Monday, August 10, 2026

मनोवाद से लड़ाई - सीताराम येचुरी

कम्युनिस्ट पार्टी के संगठन को मज़बूत करने का सवाल एक ऐसा सवाल है जिस पर एक क्रांतिकारी पार्टी को हर समय ध्यान देना चाहिए। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि पार्टी का संगठनात्मक ढांचा और उसकी प्राथमिकताएं उन अहम कामों और दिशा-निर्देशों से तय होती हैं, जिन्हें पार्टी अपनी राजनीतिक-रणनीतिक लाइन के तहत, किसी खास समय पर ठोस परिस्थितिओं के आधार पर तय करती है।  मज़दूर वर्ग के नेतृत्व वाली क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी संगठन के स्थापित सिद्धांतों और तरीकों का सख्ती से पालन करते हुए, पार्टी संगठन को मौजूदा कार्यों को पूरा करने के लिए पूरी पार्टी के सभी सदस्यों को सक्रिय करने में सक्षम होना चाहिए। कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन इसलिए, एक गतिशील जी है।

हम कई दशकों से लेनिन की यह बात दोहराते आ रहे हैं कि “ठोस परिस्थितिओं का ठोस विश्लेषण ही द्वंद्ववाद का जीता-जागता सार है।” इसमें कई पहलू शामिल हैं। पहला, ठोस परिस्थितिओं की सही पहचान करना और उस आधार पर, वर्ग संघर्षों और क्रांतिकारी आंदोलन की प्रगति पर ऐसी परिस्थितिओं के असर होने या संबंधित अन्य बातों का सही आकलन करना। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि ठोस परिस्थितिओं का सही अंदाज़ा सिर्फ़ मार्क्सवाद के वैज्ञानिक इस्तेमाल से ही लगाया जा सकता है। दोनों पहलू, यानी ठोस परिस्थिति की सही जांच और उसके बाद सही अंदाज़ा, ठोस परिस्थिति का सही आकलन करने का एक ज़रूरी हिस्सा हैं। अगर ठोस परिस्थिति का सही आकलन करने में गलतियाँ या कमियाँ हैं, तो स्वाभाविक है कि आगे का विश्लेषण गलत होगा। दूसरा, ठोस परिस्थिति के ऐसे आकलन के बाद का विश्लेषण, मनोवाद या पहले से तय बातों के असर के बिना, विज्ञानसम्मत वस्तुपरक आधार पर करना होगा। इस तरह, लेनिन की बात को सही ढंग से लागू करने के लिए, एक सख्त वैज्ञानिक मार्क्सवादी कार्यपद्धति का पालन करना होगा।

20वीं सदी की सभी सफल समाजवादी क्रांतियों का इतिहास दिखाता है कि जिन कम्युनिस्ट पार्टियों ने इन क्रांतियों को जीत दिलाई, वे लगातार उस काम में लगी रहीं जिसे “मनोवाद [सब्जेक्टिविज़्म] का मुकाबला” कहा जाता है। यह कम्युनिस्ट पार्टियों के अंदर और हर कम्युनिस्ट की व्यक्तिगत चेतना के दायरे में एक लगातार चलने वाली लड़ाई है, जो अन्य बातों के साथ-साथ, उसकी राजनीतिक-सांगठनिक क्षमताओं की ताकत तय करता है।

ठोस परिस्थितिओं का गलत अंदाज़ा लगाने से, ज़ाहिर है, एक गलत राजनीतिक लाइन और उसके नतीजे में गलत कार्यनीतिक लाइन बनेगी। और, भले ही राजनीतिक-कार्यनीतिक लाइन वैज्ञानिक आधार पर सही तरीके से बनी हो, यथार्थ में उसका क्रियान्वयन संगठन की ताकत पर निर्भर करेगा। जैसा कि स्टालिन की कही एक प्रसिद्ध बात है कि राजनीतिक लाइन 100 परसेंट सही हो सकती है, लेकिन वह निरर्थक होगी जब तक कि कोई ऐसा संगठन न हो जो स सही राजनीतिक लाइन को जनता तक ले जा सके। इस तरह, पार्टी संगठन जनता की चेतना को विकसित करने और उन्हें एक क्रांतिकारी उभार के लिए तैयार करने की पार्टी की गतिविधियों में एक अहम भूमिका निभाता है। पार्टी संगठन के अलग-अलग पहलुओं में से, एक ज़रूरी पहलु है मनोवाद [सब्जेक्टिविज़्म] की प्रवृत्ति से लड़ने के लिए लगातार संघर्ष, चाहे वह ठोस परिस्थितिओं के आकलन का सवाल हो या परिस्थितिओं के ठोस विश्लेषण का सवाल हो। और, उआकलन और विश्लेषण के आधार पर, लोगों की बड़ी से बड़ी लामबंदी करके वर्ग संघर्ष को तेज़ करना हो

संक्षेप में, ठोस परिस्थितिओं की सही समझ के लिए, वर्ग संघर्ष को आगे बढ़ाने को सक्षम सही राजनीतिक-कार्यनीतिक लाइन बनाने के लिए और मकसद को हासिल करने लायक सही सांगठनिक तरीकों को लागू करने के लिए, मनोवाद से संघर्ष अति आवश्यक है। सभी स्तरों पर, मनोवाद क्रांतिकारी आंदोलन को आगे बढ़ने से रोक सकता है।

मनोवाद, अध्ययन का एक गलत तरीका

चीनी क्रांति के दौरान, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी के पार्टी स्कूल के उद्घाटन पर बोलते हुए, माओ ज़ेदॉंग कहते हैं: “मनोवाद अध्ययन का एक गलत तरीका है; यह मार्क्सवाद-लेनिनवाद के खिलाफ है और कम्युनिस्ट पार्टी के साथ मेल नहीं खाता। हम जो चाहते हैं वह मार्क्सवादी-लेनिनवादी अध्ययन का तरीका है। जिसे हम अध्ययन का तरीका कहते हैं, उसका ताल्लुक सिर्फ पार्टी स्कूलों में अध्ययन के तरीके नहीं, बल्कि पूरी पार्टी में अध्ययन के तरीके से है। यह हमारे नेतृत्वकारी समितियों, सभाओं या परिषदों के साथी, सभी पार्टी कैडर तथा पार्टी सदस्यों के सोचने के तरीके का सवाल है, मार्क्सवाद-लेनिनवाद के प्रति हमारे नज़रिए का सवाल है, पार्टी के सभी साथियों का अपने काम के प्रति नज़रिए का सवाल है। इस तरह, यह बहुत ज़्यादा, बल्कि सबसे ज़रूरी, अहम सवाल है।”

पार्टी स्कूल में हमारे साथियों को मार्क्सवादी सिद्धांत को बेजान मताग्रह नहीं मानना ​​चाहिए। मार्क्सवादी सिद्धांत में महारत हासिल करना और उसे लागू करना ज़रूरी है; लागू करने के उद्देश्य से ही उसमें महारत हासिल करें। अगर आप एक या दो व्यवहारिक समस्याओं को स्पष्ट करने में मार्क्सवादी-लेनिनवादी नज़रिए को लागू कर सकते हैं, तो आपकी तारीफ़ होनी चाहिए और आपको कामयाबी का कुछ श्रेय मिलना चाहिए। आप जितनी अधिक समस्याओं को स्पष्ट करेंगे और जितने विस्तार गहराई में जा कर स्पष्ट करेंगे, आपकी कामयाबी भी उतनी ही ज़्यादा होगी। मार्क्सवाद-लेनिनवाद के अध्ययन के बाद छात्र चीन की समस्याओं को किस नज़रिए से देखते हैं, समस्याओं को साफ़ तौर पर देख पाते हैं अथवा नहीं, या वे उन्हें देख भी पाते हैं अथवा नहीं, इसके आधार पर हमारी पार्टी स्कूल को उन्हें 'अच्छा' या 'खराब' ग्रेड देने का नियम भी बनाना चाहिए।” (माओ त्से-तुंग, चयनित रचनाएँ, खंड III, पृष्ठ 36-38)

माओ साफ़ तौर पर लेनिन की शिक्षाओं से प्रेरणा ले रहे थे — चाहे वह मार्क्सवाद के बारे में उनके दार्शनिक अध्ययन की हों या किसी ठोस स्थिति के बारे में सही निष्कर्ष पर पहुँचने की हों। मज़दूर वर्ग के आंदोलन में हर तरह की भटकाव वाली प्रवृत्तियों के ख़िलाफ़ सफल संघर्ष के लिए बाद वाली बात (ठोस स्थिति के बारे में सही निष्कर्ष पर पहुँचना) बहुत महत्वपूर्ण है।

सैद्धांतिक रूप से, लेनिन अपनी रचना 'कॉन्स्पेक्टस ऑफ़ हेगेल्स साइंस ऑफ़ लॉजिक' (Conspectus of Hegel’s Science of Logic) में कांट (Kant) के दार्शनिक विचारों पर चर्चा करते हुए मनोवाद (subjectivism) — यानी अनुभव के तथ्यों को एकतरफ़ा ढंग से लेने’ — के ख़िलाफ़ संघर्ष करने की ज़रूरत को रेखांकित करते हैं[मनोवाद की व्याख्या करते हुए – अनु0] लेनिन कहते हैं: "अनुभव को उसकी ठोस समग्रता में नहीं, बल्कि केवल उदाहरण के तौर पर, और केवल उसी दिशा में लेना और प्रस्तावित करना ​​जो परिकल्पनाओं और सिद्धांत के लिए काम का हो। इस तरह ठोस अनुभव को पहले से तय धारणाओं के अधीन कर दिया जाना, जिससे सिद्धांत का आधार धुंधला हो जाता हो और केवल उसी पहलू से दिखाया जाना जो सिद्धांत के अनुकूल हो।" (वी. आई. लेनिन, कलेक्टेड वर्क्स, खंड 38, फिलॉसॉफिकल नोटबुक्स, पृष्ठ 210)

CPI(M) का गठन – भारत की परिस्थितिओं का सही मूल्यांकन

भारत की परिस्थिति पर मार्क्सवाद-लेनिनवाद के इसी वैज्ञानिक प्रयोग के आधार पर ही सीपीआई(एम) के गठन की नींव रखी गई थी। कुछ वैचारिक मुद्दों पर 20वें कांग्रेस के प्रस्ताव में कहा गया है:

"भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की स्थापना उस संशोधनवादी भटकाव के खिलाफ़ एक ज़बरदस्त लड़ाई के आधार पर हुई थी, जिसने उस समय की अविभाजित सीपीआई को अपनी चपेट में ले लिया था और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन – और इस तरह हमारी जनता की मुक्ति – को पटरी से उतारने का गंभीर खतरा पैदा कर दिया था। पार्टी के भीतर, भारतीय क्रांति की रणनीति और तौर-तरीकों तथा भारतीय शासक वर्गों की बनावट और चरित्र के सही मूल्यांकन पर केंद्रित ज़बरदस्त वैचारिक संघर्ष के बाद, संशोधनवाद से निर्णायक रूप से अलग होकर सीपीआई(एम) मार्क्सवाद-लेनिनवाद के क्रांतिकारी सिद्धांतों को बनाए रखने और उन्हें भारत की ठोस परिस्थितियों में लागू करने के लिए प्रतिबद्ध होकर सामने आई।

इसके तुरंत बाद, सीपीआई(एम) को वामपंथी दुस्साहसी संकीर्णतावादी भटकाव का सामना करना पड़ा और वैचारिक रूप से उन प्रवृत्तियों से लड़ना पड़ा, जिन्होंने एक बार फिर भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन को पटरी से उतारने का खतरा पैदा कर दिया था। इस वैचारिक लड़ाई के साथ-साथ हिंसक शारीरिक हमलों का सामना करना और उन पर काबू पाना भी शामिल था, जिनमें हमारे कई साथी शहीद हुए।

इन भटकावों के खिलाफ़ संघर्षों की सफलता और भारत की जनता के शानदार जुझारू संघर्षों की विरासत ने सीपीआई(एम) को देश की सबसे मज़बूत और अग्रणी कम्युनिस्ट और वामपंथी ताकत के रूप में उभरने में मदद की। इसने इन वैचारिक लड़ाइयों में हमारे मार्क्सवादी-लेनिनवादी रुख की सही होने की बात को ज़ोरदार ढंग से साबित किया।

वैचारिक भटकावों के खिलाफ़ सीपीआई(एम) का संघर्ष और मार्क्सवाद-लेनिनवाद तथा सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद की क्रांतिकारी भावना को बनाए रखने का उसका दृढ़ प्रयास, घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सामने आने वाले सभी भटकावों पर लगातार बहस करने पर आधारित था। इसमें अक्सर उस समय की दो बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट ताकतों – सोवियत रूस की कम्युनिस्ट पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी – का वैचारिक रूप से सामना करना भी शामिल था। इन्हीं वैचारिक संघर्षों ने हमारी पार्टी को न केवल सबसे मज़बूत कम्युनिस्ट और वामपंथी ताकत के रूप में उभरने की शक्ति दी है, बल्कि भारत की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा पर दबाव डालने और प्रभाव डालने में भी सक्षम बनाया है।”(कुछ वैचारिक मुद्दों पर प्रस्ताव, पैरा 1.5 से 1.8, CPI(M) का 20वां कांग्रेस, कोझिकोड, केरल, 4-9 अप्रैल, 2012)

अन्य कारकों के अलावा, भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में भटकाव के कारणों में, भारतीय क्रांति के चरण, आज़ादी के बाद के भारतीय शासक वर्गों का चरित्र तथा वैकल्पिक शासक वर्गों की बनावट व प्रकृति के बारे में पहले से बनी धारणाएं शामिल थीं, जो उस समय हमारे देश में मौजूद वास्तविक परिस्थितिओं से कटे हुए थे।

रूसी अनुभव से सीखना

रूसी क्रांति के दौरान लेनिन को ऐसी प्रवृत्तियों का सामना करना पड़ा था। मज़दूर वर्ग आंदोलन में विभिन्न धाराओं की ताकत के बारे में वस्तुनिष्ठ आंकड़े’  पर आधारित अपने काम में, प्लेखानोव और ट्रॉट्स्की दोनों के मनोवादी नज़रिए (subjectivism) का मुकाबला करते हुए लेनिन कहते हैं: "हर कदम पर वे अपनी इच्छाओं, अपने विचारों, परिस्थिति के बारे में अपने आकलन और अपनी योजनाओं को मज़दूरों की इच्छा और मज़दूर वर्ग आंदोलन की ज़रूरतों के तौर पर पेश करने की कोशिश करते हैं।" (वी. आई. लेनिन, कलेक्टेड वर्क्स, खंड 20, दिसंबर 1913-अगस्त 1914, पृष्ठ 382)

असल में, क्रांति के चरणों की जो अवधारणा लेनिन ने सैद्धांतिक रूप से रखी थी, वह वास्तविक हालात के वस्तुनिष्ठ अध्ययन से ही निकली थी। रूसी क्रांतिकारी आंदोलन के भीतर वर्गीय विचलन का मुकाबला करते हुए 'कार्यनीति पर पत्र' (Letter on Tactics) में वे कहते हैं: "लेकिन क्या हमें मनोवाद (subjectivism) में पड़ने का खतरा नहीं है? क्या हम पूंजीवादी-जनवादी क्रांति को 'लांघ कर' – जो अभी पूरी नहीं हुई है और जिसने अभी तक किसान आंदोलन को श्रांत नहीं किया हैसमाजवादी क्रांति तक पहुँचना नहीं चाह रहे हैं?” (लेनिन, कलेक्टेड वर्क्स, खंड 24, पृष्ठ 48)

आइए, ठोस परिस्थितिओं का सही अंदाज़ा लगाने की हमारी कोशिशों के संदर्भ में लेनिन की इन बातों की प्रासंगिकता पर गौर करें। जैसा कि ऊपर कहा गया है, मनोवादी सोच (subjectivism) से निपटना एक लगातार चलने वाली लड़ाई है। कई बार ऐसा होता है कि हम स्थिति का सही और वस्तुपरक आकलन करने के बजाय, मौजूदा स्थिति को अपनी पहले से बनी-बनाई मनोवादी सैद्धांतिक सोच के ढांचे में फिट करने की कोशिश करते हैं। इससे अक्सर गलत नतीजे निकलते हैं।

व्यक्तिवादी सोच: हमारे अनुभव से कुछ उदाहरण

ऐसी गलतियों के कई उदाहरण हैं। खैर, उदाहरण के तौर पर, आइए 2008 और 2009 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर अपना समर्थन वापस लेने और उसके बाद अपनाई गई चुनावी कार्यनीति के बारे में हमारी पार्टी के अनुभव पर विचार करें। अप्रैल 2012 में 20वें अधिवेशन में अपनाई गई राजनीतिक-संगठनात्मक रिपोर्ट में, 2009 के आम चुनावों के बाद केंद्रीय समिति द्वारा किए गए चुनावी समीक्षा को दोहराते हुए कहा गया है: “समर्थन वापस लेने का फैसला अक्टूबर-नवंबर 2007 में ही लागू कर दिया जाना चाहिए था, जब सरकार को बातचीत के लिए आइएइए (IAEA) के पास जाना था। वही वह समय था जब समझौते को रोकने का कोई मौका था। उस समय ऐसा न करना एक गलती थी। भारत-अमेरिका परमाणु समझौते और अमेरिका के साथ रणनीतिक गठबंधन के प्रति प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेतृत्व की गहरी प्रतिबद्धता को देखते हुए, उन्होंने परमाणु समझौते को खतरे में डालने के बजाय वामपंथियों से नाता तोड़ना बेहतर समझा। पोलित ब्यूरो और केंद्रीय मिटी ने, शासक वर्गों और अमेरिकी साम्राज्यवाद के रणनीतिक गठबंधन के हिस्से के तौर पर, परमाणु समझौते को आगे बढ़ाने के उनके दृढ़ संकल्प और क्षमता को कम करके आंका। हमने घटनाओं को प्रभावित करने की अपनी ताकत और क्षमता को भी बढ़ा-चढ़ाकर आंका। सरकार को बातचीत के लिए आइएइए (IAEA) के पास जाने देना और यह उम्मीद करना कि कांग्रेस समझौते को लागू करने की दिशा में आगे न बढ़ने की समझ का पालन करेगी, गलत था।” (CPI(M) के 20वें कांग्रेस की राजनीतिक-संगठनात्मक रिपोर्ट, कोझिकोड, केरल, 4-9 अप्रैल, 2012)

इसी तरह, उस समय अपनाई गई चुनावी रणनीति और चुनावी-रणनीतिक लाइन के बारे में, केंद्रीय समिति द्वारा पहले किए गए चुनावों की समीक्षा के आधार पर 20वें कांग्रेस की राजनीतिक-संगठनात्मक रिपोर्ट में कहा गया है: "समीक्षा में दो बातें सामने आईं। पहली, तीन या चार राज्यों में गैर-कांग्रेसी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के साथ बनाया गया गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी विकल्प पेश करने का आधार नहीं बन सकता था। दूसरी, हमें 'वैकल्पिक धर्मनिरपेक्ष सरकार' बनाने का आह्वान नहीं करना चाहिए था, बल्कि इसके बजाय गैर-कांग्रेसी, गैर-बीजेपी विकल्प को मजबूत करने के आह्वान पर ही कायम रहना चाहिए था।" (सीपीआई(एम) के 20वें कांग्रेस की राजनीतिक-संगठनात्मक रिपोर्ट, कोझिकोड, केरल, 4-9 अप्रैल, 2012)

एक और उदाहरण पर विचार करें। पार्टी की केंद्रीय मिटी और पार्टी कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में सिंगुर मोटर कार प्रोजेक्ट के लिए ज़मीन अधिग्रहण और नंदीग्राम में केमिकल हब की घोषणा के संबंध में हुई गलतियों और कुप्रबंधन को आत्म-आलोचनात्मक ढंग से स्वीकार किया। पश्चिम बंगाल में ज़मीन अधिग्रहण के ये न तो पहले उदाहरण थे और न ही आखिरी। फिर भी, सिंगुर में ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया से पहले वह पूरी तैयारी नहीं की गई थी जो सीपीआई(एम) और वाम मोर्चा आमतौर पर ज़मीन अधिग्रहण के मुद्दे पर सभी ज़मीन मालिकों के साथ चर्चा करके और आपसी सहमति से मुआवज़ा और पुनर्वास पैकेज तय करके करते हैं। सिंगुर में इन प्रक्रियाओं का पालन न करने का एक मुख्य कारण यह था कि हमने 2006 के विधानसभा चुनावों में 294 में से 235 सीटें जीतकर भारी जीत हासिल की थी। उस समय वाम मोर्चा को कुल वोटों [मतपेटी में गिरे] का 50.18 प्रतिशत वोट मिला था। पश्चिम बंगाल में तेज़ी से औद्योगीकरण कार्यक्रम के मुद्दे पर लड़े गए चुनावों में मिली इस जीत के आधार पर, वाम मोर्चा सरकार ने सिंगुर में ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया को बिना आम तैयारी के ही आगे बढ़ाया। यह सोचकर कि चूँकि हमें भारी जीत मिली है, इसलिए लोगों ने हमारे प्रस्तावित औद्योगीकरण कार्यक्रम को मंज़ूरी दे दी है।

लेकिन, जैसा कि लेनिन ने कहा, हमने इस सच्चाई का सिर्फ़ एक पहलू देखा। दूसरा पहलू यह था कि 2004 के संसदीय चुनावों की तुलना में, 2006 के विधानसभा चुनावों में सीपीआई(एम) का प्राप्तमत प्रतिशत (वोटिंग परसेंटेज) 38.57 परसेंट से घटकर 37.13 परसेंट हो गया। इसलिए, जबकि हमने असेंबली में लगभग तीन-चौथाई सीटें जीतीं, वोटिंग परसेंटेज के मामले में थोड़ी गिरावट आई। अगर इसे ठीक से समझा जाता, तो सिंगूर में ज़मीन अधिग्रहण के लिए आगे बढ़ने से पहले पूरी तरह से होमवर्क करने की अहमियत पर ज़ोर दिया जाता। बदकिस्मती से, इस पहलू को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। वस्तुगत स्थिति को पूरी तरह से न देखने के अलावा, ऐसी गलतियाँ भी हुईं जिनके कारण जनता से हमारा अलगाव और बढ़ गया।

दूसरे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय कारणों का भी, सीपीआई(एम) और वाम मोर्चा के अनुवर्ती सापेक्ष 'अलगाव' में योगदान रहा। इसके बाद, 2009 के संसदीय चुनाव और 2011 के विधानसभा चुनाव में सभी विपक्षी दलों का बिना किसी सिद्धांत के गँठजोड़ हुआ, जिसमें साम्प्रदायिक और रूढ़िवादी ताकतों से लेकर हिंसा की राजनीति समेत माओवादियों तक शामिल थी। परिणामस्वरूप पार्टी को भारी चुनावी झटका लगा। जबकि वाम मोर्चा और बाकी पूरे विपक्ष का मतदाता समर्थन (वोटर सपोर्ट) लगभग बराबर था, 2006 में हमने अपने ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ (पहले आओ पहले पाओ) चुनावी प्रणाली के तहत बड़ी संख्या में सीटें खो दीं।

इस तरह, ज़मीन के मुद्दे को संभालने में उन गलतियों और कमियों के अलावा, जिन्हें पार्टी ने सेंट्रल कमेटी और पार्टी कांग्रेस में खुद की आलोचना करते हुए नोट किया था, यह असलियत का एकतरफ़ा अंदाज़ा ही था जिसकी वजह से बाद में गलत फैसले और तरीके लिए गए।

पहले से तय नतीजों के बजाय ठोस हकीकत के आधार पर वस्तुपरक आकलन को महत्व दिया जाना, पार्टी संगठन की काबिलियत बनाने और मौजूदा कामों को पूरा करने का एक आवश्यक तत्व है।

चीनी अनुभव के कुछ उदाहरण

चीनी क्रांति का अनुभव, भले ही संदर्भ और समय दोनों में अलग हो, हमें कीमती सबक देता है। बीजिंग के पीपल्स पब्लिशिंग हाउस का सम्पादक मंडल, जिसने माओ ज़ेदॉंग की चुनी हुई रचनाओं को छापा था, ने माओ के लेक्चर 'ऑन प्रैक्टिस' को दोबारा छापते हुए अपने नोट में यह कहा:

“हमारी पार्टी में कई ऐसे साथी थे जो कट्टर थे और जिन्होंने लंबे समय तक चीनी क्रांति के अनुभव को नकार दिया, इस सच्चाई को नकारते हुए कि मार्क्सवाद कोई कट्टरता नहीं बल्कि काम करने का एक तरीका है’, और जनता को मार्क्सवादी रचनाओं के, संदर्भ से अलग कर पेश किए गए शब्दों और वाक्यों से डराते रहे। कई ऐसे साथी भी थे जो अनुभववादी थे और जिन्होने लंबे समय तक खुद को अपने अधूरे अनुभव तक ही सीमित रखा और क्रांतिकारी अभ्यास के लिए सिद्धांत के महत्व को नहीं समझा या क्रांति को पूरी तरह से नहीं देखा; आँख बंद करके, लेकिन मेहनत से काम किया। इन दो तरह के साथियों, और खासकर कट्टरपंथियों के गलत विचारों ने 1931-34 के दौरान चीनी क्रांति को बहुत नुकसान पहुँचाया, और फिर भी कट्टरपंथियों ने खुद को मार्क्सवादी बताकर बहुत से साथियों को भ्रमित किया। ऑन प्रैक्टिस इसलिए लिखा गया था ताकि पार्टी में कट्टरवाद और अनुभववाद की मनोगत गलतियाँ, और खासकर, ज्ञान के मार्क्सवादी सिद्धांत के नज़रिए से कट्टरवाद की गलतियाँ उजागर हो सके। इसका शीर्षक ऑन प्रैक्टिस [अभ्यास पर] था क्योंकि इसका ज़ोर कट्टर किस्म के मनोगतवाद को सामने लाने पर था, जो अभ्यास को छोटा समझता है। इस निबंध में शामिल विचार कॉमरेड माओ त्से-तुंग ने येनान में जापान-विरोधी सैन्य राजनीतिक कॉलेज में दिए गए एक लेक्चर में पेश किए थे।”

माओ यहाँ बताते हैं कि पार्टी के साथियों को मनोगत [वस्तुपरक के विपरीत आत्मपरक – अनु0] बातों का शिकार होने से बचने के लिए कैसे काम करने की ज़रूरत है: “अगर कोई आदमी अपने काम में सफल होना चाहता है, यानी उम्मीद के मुताबिक नतीजे पाना चाहता है, तो उसे अपने विचारों को बाहरी दुनिया के नियमों के मुताबिक बनाना होगा; अगर वे मेल नहीं खाते, तो वह अपने अभ्यास में असफल हो जाएगा। असफल होने के बाद, वह अगर अपने सबक सीखे, अपने विचारों को बाहरी दुनिया के नियमों के मुताबिक बनाने के लिए उन्हें ठीक करे, और इस तरह असफलता को सफलता में बदल दे, ही ‘असफलता सफलता की माँ है और गड्ढे में गिरना, आपकी अक्ल में बढ़ोतरी कहलाता है। (माओ त्से तुंग, सिलेक्टेड वर्क्स, वॉल्यूम I, पेज 296-297)

कॉमरेड माओ यहाँ एक और ज़रूरी बात कह रहे हैं। पार्टी की ज़िम्मेदारियाँ निभाते समय कॉमरेड गलतियाँ कर सकते हैं। गलतियाँ करना कोई गलती नहीं है, लेकिन गलती से न सीखना एक गलती है; गलती क्यों हुई यह न समझना और नतीजतन पक्का करना कि ऐसी गलती दोबारा हो, एक गलती है। आखिर में, गलती को न सुधारना और गलत समझ के साथ बने रहना एक गलती है। स्टालिन की कही गई एक बात प्रसिद्ध है कि सिर्फ़ वही साथी गलतियाँ नहीं करते जो बिल्कुल काम नहीं करते। अपना काम करते समय, कम्युनिस्ट गलतियाँ कर सकते हैं, ज़रूरी यह है कि उन्हें सुधारा जाए और यह पक्का किया जाए कि वे दोबारा न हों।

यह इस बात पर ज़ोर देता है कि एक साथी को हाथ में लिए गए काम को करने के लिए पूरी तरह तैयार रहना चाहिए। इसी तरह के एक मामले में, माओ कहते हैं: “‘मैं निश्चित नहीं हूँ कि मैं इसे संभाल पाऊंगा’, – अक्सर यह बात हम तब सुनते हैं जब कोई साथी कोई काम लेने में हिचकिचाता है। उसे खुद पर यकीन क्यों नहीं है? क्योंकि उसे उस काम के अंतर्निहित वस्तु और परिस्थिति की कोई व्यवस्थित समझ नहीं है, या क्योंकि उसका ऐसे काम से बहुत कम या बिल्कुल ही कोई संबंध नहीं रहा है, और इसलिए उस काम को संचालित करते नियम उसकी समझ से बाहर हैं। काम की प्रकृति और परिस्थिति का विशद में विश्लेषण करने के बाद, उसे खुद पर ज़्यादा यकीन होगा और वह खुशी-खुशी काम करेगा। अगर वह काम पर कुछ समय बिताता है और अनुभव हासिल करता है और अगर वह ऐसा इंसान है जो मामलों को, मनोगत, एकतरफ़ा और ऊपरी तौर पर देखने के बजाय खुले दिमाग से देखने को तैयार है, तो वह खुद के लिए नतीजा निकाल सकता है कि काम को कैसे करना है और नतीजे में उस काम को ज़्यादा हिम्मत के साथ कर सकता है। सिर्फ़ वही लोग जो समस्या को मनोगत, एकतरफ़ा और ऊपरी तौर पर देखते हैं, वे ही मौके पर पहुँचते ही बिना हालात पर सोचे, बिना चीज़ों को उनके समूचेपन (उनका इतिहास और उनकी पूरी मौजूदा स्थिति) में देखे और बिना उनके सार (उनकी प्रकृति और सभी चीज़ों की आपसी अंदरूनी संबंध) तक पहुँचे, आत्मसंतुष्ट भाव से आदेश या निर्देश जारी करेंगे। ऐसे लोगों का ठोकर खाना और गिरना तय है।” (माओ त्से तुंग, सिलेक्टेड वर्क्स, वॉल्यूम I, पेज 302)

इस सब से यह साफ़ है कि ठोस परिस्थिति का सही अध्ययन, अंतत:, हर एक साथी की उस काबिलियत पर आधारित होती है जो वह हासिल करता हैयानी, यह खास तौर पर उस स्वाध्याय पर आधारित है जो, पार्टी के स्टडी क्लास और स्कूलिंग के तय प्रोग्राम के अलावा साथियों को लगातार करने की ज़रूरत होती है।अंतत: साथियों के लिए यह उनकी पूरी ज़िंदगी लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। इसके बिना मौजूदा कामों को अच्छे से पूरा करना मुमकिन नहीं है।

जनता से सीखें

लियू शाओकी ने अपनी रिपोर्ट ऑन द रिविज़न ऑफ़ द पार्टी कॉन्स्टिट्यूशन में, जो एक बुकलेट ‘ऑन द पार्टी’ के तौर पर पब्लिश हुई है, कहा है: “जनता अपना इतिहास खुद बनाती हैं। उनकी मुक्ति उनकी अपनी चेतना और इच्छा पर आधारित होनी चाहिए। वे अपना अगुआ चुनते हैं, और उसके नेतृत्व में वे खुद को संगठित करते हैं और अपनी आज़ादी के लिए लड़ते हैं। सिर्फ़ इसी तरह वे अपने संघर्षों के नतीजों को सुरक्षित रखने, बनाए रखने और मज़बूत करने के लिए सचेत कोशिशें कर सकते हैं। जनता के दुश्मनों को सिर्फ़ जनता ही उखाड़ फेंक सकती है। यह किसी और तरीके से नहीं किया जा सकता। अपनी असली चेतना और लामबंदी के बिना, सिर्फ़ उनके अगुआ की कोशिशें लोगों को आज़ादी दिलाने, तरक्की करने या कुछ भी हासिल करने के लिए काफ़ी नहीं होंगी। यहाँ तक कि ऐसे काम जो लोगों के तुरंत के हितों से जुड़े हैं, जैसे किराया और ब्याज कम करना, या लेबर-एक्सचेंज टीम और को-ऑपरेटिव बनाना, उनका नतीजा दिखावटी कमी या औपचारिक, खोखली चीज़ें ही होगा, जब तक कि वे काम, दूसरों के द्वारा उनके लिए कर दिए जाने या उनके लिए संगठित किए जाने के बजाय, खुद न किए जाएँ।”

“कम्युनिस्टों का उद्देश्य जनता का उद्देश्य है। चाहे हमारे कार्यक्रम और नीतियाँ कितने भी सही क्यों न हों, उन्हें जनता के प्रत्यक्ष समर्थन और लगातार संघर्ष के बिना लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए, हमारी समझ यही है कि जब तक सब कुछ जनता की राजनीतिक चेतना और सक्रिय होने की इच्छा पर निर्भर और तय नहीं होता, हम कुछ भी हासिल नहीं कर सकते और हमारी सारी कोशिशें बेकार जाएंगी। उनकी राजनीतिक चेतना और सक्रियता की इच्छा पर भरोसा करके, उनकी सच्ची जागरूकता और लामबंदी के साथ और पार्टी के सही नेतृत्व के साथ, हम निश्चित ही जीतेंगे और सभी पहलुओं पर अपनी पार्टी के महान उद्देश्य को हासिल करेंगे। इसलिए, जब जनता पूरी तरह से जागृत नहीं होती है, तो कम्युनिस्टों का, जो जनता के अगुआ हैं, किसी भी तरह का काम करने में यह कर्तव्य है कि वे हर असरदार और सही तरीके से उनकी चेतना को विकसित करें। यह हमारे काम का पहला कदम है और इसे अच्छी तरह से किया जाना चाहिए, चाहे यह कितना भी मुश्किल और समय लेने वाला क्यों न हो। पहला कदम उठाने के बाद ही हम दूसरा कदम शुरू कर सकते हैं।” (लियू शाओकी के चुने हुए काम, वॉल्यूम I, पेज 347)

और, “अगर हम आम जनता से सीखने के बजाय, खुद को चालाक समझें और अपनी कल्पना से योजना बनाकर या पुराने या विदेशी अनुभवों के आधार पर योजना बनाकर आम जनता की समझ को बढ़ाने और उन्हें ‘राह दिखाने’ की कोशिश करें, तो ह कोशिश ज़रूर बेकार साबित होगी। आम जनता से सीखते रहने के लिए, हमें एक पल के लिए भी उनसे अलग नहीं रहना चाहिए। अगर हम खुद को उनसे अलग कर लेंगे, तो हमारा ज्ञान बहुत कम हो जाएगा और हम निश्चित रूप से उन्हें नेतृत्व देने लायक चालाक, जानकार, दक्ष या सक्षम नहीं होंगे।” (लियू शाओकी के चुने हुए काम, वॉल्यूम I, पेज 349)

काम करने के तरीके को सुधारना

मनोवाद सांगठनिक फैसलों पर कई तरह से असर डाल सकता है। कैडरों की ताकत और कमज़ोरियों के गलत वस्तुपरक मूल्यांकन के कारण उन्हे गलत काम सौंपे जा सकते हैं। अगर सही मूल्यांकन न किये जाएं, तो व्यक्तिपरक विचार के आधार पर निजी पसंद-नापसंदगियों पर जोर होगा और कैडर का सही मूल्यांकन नहीं हो पाएगापार्टी संगठन के लिए उसके अनर्थकारी नतीजे हो सकते हैं। याद रखें, स्टालिन ने एक बार कहा था कि एक अच्छे संगठनकर्ता की खूबी 'सही काम सही साथी को सौंपने' में है। व्यक्तिपरक सोच या मनोवाद (subjectivism) इसे होने से रोकती है, जिसके गंभीर नतीजे होते हैं।

नेतृत्व की तरफ से ऐसी पसंद-नापसंद का नतीजा यह होता है कि कैडर में चापलूसी और 'नेतृत्व को खुश करने' का आचरण पनपता है। इस प्रवृत्ति के कारण निचले स्तर से रिपोर्टिंग में स्थिति का सही और निष्पक्ष विवरण देने के बजाय 'नेतृत्व क्या सुनना चाहता है' इसे ध्यान में रखा जाता है।

पिछले दशक के अपने अनुभव से हमने देखा है कि कैसे नीचे से आई ऐसी रिपोर्टिंग के कारण मनोगत और बढ़ा-चढ़ाकर किए गए आकलन हुए, जिनमें बंगाल और केरल जैसे हमारे गढ़ों में चुनावी नतीजों के आकलन भी शामिल थे। वोटिंग खत्म होने के बाद भी, हमारी बूथ कमेटियों की रिपोर्ट के आधार पर पार्टी सेंटर को हमारे प्रदर्शन के बारे में आकलन भेजे गए। हालाँकि, इन चुनावों के असल नतीजों से पता चला कि हमारे आकलन पूरी तरह गलत थे। यह या तो मनोवादी और बढ़ा-चढ़ाकर किए गए आकलन पर आधारित था, या फिर खतरनाक तरीके से, निचले स्तर से ऐसे आकलन पहुंचाए गए जो 'नेतृत्व सुनना चाहता था'। साफ़ है कि हमारे आकलन नीचे से आई रिपोर्टिंग के आधार पर मनोवादी ढंग से तय किए गए थे, और यह एहसास नहीं किया गया कि आम लोगों के साथ हमारे संबंध इतने कमज़ोर हो गए हैं कि ऐसे गलत आकलन को बढ़ावा मिल रहा है। नीचे से आई रिपोर्टिंग उन लोगों पर भी आधारित हो सकती है जिन्हें हम अपना समर्थक मानते थे और जिन पर भरोसा करते थे, लेकिन जिन्होंने हमें छोड़ दिया था, और हमें इसकी भनक तक नहीं लगी। यह इन सभी वजहों या/और कई अन्य कारकों के मेल का नतीजा हो सकता है।

हमारे संगठनात्मक काम के संदर्भ में, मनोवादी सोच के कारण कई गंभीर कमियाँ भी आ सकती हैं, जैसे साथियों के बीच दोस्ताना व्यवहार की कमी, व्यक्तिवाद, और 'एक-दूसरे से आगे निकलने' की अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा आदि। ऐसी चीज़ों से ठोस परिस्थितिओं का गलत आकलन होता है और जनता के साथ हमारे संबंध और कमज़ोर होते हैं।

ऐसे हालात में, पार्टी के तौर पर हमारे लिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम हर स्तर पर मनोवादी सोच का मुकाबला करें। 'ठोस परिस्थितिओं' में हो रहे बदलावों का सही, वस्तुपरक आकलन और अंदाजा के लिए इससे निपटना ज़रूरी है। इन ठोस परिस्थितिओं का वैज्ञानिक मूल्यांकन करके सही मार्क्सवादी-लेनिनवादी 'ठोस विश्लेषण' तक पहुँचने और उसके आधार पर संगठनात्मक तरीके और उपाय तय करने के लिए मनोवादी सोच (subjectivism) से निपटना ज़रूरी है।

पार्टी की राजनीतिक-कार्यनीतिक लाइन का विकास इसी पर बहुत हद तक निर्भर करता है। इस प्रक्रिया में होने वाली कोई भी गलती गलत राजनीतिक और रणनीतिक लाइन की ओर ले जा सकती है और पार्टी को दक्षिणपंथी संशोधनवाद या वामपंथी दुस्साहसवाद जैसी गलतियों का शिकार बना सकती है।

इसलिए, भारत में क्रांति के जन-लोकतांत्रिक चरण को सफलतापूर्वक पूरा करके समाजवाद के संघर्ष को सफल बनाने की हमारी कोशिशों के एक अहम हिस्से के तौर पर, यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम आज के घटनाक्रम का मार्क्सवादी-लेनिनवादी विश्लेषण करें। इसमें सबसे ज़रूरी है कि हम हर स्तर पर मनोवादी सोच का मुकाबला करें, ताकि वर्गीय ताकतों के आपसी संतुलन को अपने पक्ष में बदला जा सके। देश में अपने क्रांतिकारी रणनीतिक लक्ष्य को हासिल करने हेतु संघर्षों को आगे बढ़ाने के लिए यह बहुत ज़रूरी है।

सीपीआई(एम) ने अच्छी तरह विचार-विमर्श करने के बाद अपनी 21वीं कांग्रेस में पार्टी की मौजूदा राजनीतिक-कार्यनीतिक लाइन को अपनाया है। हालाँकि, संगठनात्मक प्लेनम में हम जो फैसले लेंगे, वे ही इस राजनीतिक और कार्यनीतिक लाइन को असरदार ढंग से लागू करने की हमारी क्षमता तय करेंगे। यह क्षमता, बदले में, आम जनता के साथ पार्टी के रिश्तों को मज़बूत करने के लिए ज़रूरी संगठनात्मक फैसले लेने पर बहुत हद तक निर्भर करती है। यही हमारा अभी का काम है।

इसलिए, तीनों स्तरों पर – ठोस परिस्थितिओं का सही आकलन, ठोस विश्लेषण का वैज्ञानिक आधार, और सही संगठनात्मक तरीके व फैसले जो भारतीय जनता के साथ हमारे जीवंत रिश्तों को मज़बूत करेंगे – मनोवादी सोच का, जो कई रूपों में सामने आती है, मुकाबला करना एक ज़रूरी काम है जिसे पूरी पार्टी को मिलकर करना होगा।

January 11, 2016
The Marxist, XXXI 3, July–September 2015
https://cpim.org/combating-subjectivism/

 


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