Tuesday, April 6, 2021

जालियांवालाबाग जनसंहार के बाद रवीन्द्रनाथ का पत्र - अमल होम

 सन 1919, मार्च का महीना।

पुरानी दिल्ली के वाइसॉराय के घर पर – अभी जहाँ दिल्ली विश्वविद्यालय है – इम्पिरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल का अधिवेशन चल रहा है। बंगाल एवं पंजाब के क्रांतिवादियों को ठंडा करने के बहाने रौलट कानून की जंजीरों में इस देश के बंधनों को और मजबूत करने की कोशिश में जुट गई है सरकार। कौंसिल में उनके प्रतिनिधि हैं होम मेम्बर सर विलियम विन्सेंट। जबरदस्त उस्ताद सिविलियन। बहुत मुलायम – बिल्कुल मिछरी की छुरी। लॉबी में दौड़ते हुए आकर सुरेन बनर्जी महाशय को ओवरकोट पहना देते हैं, श्रीनिवास शास्त्री के साथ बिना मुस्कुराए बात नहीं करते, और मालवीयजी की बात, मुंह से निकलने के पहले ही जैसे लपक लेते हैं। कौंसिल के अन्दर उनका दूसरा चेहरा है। वहाँ पिछले पन्द्रह दिनों से जारी है दो तरफों की लड़ाई –

“दंशन-क्षत श्येन-विहंग / जुझे भुजंग सने” [घायल बाज, जुझ रहा है नाग के साथ]

‘बिना युद्ध के नहीं दूंगा सुईभर धरती भी” की सोच रखते हुए देश के प्रतिनिधि विदेश के प्रतिनिधियों के साथ लड़ रहे हैं। मूल प्रस्तावित बिधेयक की एक एक धारा पर पच्चीस पच्चीस ‘सुधार' (amendment) पेश किये गये हैं। अकेले मदनमोहन मालवीय जी ही सब पर भारी हैं; उनके साथ हैं बंगाल के सुरेन्द्रनाथ, मद्रास के श्रीनिवास शास्त्री एवं बम्बई के जिन्ना – उन दिनों के मोहम्मद अली जिन्ना। प्रेस गैलरी में बैठकर सुन रहा हूं उनके जोरदार बहस-मुबाहिसे।

अपराह्न खत्म होकर शाम के करीब पहुँचा है समय। उसदिन के अधिवेशन का भी अन्त होने को आया है। उठ खड़े हुये बड़े लाट बहादुर लॉर्ड चेम्सफोर्ड (उन दिनों लाट बहादुर ही विधानसभा के सभापति हुआ करते थे)। उन्होने घोषणा किया कि उसी रात, रात्रिभोज समाप्त होने के तुरन्त बाद, फिर से अधिवेशन शुरु होगा, नहीं तो इतने सारे सुधारों पर बहस सम्भव नहीं होगा, निर्धारित दिनों में काउंसिल का काम समाप्त नहीं होगा। झट उठ खड़े हुए सुरेन्द्रनाथ। बोले, “But, my Lord, we go to bed at nine! पर हुजूर, हम तो रात के नौ बजे सो जाते हैं!” लॉर्ड चेम्सफोर्ड मुस्कुराते हुए बोले, “Well, Mr. Banerjea, we shall condone your absence! ठीक है मिस्टर बैनर्जी, आपकी अनुपस्थिति पर हम ध्यान नहीं देंगे।”

फिर से कौंसिल का अधिवेशन शुरु हुआ। एक के बाद एक जितने सुधार के प्रस्ताव अल्पसंख्यक देशी सदस्यों द्वारा पेश किया गया था, सारे के सारे, बहुमत गोरे समुदाय एवं उनके काले अनुयायियों के मत की ताकत पर अस्वीकार किये गये। समझ में आ गया कि विधेयक हुबहु पारित हो जायेगा – अगले ही दिन्। गोरे-द्वीप से मिस्टर जस्टिस रौलट प्रभास-तीर्थ पर यूँ ही नहीं आये थे! अधिवेशन के अन्त में निकल रहा था – लॉबी में दिखा कि गृह-सचिव सर विलियम विनसेंट ऐसोसियेटेड प्रेस के प्रधान मिस्टर के सी राय (केशवचन्द्र राय) के साथ बातें कर रहे हैं। करीब से जाते समय अचानक एक शब्द सुनाई दिया – ‘powder’! कुछ समझ नहीं पाया।

केशवबाबु के साथ घूमते हुए, उन्ही की गाड़ी पर होटल लौटने के समय जब कश्मीरी दरवाजा पार कर कुदसियाबाग के भीतर से Maidens की ओर जा रहा था, उनसे मैंने पूछा, “विनसेंट साहब उस वक्त आपको क्या बोल रहे थे?” जबाब मिला, “I smell powder in the air of India, Roy! भारत की हवा में मुझे बारूद का गंध मिल रहा है, रॉय!”

सुनसान पुरानी दिल्ली के रास्ते से गाड़ी दौड़ रही थी; आंखों के सामने उभर आया कौंसिल के ट्रेजरी बेंच पर बैठे हुये गवर्नमेन्ट-मेम्बरों के चेहरे – सिकुड़ी हुई भौंहें, सख्त दबे हुए होंठ; ‘to teach these beggars a lesson’ से उन्हे किसी भी हालत में रोका नहीं जा सकेगा। आंखों के सामने उभर आई एक और तस्वीर – कुछ दिनों पहले जो देख आया था लाहौर में। पुराने शहर के मोचीदरवाजा के पास, मशाल की रोशनी में चल रहा है एक जनसभा। भैंस-गाड़ी पर एक टुल चढ़ा कर, उस पर खड़ा होकर भाषण दे रहा है एक पठान युवक:

ये आपलोग सोचिये, यह नया कानून जो तैयार हो रहा है इसमें – ‘न अदालत, न वकील, न अपील।’ सरकार के एक हाथ में जहर का प्याला, और दूसरे में तलवार – सरकार हमलोगों को तलवार के जोर से जहर का प्याला पिलाना चाहता है। सरकार के हाथ से जहर का प्याला छिन कर तोड़ो जमीन पर – सरकार के हाथ से तलवार छीन कर चलाओ दुशमन पर।”

“शाबाश! शाबाश!” मशालों की रोशनी से लाल हुआ आकाश फट पड़ा भाषण देनेवाले के जयकारों से। सुनने वाले थे सारे दुकानदार, पंसारी, टांगेवाले, फेरीवाले। एक के बाद एक दोनो तस्वीरों को मिलाने पर समझ गया कि संघर्ष अनिवार्य है। घनघोर बादलों को उठते हुये देखा ईशान कोण पर – महसूस किया तूफान का पूर्वाभास – शायद बारूद का भी गंध मिला हवा में!

जनता द्वारा किये जा रहे जोरदार प्रतिवाद के बावजूद रौलट बिधेयक पारित हो गया। पूरे देश में व्यापक आन्दोलन, भीषण तनाव। कानून के खिलाफ सत्याग्रह-प्रतिवाद के लिये गान्धीजी ने अपने साथियों, दोस्तों, पूरे भारत की जनता का आह्वान किया। बज उठा रणदुन्दुभी – चारों ओर। उस दिन सत्याग्रह के हथियार से अन्जान थे लोग, उसी लिये शायद जोश उतना अधिक था।

लेजिस्लेटिव कौंसिल में रौलट विधेयक संबन्धित बहस को कवर करते हुये थक चुका था सहायक सम्पादक। उसकी छुट्टी मंजूर हुई – “ट्रिब्यून” के दफ्तर में। मार्च महीने के बीच में कलकत्ता आया। लाहोर छोड़ने मैं देख आया था कि ओडायारी-शासन के थर्मामीटर का पारा ऊपर चढ़ रहा है, छोटालाट साहब, सर माइकल ओडायार, पॉलिटिकल एजिटेटरों को सीख देने को दृढ़संकल्प हैं। मेरे ‘चीफ’ कालीनाथ राय पर उनका गुस्सा सबसे अधिक था। वह “ट्रिब्यून” के सम्पादक हैं, और बंगाली हैं। काफी उद्विग्न होकर मैं कलकत्ता आया। गान्धीजी ने अपने जानेपहचाने तरीके से पहले बड़ालाट-बहादुर से आवेदन किया कि वह पूरे देश की आपत्ति की उपेक्षा कर रौलट कानून पर अपनी सहमति न दें। आवेदन अनसुना कर दिया गया। गान्धीजी बोले कि अप्रैल महीना के पहले रविवार, 6 तारीख को तमाम हिन्दुस्तान में हड़ताल होगी, और इस “काले कानून” का विरोध करते हुये पूरे देश में “जुलूस” एवं “समावेश” होंगे। उसी से शुरु होगा उनका सविनय अवज्ञा, स्वैच्छिक गिरफ्तारी। दिल्ली के लोग तारीख को लेकर गड़बड़ कर बैठे – रविवार, 31 मार्च को ही हड़ताल कर बैठे। गोली चली – लाल हो गया चांदनी चौक हिन्दु मुसलमान शहीदों के खून से; गोरखा सैनिकों के संगीनों के सामने गेरुआ वस्त्र पहने दीर्घदेही सन्यासी स्वामी श्रद्धानन्द खड़े हुये सीना तान कर। उन्हे जुम्मा मसजिद ले गया मुसलमानों का एक विशाल जुलूस – इसलाम के आचार्य की वेदी पर उन्हे, आर्यसमाज के उस साहसी निडर नेता को खड़ा कर दिया! वहाँ खड़ा होकर उन्होने आह्वान किया, “हिन्दू-मुसलमान एक हो जाओ”! वह आवाज फैल गई दिल्ली से पंजाब तक। ओडायारी-शासन का बुखार और चढ़ गया।

6 अप्रैल को पूरे देश में हड़ताल की लहर के आगोश में आ गये पंचनद के पथरीले प्रान्तर भी। डरी हुई पंजाब सरकार ने अमृतसर के हिन्दु-मुसलिम युगल नेता किचलु एवं सत्यपाल को, डिफेन्स ऑफ इन्डिया ऐक्ट के बल पर अन्जाने जगह पर भेज दिया। अमृतसर के इन दो ‘बेताज राजाओं’ के निर्वासन से क्षुब्ध नि:शस्त्र जनता का एक जुलूस जब अंग्रेज डिप्टी कमिशनर के पास आवेदन करने को जा रहा था, कुछ लोगों को गोली चलवा कर मौत के घाट उतार दिया गया। उसी का हिंसक प्रतिशोध लिया जनता ने – दो बैंक जला कर एवं पाँच निर्दोष गोरे कर्मचारियों को मार कर्। दो मेम साहब भी लांछित हुईं उनके हाथों। इस अनाचार का खबर मिलते ही क्षुब्ध गान्धीजी बम्बई से पंजाब आ रहे थे दौड़ कर; उन्हे ऐन पंजाब की सीमा पर गिरफ्तार कर बम्बई लौटा दिया गया। इस खबर के फैलते ही पूरे पंजाब में आग धधक उठा।

लाहौर की खबर मुझे कलकत्ता में मिल रही थी – कालीनाथ राय के माध्यम से। 8 अप्रैल को कालीबाबु से पत्र मिला कि लाहौर में जोरों का अफवाह है उन्हे ऐरेस्ट किया जायेगा, मैं टेलिग्राम पाते ही पहुँच जाने के लिये तैयार रहूँ। 10 अप्रैल की रात को टेलिग्राम आया, “अभी तुरंत चले आओ”। उस दिन लाहौर जाने का ट्रेन उपलब्ध नहीं था। 11 की रात को पंजाब मेल से रवाना हो गया। उस दिन सुबह कलकत्ते में खबर पहुँची है – अमृतसर में निहत्थी जनता पर गोली चलाई गई, गान्धीजी गिरफ्तार किये गये। सारी दुकानें बन्द, गाड़ियों की आवाजाही बन्द। किसी तरह हावड़ा स्टेशन पहुँचे।

13 अप्रैल को दोपहर 12 बजे के पहले ही लाहौर पहुँचने की बात थी। लेकिन अम्बाला में गाड़ी बदली गई और थोड़ी देर चलने के बाद ही रुक रुक कर चलने लगी। पूछताछ करने पर पता चला कि एक दिन पहले जगह जगह पर रेल की पटरियाँ उखाड़ दी गई थी – इसीलिए यह सावधानी। पाँच घंटे से विलम्ब से ट्रेन जब अमृतसर स्टेशन में प्रवेश की, दिखा कि प्लैटफॉर्म गोरे फौजियों से भरा हुआ है; ऊँचे सारे मेहराबदार रास्ते बालू के बोरों से बन्द कर दिए गए हैं; और उन बोरों पर चढ़ा दिये गए हैं मशीनगन। अमृतसर में किसी को उतरने नहीं दिया गया। गोरे आकर ट्रेन के कमरों में तलाशी लेने लगे। अचानक तड़ तड़ तड़ आवाज से मैं चौंक उठा – करीब से ही आ रही है आवाज। किस चीज की आवाज थी समझने में देर नहीं हुई। एक गोरे को मैंने पूछा क्या बात है? जबाब में वह स्टेशन के बाहर, शहर की ओर अपने बाँये हाथ का अंगुठा बढ़ाते हुये कहा, “Lots of fun going on there (वहाँ खूब मज़े चल रहे हैं!”

उस दिन, सन 1919 के 13 अप्रैल को – उस अपराह्न में – अमृतसर शहर की एक परती जमीन पर खून के अक्षरों से भारत के इतिहास के एक नए अध्याय का लिखा जाना शुरु हुआ। अगले दिन सुबह ही लाहौर में अमृतसर की खबर पहुँच गई। वहाँ भी दो दिन पहले गोली चली थी अनारकली बाज़ार में, दुकानें आदि कई दिनों से बन्द थीं। अब तनाव चरमसीमा पर पहुँचा। ओडायार ने हुक्म जारी किया, “बाज़ार खोलो, खोलो सारी दुकानें, नहीं तो जारी होगा उग्रवाद-विरोधी कानून!” लाहौर में लोगों ने कहा, “उस दिन अनारकली में जिन लोगों को गोली चला कर मारा गया है उनके ‘लाश’ पहले लौटाओ।” हथियारबन्द फौज को आगे पीछे रखते हुए ओडायार अपने पारिषदों के साथ घोड़े की पीठ पर पहुँचे पुराने शहर के संकरे कूचे और कटरे में। सियापा* की रुदाली के छल-परिहास के द्वारा उनका स्वागत किया घरों की औरतों ने। और मर्दों ने, लाटसाहब के बगल में चल रहे पठान पगड़ीधारी घुड़सवार, पंजाब के नामी खैर-खाँ, तिवाना के मालिक उमर हयात खाँ को देखकर स्वागत की आवाज लगाई, “सरकार के मामा आ गए, सरकार के मामा आ गए!” अपमानित लाटबहादुर लौट गए, दुकान-बाज़ार खुलवा नहीं सके।

अगले ही दिन (15 अप्रैल) को लाहौर में मार्शल लॉ जारी हुआ – “ट्रिब्यून” के दफ्तर से कालीनाथ को पकड़ कर ले गई सेना एवं सीआईडी पुलिस। मैं दफ्तर में ही नज़रबन्द रहा। शुरु हुआ लाहौर में कॉर्नल फ्रैंक जॉन्सन का उग्रवादी तांडव। गुजरानवाला में हवाई जहाज से निहत्थी जनता पर बम बरसाये गए, कासूर में चला निर्दोष औरतों पर अत्याचार, और अमृतसर के रास्तों पर संगीन की नोक पर लोगों को छाती पर रेंगते हुए चलवाया गया।

उसके बाद उतर आये घनघोर काले पर्दे – पंजाब और बाकी भारत के बीच! उस घटाटोप अंधेरे में उस दिन रोशनी की एक रेखा तक कहीं नहीं थी। सारा देश उस दिन “महा आशंका जपिछे मौन मन्तरे” [भयानक आशंकाएं जप रहा है मौन मन्त्र में]; “दिकदिगन्त अबगुंठने ढाका” [दिशाएं ढकी है अवगुंठन में]। सन 1919 की 30 मई को, उस अंधकार को चीर कर, उस अवगुंठन को अचानक दो-फाड़ कर सामने आए ज्योतिर्मय आलोकरश्मि की तलवार से उकेरे गए शब्द।

उस दिन बंगाल के कवि की आवाज में ध्वनित हुआ धिक्कार – देश की छाती पर पहाड़ बने अपमान के जहर को नीलकंठ की तरह अपने कंठ में धारण करते हुए, अंग्रेज के हाथों पहनाए गए सम्मान के मुकुट को फेंक दिये धूल में; और आकर खड़े हुये लांछित देशवासियों के पास। बड़ेलाट चेम्सफोर्ड को उन्होने लिखा –

6, द्वारकानाथ टैगोर लेन, कलकत्ता, मई 30, 1919

महामहिम,

कुछ स्थानीय अशांतियों को दबाने के लिये पंजाब की सरकार द्वारा उठाये गये कदमों की भयावहता ने एक कठोर आघात के साथ, भारत में ब्रिटिश प्रजा के रूप में हमारी स्थिति की असहायता को हमारे जेहन में प्रकट कर दिया है। हमें यकीन है कि अभागी जनता को दिये गये दंडों की असंगत तीव्रता एवं देने के तरीकों की कोई सानी, हाल के एवं पुराने कुछेक अपवादों को छोड़ कर सभ्य सरकारों के इतिहास में नहीं मिलेगी। यह विचारते हुए कि ऐसा बर्ताव, निहत्थी एवं संसाधनहीन आबादी पर एक ऐसी ताकत द्वारा की गई है जिसके पास मानव जीवन के विध्वंस का भीषणतम कुशल संगठन है, हम निश्चित ही दृढ़तापूर्वक कहेंगे कि यह आचरण कोई राजनीतिक लाभ का दावा नही कर सकता है, नैतिक औचित्य का तो और भी कम। पंजाब में हमारे भाइयों द्वारा झेले गये यंत्रणा एवं अपमान के विवरण, दबाई गई आवाजों की खामोशी से रिसते हुये, भारत के सभी कोने में पहुँच रहे हैं और हमारे शासकों द्वारा, हमारी जनता के हृदय में उभरते हुये सर्वव्यापी क्षोभ की उपेक्षा कर दी गई है; शायद जनता को वह सीख देने हेतु खुद को बधाई देते हुये जिसे वे हितकर सोचते होंगे। अधिकांश आंग्ल-भारतीय अखबारों ने इस बेरुखी की तारीफ की है। कहीं कहीं यह तारीफ हमारी तकलीफों का मजाक उड़ाने की पाशविक हद तक गई, और उस सत्ता ने उन पर न्यूनतम रोक भी नहीं लगाई जो, कष्ट भोगने वालों का प्रतिनिधित्व करने वाले मुखपत्रों से उठ रही दर्द की हर चीख और न्यायधारणा की अभिव्यक्ति का गला घोंट देने में निर्मम रूप से सचेत रहती है। यह जानते हुए कि हमारे सारे आवेदन व्यर्थ गए हैं, एवं प्रतिशोध की कामना से हमारी सरकार के राजमर्मज्ञ दृष्टि की सारी महानता खत्म हो चुकी है, जबकि अपनी भौतिक शक्ति एवं नैतिक परम्पराओं के अनुरूप वह आसानी से सदाशय हो सकती थी, न्यूनतम जो मैं अपने देश के लिये कर सकता हूँ कि आतंक से अवाक, गूंगा क्षोभ सहने को मजबूर करोड़ों देशवासियों के प्रतिवाद को आवाज देने के सारे परिणाम अपने ऊपर ले लूं। समय आ चुका है जब निरादर के बेमेल प्रसंग, सम्मान के प्रतीकचिन्हों को शर्म बढ़ानेवाले बना देते हैं, और मैं अपने सारे विशिष्ट सम्मानों को त्याग कर अपने उन देशवासियों के साथ खड़ा होना चाहता हूँ जो अपने तथाकथित तुच्छता के कारण ऐसी अधोगति के भागी हैं जो इंसानों के लायक नहीं है। और यही सारे कारण मुझे तकलीफ के साथ महामहिम को कहने के लिए बाध्य कर रहे हैं कि मेरी नाइट की पदवी हटा लें; जो नाइट की पदवी मुझे महामहिम राजा की ओर से आपके पूर्ववर्ती के हाथों स्वीकार करने का सम्मान प्राप्त हुआ था; उनके हृदय की सज्जनता के लिये मेरे मन में अभी भी आदर है।

आपका विश्वासी

रवीन्द्रनाथ ठाकुर

 

मेरे हिसाब से इस पत्र का बंगला तर्जुमा सम्भव नहीं है। “दैनिक बसुमती” पत्रिका के तत्कालीन सम्पादक हेमेन्द्रप्रसाद घोष महाशय के अनुरोध पर खुद रवीन्द्रनाथ ने जो अनुवाद किया था, उसे पढ़ने से ही समझ में आ जायेगा कि पत्र के भाषा की मर्यादा, वीरता, कोड़े की चोट एवं ज्वाला बची नहीं रहती है भाषान्तरण में। फिर भी दिया गया नीचे, चूंकि कवि की अपनी रचना है …

[कविकृत बंगला अनुवाद नहीं दिया गया इस हिन्दी अनुवाद में। मूल अंग्रेजी पत्र का भी भावार्थ नहीं बल्कि शब्दश: अनुवाद की कोशिश की गई ताकि भाषा की श्लेषोक्तियों की धार बची रहे – अनु॰]

इस पत्र का पूर्व-इतिहास थोड़ा बता दूँ यहाँ पर। शायद पूरा पता नहीं है सबको।

ठीक किनके मार्फत कवि को जालियाँवाला बाग के जनसंहार की खबर मिली थी कहना मुश्किल है। पंजाब और बंगाल के बीच उस समय चिट्ठियों या अखबारों की आवाजाही बिल्कुल बन्द थी – सेंसर का सख्त पहरा था। उनकी भांजी, पंचनद के पराक्रमी नेता पंडित रामभुज दत्त-चौधरी की पत्नी सरला देवी ने उन्हे पत्र लिखा था, अपने पति पर मंडरा रहे खतरों के बारे में बताते हुए। वह चिट्ठी रवीन्द्रनाथ के पास नहीं पहुँची थी। मैं खुद भी उस समय उन्हे लाहौर से कई चिट्ठी लिखा था – एक भी उन्हे नहीं मिला। उस वक्त वह शांतिनिकेतन में थे। लेकिन खबर पहुँच ही गई थी। वाइसॉराय को चिट्ठी लिखने के आठ दिन पहले, 22 मई को – शांतिनिकेतन में उस वक्त भरपूर गर्मी है – एक पत्र में सिमला पहाड़ पर रहनेवाली अपने एक स्नेहभाजन [राणु अधिकारी, लेडी राणु मुखर्जी] को उन्होने लिखा –

“आसमान का यह प्रताप मैं एक प्रकार से सह लेता हूँ पर मर्त्य का प्रताप असह्य हो रहा है। तुमलोग तो पंजाब में ही हो, पंजाब के दुखों का समाचार मिलता ही होगा। इस दुख के ताप ने मेरे सीने के पंजर को जला दिया।” (भानुसिंह के पत्र)

अपने इस दुस्सह मर्मदाह की बात कवि ने कहीं और कही थी, बहुत दिनों के बाद। उन्ही के शब्दों में –

“जानते हो! उस जालियाँवाला बाग वाली घटना के समय, तब तक ठीक से खबर नहीं पहुँची थी। मुझे शायद चौधरियों (आशु चौधरी, प्रमथ चौधरियों की ही बात कर रहे हैं प्रतीत होता है) के यहाँ से खबर मिली थी, अच्छी तरह याद नहीं है। सुन कर क्या भयानक कष्ट, असह्य कष्ट हुआ था, आज भी याद है। सिर्फ सवाल आते रहे – इसका कोई उपाय नहीं? कोई प्रतिकार नहीं? कोई जबाब नहीं दे पाउंगा? कुछ भी नहीं कर पाऊंगा? यह भी अगर खामोशी से सहना पड़े तब तो जीवनधारण भी असम्भव हो उठेगा!” (मैत्रेयी देवी, मॉन्गपु में रवीन्द्रनाथ)

रात रात भर कवि सो नहीं पा रहे हैं। अन्त में और सह नहीं पाए। शान्तिनिकेतन से चले आये कलकत्ता, 27 मई को। आते ही, सबसे पहले गये प्रियपात्र किसी सुविख्यात देशनेता के पास। रवीन्द्रनाथ कह रहे हैं, “उससे मैं ने कहा, एक प्रोटेस्ट मिटिंग का इन्तजाम करो, मैं भी बोलुंगा, तुमलोग भी बोलोगे।” पर वह देशनेता राजी नहीं हुये। और कईयों के पास गये कवि, कोई राजी नहीं हुआ। डिफेन्स ऑफ इंडिया ऐक्ट तब भी चढ़ कर बैठा है देश की छाती पर – पता नहीं क्या हो! खौफ से विमूढ़ है सारा देश। ऐन्ड्रुज [दीनबन्धु] साहब तब कवि के साथ ही थे। वह लिख रहे हैं –

“उन्होने एक सार्वजनिक प्रतिवाद सभा आयोजित करने की कोशिश की, पर कोई अध्यक्षता करने को तैयार नहीं हुआ।” (‘रवीन्द्रनाथ टैगोर’, सी॰ एफ॰ ऐन्ड्रुज, वूरस्लैग, डर्बन, दक्षिण अफ्रिका से प्रकाशित पत्रिका, मई-जुलाई 1927)

रवीन्द्रनाथ की जबानी सुना हूँ कि तब उन्होने गान्धीजी से कहा कि उनके साथ वह पंजाब जाने को तैयार हैं। लेकिन गान्धीजी तैयार नहीं हुये।**

28 मई, 29 मई, ये दो दिन गये व्यर्थ कोशिश में। 28 मई की सुबह को वह गये रामानन्द चट्टोपाध्याय महाशय के पास। अपने इस मित्र की राय के प्रति वह आजीवन श्रद्धाशील रहते थे। अन्त में, 29 की रात को उन्होने वाईसॉराय को चिट्ठी लिखा। कवि ने दर्ज किया है, “रात के चार बजे चिट्ठी समाप्त कर मैं सोने जा सका था। किसी को मैंने कुछ नहीं कहा इस विषय में, रथीलोगों (यानि उनका बेटा, बहु एवं घर के दूसरे लोग) को भी नहीं। जानता हूँ, इन मामलों में ज्यादा सलाह लेना बेमतलब होता है। कहीं कोई अड़चन डाले इसी का डर था।” (मैत्रेयी देवी – “मंगपु में रवीन्द्रनाथ)

इतने दिनों में उनके मन की ज्वाला कुछ शांत हुई। उसी दिन वह लिख रहे हैं राणु को, “कलकत्ता आकर मैंने बड़ेलाट को चिट्ठी दी है कि वह ‘छार’ पदवी लौटा ले। …” [छार का बंगला में अर्थ है तुच्छ, यहाँ ‘सर’ यानि नाइट की पदवी के अर्थ में इस्तेमाल किया गया है। गँवई बंगला की कुछेक बोलियों में ‘सर’ का ‘छार’ ही होता है। इसी श्लेष के साथ पचास साल पहले पडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने भी ‘छार’ शब्द का इस्तेमाल किया था – अनु॰] … “मैंने कहा है कि सीने में बहुत सारे दर्द जमा हो गये थे, उस भार पर मरे इस उपाधि का भार ढो नहीं पा रहा हूँ, इसलिये सर से उसे उतारने की कोशिश कर रहा हूँ।” ऐन्ड्रुज साहब से मैंने सुना है, अगले दिन 30 मई की सुबह को जब रवीन्द्रनाथ ने उन्हे यह चिट्ठी दिखाई, और उन्होने कवि को अनुरोध किया कि चिट्ठी को थोड़ा मुलायम बनाएँ, तब कवि ऐसी नजर से देखे उनको कि वह कभी भूल नहीं पायेंगे – “Such a look as I had never seen in the eyes of Gurudev before or after!”

डर स्वजनों एवं मित्रों में भी था, एवं डर के कारण थे बहुत। ऐन्ड्रुज साहब लिख गये हैं – याद रखना होगा कि उस समय डिफेन्स ऑफ इन्डिया ऐक्ट लागू था। रवीन्द्रनाथ जानते थे कि इस चिट्ठी के कारण वह गिरफ्तारी, सीधी सुनवाई एवं जेल भेजे जाने के खतरे के सामने खड़े हो गये हैं। उसी समय पंजाब में इससे काफी कम सरकार-विरोधी काम के लिये कई लोग आजीवन कालापानी एवं सम्पत्ति की जब्ती के दंड प्राप्त किये थे।

रवीन्द्रनाथ डरे नहीं थे। उस दुर्दिन में वह “स्वदेश-आत्मा की वाणीमूर्ति” के रूप में “सत्य के गौरव से दृप्त प्रदीप्त भाषा” के द्वारा पूरे देश को दिये “अभी” मंत्र। उन्हे सजा कौन देगा?

“देबतार दीप हस्ते ज़े आसिल भबे,

सेइ रुद्रदूते, बलो, कोन राजा कोबे पारे शास्ति दिते”

[देवता का दीप हाथों में ले कर इस दुनिया में जो आया,

उस रुद्र-दूत को बोलो कौन राजा कब सजा दे सकता है]

लेकिन अंग्रेजों ने उन्हे माफ नहीं किया। कवि कह रहे हैं, “उन्हे यह बहुत अपमानजनक लगा था। उसके बाद इंग्लैंड जा कर मैंने देखा वे उस बात को भूल नहीं पा रहे हैं। अंग्रेज राजभक्त राष्ट्र है, राजा को अस्वीकार किया जाने से चोट पहुँची थी उनको।” (मैत्रेयी देवी, “मंगपू में रवीन्द्रनाथ”)

सिर्फ इस देश के छोटे अंग्रेज ही नहीं, जो बदन में लगी आग के कारण अपने अखबार इंग्लिशमैन में लिखा था –

“रत्ती भर फर्क नहीं पड़ेगा। जैसे कि पीतल के पैसे भर का भी महत्व हो इस बात का कि सर रवीन्द्रनाथ टैगोर सरकारी नीति का समर्थन करते हैं या नहीं! जैसे कि यह बर्तानवी शासन एवं न्याय की प्रतिष्ठा, सम्मान एवं सुरक्षा के लिहाज से कोई माने रखता हो कि एक बंगाली कवि नाइट रहे या आम बाबु रहे!”

सिर्फ वे ही नहीं, उस देश के बड़े अंग्रेज भी कम विचलित नहीं हुये थे। इंग्लैंड के राजकवि, हमारे कवि के अनुरागी मित्र रॉबर्ट ब्रिजेस द्वारा रवीन्द्रनाथ को लिखा गया एक पत्र मुझे देखने को मिला है। वह भी माफ नहीं कर पाये थे रवीन्द्रनाथ को।*** और सन 1920 में जब रवीन्द्रनाथ अमरीका गये, तब वहाँ का ब्रिटिश दूतावास उनके पीछे कैसे जासूस लगाये थे, इसका पर्दाफाश किया था हेनरी नेविनसन ने, लन्दन की सुविख्यात पत्रिका “नेशन” में।

“जालियाँवाला बाग जनसंहार के बाद रवीन्द्रनाथ की चिट्ठी” सिर्फ उनके जीवन का ही एक परम गौरवकथा नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता-संग्राम के इतिहास का अविस्मरणीय अध्याय है। पराधीनता की वेदना और अपमान को पूरे देश की ओर से और किसी ने इस तरह महसूस नहीं किया, एवं और किसी ने उस वेदना एवं अपमान को इस तरह व्यर्थ भी नहीं कर पाया।

सिर्फ उपाधि त्याग कर ही कवि ने अपना दायित्व खत्म नहीं समझा। उन्होने ऐसा नहीं समझा कि पंजाब के मामले में जो कुछ करना उनके लिये उचित था वह कर चुके हैं। इस मामले को लेकर यूरोप एवं अमरीका के कई चिंतक मित्रों को उन्होने चिट्ठी लिखा है बार बार, उन्हे अंग्रेजों के अनाचार एवं अत्याचार के बारे में, अंग्रेजों के हाथों स्वदेशवासियों की लांछना के बारे में बताया है। मेरे सम्पादक कालीनाथ राय महाशय को जेल से छुट्टी दिलाने के लिये उन्होने जो कुछ किया, कालीबाबु ने हमेशा याद रखा। शांतिनिकेतन के दिवंगत अध्यापक नेपालचन्द्र राय महाशय ने मुझसे कहा था कि कालीबाबु के लिये रवीन्द्रनाथ ने सत्ता के प्राधिकारियों में से किसी को चिट्ठी भेजने में बाकी नहीं रखा। मुझे लिखी गई यह चिट्ठी भी उस बात का गवाह है –

शांतिनिकेतन

27॰7॰19

मेरे प्रिय अमल,

कुछ दिनों पहले तुम्हारी चिट्ठी मिली। आज के अखबार में देखा कि ट्रिब्यून फिर से प्रकाशित हुआ है, तुम्हारे हाथों। खुशी मिली लेकिन आशंका है मन में। सत्ता के प्राधिकारियों की कुटिल भ्रुकुटि अभी भी तनी है। सावधानी से तुम यह जिम्मेदारी सम्हालो, यही मेरी कामना है।

जेल में कालीनाथ राय के अस्वस्थ होने की खबर से चिन्तित हूँ। उनकी रिहाई की प्रार्थना करते हुये मैंने मॉन्टेगु एवं लॉर्ड सिंहा दोनों को लिखा है। परिणाम की प्रतिक्षा के सिवा और कर भी क्या सकते हैं। बहुत अधिक भरोसा मत रखो।

शंकरण नायर ने क्या किया? उनसे एक बार भेंट करने पर शायद अच्छा होता। तुम्हे शायद अभी शिमला जाने का मौका नहीं मिलेगा। ऐन्ड्रुज कुछ दिनों के बाद जायेंगे। उसके बाद लाहौर। तुम्हे उन्होने बताया है शायद। उन्ही से सारी खबरें मिलेंगी। ‘साहब’ गुस्से में है। वह जानता है पंजाब का कलंक अंग्रेज के शरीर से कभी मिटेगा नहीं।

मेरा आशीर्वाद लेना।

तुम सब का

श्रीरवीन्द्रनाथ ठाकुर

 

तीन महीना बन्द रहने के बाद अखबार निकालने की जो अनुमति मिली, सही बात है कि उसके कारण मैं शिमला नहीं जा सका। सर शंकरन नैय्यर से जा कर भेंट किये थे कालीनाथ के बुरे दिनों के मित्र, लाहौर के वकील सुधीर मुखोपाध्याय महाशय। जब लाहौर चीफ कोर्ट के कोई वकील, कोई बैरिस्टर कालीबाबु की तरफ से खड़ा होने की हिम्मत नहीं जुटा पाये, जब मार्शल लॉ ऐड्मिनिस्ट्रेटर कर्णल फ्रैंक जॉनसन के हुक्म पर कलकत्ता के सुविख्यात अंग्रेज बैरिस्टर नॉर्टन साहब को पंजाब के दरवाजे से लौट आना पड़ा – उन्हे घुसने ही नहीं दिया गया कालीबाबु का मुकद्दमा लेने के लिये – तब सिर्फ सुधीरबाबु बिना किसी डर के, उस जिम्मेदारी को सम्हाले एवं डिफेंस का अच्छा इंतजाम किये। सजा रद्द करवाने या कम करवाने के लिये बड़ेलाट को दिया जाने वाला आवेदन लेकर वह जब शंकरण नैय्यर के पास सलाह के लिये गये, तब सर शंकरण ने उन्हे रवीन्द्रनाथ का लिखा हुआ एक पत्र दिखाया। कहा, “सौभाग्य है, चेम्सफोर्ड नहीं जानते हैं कि टैगोर ने इस मामले में सिफारिश भेजा है एवं पैरवी की है!” खैर, अन्तत: कालीनाथ का कारावास-काल बड़े लाट ने कम कर दिया। वह रिहा हुए कुछ दिनों के बाद।

इस घटना के कुछेक महीने बाद सन 1920 में रवीन्द्रनाथ विलायत गए। लन्दन पहुँचकर सबसे पहले वह गए इंडिया ऑफिस – मॉन्टेगु एवं लॉर्ड सिंहा से भेंट करने के लिये। इस बीच पंजाब-अशांति की जाँच पर हन्टर आयोग का रिपोर्ट निकल चुका है। रथीन्द्रनाथ की डायरी में मॉन्टेगु के साथ उनके पिता की जो बातचीत दर्ज है पंजाब के बारे में, उसमें मैंने देखा है रवीन्द्रनाथ सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को कह रहे हैं भारत के लोग डायर को सजा देने के लिये बेचैन नहीं है, वे जानना चाहते हैं, क्या इंग्लैंड स्वीकार करता है कि अमृतसर में उसका अमानविक अत्याचार मानवधर्म के खिलाफ गया है? रवीन्द्रनाथ ने स्पष्टत: कहा, पार्लियामेंट में हन्टर कमिटी की रिपोर्ट पर बहस, पूरी ब्रिटिश राष्ट्रीयता की परीक्षा है। लॉर्ड सिंहा के साथ बातचीत में कवि एवं वह एकमत हुए कि पंजाब के लोगों ने मार्शल लॉ के अत्याचार, अनाचारों को जिस तरह खामोशी के साथ मान लिया, वह बंगाल में सम्भव नहीं होता – इन्सानियत का इस तरह अपमान बंगाली सहन नहीं करता। उस समय विलायत से रवीन्द्रनाथ ने “शांतिनिकेतन” पत्रिका में लिखा था –

“पंजाब में जो अमानवीय अत्याचार संघटित हुआ है, उसकी न्यायोचितता जाँची जा रही है। राष्ट्रनीति की ओर से मैं इस पर कोई बात नहीं करुंगा। शासकों की बात हम छोड़ दें। धर्मनीति की ओर से इस मामले की जांच करते हुये स्वदेशवासियों के चरित्र पर बातचीत करना हमारा कर्तव्य है। जो घटना सिर्फ दुखदायी होती है, उससे किसी का अपमान नहीं होता है, लेकिन इंसान के साथ पशु की तरह आचरण करना अगर सम्भव तो शर्म दुख से बड़ा हो जाता है। पंजाब का मामला हमारे लिये उसी शर्म का कारण बन गया है। यही समझ रहा हूँ कि हमारे चरित्र में बहुत गहरी हीनता आई है। हमारे ऊपर सिर्फ दुख लादना नहीं, हमारी इंसानियत का अपमान करना भी आसान हुआ है। और यही हमारी भीतरी बदहाली का कारण है।

“उत्पीड़न चाहे जितना कठोर हो सहेंगे, लेकिन हमारी आत्म का अपमान नहीं सहेंगे” – पंजाब से ऐसी ही पौरुष की वाणी सुनने की हमने उम्मीद की थी। लेकिन जब वह सुनने को नहीं मिला तो सबसे पहले खुद का ही धिक्कार करना होगा। … निहत्थे असहाय पर अत्याचार कायरता है; - क्योंकि कर्तव्य की गरिमा के साथ छाती बिछा कर हथियार का वार ग्रहण करने में, सर उठा कर दुख को स्वीकार करने में पराजय नहीं है।” (“शान्तिनिकेतन, द्वितीय वर्ष, प्रथम अंक, 1327)    

रथीन्द्रनाथ की डायरी में ही मैंने देखा है, लन्दन की एक अभिनन्दन-सभा में रवीन्द्रनाथ, टोरी पार्टी के विशिष्ट नेता वाइकाउंट सेसिल के साथ मिलते ही उन्हे एकान्त में ले गये और पंजाब के अनाचार की बात बताने लगे। ऑक्सफोर्ड के सुविख्यात अध्यापक गिलबर्ट मरे को उन्होने कहा - ईंग्लैंड के मनीषाओं में जिन्हे लगता है कि पंजाब में उनके देशवासियों का आचरण धर्म के लिहाज से गर्हित हुआ है, उनकी ओर से प्रतिवाद का एक वक्तव्य अखबार में प्रचारित होना चाहिये। विलायत में खामोश बैठे थे कवि।

उसके बाद जब पार्लियामेंट के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में हन्टर कमीशन के रिपोर्ट पर बहस का अन्त जेनरल डायर के समर्थन में हुआ, बेइंतहाँ क्षुब्ध हुये रवीन्द्रनाथ। ऐन्ड्रुज साहब को उन्होने लिखा: -

लन्दन, जुलाई 22, 1920

“पार्लियामेंट के दोनों कक्षों में डायर बहस का परिणाम, दर्दनाक तरीके से हमारे सामने इस देश के शासक वर्गों का भारत के प्रति नजरिया उजागर कर देता है। यह दिखाता है कि हमारे उपर उनकी सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा किया गया कोई भी अत्याचार, चाहे वह कितना भी राक्षसी क्यों न हो, उनके हृदय में क्षोभ की अनुभूतियाँ नहीं जगा सकती हैं, जिनके बीच से हमारे शासक चुने जाते हैं।

“उनके भाषणों में नृशंसता को दी गई निर्लज्ज माफी, जिसकी गूंज उनके अखबारों में है, कुत्सित है अपनी भयावहता में। पिछले पचास साल या उससे अधिक समय से, आंग्ल-भारतीय आधिपत्य के नीचे हमारी स्थिति पर क्षोभ की अनुभूति सशक्त होती जा रही है, लेकिन एक सान्त्वना थी अंग्रेज जनता की न्यायप्रियता पर हमारा विश्वास। यह विश्वास कि उनकी न्यायप्रियता उस सत्ता की घातक घूँट से विषाक्त नहीं हुई है, जो सत्ता सिर्फ पराधीन देश में ही प्राप्त होती है जहाँ पूरी आबादी का पौरुष कुचल कर असहायता में तब्दील कर दिया गया है।  

फिर भी उस विष का असर आशंका से अधिक होता गया है, और उसने ब्रिटिश राष्ट्र के जीवनधारक अंगों पर हमला कर दिया है। मैं महसूस करता हूँ कि उनके स्वभाव के बेहतर पहलुओं के प्रति किए जाते हमारे आवेदन की प्रतिक्रिया कम होती जाएगी दिन प्रति दिन। मैं सिर्फ इतना ही उम्मीद करता हूँ कि हमारे देशवासी इससे हिम्मत नहीं हारेंगे, बल्कि अपराजेय साहस एवं दृढ़ निश्चय के साथ अपनी सारी ऊर्जायेँ देश की सेवा में व्यतीत करेंगे।

“हाल की घटनाओं ने अन्तिम तौर पर यह साबित कर दिया है कि हमारी सच्ची मुक्ति हमारे हाथों में है; एक राष्ट्र की महानता अपना आधार, घृणायुक्त भद्देपन के साथ आधे-मन से दिये गये रियायतों में नहीं ढूंढ़ सकती है।  

“जिनके हित मुठ्ठियों को बन्द रखने में है, उनके अनुग्रहों से निर्वाह करने का संक्षिप्त मार्ग ढूढ़ना कमजोर चरित्र की निशानी है। निर्वाह का एक मात्र मार्ग है, कष्ट एवं आत्म-वलिदान का कठिन मार्ग। सारे महान वरदान हम तक, हमारे भीतर मौजूद अमर प्राण की शक्ति के कारण पहुँचते हैं, और वह प्राण, जोखिम एवं क्षति की आशंकाओं को अस्वीकार करने में ही खुद को साबित करती है।” (“लेटर्स टु अ फ्रेन्ड”, सी॰एफ॰ऐन्ड्रुज द्वारा सम्पादित, एलेन ऐन्ड अन्विन, लन्दन 1928)

वही एक ही प्रकार की ओज से प्रदीप्त वाणी, जिसे भाषा मिली थी बड़ेलाट को दिये गये उपाधि-त्याग के पत्र में, उसी की बेहिचक अभिव्यक्ति देख रहा हूँ यहाँ।

इस चिट्ठी के कुछ दिनों के बाद, 13 अगस्त को, फिर लिख रहे हैं अंग्रेज मित्र ऐन्ड्रुज को – इस बार पैरिस से –

“इंग्लैंड में हमारा ठहरना बेकार गया। डायरवाद पर आपके पार्लियामेंट के बहस एवं भारत के प्रति घृणा एवं बेरहमी से भरी हुई अहंकारी प्रवृत्ति के दूसरे लक्षण मुझे गहरे कष्ट पहुँचाये हैं। राहत के एहसास के साथ मैं इंग्लैंड छोड़ा।”

पर यही उनके आखरी उच्चारण नहीं हैं इस सम्बन्ध में। कवि अब चले आये बिल्कुल असली बात पर – जहाँ वास्तविक तौर पर त्रुटि थी वहीं लौट आये। पैरिस से ही 7 सितम्बर (1920) को लिख रहे हैं ऐन्ड्रुज साहब को –

“चलिये, पंजाब की घटनाओं को भूल जायें – लेकिन कभी नहीं भूलें कि हम इसी तरह के अवमाननाओं के लायक होते रहेंगे बार बार जब तक अपने घर को हम व्यवस्थित नहीं करें। समुद्र के लहरों की फिक्र न करें, अपने नाव के छेदों की फिक्र करें।”

वही बात, जो आजीवन कवि बोलते आये हैं अपने स्वदेशवासियों को, “अपनी ओर देखो, अपना घर सम्हालो, - चलो आत्मानुभूति एवं आत्मसंस्कृति के मार्ग पर।”         

स्वदेश के अपमान की वेदना, उसकी बदहाली एवं अवमानना अगर बारबार रवीन्द्रनाथ को तीव्र अनुभूति एवं मर्मज्वाला को भड़काते हुये क्षुब्ध किया है, हर बार संकट की घड़ी में वह आ खड़े हुये हैं अपने देशवासियों के पास। इसकी तूलना और किसी देश के और किसी कवि के जीवन में मिलता है कि नहीं मैं नहीं जानता हूँ। लेकिन यह भी बात है कि अपने देश के किसी भी अपमान को, इंसानियत की किसी भी अवमानना को हमेशा के लिये यादगार बनाये रखना वह कभी भी स्वीकार नहीं किये। इसी लिये जब जालियाँवालाबाग जनसंहार का स्मृतिस्तम्भ बनाने का प्रस्ताव आया तब वह सहमत नहीं हो पाये। उन्होने कहा था –

किसी निशानी के द्वारा पंजाब की इस घटना को हमेशा के लिये यादगार बनाये रखना हमारे लिये गौरव का नहीं होगा। वीरता ही स्मरणयोग्य होता है, कायरता कभी नहीं। … जहाँ अत्याचारी एवं अत्याचारित, किसी भी तरफ से वीरता का कोई लक्षण ही नहीं दिखा, बहाँ कौन सी बात समारोह के साथ याद रखा करेंगे? हमारे राजनेता कानपुर एवं कलकत्ते में अपने कुकर्म के स्मारक स्थापित किये हैं। हम क्या उन्ही का अनुकरण करेंगे? अनुकरण की इस कोशिश में ही क्या हमारा वस्तविक पराजय नहीं?” (“शांतिनिकेतन”, द्वितीय वर्ष, प्रथम अंक)

इससे भी बड़ी बात बोले थे कवि बम्बई में, जालियाँवालाबाग की प्रथम वार्षिकी की सभा को भेजे गये संदेश में (13 अप्रैल 1920)। सभा के आयोजक थे मोहम्मद अली जिन्ना; उन्होने ही निमंत्रण भेजा था। पुराने अखबार के पीले पन्नो से उस वाणी को बेशक खोज निकाला जाना चाहिये। अपने इस निबन्ध का अन्त मैं उसी संदेश से कर रहा हूँ –

“कानून के नाम पर पंजाब में बहुत बड़ा अपराध किया गया है। बुराई के ये भयानक विस्फोट अपने पीछे आदर्शों के विध्वंस के रूप में अपनी विरासत छोड़ जाते हैं। जालियाँवालाबाग में जो हुआ वह खुद उस राक्षसी युद्ध का राक्षसी सन्तान है, जिस युद्ध ने पिछले चार सालों से ईश्वर की दुनिया को, शारीरिक एवं नैतिक आग एवं जहर से अपवित्र कर रहा है। जिसकी यंत्रणा के रक्तरंजित फासले को मानवता ने पार किया है, पाप की उस विशालता ने उनके दिमाग में निष्ठुरता का जन्म दिया है जिनके हाथों में सत्ता है। न तो उनके भीतर से हमदर्दी की कोई बाधा है, न बाहर से प्रतिरोध का डर है। ताकतवर की कायरता, जो निहत्थे एवं बिना-चेते-गये ग्रामीणों पर डरावनेपन के मशीनों का इस्तेमाल करने में, एवं न्याय के अश्लील उपहास में उन ग्रामीणों के साथियों पर अकथ्य अवमान बरसाने में कोई शर्म नहीं महसूस करती है – एक पल के लिये भी नहीं महसूस करती है कि यह उनके अपने पौरुष के अपमान का नीचतम रूप था – वह कायरता सिर्फ हाल के युद्ध द्वारा लोगों को बार बार उनकी अपनी नैतिक ऊँचाई को धक्का पहुँचाने के, पैरों के नीचे सत्य एवं मर्यादा को कुचलने के मौके दिये जाने के कारण ही सम्भव हुई। सभ्यता के आधार का यह विघटन, नैतिक भुकम्पों का एक सिलसिला पैदा करेगा, एवं लोगों को अधिकतर कष्ट के लिये तैयार रहना पड़ेगा। संतुलन वापस आने में काफी समय लगेगा। शांतिवार्ताओं के परिवेश में प्रतिशोधभावना की आत्मघाती क्रुरता जिस तरह मनहूस सुर्खी घोल रही है, उससे यह स्पष्ट दिख रहा है।

“लेकिन, अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये दुनिया के टुकड़े टुकड़े करने वाले, विजयी शक्तियों के इन नंगे नाचों में हमारी कोई जगह नहीं है। यह जानकारी हमें सर्वाधिक चिन्तित करता है कि नैतिक अध:पतन सिर्फ उनका नहीं होता है जो असहायों पर अवमान का आघात करते हैं, बल्कि उनका भी होता है जो उनके शिकार हैं। दंडमुक्ति से आश्वस्त निर्दय अन्याय की बुज़दिली, कुत्सित एवं नीच है। लेकिन डर एवं नपुंसक क्रोध, जो कमजोर के दिमागों में स्वाभाविक तौर पर उपजेंगे, उतना ही अधम है।

“भाइयो, जब शारीरिक बल, अपने पर अहंकारी आस्था के कारण, मनुष्य की आत्मा को कुचलने की कोशिश करता है, तब मनुष्य के लिये समय आता है दृढ़तापूर्वक दिखाने का कि उसका प्राण अपराजेय है। बदले के कलुषित सपनों को दिल में पालते रहने का नैतिक पराजय हम अस्वीकार करेंगे। शिकारों के लिये न्यायपरायणता के क्षेत्र में विजयी होने का समय आ गया है।

“जब भाई भाई का खून बहाता है जमीन पर एवं उस कृत्य को आड़म्बरपूर्ण नाम देते हुये अपने पाप से हर्षित होता है, जब अपने क्रोध के स्मारक के तौर पर वह जमीन पर खून के दाग को ताजा रखने की कोशिश करता है, तब शर्म से ईश्वर उस दाग को अपनी हरी घास एवं अपने फूलों की मीठी पवित्रता के नीचे ढक लेते हैं। हम जो अपने पड़ोस में बेगुनाहों की सामूहिक हत्या देख चुके हैं, हम ईश्वर की अदालत को स्वीकार करें, एवं गैर-बराबरी के खून के धब्बों को अपनी प्रार्थना से ढँक लें –

“रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम”

“अपनी कृपालुता से आप, हे रुद्र, प्रति दिन हमारी रक्षा करें”

“क्योंकि सच्ची कृपा रुद्र से ही आती है, जो हमारी आत्मा को आतंक के बीच, कष्ट एवं मृत्यु के भय से एवं चोट की उपेक्षा करते हुये, प्रतिकार की ईच्छा से रक्षा करते हैं। हम उनके हाथों से पाठ ग्रहण करें, तब भी जब कष्ट की पीड़ा एवं अपमान ताज़ा हों – वह पाठ कि तमाम नीचता, निष्ठुरता एवं मिथ्या अस्पष्टता एवं विस्मृति के लिये है, सिर्फ महानता एवं सत्य अनंतकाल के लिये है। जो वैसा चाहते हैं कि भविष्य के अन्तर्मन को, अपने क्रोध की स्याह स्मृति ढोते पत्थरों से बोझिल बनायेंगे, बनायें; हम अपनी अगली पीढ़ियों के लिये वैसे ही स्मारक छोड़ जायें जिनकी हम श्रद्धा कर सकें। हम अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ हों जो हमारे लिये बुद्ध की छवि छोड़ गये, वह बुद्ध जिन्होने आत्म पर विजयप्राप्त किया, क्षमा का प्रचार किया और अपने प्यार को देशकाल में दूर दूर तक फैला दिया।”

यह वाणी ही रवीन्द्रनाथ की वाणी है, गांधीजी की जीवनवाणी है – भारत की शाश्वत वाणी है।    

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*पंजाब में एक लोकाचार है (अभी भी है या नहीं, नहीं जानता हूँ) किसी की मृत्यु होने पर, मृतशरीर सामने रख कर शोक व्यक्त करने के लिये किराए पर लोग लाए जाते हैं। घर के लोगों के रुदन में ये किराए के रुदाली अपनी जोरदार आवाज जोड़ कर छाती पीट कर मृत्यु की घोषणा करने में लग जाते हैं। इसी को सियापा कहते हैं। पंजाब के छोटे लाट बहादुर का मजाक उड़ाने के लिये लाहौर के घर की औरतों ने उसी का नकल कर छाती पीटना शुरु किया; मार्शल लॉ जारी होने के एक दिन पहले, हड़ताल के कारण पाँच दिनों से बन्द दुकान-बाज़ार खोलवाने के लिये सर माइकेल ओडायार के पुराने शहर में घुसते ही। यानि कहा गया, उनका प्रवेश नितान्त अमंगल का सूचक है, मृत्यु के आविर्भाव की तरह ही शोकवाहक है।    

**सरकारी निषेध एवं बाधाओं, खास कर मार्शल लॉ की डरावनी धमकी की उपेक्षा करते हुये गान्धीजी उन दिनों पंजाब क्यों नहीं आये, इसे लेकर काफी अटकलें लगाई जाती रही है। पंजाब की घटना के बाद्। कॉंग्रेसी-जाँच-कमिटी के काम से कुछ महीनों बाद (अक्तूबर 1919) गान्धीजी के लाहौर आने पर, उन्ही के मुंह से कुछ सुनने का अवसर मिला था मुझे। उस समय मैं उनकी बात सुन कर यही समझा था कि वह शुरु में सारी बाधाओं एवं निषेधों को लांघते हुये पंजाब आने के लिये बहुत उतावले हुये थे। लेकिन बाद में लगा कि 6 अप्रैल को सत्याग्रह की घोषणा के बाद गुजरात एवं पंजाब में जब हंगामा हुआ, तब वह, बिना पूरी तैयारी के, सत्याग्रह-संग्राम में पूरी जनता का आह्वान करने की गलती समझते हुये, अपनी गलती स्वीकार कर चुके हैं। उन गलती के कारण जनता की ओर से भी कुछेक अनाचार हुये। खुले तौर पर अपनी गलती “Himalayan miscalculation” स्वीकारने के बाद फिर से पंजाब आना या आने के रास्ते पर ऐरेस्ट होना उन्हे निरर्थक लगा था। और मार्शल लॉ के दौरान अगर उन्हे पंजाब में घुसने दिया भी जाता, कुछ भी नहीं कर पाते वह। उन्हे रोक कर रख दिया जाता। कोई काम नहीं हो पाता। बल्कि शायद ऐरेस्ट की खबर मिलने पर देश में दuसरी जगहों पर खून बहता, जैसा कुछd इनों पहले बहा था गुजरात और पंजाब में। ऐन्ड्रुज साहब इस प्रसंग में लिखते हैं –

“उस चिट्ठी (नाइट की पदवी त्यागते हुये रवीन्द्रनाथ की चिट्ठी) के लिखे जाने (30 मई 1919) के समय मैं उनके साथ कलकत्ते में था। पर उसके ऐन पहले मैं बम्बई में महात्मा गांधी के साथ था। और मैंने देखा था किस तरह की यंत्रणा के साथ वह हो रही घटनाओं को झेल रहे थे, और कितनी कठिनाई के साथ उन्हे, गिरफ्तार होने के लिये तत्काल पंजाब जाने से रोका गया। मैं नहीं जानता हूँ मैंने सही किया या गलत, लेकिन उन्हे पंजाब जाने से रोकने में मैं खुद शामिल रहा। मुझे लगा कि समय नहीं आया है अभी। जो मैं रेखांकित करना चाहता हूँ कि संकट की उस घड़ी में दोनों में मुझे प्राण की एक ही स्वतंत्रता, एक ही निडर साहस, अत्याचारी शक्ति के खिलाफ एक ही तीव्र घृणा, अंजाम के प्रति एक ही लापरवाही, कर्तव्य के लिये जीवन उत्सर्ग करने की एक ही उत्कट ईच्छा, भारत के लिये एक ही प्यार एवं श्रद्धा देखने को मिला – एक दूसरे से एक रत्ती कम नहीं। (‘गांधी एवं टैगोर’, दि हिन्दु, मद्रास, 10 अप्रैल, 1924)       

***राजकवि रॉबर्ट ब्रिजेस रवीन्द्रनाथ द्वारा राज-प्रदत्त उपाधि त्यागने से कितना विचलित हुये थे उसका आभास मिला था सन 1920 में, जब रवीन्द्रनाथ को ऑक्सफोर्ड में भाषण देने के लिये आमन्त्रित किया गया। उस सभा में आयोजकों ने ब्रिजेस को भी कुछ बोलने के लिये अनुरोध किया, लेकिन वह टाल गये। इस प्रसंग को स्पष्ट करते हुये वह रवीन्द्रनाथ को जो चिट्ठी लिखे थे, उसका एक नकल मेरे पास है। उस बार यूरोप से लौटने के बाद, रवीन्द्रनाथ ने मुझे और कुछेक यूरोपीय मनीषाओं द्वारा उन्हे लिखे गये पत्रों का नकल कर अपने पास रखने की अनुमति दिया था। मैं ब्रिजेस की उस चिट्ठी से कुछ पंक्तियाँ उद्धृत कर रहा हूँ –

“ … और मैं खेद व्यक्त करता हूँ कि शुक्रवार को ऑक्सफोर्ड की बैठक में मुझे बोलने के लिये जो आमंत्रण मिला है, उसे स्वीकारने में खुद को असमर्थ पा रहा हूँ … “

“मैं लिख रहा हूँ, खास कर इस लिये क्योंकि भारत में इधर के दिनों में हुई अशांतियों के उपरांत आपकी कई चिट्ठियों का मैंने कोई जबाब नहीं दिया। मैंने एक लम्बी चिट्ठी लिखना शुरु किया था लेकिन मुझे डर लगा कि शायद इस चिट्ठी को आप मेरी खामोशी से ज्यादा गलत समझेंगे, और इंग्लैंड में हम घटनाओं के अखबारी रिपोर्टों पर शुरु में भरोसा नहीं कर पाये थे।” 

           



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