Saturday, December 13, 2025

कहां है मेरा अमेरिका

यह पहली पंक्ति है उन असंख्य दर्द भरे लोक और जनगीतों में से किसी एक की, जिन्हें गाते हुये पॉल रोबसन नाम का काला अमरीकी नौजवान पूरे विश्व की निपीड़ित मानवता का महानतम गायक बना। 

तुर्कीके कवि नाजिम हिकमत ने इनके सम्मान में, इन्हें सम्बोधित करते हुए एक गीत लिखा था जिसका हिन्दी रूपान्तर हम, पटना के सड़कों पर, क्रांतिकारी जनगीत मंडलियों के कार्यक्रमोंमें पिछले बीस वर्षों से सुनते रहे हैं। इसी महान गायक की जन्मशताब्दी, पिछले ९ मई को, बिहार राज्य जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा द्वारा स्थानीय आई.एम.ए. हॉल में आयोजित किया गया।

बंगला इप्टासे आये हुये प्रतिनिधियों, श्री कंकण भट्टाचार्य, श्रीमती मंदिरा भट्टाचार्य एवं श्री सुमन्तो डे ने इसे गीतों भरी एक अविस्मरणीय शामके रूपमें ढाल दिया। यूरोपीय व अमरीकी लोकगीतों की प्रस्तुतिके लिए विशेष रूपसे बांधे गये दो गिटार और एक पारम्परिक बैंजो के सहारे इन तीन कलाकारों ने, पॉल रोबसन की गायकी व सांगितिक आयामों के विकास पर आधारित एक गीतमय आलेखकी प्रस्तुति कर श्रोताओंको मंत्रमुग्ध कर दिया। 

अमरीकी काले लोगों पर, इस शताब्दीके शुरू के दशकों में जो दर्दनाक जुल्म ढाये जाते थे (जो जुल्म, कुछ हद तक आज भी जारी हैं) उन्हीं जुल्मों की दास्तान और मुक्ति की बेचैन पुकार, 'निग्रो स्पिरिचुअल' संगीतमें प्राण संचार करती रही। उन्हीं गीतोंको गाते हुये पॉल रोबसन' ने अपनी सांगितिक यात्रा शुरू की। 'लौट आओ मोजेस', 'नीलम का मंच अब मेरे लिये नहीं' आदि इसी दौर के गीत हैं।

एक फिल्म 'सैन्डर्स ऑफ द रिवर' में अभिनय करते हुये उन्होंने गाया एक जर्मन क्रांतिकारी गीत, 'जगा है राईन का प्राण, क्या गीत गाये तूफान'। इसी बीच उन्होंने दुनियाकी विभिन्न भाषाओंमें लोक संगीतका अध्ययन व अभ्यास शुरू किया। बल्कि संगीतकी राह पर चलकर वह इस सच्चाई तक पहुंच चुके थे कि अमरीकी काले लोगों की मुक्ति का मार्ग, विश्व की पीड़ित जनता व उनकी व्यथाओंके साथ चलने में है। इस सच्चाई तक पहुंचनेके लिये - उन्होंने भाषाओं का पाठ लेना शुरू किया। कहा जाता है कि उन्होंने हिन्दी भी सीखी थी। 

इसी बीच उन्होंने गाया 'वोल्गा, वोल्गा, जीवन का गीत' और विश्व प्रसिद्ध फिल्मकार सेर्गेई आईजेनस्टाईन के निमंत्रण पर मास्को पहुंचे। सोवियत रूस के समाज से उनका जीवन-दर्शन प्रभावित हुआ और अपने पुराने गीत 'बूढ़ा मिसिसिपि' की पंक्तियों में वे संघर्ष के पुट ले आये। लोकगीतोंके साथ-साथ उन्होंने नया गीत ढूंढ़ने का काम शुरू किया। फिर उन्होंने गाया लाल फौज का गीत 'कुंवारी लड़की अब रोओ मत'।

वर्ष १९३७ में रोबसन अन्तरराष्ट्रीय ब्रिगेड के साथ स्पेन पहुंचे, फ्रांको की तानाशाही हुकूमत के खिलाफ स्पेनी जनतंत्र की मुक्ति के लिये। उन्होंने गाया 'वे चार गद्दार जेनरल, मां-ओ- मां'।

द्वितीय विश्वयुद्धके संहार और ध्वंसके बीच उन्होंने शांतिका स्वर सुना बीठोफेनकी नौवीं सिम्फनी में। अन्तिम हिस्सेके कोरल को उन्होंने अंग्रेजीके शब्दोंसे संवारकर गाया 'शांति का राजमार्ग सामने पसार लो'।

अमरीकी सरकार का दमन चक्र, इस महान गायक पर हमलों का सारा मुहिम चलाया। गुंडों से हमले करवाए गये, पासपोर्ट छीन लिये गये। इसी बीच वे गाते रहे, आज के अमर बन चुके गीत, 'जॉन ब्राउन के कब्र तले', 'पिटबौग सैनिक', 'जो हिल', 'हम हिलेंगे नहीं', 'हम एक ही नाव में हैं भाई' आदि।

बंगाल इप्टाके संगीत सचिव कंकण भट्टाचार्य एवं मंदिरा की मर्मस्पर्शी गायनशैली एवं विशेषकर गीतों की, हिन्दी रूपान्तरों में प्रस्तुति ने श्रोताओंका मन मोह लिया।

प्रारंभ में विषय प्रवर्तन करते हुये बी. एन. कालेज के बांग्ला विभागाध्यक्ष एवं प्रतिष्ठित बांग्ला साहित्यकार पुर्णेन्दु मुखर्जी ने पॉल रोबसन को, कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर (उल्लेखनीय है कि उसी दिन उनकी भी १३८वीं जन्मतिथि थी) की विश्वदृष्टि के साथ जोड़कर देखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि २५ भाषाओं के ज्ञानी इस महान जनगायक की ज्ञानतृष्णा, तुलनात्मक लोकगीतोंपर शोधकार्य युग का चारण बनकर जीवन की व्यथाओं को शब्द व सुर देने की व्याकुलता तथा दमनके खिलाफ त्यागपूर्ण जीवन संघर्ष एक आदर्श है।

राजनीतिशास्त्र विभागके भूतपूर्व प्रधान वी.पी. वर्मा अपने अमरीका प्रवास काल के दौरान पॉल रोबसन से हुये मुलाकातों व बातचीत का संस्मरण सुनाया। प्राध्यापक शैलेश्वर सती प्रसाद ने पॉल रोबसन को मानवताकी मुक्ति के महान गायक के रूप में दर्शाया।

पूरे आयोजनका संचालन, बिहार राज्य जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा के सचिव अशोक मिश्राने किया।

(आज अखबार में १७.५.१९९९ को छपा एक पुराना प्रतिवेदन)