मेलन स्थल पर गुंडों का हमला हुआ। बेरहमी के साथ प्रतिनिधियों को पीटा गया। खबर मिलते ही दौड़ आये अम्बेदकर। आहतों के लिये चिकित्सा की व्यवस्था किये। तब तक अछूत समाज के भूतपूर्व सेना कर्मचारी जमा हो गये। उनकी आंखें आग बरसा रही थीं – नेताओं से उन्होने पलट कर हमला करने के लिये अनुमति मांगी। किसी तरह अम्बेदकर ने उन्हे शांत किया नहीं तो महाड़ एक नया कुरुक्षेत्र बनने से बच गया। हालांकि, तीन महीने के अंदर कानून के रास्ते पांच हमलावरों सजा मिलने से दलितों का मनोबल काफी हद तक लौट आया।

अछूतों के छूने से चवदार तालाब का पानी कट्टर हिन्दुओं के कथनानुसार अपवित्र हो गया था, इसलिये उन्होने जल्दी से वीरेश्वर के मंदिर में सभा किया। एक सौ आठ घड़ा पानी में गोबर और गोमुत्र फेंट कर, मंत्रपाठ करते हुये तालाब के पानी में उड़ेल दिया और यह सोच कर संतुष्ट हुआ कि तालाब का पानी शुद्ध हो गया है! इन दिनों वर्णव्यवस्था मानने वाले अखबारों का जबर्दस्त हमला चला डा. अम्बेदकर पर। लोकमान्य तिलक जैसे नेता भी उनकी ही आलोचना करते रहे। मजबूर हो कर, अपना वक्तव्य रखने के लिये डा. अम्बेदकर ने सन 1927 के 3 अप्रैल से ‘बहिष्कृत भारत’ के नाम से एक मराठी साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू किया। इसी पत्रिका में तिलक का जवाब देते हुए उन्होने लिखा था, तिलक अगर अछूत समाज में जन्म लेते, तो ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ के बदले नारा लगाते, ‘छुआछूत के खिलाफ जिहाद मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’। मनुवादियों के पाखंड का चित्र खींच कर उन्होने लिखा, जो दक्षिण अफ्रिका और ब्रिटेन में भारतीयों के साथ होते द्वेष-मूलक आचरण की निंदा करते हैं, लेकिन इस देश में छुआछूत का समर्थन करते हैं, वे पाखंडी और धोखेबाज हैं। ‘बहिष्कृत भारत’ में अछूतों को उन्होने ओजस्वी भाषा में आह्वान किया, हरण किया गया अधिकार भीख में नहीं मिलता है, अविराम संघर्ष से ही उसे अर्जित करना पड़ता है। कायरता मिटाने के लिये उन्होने कहा, याद रखना, देवता को बकरे के बच्चे की ही बलि चढ़ाई जाती है, शेर के बच्चे की नहीं।

इस तरह, अछूतों को बराबरी का अधिकार अर्जित कराने के रास्ते से डा. अम्बेदकर जब भारतीय समाज को मनुवादी व्यवस्था से निकालने का प्रयास कर रहे थे, महाड़ का नगर निगम अचानक वर्ष 1926 का फैसला वापस ले कर घोषित किया, चवदार तालाब का पानी फिर से अछूतों के लिये निषिद्ध किया जाता है। इसके प्रतिक्रिया में अछूतों ने भी बम्बई में सभा बुला कर फैसला लिया, सरकारी तालाब का पानी पीने का अधिकार पुन: प्राप्त करने के लिये वर्ष 1927 के 25 और 26 दिसम्बर को महाड़ में दूसरी बार सत्याग्रह आन्दोलन किया जाएगा। सरकार अगर सत्याग्रह पर पाबंदी लगाती है, जेल भेजे जाने की परवाह न करते हुये ही वे सत्याग्रह करेंगे।

प्रशासनिक बाधा और हजारों प्रतिकूलताओं को लांघने तथा एक सहृदय मुसलमान व्यक्ति की जमीन पर पंडाल लगाने की इजाजत हासिल करने के उपरांत 25 दिसम्बर को नियत समय पर सम्मेलन शुरू हुआ। 15,000 प्रतिनिधि उपस्थित थे। उद्घाटन भाषण डा. अम्बेदकर ने दिया। सम्मेलन में मानवाधिकार की प्रतिष्ठा करने एवं हिन्दु समाज को वर्णभेद-शून्य करने से संबंधित प्रस्ताव लिये गए। सबसे अधिक उल्लेखनीय रहा वर्णभेद का विधिशास्त्र मनुसंहिता के दाह का फैसला। असमानता और भेदभाव का संदेश देनेवाले इस ग्रंथ को उसी दिन जला कर समाज को नया संदेश दिया गया। अगले दिन चवदार तालाब के अभियान का कार्यक्रम था। फिर भी, अम्बेदकर के सलाह के अनुसार, अदालत की तात्कालिक पाबंदी को मानते हुये पानी स्पर्श नहीं किया गया, सिर्फ तालाब की परिक्रमा कर लौट आया गया।

इसके बाद 28 दिसम्बर को बाबासाहब ने 3,000 अछूत महिलाओं के समावेश में भाग लिया। वहां उन्होने महिलाओं को जीवन के नये बोध एवं नये आचार-आचरण की दीक्षा लेने का आह्वान किया। उन्होने कहा, आप खुद को छोटा नहीं समझेंगी, किसी रोक-टोक की बिना परवाह किये सवर्ण महिलाओं के तरीके से ही कपड़े पहनेंगी, साफ-सुथरा रहेंगी, बच्चों को स्कूल भेजेंगी। और अगर आपका पति या बेटा शराब पिये, उन्हे भात पका कर खिलायेंगी नहीं। बाबासाहब के ये क्रांतिकारी बोल उस दिन अंत्यज स्त्रीओं को जीवन के नये बोध से लैस किये थे।

छुआछूत के विरुद्ध अभियान के बाद डा. अम्बेदकर भूदास प्रथा के अंत कराने के लिये सक्रिय हुये। पुराने जमाने से ही थोड़ी सी जमीन के बदले महारों को भूदास बनाये रखने की एक प्रथा चल रही थी। सन 1874 में ब्रिटिशों ने उसे कानून में परिवर्तित किया। मराठी भाषा में इसे ‘महार वतनदार’ प्रथा कहा जाता था। वतनदारों के कुछेक बड़े समावेशों के द्वारा डा. अम्बेदकर ने पहले ही उन्हे सचेत करने का काम शुरू कर दिया था। 1928 के 3 अगस्त को उन्होने बम्बई विधान सभा में इस प्रथा के अंत के लिये एक विधेयक पेश किया। उस विधेयक में भूदास प्रथा का अंत कर जमीन की मिल्कियत संबंधित महार परिवारों को देने का प्रस्ताव था। लेकिन निहित स्वार्थ वाले लोगों ने विधेयक को पारित होने नहीं दिया। मजबूर होकर डा. अम्बेदकर को अगले साल विधेयक वापस लेना पड़ा।

वतनदार के अलावे किसानों का शोषण करनेवाली और एक व्यवस्था समाज में मौजूद थी, ‘खोती व्यवस्था’। इस प्रथा के अंत के लिये भी डा. अम्बेदकर ने राज्य के विभिन्न जिलों में सभायें की थीं। जागरुकता बढ़ाने के प्रयास किये थे। दुख की बात है, इस उद्देश्य में भी वह सफल नहीं हो पाए।

श्रमिकों की समस्याओं को ले कर भी डा. अम्बेदकर सक्रिय हुये थे। लेकिन कम्युनिस्ट नेतृत्व के साथ शुरू में ही उनका मतभेद हो गया। बम्बई के सूताकलों में इन दिनों मजदूरों का आन्दोलन तीव्र हो उठा था। पहले चरण में छह महीने हड़ताल चली थी। ट्रेड युनियन के नेताओं ने 1929 के 26 अप्रैल से हड़ताल के दूसरे चरण का आह्वान किया। मुख्य तौर पर, कुछेक हड़ताली मजदूरों की छँटनी के विरोध में ही थी यह हड़ताल। डा. अम्बेदकर ने मांगपत्र में अछूत मजदूरों की समस्याओं – जैसे कैंटीन में सभी का प्रवेशाधिकार, सभी विभाग में अछूतों की नियुक्ति, एक ही बर्तन से पानी पीने का अधिकार, दूसरों की तरह प्रोन्नति के अवसर आदि – को शामिल करने की मांग रखी। नेतृत्व इन बिंदुओं पर उनसे सहमत नहीं हो पाई। डा. अम्बेदकर ने भी उनके नेतृत्व में आंदोलन पर जाने से इंकार किया। गिरनी कामगार युनियन के विरोध में “द टेक्सटाइल लेबर युनियन’ द्वारा बुलाई गई सभा में अध्यक्षता करते हुए उन्होने घोषणा की कि मजदूरों में भेदभाव को जीवित रखना और उनकी समस्या का समाधान करने के बजाय राजनीतिक स्वार्थ चरितार्थ करना ही उनका [गिरनी कामगार युनियन के नेताओं का – अनु.] मुख्य उद्देश्य है और इसीलिये यह हड़ताल समर्थन करने लायक नहीं है। और, इस तरह मजदूरों का आंदोलन दो भागों में बंट गया।

सन 1929 में बम्बई प्रेसिडेंसी के आदिवासी व अछूतों की शिक्षा, आर्थिक व सामाजिक स्थिति की समीक्षा के लिये ‘स्टार्ट कमिशन” के नाम से एक कमीशन गठित किया गया। डा. अम्बेदकर उस कमीशन के सदस्य मनोनीत किये गए। सदस्य के तौर पर जिलों में जा कर कई प्रकार से वह अपमानित हुए। कई स्कूलों में उन्हे घुसने ही नहीं दिया गया। चालिसगाँव नाम की एक जगह पर तो तांगावाले ने उन्हे तांगे पर लेने से ही इंकार किया। अंतत: समाधान निकाला गया कि तांगे को एक अछूत व्यक्ति हांक कर ले जायेगा। मालिक के बाद अब तांगे के घोड़े की बारी थी बगावत करने की। नये गाड़ीवान का आदेश मानने से इंकार कर वह इस कदर उछल पड़ा कि दर्दनाक तरीके से डा. अम्बेदकर गाड़ी से दूर फेंका गये और उनके पैर की हड्डी टूट गई। लगभग तीन महीना उनको घर में ही बंद रहना पड़ा। यह टूटा पैर ही उन्हे अंतिम जीवनकाल में लगभग अचल और असमर्थ बना दिया था। उनकी असामयिक मृत्यु को त्वरित किया था।

जीवन के इस चरण में डा. अम्बेदकर अछूतों के मंदिर-प्रवेश के अधिकार को लेकर आन्दोलन में भी शामिल थे। पुणे का पार्वती मंदिर, नासिक का कलाराम मंदिर, अमरावती का अम्बादेवी मंदिर आदि के इर्द-गिर्द जो सत्याग्रह आंदोलन शुरु हुये थे, डा. अम्बेदकर उन आंदोलनों की मुल प्रेरक शक्ति थे। हालांकि, एक पड़ाव तक पहुंचने के बाद अपने अनुगामियों को उन्होने संदेश दे दिया था कि रामचंद्र से रोटीचंद्र काफी ज्यादा जरूरी है।

 

राजनैतिक अधिकार का संग्राम

भारत सरकार अधिनियम में संशोधन व उसकी पुनर्विवेचना के उद्देश्य से भारत में सन 1928 में जॉन साइमन के नेतृत्व में एक कमीशन आया। कांग्रेस ने भले ही इस कमीशन का विरोध किया हो, दलित समाज ने इसका स्वागत किया। दलितों के 18 संगठन साईमन कमीशन के सामने आये। उन्होने साक्ष्य प्रस्तुत किया और मांगपत्र पेश किया। इनमें से 16 संगठनों की मांग थी कि अंत्यजों के लिये पृथक चुनावी व्यवस्था हो। डा. अम्बेदकर बम्बई प्रेसिडेन्सी विभाग के सदस्य मनोनीत हुए थे। कमीशन के काम में सहायता करने के कारण उन्हे ‘अंग्रेजों का जासूस’ तक कहा गया। जबकि यह यथार्थ था कि जो लोग अंत्यजों के अधिकार स्वीकारने को राजी नहीं थे, वे ही कमीशन के पास अंत्यजों का पहुंचना मान नहीं पाये। दलित भी इसके विपरीत, पृथक चुनावी व्यवस्था की मांग को मजबूती के साथ पकड़े रहे।

जबकि डा. अम्बेदकर ने अपनी “बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की ओर से साईमन कमीशन के पास ‘पृथक’ नहीं, ‘आरक्षित’ आसन पर संयुक्त चुनावी व्यवस्था की ही मांग रखी थी। वर्ष 1930 के मई महीने में कमीशन का रिपोर्ट प्रकाशित होने पर देखा गया कि कमीशन ने ‘आरक्षित’ आसन पर संयुक्त चुनावी व्यवस्था के पक्ष में ही अपनी राय दी है। हालांकि, हिन्दु और मुसलमान के लिये पृथक चुनावी व्यवस्था के पक्ष में ही उन्होने मुहर लगाई थी। केंद्रीय विधानसभा के 250 आसनों में से हिन्दुओं के लिये आबंटित हुए थे साठ प्रतिशत आसन। इस साठ प्रतिशत में ही अंत्यज वर्गों के लिये आरक्षित आसन भी थे। लेकिन एक आपत्तिजनक शर्त भी उसमें था। उसमें कहा गया था कि गवर्नर का प्रमाणपत्र नहीं प्राप्त होने पर दलित वर्ग का कोई प्रतिनिधि चुनाव में प्रतिभागी नहीं बन पायेगा। दलितों की ओर से प्रमाणपत्र वाले इस शर्त की निंदा नागपुर में अखिल भारतीय एक सम्मेलन आहुत कर की गई। उस सम्मेलन से ही डा. अम्बेदकर, ब्रिटिश सरकार आहुत लंदन के गोल-मेज बैठक के लिये दलित वर्ग के सर्वसम्मत प्रतिनिधि चुने गये। भारत में स्वायत्त शासन की मांग के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न समुदायों की हिस्सेदारी तथा सत्ता के बंटवारे से संबंधित मुद्दों पर परिस्थिति को भांपना ही ब्रिटिश सरकार के गोल-मेज बैठक का मुख्य उद्देश्य था। प्रतिनिधियों को भी ब्रिटिश सरकार ने खुद ही चुना था। बैठक का उद्घाटन सम्राट पंचम जॉर्ज ने किया, सभापतित्व प्रधानमंत्री मैकडोनल्ड ने किया। सन 1930 के 12 नवम्बर से सन 1931 के 19 जनवरी तक पहला गोल-मेज बैठक आयोजित हुआ। कांग्रेस ने इस बैठक का बहिष्कार किया था, फलस्वरूप उनका कोई प्रतिनिधि नहीं था। भारत के दलित समाज के प्रतिनिधि के रूप में थे डा. अम्बेदकर तथा रायबहादुर श्रीनिवासन। और थे मुसलिम लीग, भारत के कुछेक जनसमुदाय व राजघरानों के प्रतिनिधि एवं इंग्लैंड के तीन राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि। भारत के प्रतिनिधियों ने ब्रिटिश सरकार प्रस्तावित, स्वायत्त शासन पर आधारित भारतीय राज्यसंघ गठित करने के प्रस्ताव का समर्थन किया। 

पहली बैठक में डा. अम्बेदकर के वक्तव्य को ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया। सिर्फ राजनीतिक हलकों में नहीं, ब्रिटिश पत्र-पत्रिकाओं में भी उन्ही का वक्तव्य अधिक से अधिक प्रचारित होता रहा। उनके वक्तव्य में भारत पर डेढ़ सौ वर्षों के ब्रिटिश शासन की तीव्र आलोचना थी जरूर, लेकिन उस आलोचना की मुख्य धार थी कि इस ब्रिटिश शासन ने, घृणा और छुआछूत से दलित समाज की मुक्ति और उनके विकास के लिये कुछ भी खास नहीं किया, बल्कि यह शासन खामोशी के साथ निहित स्वार्थों के संरक्षक की भूमिका निभाते रहा है। भारत के स्वायत्त शासन की मांग का जोरदार समर्थन करते हुए उन्होने कहा अछूतों की समस्या के समाधान के लिये बेशक उनके हाथों में राजनीतिक शक्ति दी जाय। बननेवाले संविधान में अछूतों के लिये स्वतंत्र व्यवस्था रखी जाय। गोल-मेज बैठक के आयोजकों ने डा. अम्बेदकर के वक्तव्य को विशेष महत्व दिया था। बाद में बनी नौ सबकमिटियों में से आठ में उनको शामिल किया जाना उसका प्रमाण है। इसी बैठक के माध्यम से ब्रिटिश पार्लियामेंट और पूरी दुनिया यह सच्चाई जान पाई कि भारत के अछूतों की स्थिति अमरीका के निग्रो समुदाय से भी बुरी है।

दूसरी गोल-मेज बैठक आयोजित हुई सन 1931 के 7 सितम्बर को। इस बार कांग्रेस और गांधीजी अपनी शुरुआती समझ से हट आये और बैठक में हिस्सा लेने का फैसला लिये। लेकिन लंदन जाने से पहले डा. अम्बेदकर का मनोभाव समझने के लिये गांधीजी उनसे मिलने की इच्छा जताए। यह मुलाकात हुई गांधीजी के आवास में, दिनांक 14 अगस्त 1931 को। अगले ही दिन डा. अम्बेदकर लंदन जानेवाले जहाज पर चढ़े। गांधीजी पहुंचे बैठक शुरू होने के पांच दिन बाद। 15 सितम्बर को फेडरल स्ट्रक्चर कमिटी में पहला वक्तव्य रखते वक्त अजीब तरीके से उन्होने खुद को पेश किया।

गांधीजी ने दावा किया कि कांग्रेस के वर्किंग कमिटी में मुसलमान हैं, एक समय प्रेसिडेंट भी मुसलमान थे, महिलायें भी कांग्रेस के प्रेसिडेंट थीं, छुआछूत खत्म करने का काम कांग्रेस चलाये जा रहा है, इसीलिये इन सभी तबकों का एवं पूरे भारत का एकमात्र प्रतिनिधि संस्था है कांग्रेस। और उस कांग्रेस के चुने गये प्रतिनिधि के रूप में वही, यानि गांधीजी पूरे भारत के एकमात्र स्वीकृत प्रतिनिधि हैं। और किसी को प्रतिनिधित्व का अधिकार नहीं है। गांधीजी की इस हमलावर समझ का माकूल जवाब देते हुए डा. अम्बेदकर ने कहा कि एकमात्र प्रतिनिधि होने का दावा जो व्यक्ति कर रहे है, उन्हे मालूम होना चाहिए कि वह भी यहां निर्वाचित हो कर नहीं, दूसरों की तरह सरकार द्वारा मनोनीत किये गये सदस्य के रूप में आये हैं।

दर असल, अल्पसंख्यक सबकमिटी की सभा में डा. अम्बेदकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि प्रतिनिधित्व का अधिकार एवं राजनीतिक सशक्तिकरण के मुद्दे पर दूसरे तबकों को गांधीजी भले ही मान लें, दलित, अंत्यज समाज को कभी भी नहीं मानेंगे। गांधीजी ने कहा कि नई स्वायत्त शासन की व्यवस्था के अन्तर्गत केन्द्रीय सरकार में विभिन्न समुदाय से प्रतिनिधित्व के सवाल पर कांग्रेस की स्वीकृति मुसलमानों और सिखों तक सीमित थी, उसके अतिरिक्त किसी समुदाय के प्रतिनिधि को कांग्रेस स्वीकृति नहीं देगी। अपने फैसले की दृढ़ता समझाने के लिए उन्होने और भी कहा कि अछूत अगर इसलाम या ईसाईयत में धर्मांतरित हो जाएं उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है, मैं सह लूंगा लेकिन हिंदुओं का दो भागों में बंटवारा मैं कभी भी नहीं मानुंगा। उन्होने दावा किया कि डा. अम्बेदकर अछूतों के प्रतिनिधि नहीं हैं, उनके पीछे उस जनसमुदाय का कोई समर्थन नहीं है।

अखबारों के माध्यम से गांधीजी का नजरिया जानने के बाद भारत के विभिन्न प्रांत से सैंकड़ों की संख्या में टेलिग्राम लंदन पहुंचने लगे। उन टेलिग्रामों के माध्यम से दलित नेताओं ने कहा कि डा. अम्बेदकर उन्ही के प्रतिनिधि हैं तथा अम्बेदकर के सारे वक्तव्य और मांगों का वह समर्थन करते हैं। इस पर भी हार न मान कर गांधीजी ने मुसलिम लीग के नेताओं से अनुरोध किया कि व अम्बेदकर का समर्थन न करें। लंदन से लौटने के बाद बम्बई के परेल में जब उनके लिये एक अभिनंदन समारोह किया गया, वहां डा. अम्बेदकर ने दावा किया कि गांधीजी ने मुसलमान नेताओं को यहां तक कहा था कि अगर वे अछूतों की मांगों के विरोध में रहेंगे तो मुसलिम लीग की चौदह सुत्री मांगें, जो पहले मानी नहीं गई थी, पुरस्कार के तौर पर अब मान ली जायेगी। लेकिन गांधीजी की सारी कोशिशें बेकार गईं।

माइनॉरिटी सब-कमिटी के काम में गतिरोध की स्थिति में ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने प्रस्ताव रखा कि उन्हे सारी स्थितियों की गहराई से जांच कर अंतिम फैसला लेने का अधिकार दिया जाय। अधिकार देने से संबंधित अर्पण-पत्र पर गांधीजी सहित सब-कमिटी के सभी सदस्यों ने हस्ताक्षर किया, लेकिन डा. अम्बेदकर ने नहीं किया। उन्होने कहा, दलितों ने अपना हित देखने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी है, मैं उस जिम्मेदारी को ब्रिटिश प्रधानमंत्री के हाथों नहीं सौंप सकता हूं।

सन 1932 के 15 अगस्त को ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने जब भारत के स्वायत्त शासन में विभिन्न समुदाय के अधिकारों की घोषणा की, देखा गया कि मुसलमान, ईसाई, सिख, यूरोपीय समुदायों के साथ साथ दलित समुदायों के लिये भी विधान सभा में पृथक निर्वाचन की व्यवस्था को स्वीकृति मिली है। गांधीजी इसके लिये तैयार नहीं थे। उन दिनों वह यरवदा कारागार में थे। वहीं से उन्होने दलित वर्ग के विशेष अधिकार के खिलाफ आमरण अनशन की घोषणा की।

गांधीजी का अनशन पूरे भारत को हिला दिया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर भी अधीर हो कर टेलिग्राम किये। डा. अम्बेदकर का वक्तव्य था, ‘अगर मुसलमान, सिख, एंग्लोइंडियन आदि के लिये पृथक निर्वाचन की व्यवस्था से देश व राष्ट्र के टुकड़ों में बंटने की आशंका नहीं होती है, तो अछूतों के लिये पृथक निर्वाचन की व्यवस्था से हिंदु समाज भी टुकड़ों में नहीं बंटेगा’। जिनका कुंआ अलग है, रास्ता अलग है, श्मशान तक अलग है, वे अलग नहीं हैं? फिर भी, कई किस्म के दबाव के कारण उन्हे अपनी समझ से पीछे हटना पड़ा। गांधीजी ने भी अपनी कठोर समझ से थोड़ा पीछे हटने का संकेत दिया। इस तरह तैयार हुआ पुणे समझौता (पुना-पैक्ट) का परिप्रेक्ष्य।

सन 1932 के 24 सितम्बर को, गांधीजी के अनशन के पांचवें दिन, पुणे-समझौता पर हस्ताक्षर हुआ। अछूतों के लिये पृथक निर्वाचन व्यवस्था के बदले सामूहिक निर्वाचन व्यवस्था ही लागू होगी; गांधीजी का जीवन बचाने के लिये आखिर में डा. अम्बेदकर ने यह प्रस्ताव मान लिया। स्वतंत्र रूप से अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार खो कर, हर्जाने के तौर पर, लम्बी खींचतान के बाद यह फैसला मान लिया गया कि प्रांतीय विधान सभाओं में 71 के बजाय 148 आसन आरक्षित होंगे और केन्द्रीय विधान सभा में हिंदुओं के हिस्से का 10 प्रतिशत आसन अछूतों के लिये आबंटित रहेगा। समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद कस्तुरबादेवी के हाथों नारंगी का रस पी कर गांधीजी ने अनशन भंग किया। ब्रिटिश सरकार ने भी वादा किया कि वह पुणे-समझौता मान लेगा। हालांकि, कुछ ही दिनों के व्यवधान में परिलक्षित होगा कि पुणे-समझौता के विरुद्ध विभिन्न प्रांतों के दलित नेतृत्व अपना क्षोभ व्यक्त करने लगे।

तीसरा गोल-मेज बैठक संपन्न हुआ उसी साल, नवम्बर और दिसम्बर में। डा. अम्बेदकर पहले की बैठकों की तरह इस बैठक में भी हिस्सा लिये। पिछ्ली दो बैठकों की तुलना में यह वाली महत्वहीन थी। बैठक से घोषणा की गई कि सभी वयस्कों के लिये वोट प्रदान का अधिकार अभी यथार्थ से मेल नहीं खायेगा। लेकिन महिलाओं के एक हिस्से को वोट का अधिकार देने और अछूत सहित सामान्य वर्गों के अधिकाधिक लोगों को वोटर-सूची में शामिल किये जाने के फैसले लिए गये।

वर्ष 1933 के जनवरी महीने के अंत में डा. अम्बेदकर के लंदन से लौट आने पर यरवदा जेल से गांधीजी ने टेलिग्राम से संदेश भेजा कि वह अम्बेदकर से मिलना चाहते हैं। 4 फरवरी को दोनों की भेंट हुई। पूरे देश में उन दिनों अछूतों के मंदिर प्रवेश के अधिकार को ले कर उथल पुथल चल रहा था। गांधीजी ने अम्बेदकर से अनुरोध किया कि वह डा. सुब्बारायन विधेयक तथा रंगालियर विधेयक का समर्थन करें। डा. अम्बेदकर इंकार किये। उन्होने कारण बताया कि उस विधेयक में अछूतों के मंदिर में प्रवेश के अधिकार की बात जरूर कही गई है, पर पूजा देने का अधिकार नहीं दिया गया है। विधेयक में छुआछूत को पाप कहकर निंदा भी नहीं किया गया है। गांधीजी छुआछूत खत्म करना चाहते हैं लेकिन चाहते हैं कि वर्णव्यवस्था रहे। जबकि अम्बेदकर उस वर्णव्यवस्था को ध्वस्त करना चाहते हैं, इसलिये दोनों में मतैक्य नहीं हो सकता है। बातचीत विफल होती है।

सन 1933 के जुलाई व अक्तुबर महीने में लॉर्ड लिनलिथगो की अध्यक्षता में बनी इंडियन कॉन्स्टिट्युशनल रिफॉर्म सम्बन्धित जॉइंट पार्लियामेंटरी कमिटी के कुछ महत्वपूर्ण कामों के सिलसिले में डा. अम्बेदकर को फिर लंदन जाना पड़ा। उस समय श्वेतपत्र में प्रस्तावित फेडरल व्यवस्था के बारे में प्रबल प्रतापी विंस्टन चर्चिल से उन्होने ऐसा जिरह शुरू किया कि चर्चिल मैदान से भाग कर अपना आत्मसम्मान बचाया।

डा. अम्बेदकर के जीवन में वर्ष 1935 कई कारणों से याद किये जाने लायक है। इसी वर्ष 27 मई को पत्नी रमाबाई चल बसीं। उनकी अंतिम यात्रा में दस हजार शोकाकुल लोगों ने हिस्सा लिया। जीवन की इस त्रासद घटना के कुछ दिनों बाद डा. अम्बेदकर ने बम्बई गवर्नमेंट लॉ कालेज का अध्यक्ष व पेरी प्रोफेसर ऑफ जुरिसप्रुडेंस का पद ग्रहण किया। वर्ष के अंत में, अस्पृश्यता की यंत्रणा से बिल्कुल ऊब चुके डा. अम्बेदकर ने धर्मांतरण का फैसला लिया। येवला सम्मेलन के मंच से जब उन्होने यह घोषणा किया तो देश में खलबली मची। भाषण में उन्होने कहा, जन्म से मैं अछूत हिंदु हूं। दुर्भाग्य से, जन्म मेरे इच्छा के अधीन नहीं था। लेकिन, इस असम्मान को लेकर मैं हिंदुधर्म में नहीं रहुंगा। स्पष्टता के साथ बोल रहा हूं, एक अछूत हिंदु के तौर पर मरुंगा नहीं। इस घोषणा के बाद कई धर्म के प्रतिनिधि आ कर उनसे भेंट करने लगे। उनके कुछेक घनिष्ठ सहयोगी के सिखधर्म ग्रहण करने पर और भी अधिक हलचल हुई।

भारत सरकार अधिनियम के अनुसार संभावित चुनाव में हिस्सा लेने के लिये वर्ष 1936 के 15 अगस्त को डा. अम्बेदकर ने स्वतंत्र श्रमिक दल (इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी) का गठन किया। इसी साल लाहौर से जातपात तोड़क मंडल के सम्मेलन की अध्यक्षता का आमंत्रण मिलने पर ‘अनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ (जातपात का खात्मा) शीर्षक अपना वक्तव्य उन्होने लिख डाला। हालांकि कट्टर हिंदुओं के दबाव पर सम्मेलन के आयोजक पीछे हट गये। फलस्वरूप उनका लाहौर जाना नहीं हुआ, क्योंकि भाषण का बहुत सारा हिस्सा उनलोगों ने हटा देने का अनुरोध किया था; कट्टरपंथ के आगे डा. अम्बेदकर सर नहीं झुकाये। पुस्तक के रूप में प्रकाशित उस वक्तव्य का आज पूरी दुनिया में आदर किया जाता है।

वर्ष 1937 में चुनाव घोषित होने पर विधानसभा में प्रतिनिधि भेजने के उद्देश्य से, नवगठित स्वतंत्र श्रमिक दल के बैनर तले उन्होने राजनीतिक संग्राम में हिस्सा लिया। बम्बई प्रांतीय परिषद में कुल आरक्षित पद 15 थे। उन दिनों सार्वभौमिक मताधिकार लागू नहीं हुआ था। डा. अम्बेदकर को एक गठबंधन की आवश्यकता महसूस हुई। लगभग सभी को चौंका कर कट्टर ब्राह्मणवादी डेमोक्रैटिक स्वराज पार्टी के साथ डा. अम्बेदकर के स्वतंत्र लेबर पार्टी का गठबंधन बना। वस्तुत:, डेमोक्रैटिक स्वराज पार्टी के नेता, भूतपूर्व प्रांतीय कांग्रेस सभापति वोपटकर पहले से ही बाबासाहब के प्रशंसक थे। इस गठबंधन के कारण डा. अम्बेदकर की आलोचना बेशक हुई, पर गठबंधन का लाभ मिला। 17 आसनों पर प्रत्याशी खड़ा कर अम्बेदकर के लोगों ने 15 आसन पर जीत हासिल की। उनमें से 13 आरक्षित आसन थे। हालांकि पुणे क्षेत्र में वोपटकर खुद जीत हासिल नहीं कर पाये।

बम्बई में कांग्रेस की ही सरकार गठित हुई। शुरुआत में ही बाबासाहब ने, किसानों को भूदास बनाने वाली ‘खोती प्रथा’ के खात्मे की मांग पर, विधानसभा के भीतर और बाहर संघर्ष शुरू किया। जिलों में अनगिनत जनसभाएं की और किसानों को लेकर विधानसभा अभियान भी चलाया। किसानों के बाद, श्रमिकों के मुद्दों पर भी ध्यान देना शुरू किया। श्रमिकनेतागण अछूत श्रमिकों पर हो रहे अन्याय का कोई प्रतिकार नहीं कर रहे हैं इस आरोप पर, नासिक जिला के मनमाड में सन 1938 के 12 और 13 फरवरी को उन्होने अछूत रेलश्रमिकों का एक सम्मेलन का आह्वान किया। इस सम्मेलन में उन्होने घोषित किया कि मूलभूत तौर पर श्रमिकों के दो दुश्मन हैं, पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद। दोनों के खिलाफ श्रमिकों को संघर्ष करना होगा।

इस समय मध्य प्रदेश के नवनिर्वाचित कांग्रेस सरकार पर एक संकट गहराने लगा। अग्निभोज नाम के एक अछूत को क्यों मंत्रीमंडल में जगह दी गई है, इस सवाल पर मुख्यमंत्री (तब प्रधानमंत्री कहा जाता था) डा. खरे को इस्तीफा देना पड़ा। डा. खरे ने खुद एक खुले जनसभा में भंडाफोड़ कर दिया कि इसके पीछे गांधीजी का हाथ था। डा. अम्बेदकर के इस आरोप को और बल मिला कि गांधीजी का दलित-प्रेम भीतर से खोखला और दिखावटी है।

सन 1938 में बम्बई विधान परिषद में कांग्रेस की सरकार द्वारा औद्योगिक विवाद विधेयक पारित किया गया। इस कानून के आधार पर श्रमिकों के हड़ताल का अधिकार छीन लिया गया। इसके खिलाफ एकजुट लड़ाई के लिये अम्बेदकर ने श्रमिक नेताओं के साथ सम्पर्क स्थापित किया। स्वतंत्र श्रमिक दल, बीपीटीइयुसी सहित 60 श्रमिक संगठनों ने एक साथ 7 नवम्बर को औद्योगिक बंद का आह्वान किया। स्वतंत्र श्रमिक दल के विधायक व स्वेच्छासेवकों की भूमिका शानदार रही। सरकार द्वारा किये गये हर प्रकार के विरोध के बावजूद हड़ताल को जबर्दस्त सफलता मिली। हड़ताल की शाम कामगार मैदान में हुए विशाल श्रमिक समावेश के मंच पर यमुनादास मेहता, बी. टी. रणदीवे, एस. ए. डांगे आदि के साथ डा. अम्बेदकर भी अपना वक्तव्य रखे।

पूरी दुनिया में द्वितीय विश्वयुद्ध की रणभेरी बज उठी सन 1939 में। नाजी हमले से परेशान ब्रिटिश सरकार ने, भारतीयों का समर्थन प्राप्त करने के उद्देश्य से कुछेक कदम उठाये। वायसराय ने घोषणा की कि युद्ध के अंत में भारत को स्वायत्त शासन देने के मुद्दे पर कारगर भूमिका ग्रहण की जायेगी। ऐन मौके पर मुसलिम लीग के नेता, मुसलमानों के लिये अलग राष्ट्र गठित करने की मांग उठा दिये, कांग्रेस ने अपनी धारणा के अनुकूल अविभाजित भारत की मांग रखी। वायसराय से भेंट कर बाबासाहब ने, ब्रिटिशों के जाने के बाद के भारत में अछूत समाज के अधिकार सुरक्षित किये जाने की मांग रखी। उन्होने जनसंख्या में अनुपात आधार पर अछूतों को नौकरी देने का मामला उठाया। सन 1892 से सैन्यसेवा में महारों का प्रवेश प्रतिबंधित था। बाबासाहब के अनुरोध पर लॉर्ड लिनलिथगो ने उस आदेश को वापस लिया। फलस्वरूप, सैन्यसेवा में महारों को फिर से प्रवेश का अवसर प्राप्त हुआ।

सन 1941 में वायसराय ने अपना मंत्रीमंडल प्रसारित किया। एक रक्षा सलाहकार मंडली गठित की गई। डा. अम्बेदकर सलाहकार परिषद के सदस्य बनाये गये। लगभग एक साल के बाद, सन 1942 के 20 जुलाई को वायसराय ने अपने मंत्रीमंडल में पांच और लोगों को जोड़ा। इस बार डा. अम्बेदकर को भी जगह मिली; स्वतंत्र श्रमिक दल के नेता पर श्रम मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। चार साल श्रम मंत्री रहते हुये कुछ क्रांतिकारी कदम उठाये थे बाबासाहब। इनमें उल्लेखनीय था, श्रम-विवाद मिटाने के लिये जॉइंट लेबर मैनेजमेंट कमिटी का गठन, इम्प्लॉयमेंट एक्स्चेंज की स्थापना, श्रमिकों के लिये वेतन-सह-अवकाश की व्यवस्था, महिला कर्मचारियों के लिये मातृत्वकालीन अवकाश, हफ्ते में 48 घंटे काम का कानून। इसके साथ ही साथ, श्रमिकों के वेतन, शिक्षा, आवास स्वास्थ्य संबंधित विकास के लिये कमीशन का गठन, औद्योगिक अशांति को समाप्त करने के लिये शांति कमिटी की स्थापना, श्रम-विवाद कानून में संशोधन एवं न्यूनतम वेतन कानून के लिये उन्होने अनुशंसा किया।

श्रममंत्री के पद पर उनकी नियुक्ति के पहले ही सन 1842 के मार्च महीने में क्रिप्स मिशन भारत आई। क्रिप्स ने प्रस्ताव दिया कि युद्ध के बाद भारत को ‘डॉमिनियन स्टैटस’ दिया जायेगा और जनपरिषद का गठन किया जायेगा। इस मामले में मिशन ने कांग्रेस, मुसलिम लीग, हिंदु महासभा, सिखों के संगठन तथा रजवाड़ों के साथ बात की। दलित वर्गों की ओर से एम. सी. राजा तथा डा. अम्बेदकर ने 30 मार्च को क्रिप्स के साथ भेंट किया। बातचीत से वे समझ गये कि ब्रिटिश भारत को विभाजित करने के लिये तथा नया संविधान लिखने के लिये दृढ़संकल्प है, वहाँ दलित वर्गों के हितों की बात उसकी विवेचना में है ही नहीं। क्योंकि क्रिप्स डा. अम्बेदकर से ही सवाल कर बैठे, आप किनके प्रतिनिधि हैं, श्रमिकों के या अछूतों के? यह सवाल डा. अम्बेदकर की सोच में एक नया आलोड़न पैदा किया। उन्होने अपना कर्तव्य तय कर लिया।

बिना देर किये दिल्ली में अनुसूचित जाति के नेताओं को मामले की जानकारी दी गई। उसके बाद ही ‘अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन’ बनाने का खयाल उनके दिमाग में आया। सन 1942 के 19 व 20 जुलाई को नागपुर में पूरे भारत के अछूत समाज के लोगों का सम्मेलन आहुत किया गया। वहीं एन. शिवराजन को अध्यक्ष बना कर अनुसूचित जाति फेडरेशन गठित हुआ। फेडरेशन के नेता के तौर पर आगे बाबासाहब ने ब्रिटिश सरकार के सामने एक ‘त्रिपक्षीय समझौते का फॉर्मुला’ पेश कर कहा कि राष्ट्रीय कांग्रेस, मुसलिम लीग और अनुसूचित जाति फेडरेशन – इन तीन पक्षों की सहमति लेकर ही भारत में सत्ता-हस्तांतरण की व्यवस्था की जाय। इस वक्तव्य के समर्थन में वह भारत के विभिन्न प्रांतों में सफर कर जनमत बनाना शुरू किये। इस समय स्वतंत्र श्रमिक दल की जिम्मेदारी को किनारे कर, अनुसूचित जाति फेडरेशन को शक्तिशाली बनाने में ही उनका पूरा ध्यान लग गया।

सन 1944 के अगस्त और 1945 के जनवरी में वह संगठन बनाने के लिये कलकत्ता आये। दूसरी बार वाली यात्रा में एक बार वह रेल के ऊंचे अधिकारी डी. जी. यादव के घर पर शाम के निमंत्रण पर गये थे। तब भी वह भारत के श्रममंत्री थे, लेकिन कलकत्ता में भी उनके अछूत भाग्य में कोई बदलाव नहीं आया। अगले दिन सुबह को ही यादवजी के रसोइया और नौकरों ने यादवजी के घर पर काम करने से इंकार किया।

सन 1945 में बाबासाहब अम्बेदकर ने ‘पिपुल्स एडुकेशन सोसाइटी’ स्थापित किया। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य था कॉलेज, विद्यालय, छात्रावास व ग्रंथागारों की स्थापना के माध्यम से शिक्षा का प्रसार। एक साल के अन्दर बम्बई का प्रख्यात सिद्धार्थ कॉलेज का निर्माण कर सोसाइटी शिक्षा के क्षेत्र में नया ज्वार ले आया। सन 1945 के मई महीने में जर्मनी के आत्मसमर्पण के माध्यम से द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म हुआ। जुलाई महीने में ब्रिटेन के आम चुनाव में टोरी पार्टी बुरी तरह हारी; लेबर पार्टी सत्ता में आई। नया प्रधानमंत्री क्लेमेन्स ऐटली ने संकेत दिया कि भारत की पूरी आजादी की मांग मान ली जायेगी।

इस समय लंदन सफर से लौट कर वायसराय लॉर्ड वाभेल ने वर्ष 1946 की शुरुआत में आम चुनाव होने की घोषणा की। बहुत ही महत्वपूर्ण इस चुनाव में सभी राजनीतिक दल अपनी पूरी ताकत लगा कर कूद पड़े। बाबासाहब अम्बेदकर अंत्यज समाज को समझाने की कोशिश किये कि अगर चुनाव के माध्यम से वे राजनीतिक सत्ता को अपनी मुट्ठी में कर सकें, तभी वे मनुष्य के अधिकार के साथ जी पायेंगे, नहीं तो उन्हे गुलाम या पशुओं का जीवन यापन करना होगा। लेकिन उनके अथक प्रयासों के बावजूद सन 1946 के चुनाव में अनुसूचित जाति फेडरेशन को बहुत बुरे नतीजों का सामना करना पड़ा। बाबासाहब खुद भी हार गये। एक मात्र फेडरेशन के प्रांतीय सभापति योगेंद्रनाथ मंडल, पिरोजपुर-पटुआखाली क्षेत्र से चुने गये। आरक्षित आसनों का अधिकांश कांग्रेस के के कब्जे में चला गया।

निस्सन्देह, बाबासाहब अत्यंत हताश हुए। कांग्रेस और मुसलिम लीग के साथ साथ तीसरी ताकत के रूप में उभर पाने पर सह-नागरिक के दर्जे में रहते हुये दलितों के अधिकार अर्जित किये जायेंगे, मनुवाद के हटाये जाने पर जनतंत्र की स्थापना का मार्ग और सुगम होगा – ऐसा सपना उन्होने देखा था। खास तौर पर, संभावित जनपरिषद में इस लड़ाई को जारी रखने के लिये उनका रहना अत्यंत आवश्यक था। लेकिन चुनाव के बाद वह रास्ता अभी बंद हो गया।

भारत में चुनाव के कुछ दिनों बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऐटली ने, पूरी आजादी की प्रक्रिया से संबंधित खोजबीन के लिये सर स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक कमीशन को भारत भेजा। तीन क्यबिनेट मंत्रियों को लेकर बने इस कमीशन को भारतीय नेताओं के साथ बातचीत करनी थी। यह मिशन कैबिनेट मिशन के नाम से ख्यात हुआ। सभी रजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ उन्होने बातचीत की। तर्कसंगत होने के बावजूद राजनीतिक तौर पर अशक्त डा. अम्बेदकर एवं उनके साथी मास्टर तारा सिंह के वक्तव्यों को कैबिनेट मिशन ने तरजीह नहीं दी। मई महीने में अपनी राय देते हुये क्रिप्स मिशन ने कहा:

1-    भारत के प्रांतों को तीन भागों में विभाजित किया जायेगा;

2-    आसन्न स्वतंत्र भारत के संविधान की रचना के लिये एक जनपरिषद का गठन किया जायेगा; और

3-    एक अस्थाई अंतरिम सरकार का गठन किया जायेगा।

राष्ट्रीय कांग्रेस ने सब तरीके के इंतजाम किये ताकि बाबासाहब अम्बेदकर किसी भी तरह जनपरिषद में न आ पाएं। सर्दार बल्लभ भाई पटेल पूरा रोब दिखाते हुए घोषणा किये कि जनपरिषद में अम्बेदकर के प्रवेश के सारे रास्ते कांग्रेस ने बंद कर दिये हैं। जनपरिषद में पहुंचने के लिये मात्र पांच एम. एल. ए. के वोटों की जरूरत थी, लेकिन बम्बई या और कहीं भी, डा. अम्बेदकर का नाम प्रस्तावित करने वाला कोई नहीं मिला। सिर्फ बंगाल के फेडरेशन के अकेले प्रतिनिधि जुझारू नेता योगेन्द्रनाथ मंडल उम्मीद नहीं त्यागे। सर्दार पटेल की चुनौती वह स्वीकार किये। सौभाग्य की बात थी कि वह उस समय बंगाल के मंत्रीमंडल के महत्वपूर्ण सदस्य थे।

बाधाएं थीं प्रबल; एक एम. एल. ए. का अपहरण तक किया गया। मुसलिम लीग मंत्रीमंडल की तत्परता के कारण आखरी वक्त में उन्हे छुड़ाया भी गया। मतदान की तारिख (17 जुलाई 1946) खत्म होने पर देखा गया कि पूर्वी बंगाल के अनुसूचित जाति के एम. एल. ए. लोगों के कारण बाबासाहब अम्बेदकर सर्वाधिक मत प्राप्त कर जनपरिषद में निर्वाचित हुये हैं। भले ही उस दिन राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं को बहुत निराशा झेलनी पड़ी हो, जल्द ही वे समझ गये, जनपरिषद में डा. अम्बेदकर की उपस्थिति कितनी जरूरी थी।

सन 1947 के 20 जून को बंगाल के विधानसभा में मतदान के फलस्वरूप बंगाल का विभाजन सुनिश्चित होने के बाद पूर्वी बंगाल भारत से बाहर चला गया। फलस्वरूप अम्बेदकर को जनपरिषद की सदस्यता खोनी पड़ी। लेकिन इस बार कांग्रेस ने अपने ही प्रयास से बाबासाहब अम्बेदकर को बम्बई से जितवाया। संविधान रचना कमिटी (ड्राफ्टिंग कमिटी) का अध्यक्ष बना कर अपनी पुरानी गलती का प्रायश्चित्त किया। सिर्फ यही नहीं, नेहरू  उनको मंत्रीमंडल में ले आये, विधि मंत्रालय की बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी।

संविधान रचना कमिटी में सात सदस्य थे, लेकिन अम्बेदकर को लगभग अकेले ही सारे काम सम्हालने पड़ते थे। सात हजार से अधिक संशोधन जमा किये गये जिनमें से 2473 संशोधन चर्चा के लिये स्वीकृत हुये। सारे बहस, व्याख्या और विश्लेषण में उन्हे हिस्सा लेने पड़े। उसके बाद भी मात्र दो वर्ष इग्यारह महीने और सत्रह दिनों में संविधान की रचना पूरी की गई। राष्ट्र के नाम संविधान को उत्सर्ग करने से पहले, सन 1949 के 25 नवम्बर को जनपरिषद में खड़ा हो कर बाबासाहब अम्बेदकर पूरे राष्ट्र को आशु कर्तव्य के बारे में सचेत किये, “On January 26, 1950, we will have equality in politics and inequality in social and economic life. We must remove this contradiction at the earliest moment or else those who suffer from inequality will blow up the structure of political democracy.”

 

अंतिम चरण

डा. अम्बेदकर का पहले से ही गिरा हुआ स्वास्थ्य, संविधान संबंधित कामों के दबाव से और भी अधिक कमजोर हो चुका था। वस्तुत:, न उनकी परिचर्या के लिये कोई था, न उन्हे साहचर्य देने के लिये कोई था। कुछ दिनों पहले जब अस्पताल में इलाज चल रहा था, उनका परिचय सारस्वत ब्राह्मण समुदाय की डा. शारदा कबीर से हुआ था। बाबासाहब ने दूसरी शादी के बारे में फैसला किया और सन 1948 के 15 अप्रैल को शारदा कबीर के साथ उनका विवाह सम्पन्न हुआ। 

अंतरिम सरकार के नेहरू मंत्रीमंडल में काम करते हुए डा. अम्बेदकर को सबसे अधिक असहायता झेलनी पड़ी थी हिंदु कोड बिल पर काम करते समय। तीन साल के लम्बे प्रयास के बावजूद वह हिंदु कोड बिल पास कराने में व्यर्थ हुए। हिंदु स्त्रीओं के प्रति भेदभाव करती नीतियों का सुधार चाहते हुये उन्होने प्रस्ताव किया था कि –

1-    ऐसी व्यवस्था लागू हो कि हिंदुओं की एक ही अभिन्न विवाह प्रथा रहे और हर पुरुष की एक ही पत्नी रहे;

2-    हिंदु स्त्रीओं को पिता की सम्पत्ति में अधिकार और दत्तक ग्रहण का अधिकार दिया जाय;

3-    हिंदु स्त्रीओं को विवाह-विच्छेद और जरूरत हो तो नया दाम्पत्य संबंध स्थापित करने का अधिकार दिया जाय; एवं

4-    हिंदु समाज के नियमों को एक सूत्र में बांध कर, आवश्यक परिवर्तन साधित कर प्रगतिशील सोच-विचार के साथ सामंजस्य में लाया जाय।

लेकिन जनपरिषद के भीतर और बाहर हिंदु कोड बिल को जबर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ा। सन 1951 के सितम्बर महीने में प्रधानमंत्री नेहरू ने जब बिल को वापस लेने की बात की तो क्षुब्ध बाबासाहब ने 27 सितम्बर को मंत्रीमंडल से इस्तीफा देने का निर्णय किया।

प्रसंगवश जिक्र किया जाना चाहिए कि उस समय बाधाएं जरूर आई थीं लेकिन हिंदु कोड बिल की अलग अलग धाराएं बाद में संसद में स्वीकृत हो कर कानून बन चुकी हैं। यह बात बार बार प्रमाणित हो चुकी है कि समय से काफी आगे चलनेवाले बाबासाहब अम्बेदकर, आवश्यक सुधार के माध्यम से हिंदु समाज को आधुनिक और प्रगतिशील बनाना चाह रहे थे, मनुतंत्र से जनतंत्र में उत्तीर्ण करना चाह रहे थे।

कांग्रेस का साथ त्यागने के पश्चात डा. अम्बेदकर वर्ष 1952 में स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव में अनुसूचित जाति फेडरेशन के तरफ से प्रत्याशी बने लेकिन दुर्भाग्यवश कांग्रेस के एक अत्यंत मामुली प्रत्याशी ने उनको पराजित करा दिया। हालांकि कुछ दिनों के अंदर अपने सहयोद्धाओं के प्रयास से बम्बई विधानसभा से निर्वाचित हो कर वह फिर से संसदीय राजनीति में लौट आये। उसी साल जून महीने में अमरीका के कोलंबिया विश्वविद्यालय की ओर से उन्हे मानद डाक्टरेट की डिग्री तथा ‘भारत के श्रेष्ठतम नागरिकों में एक, सुविख्यात समाज सुधारक एवं मानवीय मूल्यबोध के प्रवक्ता’ की उपाधि से भूषित किया गया। उसी तरीके से 1953 में हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय की ओर से उन्हे मानद डि-लिट उपाधि दी गई।

वर्ष 1954 में संसद में प्रवेश की क्षीण आशा के साथ बाबासाहब भंडारा लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव में प्रत्याशी बने लेकिन इस बार भी नतीजे उन्हे निराश किये। यह एक त्रासदी है कि सर्वाधिक योग्य व्यक्ति हो कर भी निर्वाचकों का आवश्यक समर्थन उन्हे नहीं मिला। उन्हे इस बात के लिये क्षोभ की सीमा नहीं थी कि गांधीजी का सूत्र मान लेने के चलते हुये पुणे-समझौते की संयुक्त निर्वाचन विधि बार बार उनके रास्ते में कांटे बिछाती रही।

हिंदु समाज की जड़ता तोड़ने में असमर्थ हो कर अंतत: उस जड़ता से बाहर निकलने का निर्णय लिये डा. अम्बेदकर। सन 1953 में, दिल्ली में आयोजित भारत-जापान सांस्कृतिक संस्था की एक सभा में उन्होने कहा, ‘मैं इस फैसले तक पहुंचा हूं कि आज या कल की पीढ़ी को निश्चय ही गौतम बुद्ध या कार्ल मार्क्स – इन दोनों की विचारधाराओं में से किसी एक को ग्रहण करना पड़ेगा।’ अंतत: बुद्ध के ही मार्ग को चुन लेंगे यह सोच कर वर्ष 1954 में वह रंगून में आयोजित तृतीय विश्व-बौद्ध सम्मेलन में हिस्सा लिये। भाषण के शुरू में वह काफी उदास दिख रहे थे और आंखों से आंसू प्रवाहित हो रहे थे। प्रसंगवश वहीं उन्होने भारत के राष्ट्रीय ध्वज में अशोकचक्र का प्रतीक जोड़े जाने में उनकी भूमिका की जानकारी दी।

1955 की शुरुआत में बाबासाहब ने घोषणा किया कि 1956 के मई महीने में औपचारिक तौर पर वह बौद्ध धर्म ग्रहण करेंगे। इन दिनों उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था। दिन खत्म हो रहे हैं जान कर, अधूरे कामों को पूरा करने के लिये वह और भी अधिक श्रम करने लगे। सन 1956 की शुरुआत में ही उन्होने ‘बुद्ध एवं उनका धम्म’, ‘प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति’, ‘बुद्ध एवं मार्क्स’ आदि ग्रंथों की रचना का काम पूरा कर लिया।

दलित समाज के अधिकार एवं उनकी सुरक्षा का कवच सुनिश्चित करने के लिये एक दिन वह स्वतंत्र श्रमिक दल से हट कर अनुसूचित जाति फेडरेशन गठित किये थे। कार्य पूरा हो जाने पर वह उस संगठन को तोड़ कर उन्होने सन 1956 के 23 सितम्बर को ‘रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया’ बनाया। कार्यक्रम के मसौदे में घोषित हुआ कि ‘समाजवाद’ ही पार्टी का लक्ष्य है। इसके तीन सप्ताह के बाद, 14 अक्तूबर 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि में तीन लाख अनुगामियों के साथ बाबासाहब अम्बेदकर बौद्ध धर्म में दीक्षित हुये। अगले दिन और भी एक लाख से अधिक लोग उनसे दीक्षित हुए। भाषण में उन्होने कहा, ‘बौद्ध विचारधारा भारतीय संस्कृति का अंगीभूत है। मैं बहुत सचेत था कि मेरा धर्मांतरण कहीं भारतीय संस्कृति व इतिहास की धारा को क्षति नहीं पहुंचाये।‘

15 नवम्बर को अत्यधिक अस्वस्थ्यता के बावजूद वह नेपाल के काठमान्डु में विश्व बौद्ध सम्मेलन में हिस्सा लिये। वहां उनका आलोच्य विषय था बुद्ध और मार्क्स। 30 नवम्बर को वह भारत लौट आये। उसके सिर्फ छे दिनों के बाद 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली स्थित अपने निवास में, भारत में समता, स्वतंत्रता, भाईचारा की प्रतिष्ठा के अनेकों संघर्ष अधूरा छोड़ कर इस महाजीवन का महानिर्वाण हुआ।

 23 May 2025 


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