Tuesday, January 15, 2019

॥ 2 ॥ शिक्षा : विद्यालयों की स्थापना


अंग्रेज सरकार द्वारा सहायक स्कूल इन्स्पेक्टर नियुक्त किये जाने के बाद, जैसा कि उपर में कहा गया, आदर्श बंगविद्यालय या मॉडल बेंगॉली स्कूल खोलने के लिये विद्यासागर ने कई जिलों में गाँवों का दौरा किया। लेकिन, इस प्रसंग पर जाने से पहले इस बात का जिक्र कर देना जरूरी है कि पहले भी वह अपनी आय से विद्यालय खोलते रहे। विद्यासागर के जीवनीकार सुबल चन्द्र मित्र लिखते हैं:
“सन 1853 में विद्यासागर ने अपने जन्मस्थल वीरसिंहो गाँव में एक नि:शुल्क विद्यालय स्थापित किया। साथ ही इस विद्यालय के साथ, खेतीहरों के लड़कों के लिये एक रात्रिकालीन विद्यालय भी संलग्न किया। अपने पैसों से उन्होने विद्यालय के लिये जमीन का एक टुकड़ा खरीदा। खुद उन्होने भवन की आधारशिला रखी। उसी समय उन्होने एक बालिका विद्यालय भी शुरू किया। इन सभी विद्यालयों के लिये खर्चे वह खुद करते थे। …”
वीरसिंहो गाँव में खोले गये विद्यालयों की चर्चा आगे के पन्नों में, ‘जनशिक्षा’ शीर्षक के अन्तर्गत विस्तार से करेंगे।
दूसरी बात, मातृभाषा पर आधारित शिक्षा को पहली बार लागू करने का श्रेय तो पश्चिमोत्तर प्रांत के लेफ्टेनैंट गवर्नर लॉर्ड टोमासन को मिलेगा, और मिलना भी चाहिये। उन्होने पूरे पश्चिमोत्तर लगभग नौ सौ विद्यालय खुलवाये। पंजाब के विद्यालयों में तो तीन तीन मातृभाषा, गुरुमुखी, उर्दु एवं हिन्दी में पढ़ाई होती थी। लेकिन उन विद्यालयों के पाठ्यक्रमों को विद्यासागर ने खारिज कर दिया। उनकी स्पष्ट राय थी कि मातृभाषा शिक्षा के नाम पर यह शिक्षा सिर्फ पढ़ना, लिखना, बहीखाता समझने लायक अंकगणित तक सीमित नहीं रहनी चाहिये बल्कि वह पूरा पाठ्यक्र्म होना चाहिये जो उन्होने सुझाया था।
सन 1854 के 3 जुलाई तारीख को विद्यासागर ने बंगाल के लेफ्टेनैंट गवर्नर के निजी सचिव एच॰ सी॰ जेम्स को एक पत्र लिखा: “बंगाल के माननीय लेफ्टेनैंट गवर्नर द्वारा मुझे दिये गये मौखिक निर्देशानुसार, पिछले दिनांक 21 मई से 11 जून तक, [सरकार द्वारा] विचारे गये मातृभाषा विद्यालय स्थापित करने के उपयुक्त गाँव एवं शहरों को चुनने के लिये मैंने हुगली जिला के विभिन्न जगहों का भ्रमण किया। मेरा आपसे अनुरोध है कि यह प्रतिवेदन उनके समक्ष प्रस्तुत किया जाय।”
विद्यासागर के एक और जीवनीकार इन्द्र मित्र बताते हैं कि उस अवधि में संस्कृत कॉलेज में छुट्टी थी एवं विद्यासागर उस एक दौरे में सियाखाला, राधानगर, कृष्णनगर, क्षीरपाई, चन्द्रकोणा, श्रीपुर, कामारपुकुर, रामजीवनपुर, मायापुर, मलयपुर, केशवपुर, पातिहाल आदि गाँव घूम आये। सभी गाँव के बाशिन्दों ने अपने गाँव में विद्यालय खोले जाने की बात पर उत्साह जताया एवं कईयों ने अपने खर्चे से भवन खड़ा कर देने का वादा भी किया। कॉलेज की छुट्टियाँ खत्म हो रही थी इसलिये वह कलकत्ता लौट आये लेकिन पूछ्ताछ के द्वारा उन्होने नदीया, बर्धमान एवं 24 परगना जिलों के भी विभिन्न गाँवों की खबर ली तथा उन गाँवों का नाम अपने प्रतिवेदन में शामिल किया।
ब्रजेन्द्रनाथ बंदोपाध्याय रचित ‘विद्यासागर प्रसंग’ में सरकारी दस्तावेज से उद्धृत की गई एक सूची है जिसमें विद्यासागर स्थापित आदर्श विद्यालय के स्थापना की तारीख और जगह दी गई है।
“मॉडेल स्कूल    स्थापना की तारीख   मॉडेल स्कूल    स्थापना की तारीख
      नदिया जिला                              हुगली जिला
बेलघरिया     22 अगस्त 1855   हाराप       28 अगस्त 1855
महेशपुर       01 सितम्बर 1855  शिआखाला   14 सितम्बर 1855
भजनघाट     4 सितम्बर 1855   कृष्णनगर   28 सितम्बर 1855
कूपदह या     11 सितम्बर 1855  कामारपुकुर  28 सितम्बर 1855
   खानटुआ
देवग्राम       12 सितम्बर 1855  क्षीरपाई     01 नवम्बर 1855
      वर्धमान जिला                             मेदिनीपुर जिला
आमादपुर     26 अगस्त 1855   गोपालनगर  01 अक्तूबर 1855
जौग्राम       27 अगस्त 1855   वासुदेवपुर   01 अक्तूबर 1855
खन्डघोष      01 सितम्बर 1855  मालंच      02 नवम्बर 1855
मानकर       03 सितम्बर 1855  प्रतापपुर    17 दिसम्बर 1855
दाँईहाट       21 अक्तूबर 1855   जकपुर     14 जनवरी 1856
यह सिर्फ पहले दौर का खाका है जो 24 जनवरी 1856 के सरकारी प्रतिवेदन में छपा था। उसके बाद भी विद्यालय खुलते गये। जानकार बताते हैं कि विद्यासागर ने एक सौ से अधिक आदर्श बंगविद्यालय अपने सहायक स्कूल इन्स्पेक्टरी के दौरान स्थापित किये थे। एवं इनके अलावे उनके कार्य से प्रेरित होकर जहाँ कहीँ भी आर्थिक तौर पर सम्पन्न व्यक्तियों ने विद्यालय खोलने की ईच्छा व्यक्त की उन्होने उसे सफल करने में पूरा मेहनत किया। खुद भी कईयों को प्रेरित किया आर्थिक व अन्य सहायता देने के लिये ताकि वह विद्यालय स्थापित कर सकें।
मातृभाषा पर आधारित शिक्षा को पहली बार लागू करने का श्रेय तो पश्चिमोत्तर प्रांत के लेफ्टेनैंट गवर्नर लॉर्ड टोमासन को मिलेगा, और मिलना भी चाहिये। उन्होने पूरे पश्चिमोत्तर में लगभग नौ सौ विद्यालय खुलवाये। पंजाब के विद्यालयों में तो तीन तीन मातृभाषा, गुरुमुखी, उर्दु एवं हिन्दी में पढ़ाई होती थी। लेकिन उन विद्यालयों के पाठ्यक्रमों को विद्यासागर ने खारिज कर दिया। उनकी स्पष्ट राय थी कि मातृभाषा शिक्षा के नाम पर यह शिक्षा सिर्फ पढ़ना, लिखना, बहीखाता समझने लायक अंकगणित तक सीमित नहीं रहनी चाहिये बल्कि वह पूरा पाठ्यक्र्म होना चाहिये जो उन्होने सुझाया था।



॥ 1 ॥ शिक्षा : नया पाठ्यक्रम निर्माण


“हमें आम जनता तक शिक्षा के लाभ को पहुँचाना होगा। हमें मातृभाषा के विद्यालय स्थापित करने दें, उपयोगी एवं शिक्षाप्रद विषयों पर मातृभाषा में लिखित पाठपुस्तकों की शृंखला तैयार करने दें, शिक्षकों की जिम्मेदारी लेने के योग्य लोगों का एक दल बनाने दें तो बस, लक्ष्य की प्राप्ति हो जायेगी।” [विद्यासागर द्वारा अंग्रेज सरकार के शिक्षा परिषद के सचिव डा॰ मोएट को लिखे गये पत्र से उद्धृत]  
सबसे पहले हम उनके द्वारा, शिक्षा के क्षेत्र में किये गये कामों पर नज़र डालें।
नया पाठ्यक्रम निर्माण
शिक्षा के क्षेत्र में किये गये कामों की चर्चा में क्रमानुसार पहला होगा, संस्कृत कॉलेज के नवनियुक्त साहित्य के प्राध्यापक के रूप में नये पाठ्यक्रम के निर्माण का काम। ऐसा नहीं कि शिक्षा या किसी और क्षेत्र में भी, यह उनका पहला काम था। यह उनकी पहली नौकरी भी नहीं थी। पहली नौकरी सन 1841 से 1846 तक फोर्ट विलियम कॉलेज मे करने के बाद एक बार वह इसके पहले संस्कृत कॉलेज की नौकरी कर चुके थे (अप्रैल 1846 – अप्रैल 1847)। उसी समय उन्होने पठन-पाठन में जो सुधार करना चाहा उन सुधारों को कॉलेज के तत्कालीन सचिव द्वारा रोका गया। विरोध में विद्यासागर इस्तीफा दिये और फिर से फोर्ट विलियम कॉलेज में योगदान दिये।
सन 1850 के नवम्बर में संस्कृत कॉलेज में साहित्य के प्राध्यापक का पद रिक्त हुआ। शिक्षा परिषद के सचिव डा॰ मोयेट के अनुरोध पर विद्यासागर फिर से संस्कृत कॉलेज में अपना योगदान दिये। लेकिन विद्यासागर इसी शर्त पर उस पद पर अपना योगदान दिये थे कि उन्हे सचिव की सारी कार्यकारी शक्तियाँ मिलेंगी ताकि वह कॉलेज को सुधार सकें। सरकार की अनुशंसा पर यह शक्ति उन्हे मिल भी गई। स्वाभाविक तौर पर, कुछ ही दिनों बाद सचिव रसमय दत्त ने इस्तीफा दिया। उनके इस्तीफे के बाद विद्यासागर सचिव बने। बाद में, संस्कृत कॉलेज में सचिव के पद को प्राचार्य का पद सन 1851 में बनाये जाने पर विद्यासागर पहले प्राचार्य बने।
उस समय, पुस्तकों का लेखन, पत्रिका का सम्पादन आदि कई काम उनके चल रहे थे। उन कामों की चर्चा जगह पर होगी। नये पाठ्यक्रम निर्माण के काम का ऐतिहासिक महत्व है। इसीलिये इसकी चर्चा हम पहले कर रहे हैं। यह भी बताते चलें कि उस समय के कॉलेज आज के जैसे नहीं थे। जिन्हे आज विद्यालयी शिक्षा कहते हैं उन निचली कक्षाओं की पढ़ाई भी कॉलेज में हुआ करती थी। उच्च शिक्षा के लिये कलकत्ता शहर में हिन्दू कॉलेज और कलकत्ता मदरसा था। पारम्परिक हिन्दूशास्त्रों यानि अंग्रेजों की नजर में ‘प्राच्यविद्या’ के ज्ञान के लिये कलकत्ता एवं बनारस में दो संस्कृत कॉलेज बनाये गये थे। फोर्ट विलियम कॉलेज मुख्यत: अंग्रेजों के लिये था।  
दर असल, सन 1824 में अंग्रेजों द्वारा स्थापित यह संस्कृत कॉलेज, जिसमें ब्राह्मणों के लड़के 15 वर्षों की पूर्ण पाठावधि में संस्कृत के विद्वान बन कर निकलते थे, उन दिनों बन्द होने के कगार पर था। लड़के हर साल घट रहे थे, जबकि शिक्षा परिषद द्वारा स्थापित स्कूलों की संख्या, जो कलकत्ता में सन 1841 में 28 थी, 155 में 151 हो गई थी। छात्रों की संख्या 4632 से बढ़कर 13,162 एवं शिक्षकों की संख्या 191 से बढ़कर 455 हो गई थी। इन स्कूलों में से कईयों में अंग्रेजी एवं देसी भाषायें (बंगला, हिन्दी, उर्दू) पढ़ाई जाती थी। इन स्कूलों से पास करने वालों को नौकरियाँ मिल रही थी। दूसरी ओर संस्कृत कॉलेज से पास कर निकलने वालों को नौकरियाँ नहीं मिल रही थी।
विद्यासागर ने, 16 दिसम्बर 1850 को एक बड़े प्रतिवेदन के द्वारा शिक्षा परिषद को दो तरह के बदलाव सुझाये।
पहला, कि संस्कृत, खासकर व्याकरण की पढ़ाई, प्राचीन संस्कृत व्याकरण के पुस्तकों के द्वारा नहीं बल्कि देसी भाषा में आधुनिक शिक्षा पद्धति को ध्यान में रख कर रचे गये पुस्तकों के द्वारा हो। (यह कहने में जितना आसान लगता है उतना आसान नहीं था। उस समय तक भारतीय इतिहास में पहली बार किसी युवा शास्त्रज्ञ पंडित ने खुद, विद्यार्थियों को ध्यान में रखते हुये संस्कृत के क्लासिकीय पाठों का मूल्यांकन किया, एक एक पाठ को सामने रख कर उनकी समीक्षा की एवं छात्रों के लिये उनकी उपयोगिता को चुनौती दी। साथ ही छात्रों को पढ़ाये जाने वाले भारतीय दर्शनों की पद्धतिगत विसंगतियों की आलोचना की।)
दूसरा, कि संस्कृत के साथ साथ देशीभाषा (मातृभाषा), अंग्रेजी, भुगोल, साधारण व वैज्ञानिक ज्ञान एवं गणित (अंकगणित, बीजगणित एवं ज्यामिति) की पढ़ाई आवश्यक तौर पर हो।
इन दोनों किस्म के बदलावों की विशद व्याख्या एवं स्पष्ट सुझाव आदि उन्होने अपने दीर्घ प्रतिवेदन में दिया। पुरानी पद्धति, पाठ्यपुस्तक एवं पाठ्यक्रम की सटीक आलोचना की। साथ ही, कॉलेज में अनुशासन की बिगड़ी हुई हालत के मद्देनज़र, ठोस कदम सुझाये ताकि उपस्थिति में सुधार हो, क्लास सब के सब हों एवं समय पर हों आदि। इन सुझावों से अलग, संस्कृत कॉलेज में छात्रों की भर्ती से सम्बन्धित जातिगत दायरों को तोड़ने से सम्बन्धित सुझाव की चर्चा आगे अलग से की गई है।  
शिक्षा परिषद ने प्रस्ताव रचयिता की पैनी दूरदृष्टि की प्रशंसा करते हुये सभी बदलावों को सहर्ष स्वीकार लिया।
इन बदलावों के, एवं अगले 18 वर्षों तक विद्यासागर संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य रहने के कारण संस्कृत कॉलेज न सिर्फ जीवित रहा बल्कि आज 168 वर्ष पार कर वह संस्कृत विश्वविद्यालय बन कर खड़ा है।
पाठ्यक्रम सम्बन्धी दूसरा काम था, मातृभाषा के विद्यालयों के लिये पाठ्यक्रम का सुझाव। पहले अंग्रेज शासकों की उपेक्षा की नजर थी मातृभाषा की पढ़ाई पर। शासन के लिये जरूरी अंग्रेज साहबों के कनीय कर्मचारी व अधिकारी अंग्रेजी विद्यालयों, मिशनरी स्कूलों एवं कॉलेजों से मिल ही जा रहे थे। साथ ही, कलकत्ता एवं कुछ बड़े शहरों में निजी तौर पर, राजा राधाकान्त देव एवं अन्य कुछ बड़े लोगों ने हिन्दु बालकों के लिये कई विद्यालय खोले थे क्योंकि उनका आरोप था कि मिशनरी स्कुलों में ‘म्लेच्छों’ के साथ बैठना पड़ता है और जबर्दस्ती लोग इसाई भी बना डालते हैं। लेकिन इन विद्यालयों का पाठ्यक्रम वही मोटामोटी अंग्रेजी स्कूलों वाला ही था।  
जैसे जैसे अंग्रेज सरकार का शासन गहराई तक पैठते गया, दुभाषिये से काम चलाना दुभर हो गया। मातृभाषा की वजायाफ्ता पढ़ाई किये हुये कर्मचारी की जरूरत बढ़ती गई। लॉर्ड हार्डिंज ने इस दिशा में काम किया और बंगाल, बिहार व उड़िसा के विभिन्न जगहों में सौ से अधिक विद्यालय या पाठशाला खोले। पर वे चल नहीं पाये। सरकार भी कुछ वर्षों तक इस दिशा में सोचना एवं कोष देना बन्द कर दिया। सरकार ने यह भी सोचा कि क्यों न ग्रामीण पाठशालाओं को ही प्राथमिक विद्यालय में बदल दिया जाय। (बाद में, अपने नोट भेजते वक्त विद्यासागर ने इस प्रस्ताव को बेतुका बता कर खारिज कर दिया था क्योंकि बजट बहुत कम रखा गया था और शिक्षकों के लिये कोई व्यवस्था नहीं की गई थी।)
फिर खबर मिली कि पश्चिमोत्तर राज्यों के कुछ चुनिंदे जिलों में वहाँ के प्रभारी लॉर्ड टोमासन ने इस दिशा में पहल की है और मातृभाषा के विद्यालय वहाँ बढ़िया चल रहे हैं। बंगाल के प्रभारी, छोटा लाट यानी लेफ्टेनैंट गवर्नर थे हैलिडे। वह खुद पहले शिक्षा परिषद में थे एवं शिक्षा में रुचि रखते थे। संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य के रूप में विद्यासागर से उनकी अच्छी मित्रता थी तथा उनकी विद्वता एवं व्यवहारिक ज्ञान दोनों से वह प्रभावित थे। टोमासन की सफलता के बारे में जानने के बाद हैलिडे ने अपने सरकार से विचार किया कि क्यों न कुछ मॉडेल बेंगॉली स्कूल खोलने के बारे में सोचा जाय एवं इस काम का पूरा जिम्मा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर को दिया जाय, क्योंकि बहुत दिनों से विद्यासागर मातृभाषा में शिक्षा की वकालत कर रहे हैं। लेकिन वह अंग्रेज नहीं थे। और इन्स्पेक्टर ऑफ स्कूल्स कोई अंग्रेज ही बन सकता था।
हैलिडे भी काफी जिद्दी थे। काफी जद्दोजहद के बाद बात बनी कि विद्यासागर रहेंगे तो सहायक इन्स्पेक्टर, लेकिन मॉडेल बेंगॉली स्कूलों के स्थाई स्वतंत्र प्रभार के साथ, जिसके लिये उन्हे संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य की तनख्वाह के साथ अलग से इन्स्पेक्टरी वाली तनख्वाह भी मिलेगी (बाद में इस पद का नाम बदलकर ‘दक्षिण बंगाल के विद्यालयों का विशेष निरीक्षक’ या ‘स्पेशल इन्स्पेक्टर फॉर स्कूल्स ऑफ साउथ बेंगॉल’ कर दिया गया था)। फिर हैलिडे साहब के कहने पर विद्यासागर ने बंगाल के कुछेक जिलों में चप्पा चप्पा छान मारा, गाँववालों से बात की … उन तमाम गाँवों को चिन्हित किया जहाँ मॉडेल बेंगॉली स्कूल खोले जा सकते थे एवं उन गाँवों को भी चिन्हित किया जहाँ आश्वासन मिला कि स्कूल खोले जाने पर गाँववाले खुद अपनी मदद से स्कूल के लिये भवन खड़ा कर देंगे, या मुहैया करा देंगे। फिर उन्होने 19 विन्दुओं का एक विस्तृत नोट दिया जो पूरा का पूरा लेफ्टेनैंट गवर्नर द्वारा अनुशंसित किया गया एवं उनकी अनुशंसा पर दिल्ली सरकार व राजकोष विभाग ने भी स्वीकार कर लिया।
उस नोट के पहले चार विन्दु पाठ्यक्रम से सम्बन्धित हैं जिनका अनुवाद नीचे दिया जा रहा है। आगे के विन्दु, शिक्षक नियुक्ति, शिक्षक, सहायक शिक्षक आदि का वेतन एवं अन्य विषयों पर है।
“मातृभाषा में शिक्षा पर नोट:
1-  व्यापक पैमाने पर एवं पूरी सक्षमता के साथ मातृभाषा में शिक्षा अत्यंत आकांक्षित है। क्योंकि सिर्फ इसी के जरिये आमजनता कि स्थिति में सुधार लाया जा सकता है।
2-  इस शिक्षा में सिर्फ, थोड़ा अंकगणित और थोड़ा पढ़ना-लिखना सीखा देना ही काफी नहीं होगा; शिक्षा को सम्पूर्ण करने के लिये भुगोल, इतिहास, जीवनी, अंकगणित, ज्यामिति, नैसर्गिक दर्शन, नैतिक दर्शन, राजनीतिक अर्थशास्त्र एवं देहशास्त्र की शिक्षा भी देनी होगी।
3-  शुरुआती पुस्तकें जो प्रकाशित हो चुके हैं और जिन्हे पाठ्यपुस्तकों के रूप शामिल किया जा सकता है, निम्नलिखित हैं:-
प्रथम – शिशुशिक्षा, पाँच भागों में। पहला तीन भाग वर्णमाला, हिज्जे एवं पाठ सिखाते हैं। चौथा भाग एक निबंध है ज्ञान के मूल बातों पर। पाँचवाँ, ‘चेम्बर्स शिक्षाक्रम’ के नैतिक पाठ्यपुस्तक का स्वच्छंद अनुवाद है।
द्वितीय – पश्वावली, पशुओं का प्राकृतिक इतिहास।
तृतीय – बंगाल का इतिहास, मार्शमैन रचित पुस्तक का स्वच्छन्द अनुवाद।
चतुर्थ – चारुपाठ, आवश्यक एवं मनोरंजक विषयों पर पाठमाला।
पंचम – जीवनचरित, ‘चेम्बर्स एक्जेम्प्लरी बायोग्रफी’ से कोपरनिकस, गैलिलिओ, न्युटन, सर विलियम हेर्शेल, ग्रॉश्यस, लिनॉस, डुवल, सर विलियम जोन्स एवं थॉमस जेन्किन्स के जीवनियों का स्वच्छंद अनुवाद।
4-  अंकगणित, ज्यामिति, नैसर्गिक दर्शन पर पुस्तकें तैयार किये जा रहे हैं। भुगोल, राजनैतिक अर्थशास्त्र एवं देहशास्त्र पर निबंध तथा ऐतिहासिक कार्य एवं जीवनियाँ अभी संगृहित किये जाने हैं। फिलहाल, भारत, युनान, रोम एवं इंग्लैंड का इतिहास काफी होगा।”
इसके बाद भी विद्यासागर पाठ्यक्रम सम्बन्धी सुझाव देते रहे। मुख्य बात यह है कि न सिर्फ बंगाल बल्कि पूरे भारत में शिक्षाविदों द्वारा आम छात्र-छात्राओं के लिये मातृभाषा से लैस, आधुनिक एवं बेहतर रोजगार पाने की दृष्टि से आवश्यक शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार किये जाने का सिलसिला उन्होने ही शुरू किया।



प्रस्तावना

बहुतों को यह शीर्षक हास्यास्पद प्रतीत होगा। क्योंकि उनके मन में तुरन्त कौंध उठेगा, ‘कौन नहीं जानता है पडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर को? वही, जिन्होने विधवाविवाह शुरु करवाया।‘
- और?
- मेधावान थे इतना कि अंग्रेजी संख्या का ज्ञान अपने गाँव से पिता का हाथ पकड़कर पैदल कलकत्ता आते हुये, मील के पत्थरों से प्राप्त कर लिये।
   - और?
-     - ऐसा मातृभक्त थे कि माँ के बुलावे पर उफनते हुये दामोदर नद को तैर कर पार कर लिये।
-     - और?
-     - अंग्रेज अफसर ने अपने चेम्बर में जूता सहित पैर मेज पर उठाये हुये बात किया तो वह भी अपने कमरे में उस अफसर को आते देख अपने पैर चप्पल सहित मेज पर उठा लिये।
-     - और?
-     - और क्या? शिक्षा के लिये काम किये, नारीशिक्षा के लिये काम किये। आधुनिक भारतीय इतिहास में बंगाल के नवजागरण के दो शख्सियत, राजा राममोहन राय एवं विद्यासागर का नाम साथ साथ लिया जाता है।
-     - और?
-    ………………… !!!       
हाँ, पाठको। यही बात है कि हम ईश्वरचन्द्र विद्यासागर को मानते तो बहुत हैं पर जानते थोड़ा कम हैं। यह वही इन्सान हैं जिन्होने उन्नीसवीं सदी के मध्य में कठोर शब्दों में कहा था,
“पुरानी प्रकृति व प्रवृत्तियों वाले मनुष्यों की खेती बन्द कर, सात तहों तक की मिट्टी हटाकर अगर नये मनुष्यों की खेती की जाय, तब इस देश का भला होगा।”
महात्मा गांधी कहते हैं, “राममोहन राय से शुरू कर एक के बाद एक वीरोचित व्यक्तियों ने बंगाल को अन्य प्रदेशों से अधिक ऊँचा स्थान दिया है। यह कहा जा सकता है कि विद्यासागर उनमें महानतम थे। ‘विद्यासागर’, जिसका अर्थ होता है ज्ञान का समुद्र, उन्हे मिली एक साम्मानिक उपाधि भी थी, जो उन्हे कलकत्ता के पंडितों ने, उनके गहन संस्कृत ज्ञान को देखते हुये प्रदान किया था। लेकिन ईश्वरचन्द्र सिर्फ ज्ञान के समुद्र नहीं, करुणा के, दया के एवं अन्य कई गुणों के समुद्र थे। वह एक हिन्दू थे, ब्राह्मण भी थे, लेकिन उनके लिये ब्राह्मण और शुद्र, हिन्दू और मुसलमान सब बराबर थे। कोई भी अच्छा काम जो उन्होने किया, उसमें उन्होने ऊँच-नीच का कोई फर्क नहीं किया।”
इस निबन्ध में हम मेदिनीपुर जिला स्थित वीरसिंहो गाँव में आज से 200 वर्ष पूर्व 26 सितम्बर 1820 की तारीख में जन्मे कर्मवीर, ठाकुरदास बंदोपाध्याय एवं भगवती देवी के प्रथम सन्तान ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के जीवनकथा को भरसक नहीं दोहरायेंगे। क्योंकि उनकी जीवनकथा के कई पुस्तक उपलब्ध हैं, इन्टरनेट पर कई वेबसाइट्स पर उनका जीवन परिचय मिल जायेगा। बल्कि सुबल चन्द्र मित्र द्वारा लिखित अंग्रेजी में उनकी जीवनी पूरी की पूरी विकिपिडिया के पृष्ठों पर धारावाहिक के तौर पर उपलब्ध है।
आज, जब हम इस महान कर्मवीर, या सही अर्थों में `कर्म-दैत्य’ के जन्म की 200वीं जयन्ती मनाने की तैयारी में जुटे हैं, हम सिर्फ उनके द्वारा किये गये कामों पर, वह भी आज की प्रासंगिकता में चर्चा करेंगे । हाँ, हो सकता है कि कामों की चर्चा में कुछ कुछ जीवन प्रसंग भी आ जाय।
आगे बढ़ने से पहले यह भी बताते चलें कि पूर्व के अविभाजित बिहार एवं आज के झाड़खंड के जामताड़ा जिले में स्थित कर्माटाँड़ (रेलस्टेशन – विद्यासागर) में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के अन्तिम 18 वर्षों का आवास ‘नन्दन कानन’ में भी उनकी 200वीं जयन्ती मनाने की तैयारी चल रही है। ‘विद्यासागर द्विशत-जन्मवार्षिकी – नन्दनकानन समारोह समिति’ ने इस अवसर पर दो वर्षों का जो कार्यक्रम तय किया है उसमें आज के भारत के कुछ ज्वलन्त सामाजिक मुद्दों को उठाने की बात हुई है। इस पुस्तक में भी हम विद्यासागर के कामों को जनशिक्षा, जनस्वास्थ्य, अंधविश्वासों के खिलाफ संघर्ष, वैज्ञानिक व तर्कपूर्ण सोच का विकास, व्यक्तिजीवन में सकारात्मक, जनहितैषी जीवनमूल्यों की जरूरत आदि सन्दर्भ में देखने का प्रयास करेंगे।
यह भी हम शुरू में ही बता दें विद्यालयों एवं बालिका विद्यालयों की स्थापना, विधवाविवाह के लिये संघर्ष आदि क्षेत्र में विद्यासागर कोई पहले व्यक्ति नहीं थे। लेकिन उन तमाम कामों को एक क्रांतिकारी गति एवं दिशा देने वाले थे विद्यासागर। उन्होने कर के दिखाया कि काम कैसे किया जाता है, किस तरह करने पर सफलता सुनिश्चित होती है। काम करने वाले की, सही अर्थों में एक कर्मवीर की सोच कैसी होनी चाहिये, उसका मानसिक तेवर कैसा होना चाहिये। साथ ही, उसके लिये व्यक्तित्व के किन गुणों में धनी होना श्रेय है। हम सब विद्यासागर तो नहीं बन पायेंगे, लेकिन उनके अनुयायी बनने की कोशिश जारी रख पायें यही बहुत है।



Sunday, January 13, 2019

নদীর রোদ-ঝিলিক


[শ্মশান । এমন সাজানো যেতে পারে যে মঞ্চের পিছন দিকে, মাঝের বাঁপাশে একটা কাঠের চৌকি । চৌকির গায়ে কাট আউট করে তৈরি একটা গাছ । গাছের নিচে, চৌকির ওপর, শেষকৃত্য ও দাহকর্মের প্রয়োজনীয় জিনিষপত্রের একটি দোকান সাজানো । চৌকির ডানদিকে, অর্থাৎ মঞ্চের পিছন ঘেঁষে মাঝবরাবর, কাঠের তৈরি তিন ধাপ সিঁড়ি এদিক দিয়ে উঠে ওদিকে নেমে গেছে । আভাসটা এই যে বর্ষার জলস্তর রোখার জন্য চার ফুটের বাঁধ পেরিয়ে নদীর ঘাট ।
সামনে একটি মৃতদেহ । পাশে বসে এক প্রৌঢ় । তার সামনে পুরোহিত । পুঁটলি থেকে সামগ্রী বার করছে । অদূরে বসে দুজন শ্মশানসঙ্গী । পাহারায় রত দুজন পুলিশ । চৌকির ওপর বসে দাহকর্মের জিনিষপত্রের দোকানটা সামলাচ্ছেন এক স্ত্রীলোক ।
সময় – সন্ধ্যা ।]

(একজন ফোটোগ্রাফার, যেমন শ্মশানে ঘুরফির করে ছবি তুলে দেওয়ার জন্য, তৃতীয় শ্মশানসঙ্গীর পিছুপিছু প্রবেশ করে ।)

ফটোগ্রাফার - একটু তুলে ধরুন মাথাটা ।
                   (সঙ্গে আসা শ্মশানসঙ্গী এগিয়ে গিয়ে ঝুঁকে দু’হাত দিয়ে শবদেহের মাথা আর কাঁধটা তুলে ধরে । তাতে দেখা যায় শবদেহটি দশ-বারো বছরের ছেলের । কাপড়টা নিচে খসে যাওয়াতে গলার নিচ থেকে পোস্টমর্টেমের সেলাই দেখা যায় । একটা ছবি তোলা হয় – ফ্ল্যাশ ঝলকায় ।)
তৃতীয় শ্ম.স.-  (প্রৌঢ়কে) আপনি আসুন পাহুনজী১, একবার পাশে এসে বসুন । (প্রৌঢ় মাথা ঝাঁকান । শ্মশানসঙ্গীরা স্নেহভরে জোর করে তাঁকে শবদেহের পিছনে বসিয়ে দেয় । বাঁহাতে দেহের নিচের দিকে ঠেক দেওয়ায় ও অন্য হাতে মাথায় ঠেক দেওয়ায় । কিন্তু প্রৌঢ়ের নিজের মাথা আর সোজা হয় না । ওই অবস্থাতেই আরেকটা ছবি তোলা হয় ।
১ম শ্ম.স. -    আর দেরি কোরো না তোমরা । পোস্টমর্টেম করিয়ে বডি দিতেই বিকেল করে দিল । বাড়ি ফিরব কখন ? কীভাবে ফিরব ?
ফটোগ্রা. -      কী, হয়েছিল কী ?
                   (শ্মশানসঙ্গীরা একে অন্যের মুখের দিকে চায় । অর্থাৎ বলার ইচ্ছে নেই । দুই পুলিশের মধ্যে অপেক্ষাকৃত যে তরুণ, সে ফটোগ্রাফারকে ধমকের সুরে প্রশ্ন করে)
১ম পুলিশ -    ছবি তোলা হয়ে গেছে আপনার ?
ফটোগ্রা. -      হ্যাঁ ! সে তো দেখতেই পেলেন আপনারা !
১ম পুলিশ -    তাহলে যান ।
ফটোগ্রা. -      না, মানে এত ছোটো একটা বাচ্চার লাশ, তাও পোস্টমর্টেম করানো ...
২য় পুলিশ -    (ইনি একটু বয়স্ক) গ্রামের ঘরে ঘরে আগুন জ্বলছে ফটোগ্রাফরবাবু ! জমি নিয়ে, জাত নিয়ে, ধরম নিয়ে । তারপর নক্সলী উৎপাত । আর কিছু না পেলে ... গোতিয়ার২ ঝগড়া । জোরু নিয়ে টানাটানি ! কিছু বাকি আছে ? কত কত খবর রাখবেন? বড় কাউকে পেলোনা তো বাচ্চাটাকেই ধরে শেষ করে দিল !
৩য় শ্ম.স. -    আরে কাজিয়া, লড়াই, হাঙ্গামা, ফ্যাসাদ তো তবু বোঝা যায় । ভুল হোক আর ঠিক হোক, জমিজিরেত নিয়ে, জাত নিয়ে, হকহুকুক নিয়ে বয়স্কদের মধ্যে দুশমনি লাগতেই পারে । ওই নিয়েই জীবন । ... আমি তোকে মারলাম । তুই আমায় মারলি । এইই দিনকাল । ... কিন্তু বাচ্চাটা কার শত্রু ছিল ভাই ? কাকে মেরেছিল ? কার গোলার ধানে আগুন দিয়েছিল ? কার ঘরে ঢুকে বাড়ির অওরতের সাথে মুখ কালো করেছিল ? দশ বছরের একটা বাচ্চা ?
                   (এরই মধ্যে পিছন থেকে এক বৃদ্ধ প্রবেশ করে । তার আগল-পাগল বা নেশাগ্রস্ত চলনে শবদেহের কাছে আসার ধরণ দেখে সবাই চুপ করে যায় । ফটোগ্রাফার ‘ওই যে, এসে গেছে’ বলে বেরিয়ে যায় ।
পুরোহিত -     এ এখনো বেঁচে আছে ? ছিল কোথায় ? দেখতাম না তো ?
প্রৌঢ় -          লোকটা কে, পন্ডিতমশাই ?
                   (পুরোহিত জবাব দেওয়ার আগেই বৃদ্ধ শবের মুখটা ভালো করে দেখে হেসে ওঠে)
বৃদ্ধ -            এসে গেলি ? আবার ফিরে এলি ? এত শিগ্‌গির ?
৩য় শ্ম.স. -    বলে কি বুড়ো ! আবার ফিরে এলি মানে ?
বৃদ্ধ -            (তার দিকে তাকিয়ে তার কাছে এসে) বাঃ, ফিরে ফিরে আসছে আমার চোখের সামনে, পোড়ানো হচ্ছে বার বার ... বলব না ?
১ম শ্ম.স. -    কী বলছে বুড়ো যা তা ! সরা ওকে এখান থেকে ! কে ও ?
দোকানি -      (অদূরে তার দোকান থেকেই) ওই বুড়োই তো এই শ্মশানঘাটের রাজা ছিল । রাজা হরিশ্চন্দ্র, কলিযুগের ! এখন আর হাত পা চলে না । মাথাও বিগড়েছে । তাই ছেলে ধরেছে কাজ ।
২য় শ্ম.স. -    ঠিকই বলছে দোকানি । ওই আগে হাতে ধরিয়ে দিত আগুনের আঁটি । ঘাটছাড়ানি নিয়ে আমি নিজেও বেশ কয়েকবার দরদাম করেছি ওর সাথে – পাঁচ বছর আগে অব্দি । এদিকে দেখতে পেতাম না । ভেবেছিলাম মরে গেছে । (বলে নদীর দিকে নেমে যায়)
১ম শ্ম.স. -    এত সহজে মরে শালা চিমড়ে বুড়ো ! মাল টেনে দিব্যি মস্ত্‌ আছে, দেখছিস না !
বৃদ্ধ -            (তার কাছে এগিয়ে এসে) ঠিক বলেছিস ।  মাল টেনে, বুকে পেটে, মাথায় আগুন জ্বালিয়ে দিব্যি বেঁচে আছি । নদীর তারা গুনছি আর আকাশের ঢেউ গুনছি । কেন জানিস ?
৩য় শ্ম.স. -    জেনে কাজ নেই । মাল খাওয়ার যোগাড় যখন আছে তার মানে পেটের ভাতটাও সময় মত জুটছে । নদীর তারা আর আকাশের ঢেউই তো গুনবে । স্‌সালা ।
বৃদ্ধ -            (নিজের মনে) আমরা তো হলাম, ওই যাকে বলে যমের, মানে উপরের ডোমটার অরুচি । যেতে চাইলেও নেয় না । ফিরিয়ে দিল দু’দুবার । ... আর এই যে দেখছিস শুয়ে আছে যমের মাংসলুচি । কচি পাঁঠার মাংস । গপগপিয়ে খাবে । (হাসতে হাসতে নিজের দিকে আর শবদেহের দিকে আঙুল দেখিয়ে দেখিয়ে বলতে থাকে, ‘অরুচি – মাংসলুচি ... অরুচি – মাংসলুচি ...)
১ম শ্ম.স. -    তা এই বাচ্চার লাশটা দেখে ‘আবার ফিরে এলি’ বলার মানে কী ?
বৃদ্ধ -            বাঃ, বার বার আসবে, ফিরে ফিরে আসবে ... বলব না ? সেদিন এল । কী, না দাঙ্গায় মরেছে । আবার এল । কী না নৌকো ডুবেছে । এবার ? শুনছি জমি জিরেতের কাজিয়া । মাঝে মধ্যেই আসে অসুখে মরে । না খেয়ে । আগুনে পুড়ে । ফিরে ফিরে আসে এখানে । বলব না ?
৩য় শ্ম.স. -    বাঃ, পাগলের কথা শুনুন । জ্ঞানবাক্য । কাব্য । দুনিয়ার যত বাচ্চা মরছে সব একটাই বাচ্চা । যত যোয়ান মরছে সব এক যোয়ান । যত মেয়ে মরছে ... বুড়োও তবে যে কটা মরছে সব এক ! মানে ও নিজেই । বুড়ো সমাজের ভুত । শালা মাল খেয়ে টইটুম্বুর । ফিলজফি আওড়াচ্ছে । মানবতার মৃত্যু ।
বৃদ্ধ -            ও তুই বুঝবি না । বুঝবি না । বড়দের মরা আর এর এই শ্মশানে আসা বারবার (শবদেহের দিকে কিছুক্ষণ তাকিয়ে থেকে )... এক হয় কখনো ? বড়রা তো দুনিয়াদারীর ভাগিদার । দুনিয়াদারীতেই বাঁচছে, মরছে । নিজেদের কর্মে তৈরি করছে নিজেদের জীবন । নিজেদের মৃত্যু । ... এরা তো ঢোকেইনি সেই দুনিয়াদারীতে । জন্মই নেয়নি । মানুষের এক জন্ম মায়ের পেট থেকে । দ্বিতীয় জন্ম – দুনিয়াদারীর ছকে নিজের খোপটায় গিয়ে দাঁড়ানোর পর । নিজের হিস্‌সার কর্ম করতে । ... মাঝখানের বয়সটা ? (একটা চাওয়ালা বাচ্চা ছেলে, প্রায় একই বয়সের, হাতে খালি গেলাস বসান তারের জালি নিয়ে দোকানি স্ত্রীলোকের কাছে যায় । বৃদ্ধ তার দিকে তাকিয়ে থাকে ।) মাঝখানের বয়সটা । হাঁটা শেখার সময় থেকে চলা শেখার সময় অব্দি ভগবানের বয়স । ... ভগবান দুটো হয় ? ওই এক । ভগবান । সময়ের ফুল । ফল হওয়ার আগেই এভাবে মেরে ফেলি আমরা । আর তিনি ফিরে ফিরে আসেন শ্মশানে ।
চাওয়ালা -     (দোকানি স্ত্রীলোকের সামনে দাঁড়িয়ে) গেলাসটা কোথায় রেখেছ ? দোকানি চৌকির নিচে ইশারা করতে ঝুঁকে ছেলেটি গেলাস তুলে নেয়) এখনকারটা মিলিয়ে ন’টাকা হল । 
দোকানি -      পরে নিয়ে যাস ।
চাওয়ালা -     এখনই দাও না । শেষে আমাকে কথা শুনতে হয় । আগের রেজিস্ট্রিবাবুর এভাবেই ছত্রিশ টাকা বাকি পড়ে গিয়েছিল । ট্রান্সফার হয়ে গেল । টাকা পেলাম না । আমার মাহিনা থেকে কেটে নিল মালিক ।
দোকানি -      তোর মালিক তো চশনখোর ।
চাওয়ালা -     (কথা এড়িয়ে যেতে) টাকাটা দিয়ে দিলেই তো ফুরিয়ে যায় । কেন কথা বাড়াচ্ছ ?
দোকানি -      আচ্ছা নিয়ে যা । (পয়সা দিয়ে বৃদ্ধকে চেঁচিয়ে শোনায়) এই যে দেখ, তোমার কেষ্টঠাকুর ! হাতে পায়ে হাজা ধরে নিল রাত বারোটা অব্দি এঁটো বাসন মাজতে মাজতে । একটু বল এর কথাও !
বৃদ্ধ -            (দাড়ির ফাঁকে ফোকলা দাঁতে খানিক হেসে নিয়ে) ও তো আমাদের দলের বোড়ে । এগিয়ে চলেছে । এগিয়ে চলেছে । কবে মালিকদের লাইনে ঢুকে তোর ঘোড়া বাঁচিয়ে দেবে, আমার হাতি বাঁচিয়ে দেবে, নাকি মন্ত্রী হয়ে যাবে ... দেখতে রয়ে যাবি ।
দোকানি -      এ তো আর দাবা খেলা নয় ! ... হয়তো দেখবে মালিকদেরই ঘোড়া হয়ে এসে তোমার পাঁজর গুঁড়িয়ে দিল । সময়ের আগেই ধরে নিয়েছে ছক । কীই বা বোঝে ও এই ছকের । লেখাপড়া করাবে, না নেশাখোর বাপ জুতে দিয়েছে কাজে ।  (একজন মোটাসোটা যুবক ঢোকে)
যুবক -          (বৃদ্ধকে ধরে নিয়ে যেতে যেতে) তোমাকে বলি ওদিকে থাক । কাজের সময় এসে বাগড়া দেওয়ার অভ্যাস হয়ে গেছে তোমার ।
দোকানি -      হ্যাঁ, হ্যাঁ, নিয়ে যা তোর বাপকে ! যতক্ষণ থাকবে এই সমস্ত পাগলামি চলবে । সিপাহিজীরা ভাববে নিশ্চয়ই কোনো ব্যাপার আছে । রেজিস্ট্রিবাবুকে তো আলবাৎ ধরবে । একটা মড়ার ডবল রেজিস্ট্রি ... ।
                   (ছেলেটি বৃদ্ধকে টানতে টানতে নদীর দিকে নেমে যায় । ওদিক থেকেই উঠে আসে দ্বিতীয় শ্মশানসঙ্গী)
২য় শ্ম.স. -    এদিকের কাজ শেষ হয়ে গিয়ে থাকলে এবার চল । ওদিকে সবকিছু রেডি ।
                   (শবদেহ উঠিয়ে নদীর দিকে নেমে যায় মৃত বালকের পিতা, শ্মশানসঙ্গীরা এবং পুরোহিত । চাওয়ালা বাচ্চা ছেলেটি দাঁড়িয়ে পড়েছিল বৃদ্ধ ও তার ছেলের টানাটানি দেখতে । এবার গেলাসসুদ্ধু জালিটা পায়ে বাজিয়ে যাওয়ার উদ্যোগ করতেই দুই সিপাই নড়ে চড়ে)
১ম পুলিশ -    (যে অপেক্ষাকৃত তরুণ) কী সাহেবজী, একটু চা পেলে কেমন হয় ?
২য় পুলিশ -    মন্দ নয় । এ্যাই চাইল্ড-লেবার । দুটো চা দিয়ে যা তো । আলাদা করে বানিয়ে আনবি ।
চাওয়ালা -     স্পেশাল তিন টাকা ।
২য় পুলিশ -    ডবল ?
চাওয়ালা -     পাঁচ ।
২য় পুলিশ -    ওই ! দুটো ডবল হাফ ।
চাওয়ালা -     পয়সা ?
১ম পুলিশ -    আরে নিয়ে আয় না ! না দিয়ে পালিয়ে যাচ্ছি না ।
২য় পুলিশ -    (পয়সা বার করে) না, নিয়ে যা পয়সা । নইলে আবার ঝাড় খাবি মালিকের কাছে । কিন্তু চা যেন ভালো হয় । আর (নদীর দিকে ইশারা করে) ওই দিকে যাচ্ছি আমরাও । পৌঁছে দিবি । ... শালা কী নিয়মকানুন এই জমানার । বাচ্চারা টিভিতে গান গেয়ে, নেচে, এ্যাক্টিং করে পয়সা কামাচ্ছে । বাপমায়ের স্বপ্ন পুরো করার কথা বলছে । তো সে হল ট্যালেন্ট কা কমাল । আর দোকানে, কারখানায়, রাস্তায় কাজ করে পরিবার চালাচ্ছে, পেট পালছে, এমনকি লেখাপড়া শেখার জন্য খাটছে তো সে হল চাইল্ড-লেবার ! বেআইনি ! ...
                   (ততক্ষণে চাওয়ালা বাচ্চাটা পয়সা নিয়ে চলে যায় । সিপাই দুজনও নদীর দিকে নেমে যায় । দোকানি মেয়েলোকটি হাই তুলে আড়মোড়া ভেঙে ওঠে । কাট-আউট গাছটা সিঁড়ির ডানদিকে নিয়ে গিয়ে ঘুরিয়ে বাঁধের ওপাশে দাঁড় করায় । চৌকিটা টানতে টানতে নিয়ে নাট্যস্থলের বাইরে চলে যায় । অর্থাৎ, ঘটনাস্থল নদীর দিক । ...
গভীর রাত । মঞ্চ ঈষৎ অন্ধকার । যে ছেলেটি শবদেহ হয়েছিল সে ডানদিক থেকে ঢুকে ডানঘেঁষেই মাটিতে শুয়ে পড়ে । নিভন্ত চিতা বোঝাতে একটা লাল আলো ফেলা যেতে পারে তার ওপর ।
                   বাঁদিক থেকে বৃদ্ধ একটা মদের বোতল আর একটা পুঁটুলি হাতে নিয়ে ঢুকে বাঁ ঘেঁষে বসে পড়ে । ধপ করে বসতে গিয়ে বেসামাল হয়ে চিৎপটাং হয় । আবার উঠে বসে । মদ খায় ।
                   একেবারে সামনে বাঁদিকে তিন বালক/বালিকা, মাথায় মুখে কালো কাপড় বাঁধা, কাঁধে বন্দুক ... প্রবেশ করে । তাদের সাথে একজন দলনেতা – যুবক বা মধ্যবয়সী – মাথায় মুখে কাপড় বাঁধা বলে বোঝা যায় না ।)
দলনেতা -      সব কথা মনে রেখেছ তো তোমরা ? এটাই কিন্তু তোমাদের প্রথম অপারেশন, তোমাদের পরীক্ষা । আমি আর রাঘবদা রাস্তার ধারে থাকব । তোমাদের সিগন্যাল পেলেই বাইকে স্টার্ট দেব । ঠিক আছে, কমরেডস !
                   (দলনেতা চলে যায়)
১ম (বালি.) - কুশলের ছোটকা যদি না আসে শেষ অব্দি ?
২য় (বাল.) -   আসবেই । ওর আদরের ভাইপো, ওরই জন্য জীবনটা দিল ! পারলে লাশের সঙ্গেই আসত । কিন্তু পুলিশের ভয় । এখন আসবে । ভাইপোর চিতার কাছে । আসবেই ।
বালিকা -       একা আসবে ?
বালক -         একা নাও হতে পারে । দুজন । তিনজন । তবে দল বেঁধে এখান অব্দি আসার সম্ভাবনা কম ।
বালিকা -       দুজন তিনজন হলে চিনতে অসুবিধা হবে না ? কাপড়ে চোখমুখ ঢাকা থাকলে ...
বালক -         মিটিংএর সময় ঘুমোচ্ছিলি ?... চিতার কাছে আসবে । বসবে । ফিসফিসিয়ে কাঁদবে, গর্জাবে ...। অসুবিধা হবে চিনতে ?
৩য় (বালক) - চুপ । কেউ আসছে ।
                   (ওরা চুপ করে যায় । কিন্তু কেউ আসেনা । সিঁড়ির ওধার থেকে একজন শ্মশানসঙ্গী উঁকি মেরে চিতাটা দেখে । স্বগতোক্তি করে ‘নেভেনি । এখনও ঘন্টাখানেক লাগবে’ । বলে অদৃশ্য হয়ে যায় ।)
সত্যি বলতে কুশলটা বেচারা বেঘোরে মরল । ... অনেক আগে খতম করে দেওয়া উচিৎ ছিল ওর ছোটকাকে । রামস্বরূপ সিংএর ডান হাত ভেঙে যেত । আমাদের টোলায় গত দু’বছরে পাঁচটা হামলার মধ্যে তিনটে লীড করেছে ও । বাকি দুটোর সময় বম্বে গিয়েছিল মালিকের কাজে । শালা কুত্তা । সেদিনও দিদির ওপর ... (বলতে গিয়ে গলা ভেঙে আসে, বাকি দুজন ওর কাঁধে হাত চাপড়ে প্রবোধ দেয় । চুপ থাকে তিনজনেই । একটু পরে অন্যদিক থেকে চুপিসাড়ে, মাথায় মুখে কাপড় বাঁধা, বন্দুক কাঁধে দুজন লোক প্রবেশ করে । একজন চিতার কাছে এগিয়ে যায়। হাঁটু গেড়ে বসে । তিনজন বালক বালিকা ক্ষিপ্রতার সাথে পজিশন নেয় ।)
ছোটকা -       তোকে মারার বদলা তো আমি নেব কুশল । এমন বদলা নেব যে ... ! এত হিম্মত হয়ে গেছে ওই হারামিগুলোর ! পুরো টোলা ওদের ছারখার করে দেব এবার । শাবল দিয়ে খুঁচিয়ে খুঁচিয়ে আগুনে পোড়াব। দেখব কোন মসীহা আর কোন পার্টি ওদের বাঁচাতে আসে । ... আমাকে ওরা চেনেনি এখনও, যে চাইলে ...
                   (গুলি চলে । এক বালক ছোটকাকে তাগ্‌ করে । বাকি দুজন ছোটকার সঙ্গীকে ব্যস্ত রাখে । মোক্ষম গুলিতে ছোটকা লুটিয়ে পড়ে । তার সঙ্গী আড়াল খোঁজে । তখনই একজন বালক একটা বোমা ছোঁড়ে । ধোঁয়া, আগুন । তিন জন বালক-বালিকা পালিয়ে যায় । নেপথ্যে বাইকের আওয়াজ । মিলিয়ে যায় । ছোটকার সঙ্গী দ্রুত উঠে এসে রক্তাক্ত ছোটকার শরীর টানতে টানতে নেপথ্যে নিয়ে যায় । কিছু চাপা শোরগোল হয় পিছন দিকে । হন্তদন্ত হয়ে পুলিশ দুজন এবং শবসঙ্গীরা সিঁড়ির ওপর উঠে দাঁড়ায়, খানিক নেমে আসে । কাছে আসতে ভয় পায় । ওখান থেকেই অন্ধকারে ঠাহর করে ।)
কুশ. পিতা -   (সবচেয়ে পিছন থেকে) ছোট এসেছিল নির্ঘাৎ ।
১ম পুলিশ -    আর কে এসেছিল ?
২য় শ্ম.সঙ্গী -  কেউ তো এসেছিল পাল্টা তরফেরও । নইলে গুলি বোমা চলল কী করে ?
২য় পুলিশ -    পিছু হটুন আপনারা । এদিকেই থাকুন । ফোর্স আসা দরকার । থানায় খবর দিতে হবে (প্রথম পুলিশকে) এদের নিয়ে এখানে থাক । আমি থানায় খবর দেওয়ার ব্যবস্থা করি । (সবাই আবার ওদিকে চলে যায় ।)  
                   (এতক্ষণ গুলির আওয়াজ, হাঙ্গামার মধ্যে কাটিয়েও মধুর পিতা অর্থাৎ বৃদ্ধের কোনো ভ্রুক্ষেপ নেই । মদ খেয়ে যেমন ঝিমোচ্ছিল তেমনই ঝিমোতে থাকে । ... চিতার ওপর লাল আলো নিভে যায় । অলৌকিক এক ফিকে আলো ছড়িয়ে পড়ে সামনের দিকের সবটা জুড়ে । বৃদ্ধ হঠাৎ টেনে তোলে নিজেকে । মঞ্চের নিচে থেকে অর্থাৎ নদী থেকে উঠে আসে এক সাদা নরম কাপড় জড়ান স্ত্রীলোক । বসে পড়ে বৃদ্ধের একটু দূরে । বৃদ্ধ খেয়াল করেনা । ওদিকে চিতার ছাই থেকে উঠে বসে মৃত বালক, কুশল । বৃদ্ধের দিকে এগিয়ে আসে ।)
কুশল -          এসে গেছি ধর্মরাজা ! (বৃদ্ধের পুঁটুলির ভিতরে হাত ঢুকিয়ে একটা মুকুট বার করে বৃদ্ধকে পরিয়ে দেয় । বৃদ্ধ চমক ভেঙে কুশলকে দেখে । তার পর অদূরে বসে থাকা স্ত্রীলোকটিকে দেখে । কিছু একটা অস্বীকার করার ভঙ্গীতে মাথাটা দুলিয়ে দুলিয়ে নাড়ে ।)
বৃদ্ধ -            কেউ শালা মানতেই চায় না । কেন মানতে চায় না? ফিরে ফিরে আসছে সেই ভগবান । ফিরে ফিরে আসছে আকাশ-জল-মাটি-বাতাস আর আগুন দিয়ে তৈরি শক্তি । সময়ের ফুল । তারই মধ্যে তো প্রতিষ্ঠিত হন ভগবান । আর তোরা তাকে বানাচ্ছিস লাশ । ফিরে ফিরে আসছে লাশ । প্রতিদিন । ... অথচ কেউ মানতেই চায় না ।
স্ত্রীলোক -       আমি মানি । (দীর্ঘশ্বাস ফেলে) আমি যে নিজেই বয়ে বেড়াচ্ছি এক জগদ্দল । লাশের বাড়া লাশ । প্রতিটি প্রহর ।
বৃদ্ধ -            তুই আবার কে রে । (ঠাহর করে দেখে) ও বাবা, এ তো মেয়েলোক । এই অন্ধকারে এখানে কী করছিস ?
কুশল -          ও কি ধর্মরাজা, নিজের বোনকে চিনতে পারছ না ? নদী । তুমি যম, ও যমুনা ।
বৃদ্ধ -            (অনিশ্চিত ভাবে) ওঃ, তা ... কী ? এখানে ? এখন ? কেন ?
স্ত্রীলোক -       তোমার ব্যথার টানে উঠে এলাম । তোমার দীর্ঘনিঃশ্বাসে উঠে এলাম । আমিও যে নিষ্কৃতি পাই না কিছুতেই । অথচ নিঃশ্বাস বন্দ হয়ে আসে । গতি রুদ্ধ হয়ে যায় ।
কুশল -          আমি কি দাঁড়িয়ে থাকব ধর্মরাজা ? এখানেই ? আমাকে নিয়ে যাবে না?
বৃদ্ধ -            কোথায় নিয়ে যাব তোকে ? কোথায় নিয়ে যাব বল তো যমুনা ? স্বর্গে ? নরকে ? কোথায় এর পাপ আর পূণ্যের হিসেব ?
স্ত্রীলোক -       আমায় দিয়ে দাও ।
বৃদ্ধ -            তুই নিয়ে যাবি ? তোকে দিয়ে দেব ? জানি না । ... কিন্তু তুই তো আবার বললি যে তোর নিঃশ্বাস বন্দ হয়ে আসে । কি  যেন এক জগদ্দল ... ।
স্ত্রীলোক -       সে তো ওই পাপপূণ্যের আবর্জনা । দুনিয়ার মানুষের । বেড়েই চলেছে আমার শরীরে । (কুশলের মাথায় হাত রেখে) এ তো আমার গতি, আমার ঢেউ । আমার রোদ-ঝিলিক । একে দিয়ে দাও আমার ভাগে ।
বৃদ্ধ -            তাহলে চল্‌, আমিই একে তোর ঘরে পৌঁছে দিয়ে আসি ।
                   (ছেলেটির হাত ধরে বৃদ্ধ । পাশে স্ত্রীলোক । বৃদ্ধের মাথায় মুকুট । মাঝখানে কুশল চলতে থাকে ।)
                   (ছেলেটির উদ্দেশে) এবারে কী হয়েছিল তোর ? কিসের খুনোখুনি ? না কি অসুখবিসুখ ?
কুশল -          (চুপ করে থাকে কিছুক্ষণ, তারপর) রাতে শুয়েছিলাম । বাবা ছিল । মা ছিল । দিদিরা ছিল । হামলার ভয় তো ছিলই । তাই ছোটকা ছিল না বাড়িতে । আর আমরাও ঘুমোইনি কেউ । পালাবার জন্য তৈরি ছিলাম । কিন্তু ভোরের ঠিক আগে হামলা শুরু হতে যেই খিড়কি দিয়ে পালাতে গেলাম, পা হড়কে পড়ে গেলাম কলাবনের কাছে । বাবা পিছু ফিরে দৌড়ে আসছিল । কিন্তু ততক্ষণে একটা প্রচন্ড ঘা পড়ল আমার ঘাড়ে । আর আমি কিছু জানি না । শুধু শুনতে পেলাম কেউ বলছে, “ছাড়বি না এই হারামির বাচ্চাটাকে, এও সেদিন ছিল ছোটর দলবলের সাথে”...
স্ত্রীলোক -       সেদিন মানে ? কোন দিন ? কী হয়েছিল ?
(কুশল দুজনের দিকে অনিশ্চিত ভাবে তাকিয়ে তাকিয়ে কিছু ভাবে)
কুশল -          আচ্ছা, তোমরা ‘সংস্কার’ বোঝ ? ছোটকা বলে ‘সংস্কারহীন’ হয়ে যাচ্ছে দুনিয়া । ছোটরা বড়দের মানছে না, মুখে মুখে কথা বলছে । যারা শূদ্র তারা মুখ লাগাচ্ছে উঁচু জাতের । রামস্বরূপজি এত করেছেন গ্রামের উন্নতির জন্য । তার বিরুদ্ধে জমায়েত হচ্ছে মুসহরটোলায় আর কোথায় কোথায় । ... তো সেই জন্যই তিনচার সপ্তাহ আগে এক রাতে ছোটকাদের দল গিয়েছিল ওদের টোলায় । আমাকে বলল, “চল, তুইও আজ মরদ হয়ে আসবি ।” টোলার একেবারে শেষের দিকে ভীমজীর ঘর । সবাই ধরা পড়ে গেল । বন্দুকের নলের সামনে দাঁড় করিয়ে দেওয়া হল । ... ভীমজীর মেয়ে আমারই ছোড়দির বয়সী । ছোটকা ওকে (ইতস্তত করে) যেমন সিনেমায় থাকে না ? খারাপ সীন । ছোটকা, তার দলের তার জন । তারপর হাসতে হাসতে আমাকে উঠিয়ে ওই ভাবে শুইয়ে দিল ওর গায়ের ওপর । ... আমার কেমন গা ঘিন ঘিন করে উঠল । অন্ধকার, নরম গা, রক্ত । আমি ওদের পায়ের ফাঁক দিয়ে বেরিয়ে পালিয়ে গেলাম । হাঁপাতে হাঁপাতে নিজের বাড়ির কাছে এসে পিছনে দেখলাম । দাউ দাউ করে জ্বলছিল ঘরটা ...
                   (বৃদ্ধ মাথায় হাত দিয়ে বসে পড়ে । স্ত্রীলোকটি কুশলের হাত ধরে দাঁড়িয়ে পড়ে । বৃদ্ধ মুকুটটা মাথা থেকে উপড়ে ছুঁড়ে ফেলে চিতার ওপর । তারপর কোঁচড় থেকে একটা বিড়ি বার করে চিতা থেকে নিভু একটা অঙ্গার খুঁজে তাতে ধরায় । টানতে টানতে গিয়ে বসে পড়ে সিঁড়ির ওপর ।)

[নাটকের মঞ্চ-নির্দেশাদি নিছক মাথায় ঘুরতে থাকা ছবিটা স্পষ্ট করতে চাওয়া । প্রয়োজনে ওগুলো অপ্রয়োজনীয় বলে বাদ দেওয়া যেতে পারে। ]           
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১ – জামাইবাবু  
২ – জ্ঞাতি

[২০০৯, ২০১০ বা ২০১১র সঞ্চিতা, সাহিত্য সংখ্যায় প্রকাশিত]