Wednesday, January 19, 2022

आचार्य जगदीश चन्द्र बोस

वनचंडाल का नृत्य

 

वनचंडाल के पेड़ पर प्रयोग कर उद्भिदों की स्पन्दनशीलता अनायास ही देखी जा सकती है । इसके छोटे छोटे पत्ते खुद व खुद नृत्य करते रहते हैं । लोग मानते हैं कि हाथों से चुटकी बजाने पर ही नृत्य शुरू होता है । पेड़ों में संगीत का बोध होता है या नहीं यह तो मैं बता नहीं पाऊंगा, लेकिन वनचंडाल के नृत्य के साथ चुटकी का कोई सम्बन्ध नहीं है । तरुस्पन्दन के उत्तरों का वर्णमाला पढ़ कर यह निश्चित तौर पर कह पा रहा हूँ कि पशु एवं उद्भिद के स्पन्दन एक ही नियमों से निर्देशित होते हैं ।

                        

पहली बात यह है कि प्रयोग की सुविधा के लिये वनचंडाल के पत्ते को छेदने से स्पन्दनक्रिया बन्द हो जाता है । लेकिन नली के द्वारा उसमें रस का दवाब देने पर स्पन्दन की क्रिया पुन: शुरू होती है एवं अनवरत चलती रहती है । उसके बाद यह भी परिलक्षित होता है कि ताप से स्पन्दनों की संख्या में वृद्धि होती है और ठंढक से स्पन्दन धीमी होती है । ईथर के इस्तेमाल से स्पन्दनक्रिया थम जाती है, लेकिन हवा करने पर बेहोशी की हालत खत्म होती है । क्लोरोफॉर्म का प्रभाव खतरनाक होता है । सबसे अधिक आश्चर्य की बात है कि जिस जहर से और जिस प्रकार स्पन्दनशील हृदय नि:स्पन्द होता है उसी जहर से उसी प्रकार उद्भिद का स्पन्दन भी निरस्त होता है । उद्भिद में भी एक जहर से दूसरे जहर को काटने में मैं सफल हुआ हूँ ।

 

 

तार के बिना खबर

 

अदृश्य आलोक ईंट-सुरकी, घर-मकान भेद कर अनायास ही चला जाता है । अत: इसके सहारे तार के बिना खबरें भी भेजी जा सकती हैं । सन 1895 में कलकत्ता के टाउनहॉल में इस वारे में मैंने कई प्रकार के प्रयोग प्रदर्शित किये थे । बंगाल के लेफ्टेनैंट गवर्नर सर विलियम मैकेंजी वहाँ मौजूद थे । वेतार के विद्युत्तरंग उनका विशालकाय देह तथा दो बन्द कमरों को भेद कर तीसरे कमरे में पहुँच कर कई प्रकार के हंगामे किये थे । लोहे के एक गोले को उन तरंगों ने फेंक दिया, एक पिस्तौल चलाया एवं बारूद के ढेर को उड़ा दिया । सन 1907 में मार्कनी ने बिना तार के खबर भेजने का पेटेन्ट लिया । उनकी अद्भुत तपस्या एवं विज्ञान के व्यवहारिक विकास में उनका कृतित्व पृथ्वी पर एक नये युग का प्रवर्तन किया है ।

 

-     आचार्य जगदीश चन्द्र बोस (अव्यक्त)

 

30 नवम्बर 1858 – 23 नवम्बर 1937

आचार्य जगदीश चन्द्र बसु 

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