বিদ্যুৎ পাল
Storage of my writings to share.
Tuesday, August 27, 2024
অভিশপ্ত
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কত গুরুভার দুষ্কৃত্য আর মৃত্যু বইতে অভিশপ্ত হয়ে চলেছি আমরা! তোমাদেরকে তো এই অভিশাপেরও ভাগ দেবো না, শয়তান ...
ক্ষয়
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বোধগুলো হারিয়ে ফেলছে প্রাঞ্জলতা! মুখের ভাষা, দেহের ভাষা – জানছেও না, রাত্রে তারা ঘেঁটেছে কোন ঘৃণ্য ক্লেদ! কী বলবো? ভালোবাসি? হব না তো আত্...
Wednesday, August 21, 2024
বন্ধুর ফ্ল্যাট
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অভ্যস্ত পুরোনো সিঁড়ি ভেঙে উঠে তালা খুলে ঢুকি আরেকটি সমধর্মী বাঁচার অগোছালোপনায় … কেন যে চাবি দেয় লোকে! কেন বলে যায় তাদের ফ্ল্যাটটা দেখে আসতে...
চিঠিচর্চা ৬
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আমিও ভেবেছিলাম চিঠিযুগ শেষ হয়ে গেছে। হয় নি তো! ডাকপর্ব পেরিয়ে এখন ডিজিটাল! বুড়ো ডাকপিওন, ডাকবাক্সো, এ দুনিয়া চেনে না। কখনো অবাক দেখে সুউচ্চ ...
इतिहासविद
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गर्मी की एक दोपहर में मैने उन्हे देखा। धूल और कचरे से भरे रास्ते के एक तरफ से वह घर लौट रहे थे; कांख में कुछेक विदेशी पत्रिकाएं और हाथ...
Monday, August 19, 2024
कलीमलोग
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बाप-माँ की पीढी ने विश्वयुद्ध और अकाल देखा था। चटकल से छँटनी के बाद इस छोटे से शहर में आकर रज्जाक ने बीड़ी की दुकान खड़ी की थी। “अच्छा ही तो च...
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