Sunday, May 15, 2022

বুদ্ধ

আপনি বুদ্ধ, ফিলিম শুরুর
               ধামাকেদার সীন!
মনে হয় সিনেমা হলের
সস্তা ভাঙা সিটে বসে
দেখছি জবর হিট – ‘জন্ম-ঋণ’!
 
সমুদ্রের সুর্য উঠছে,
                 গাদিপচা রীলে! …
পরেই উঠল ছায়ামানুষ
ঢাকল সুর্য বিশাল বুক
হলের তিনশো দর্শককে
                উৎকণ্ঠায় ফেলে।

একটু পরেই বুক ছিঁড়ল
               আলোর বিচ্ছুরণ।
সুর্য আবার সুর্য হল,
ছায়ামানুষ আকাশ হল,
লেখায় সুরে ফুটে উঠল
               বুদ্ধং শরণং …!
 
সাত দশকের দেশকালও
              ফিলিমই, বিন্দাস!
তবু আপনার সাধনছায়ে
অবাক এক যুগের হাতছানি,
দেখতে বড়ো ভালো লাগে।
                নই তো তেমন ধ্যানী,
মঠের পিছে, বোধিবৃক্ষের নিচে
আলোহাওয়ায় পাতার গন্ধে
         বুক ভরে ভারতসত্যে
                        নিবিড় বিশ্বাস।
 
‘বুদ্ধ অর্থে মহৎ মানুষ
                যাও তাঁর শরণে!
আরো এগোও, ধম্ম অর্থে 
জ্ঞান, ধরো শিরে!
আরো এগোও সঙ্ঘ ঐক্যে,
             মানুষ হওয়ার রণে!’

১৬.৫.২২




Friday, May 13, 2022

প্রশ্ন থাক

এসব কাজে আনন্দটাই বড় ভাই,
থাক জটিল প্রশ্ন, রাতে ভাবব।
বরং আগে অটোর সাথে সারি
তিনঘন্টা ভাড়ায় নেওয়ার কথা।

ভাড়া হলে সাজাই ব্যানার দিয়ে,
সামনে, পিছে – নাও, ওদিক বাঁধো!
রাস্তা গলির লোককে খবর দিয়ে  
বিকেল নাগাদ মিছিল ধরব নিজের।

এবছরের মে-দিনটায় যেমন
তিনটে মিছিল একে একে এল
কয়েকটি খুব পরিচিত গলা,
মাথায় ছিল – বাইরে তো আর নেই! 

আবার যেসব লড়াই ভাবি নেই,
দেখতে পেলাম ফিরছে নানান রূপে –
একমুঠো লাল ঝান্ডায়; থাক প্রশ্ন,
মিছিলটাতেই আছি, ভাল লাগছে। 

আর দেখ ওই দীপকটাকে, এবার
বৌকে নিয়ে, বাচ্চা কোলে এল।
বিয়েও সেরেছিল যুব সম্মেলনে -
ভাবটা, লালে মাখিয়ে নেবে বাঁচা।

সব বড়দের সাথে নিল সেলফি
আমিই শালা বাইট দিতে ব্যস্ত …
পার্কের ওই সন্ধ্যাকাশটা তোরই,
আনন্দরাগ ছড়াচ্ছে দেখ্‌ রঙে।  

১৩.৫.২২



Thursday, May 12, 2022

কোকিল, ঘুড়ি এবং শিশু

বিচক্ষণ কোকিল 
লিচু গাছে ফেঁসে থাকা ঘুড়ির দিকে তাকাল,
তাকাল নিচে দাঁড়ান ছেলেটির দিকে।
এ ডাল থেকে ও ডালে, পাতার ফাঁক দিয়ে কোকিল 
ঘুরে ঘুরে ভালো করে দেখতে লাগল ঘুড়িটাকে …
মাঝে মধ্যে শিস দিয়ে উঠছিল।
বৈশাখের ভোরে, পূব থেকে ভেসে এল হাওয়া।
ঘুড়িটা ডালের ফাঁস থেকে ছিঁড়ে হাওয়ায়
এলো মেলো উড়তে থাকল এবং কোকিলও তার সাথে।
যথাসময়ে নিচে মাটিতে নেমে এল ঘুড়ি …
কোকিল কিছুদূর তাকে অনুসরণ করে
মাটি ছোঁয়ার আগের মুহুর্ত্তে তীক্ষ্ণ শিস দিয়ে ওপরে 
উঠে হাওয়া চিরে পূবের আকাশের দিকে উড়ে গেল।
বস্তুতঃ আমরা কোকিলের
ডাকটুকুই শুনি, পাতার ফাঁকে ফাঁকে, পাড়ার লিচুগাছে …
আকাশের ডাক বা তার 
উড়ানের আকাশটার খবর রাখি না।  

১৯৭৫  




Friday, May 6, 2022

धर्ममोह

धर्म के लिबास में आ कर जिसे जकड़ता है मोह
अंधा वह बस मारता है और खुद मरता है।
             नास्तिक को भी मिलता है विधाता का वरदान, 
             धार्मिकता का आड़म्बर वह करता नहीं। 
श्रद्धा के साथ जलाता है बुद्धि का आलोक,
शास्त्र मानता नहीं, मानता है आदमी की भलाई।

विधर्म कह कर मारता है दूसरों के धर्म को,
अपने धर्म का अपमान करता फिरता है,
             पिता के नाम पर चोट करता है उनके संतानों को,
             बस आचार ग्रहण करता है, सूझ-बूझ से वास्ता नहीं,
उपासनास्थल पर फहराता है खून-सना ध्वजा –
देवता के नाम पर यह तो शैतान का है भजन।

अनेक युगों की लज्जा व निरादर,
बर्बरता की विकृति व विड़म्बनाएं
            जिन्होने दिलाई धर्म में आश्रय की जगह
            कचरे में रच रहे हैं वे अपना कारागार। -
सुन रहा हूँ वह प्रलय की तुरही की आवाज,
महाकाल झाड़ु लेकर आ रहा है। 

जो मुक्ति दिलाएगा उसे खुँटा बना कर गाड़ दिया,
जो मेल कराएगा उसे बनाया विभेद का खड़ग,
                जो लाएगा प्यार अमृत के उद्गम से
                उसी के नाम पर पृथ्वी को दहाया विष की धारा में,
खुद नाव में छेद कर अब पार होने में डूबते हैं – 
फिर भी ये क्या क्षोभ दिखाते, किन पर करते दोषारोपण। 

हे धर्मराज, धर्म की विकृति का नाश कर 
धर्म के मूढ़जनों को आकर बचाओ।
              खून में दह गया है जो पूजा की बेदी
              तोड़ो तोड़ो, आज तोड़ कर उसे खत्म करो।
धर्म के कारागार की दीवार पर वज्र से प्रहार करो,
इस अभागा देश में ज्ञान का आलोक लाओ।  

7. 5. 2022



बंग-कवीन्द्र श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर के शुभागमन के अवसर पर

कविवर !

इस प्रदेश में आपके शुभागमन के अवसर पर आपका स्वागत करने के लिये मुजफ्फरपुर-प्रवासी हम बंगाली आज यहाँ इकट्ठे हुये हैं। थोड़े दिनों के लिये ही सही, हमारे बीच आपको पा कर हे बंगभूमि के वरपुत्र, भारती के प्रिय संतान, हम आनन्दित हैं, कृतार्थ व धन्य हुये हैं, एवं इस सामान्य अभिनन्दन-पत्र के द्वारा आपके प्रति हमारे क्षुद्र हृदयों की शुद्ध भक्ति व प्रीति, श्रद्धा व कृतज्ञता ज्ञापित कर रहा हूँ। …

यहाँ पर बंगसाहित्य के अनुरागियों को अपनी साहित्य-तृष्णा मिटाने के एकमात्र साधन के रूप में प्राप्त होती हैं बस दो-चार पत्रिकायें। उनमें से कई आपके द्वारा ही सम्पादित हुआ करती हैं और अक्सर आपके द्वारा रचित संगीत, कविता, निबंध एवं कहानियों से भरी होती हैं। इसलिये आपकी ही रचनायें पढ़ कर हम अपनी साहित्य-तृष्णा को चरितार्थ करते हैं; जो पढ़ते हैं उसी पर मुग्ध होते हैं एवं खुशी से झूम उठते हैं। … साहित्याचार्य बंकिमबाबु के परलोक सिधारने के उपरांत, बंगदेश के काव्य-राजसिंहासन के वर्तमान अधिकारी आप ही हैं। बंगालियों के हृदय में आपका राजसिंहासन स्थापित हुआ है। … बंकिमबाबू ने ही तय किया था कि उनके राजासन के अगले अधिकारी आप ही होंगे। इसी लिये अपने गले की माला निकाल कर उन्होने आपके गले में पहनाया था। उसी दिन राजत्व पर आपका अभिषेक हो चुका है। … जो प्रतिभा गीतों के इस कलतान तथा काव्यकला की जन्मदात्री है उस प्रतिभा के आधार को, साक्षात उस देवता-समान कवि को अपने बीच विराजित पाने पर हृदय में जैसा एक आनन्द का उदय होता है – पहले कभी अनुभूत न हुआ हो ऐसा एक अनिर्वचनीय आनन्द – हमारी क्षीण भाषा में, दीन वाक्यों के द्वारा उस आनन्द को समझाया नहीं जा सकता है।  … हमारे हृदयों पर इतना आधिपत्य, सिवाय बंकिमबाबू के, और किसी का हो नहीं पाया।

… कवित्व का धनी बंगाल में आपने कविता के एक अभिनव युग का सृजन किया है। आपको आदर्श बना कर, आपका अनुसरण कर, आपके भावों से अनुप्राणित होकर कवियों के एक वर्ग का अभ्युदय हुआ है। ब्रह्मदेश से सिंध तक के बंगाली जिस कवि के गीतों की मधुरता में पिघलने लगते हैं और जिनके आदर्श को सम्मुख में रखकर देश में नये कवियों के एक दल का अभ्युदय होता है, क्या गौरव है उस कवि का ! क्या महिमा है उअ कवि की ! आपकी कविता में ही उस गौरव के, उस महिमा के कारण निहित हैं।

आपकी कविता में और भी कुछ अनन्य गुण हैं, जो बंगाल के दूसरे कवियों में पाना दुर्लभ है। उनमें मुख्य हैं – आपकी गहरी, सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि एवं आपकी मर्मस्पर्शी समवेदना। बंगाली राष्ट्रीयता जितनी अन्तर्दृष्टिसम्पन्न एवं समवेदना सम्पन्न होगी, आपकी कविताओं का समादर उतना ही बढ़ेगा। और एक गुण है – आपकी कविता में क्षीण रूप से में प्रवाहित मंथरगति स्वदेश-हितैषिता की धारा। यह सत्य है कि बंगाल में स्वदेश-हितैषिता के उमंग से भरी हुई कविताओं का अभाव नहीं है, लेकिन उन कविताओं का प्रवाह तूफानी है – पद्मानदी की बाढ़ की तरह। स्चानक पूरे देश को वह प्लावित करता है लेकिन कुछ समय के बाद वह तूफानी जल-प्रवाह अथाह सागर में लीन हो जाता है, और जो स्थान प्लावित हुआ था, उस पर सिर्फ कीचड़ का एक परत बचा रहता है। लेकिन आपकी उद्दीप्तता अन्त:सलिला फल्गु की धारा की तर्ह है। उसमें तूफानीपन नहीं है, चंचलता नहीं है, गंदलापन नहीं है, लहरों के टूटने का विक्षेप नहीं है, हमेशा वह छुपे हुये तरीके से अन्तर्देश को अभिषिक्त करती है। … आपकी संगीत रचनाओं ने भी बंगाल में एक अभूतपूर्व युग का सृजन किया है। आप ने कई प्रेमसंगीत की रचना की है, लेकिन उनमें से एक में भी लालसा, कामना या भोगतृष्णा का लेशमात्र नहीं है। उनमें है सिर्फ त्याग का भाव, आत्मविसर्जन का भाव, एक अज्ञात अनन्त के प्रति अनन्त अनुराग एवं उपासना का भाव। … और आपके गद्य काव्य समूह – उनकी भी क्या तूलना की जय किसी से ? ‘क्षुधित पाषाण’ जैसा चित्तरंजक अद्भुत कहानी कहीं और पढ़ी हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता है। …

कविवर ! ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वह आपको लम्बी उम्र दें, आपके जीवन को मधुमय बनायें, आपकी प्रतिभा को नई शक्ति से, नये तेज से उद्दीप्त व उद्भासित करें और वह प्रतिभा आपकी अमृतमयी लेखनी के मुख से बंगाल के काव्यकानन में सुधा का निर्झर निसृत करे। बंगसमाज अमर कविप्रतिभा के अमृतमय फल का आस्वाद लेकर धन्य व कृतार्थ हो।  

बंगकुलरवि ! कृतज्ञ एवं भक्ति-विनम्र हृदय से, सम्मान के साथ हम आप का स्वागत करते हैं, और हर वर्ष आप का स्वागत कर सकें ऐसा अवसर देने की प्रार्थना करते हैं।

 

मुजफ्फरपुर-प्रवासी आपके भक्त बंगाली समुदाय

मुजफ्फरपुर
1 श्रावण, बंगाब्द 1308        

-----------------------------------------------------------------

বঙ্গকবীন্দ্র শ্রীযুক্ত রবীন্দ্রনাথ ঠাকুরের শুভাগমন-উপলক্ষে ।

কবিবর!

আপনার এ প্রদেশে শুভাগমন উপলক্ষে আপনার অভ্যর্থনা করিবার জন্য মজঃফরপুর-প্রবাসী বাঙ্গালী আমরা আজ এখানে সমবেত। অল্পদিনের জন্য হইলেও বঙ্গভূমির বরপুত্র, ভারতীর প্রিয়সন্তান আপনাকে আমাদের মধ্যে পাইয়া বাস্তবিকই আমরা আনন্দিত, কৃতার্থ ও ধন্য হইয়াছি, এবং এই সামান্য অভিনন্দনপত্রে আপনার প্রতি আমাদের ক্ষুদ্র হৃদয়ের অকৃত্রিম ভক্তি ও প্রীতি, শ্রদ্ধা ও কৃতজ্ঞতা জ্ঞাপন করিতেছি।---

এখানে বঙ্গ-সাহিত্যানুরাগীর সাহিত্য-পিপাসা মিটাইবার একমাত্র উপকরণই দুই চারিখানা সাময়িক পত্র। তাহার অনেকগুলি আপনারই সম্পাদিত এবং অনেক সময় তাহা আপনারই রচিত সঙ্গীত, কবিতা, প্রবন্ধ এবং গল্পে পূর্ণ। সুতরাং আপনারই রচনা পাঠ করিয়া আমরা আমাদের সাহিত্য-পিপাসা চরিতার্থ করি, এবং যাহা পড়ি তাহাতেই মুগ্ধ হই, এবং আনন্দে বিভোর হই। সাহিত্যাচাৰ্য বঙ্কিম বাবুর পরলোক গমনের পরে, বঙ্গদেশের কাব্য-রাজসিংহাসনের বর্তমান অধিকারী আপনিই বাঙ্গালীর হৃদয়রাজ্যে আপনার রাজসিংহাসন প্রতিষ্ঠিত হইয়াছে। ----বঙ্কিম বাবু আপনাকেই তাঁহার রাজাসনের ভাবী অধিকারী স্থির করিয়া নিজকণ্ঠ হইতে জয়মাল্য উন্মোচন পূর্ব্বক আপনারই গলে পরাইয়াছিলেন। সেই দিনই আপনার রাজত্বে অভিষেক হইয়া গিয়াছে। ... যে প্রতিভা এই কলগীতি ও কবিতাকলার উৎস, সেই প্রতিভার আধারকে, মূর্ত্তিমান সেই দেবোপম কবিকে আপনাদের মধ্যে বিরাজিত দেখিলে, হৃদয়ে যে কি এক অননুভূতপূর্ব্ব, অনির্বচনীয় আনন্দের উদয় হয়, তাহা আমাদের ক্ষীণ ভাষায়, দীন বাক্যে কিরূপে বুঝাইব ? আমাদের হৃদয়ের উপরে এত আধিপত্য বঙ্কিম বাবু ভিন্ন আর কেহ করিতে পারেন নাই।

----কবিত্ব-প্রবণ বঙ্গে আপনি কবিতার এক অভিনব যুগের সৃষ্টি করিয়াছেন। আপনাকে আদর্শ করিয়া, আপনার অনুসরণ করিয়া, আপনার ভাবে অনুপ্রাণিত হইয়া একশ্রেণী কবির অভ্যুদয় হইয়াছে। আব্রহ্মসিন্ধু পর্যন্ত বাঙ্গালী যে কবির কলগীতে দ্রব হইয়া যায় এবং যাঁহার আদর্শ সম্মুখে রাখিয়া দেশে একদল নবকবির অভ্যুত্থান হয়, সে কবির কি কম গৌরব, কম মহিমা ? আপনার কবিতার মধ্যেই সেই গৌরবের, সেই মহিমার কারণ নিহিত আছে।

.....আপনার কবিতার মধ্যে আরও কতকগুলি অনন্য সাধারণ গুণ আছে, যাহা বঙ্গের অন্যান্য কবিতে দুষ্প্রাপ্য । তন্মধ্যে প্রধান,— আপনার সুগভীর, সুক্ষ্ম অন্তর্দৃষ্টি, এবং আপনার মর্মস্পর্শিনী সমবেদনা। বাঙ্গালীজাতি যতই অন্তর্দৃষ্টিশালী ও সমবেদনা পরায়ণ হইবে, ততই আপনার কবিতার সমাদর বৃদ্ধি পাইবে। আর একটী গুণ, — আপনার কবিতার মধ্যে ক্ষীণ-প্রবাহা মন্থরগতি স্বদেশহিতৈষণার ধারা। বঙ্গদেশে স্বদেশহিতৈষণার উদ্দীপনা পূর্ণ কবিতার অভাব নাই সত্য; কিন্তু সে সকল কবিতার প্রবাহ উদ্দাম,—পদ্মার বন্যার ন্যায়। হঠাৎ তাহা সমস্ত দেশকে প্রাবিত করে, কিন্তু কিয়ৎকাল পরে সেই উদ্দাম বারিরাশি-প্রবাহ অনন্ত সাগরে মিলাইয়া যায়, এবং যে স্থান প্লাবিত হইয়াছিল, তাহার উপর একস্তর কদম মাত্র অবশিষ্ট থাকে। কিন্তু আপনার উদ্দীপনা অন্তঃসলিলা ফল্গু ধারার ন্যায় তাহাতে উদ্দামতা নাই, চঞ্চলতা নাই, আবিলতা নাই, তরঙ্গভঙ্গের উৎক্ষেপ নাই, সর্ব্বদা তাহা প্রচ্ছন্নভাবে অন্তর্দেশকে অভিষিক্ত করে। আপনার সঙ্গীতাবলীও বাঙ্গালায় এক অপূর্ব্ব যুগের সৃষ্টি করিয়াছে। আপনি অনেক প্রেমসঙ্গীত রচনা করিয়াছেন; কিন্তু তাহার একটীতেও লালসার, কামনার, ভোগপিপাসার গন্ধমাত্র নাই; তাহাতে আছে কেবল, ত্যাগের ভাব, আত্মনিমজ্জনের ভাব, এক অজ্ঞাত অনন্তের প্রতি এক অনন্ত অনুরাগ ও উপাসনার ভাব। ...আর আপনার গদ্য কাব্য সমূহ –তাহাদেরই বা তুলনা কোথায় ? “ক্ষুধিত পাষাণের ন্যায় চিত্তরঞ্জক অপূর্ব্ব গল্প কোথাও পড়িয়াছি বলিয়া মনে হয় না।...

কবিবর ! ঈশ্বরের নিকট প্রার্থনা করি তিনি আপনাকে দীর্ঘজীবী করুন, আপনার জীবনকে মধুময় করুন, আপনার প্রতিভাকে নূতন বলে, নূতন তেজে উদ্দীপিত ও উদ্ভাসিত করুন, এবং সেই প্রতিভা আপনার অমৃতময়ী লেখনীর মুখে বঙ্গের কাব্যকাননে সুধার প্রস্রবণ উৎসারিত করুক, এবং বঙ্গসমাজ অমর-কবি-প্রতিভার অমৃতময় ফল আস্বাদন করিয়া ধন্য ও কৃতাৰ্থ হউক ।

বঙ্গকবিকুলরবি ! আমরা আপনাকে কৃতজ্ঞ ও ভক্তিনম্র-হৃদয়ে সসম্ভ্রমে অভ্যর্থনা করি, এবং বর্ষে বর্ষে আপনাকে অভ্যর্থনা করিবার সুযোগ প্রার্থনা করি

মজঃফরপুর

১লা শ্রাবণ, বঙ্গাব্দ ১৩০৮।

মজঃফরপুর-প্রবাসী আপনার ভক্ত বাঙ্গালী সম্প্রদায় ।




Thursday, May 5, 2022

मैं और प्राण, खेलेंगे दोनों आज मृत्यु का खेल

[कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की 150वीं जयन्ती पर साप्ताहिक ‘लोक जनवाद’ में प्रकाशित आलेख, कुछ संशोधनों के साथ।]

‘ठाकुर’ या ‘टैगोर’? ठाकुर बोलो भई। ‘टैगोर’ तो अंग्रेजों ने बना दिया क्योंकि उन्हे ‘ठ’ बोलना नहीं आता था। आये भी तो कैसे? ‘ठ’ बोलने के लिये जीभ को तालु में सटा कर चट्खारे लेने की आदत रहनी चाहिये, तब तो फेफड़े के धक्के से ‘ठ’ निकलेगा! और चटखारे लेने की आदत तब पड़ेगी जब आम के पेड़ हों और टिकोले फलें चैत में। इंग्लैन्ड में आम होता है क्या?

तो ‘ठाकुर’ बोलो। अब इसके चलते भाँति-भाँति के ठाकुर लोग उत्साहित हों कि कविगुरु उनकी जाति के थे तो हमारी बला से।

जमीन्दार तो बेशक थे वे, अपने जन्म से। लेकिन आज से 118 साल पहले, देश के पंडितों की बीमार दार्शनिकता पर प्रहार करते हुये ‘मायावाद’ नाम की कविता में उन्होने लिखा, “निकम्मे रात दिन घर के कोने में बैठकर / विश्ववसुन्धरा को / अनन्त आकाश में ग्रहों और तारों से भरी सृष्टि को तुमने / मिथ्या समझा है। / युगयुगान्तरों से पशु पक्षी प्राणी / निरन्तर निडर जहाँ ले रहे हैं साँस / विधाता की दुनिया को माँ की गोद मानते हुये / तुम बुड्ढे उसका कुछ भी विश्वास नहीं करते। / लाखों करोड़ों जीवों को लेकर इस विश्व का मेला / सब बच्चों का खेल लगता है तुम्हे।”

उसी वर्ष ‘वसुन्धरा’ नाम की एक लम्बी कविता में, पूरी पृथ्वी में, जिन्दगी के हर एक कोने में पहुँच कर जीने की उत्कट व्याकुलता को भाषा देते हुये उन्होने लिखा, “नये देशों का नाम जितना पाठ करता हूँ / विचित्र वर्णन सुनता हूँ, मन आगे बढ़ कर / स्पर्श करना चाहता है सबकुछ – सागर की तट पर / छोटी-छोटी नीली पहाड़ी मार्ग पर / एक गाँव, तट पर सूख रहा है जाल / पानी में तैर रहा है नाव, फहर रहा है पाल / मछियारा पकड़ रहा है मछली …” फिर आगे लिखा, “… इच्छा होती है दिल में / देश देशान्तरों में सभी लोगों के साथ / स्वजाति बन कर रहूँ; पिऊँ ऊँट का दूध / रेगिस्तान में रहूँ अरब का बच्चा, बेखौफ, आजाद; / तिब्बत के पहाड़ों पर / निर्लिप्त पत्थरों के शहर में, बौद्ध मठ में / विचरण करूँ। बनूँ अंगूर का रस पीने वाला फारसी / गुलाब के बगीचे में रहने वाला / बनूँ निडर तातार, घुड़सवार; / शिष्टाचारी ताजगी भरा जापान / प्रवीण प्राचीन चीन रात दिन कर्म में लीनो / सबके घर में जन्म लूँ ऐसी इच्छा होती है।”

ऊपर दिये गये दोनों उद्धरण उनका काव्यग्रंथ ‘सोने की नाव’ से लिये गये हैं। उसी काव्यग्रंथ में ‘झुलन’ कविता भी है जिससे इस आलेख का शीर्षक लिया गया है। कविता में प्राण और प्रेयसी एक हो जाते हैं। लोक जनवाद के इसी अंक में अन्यत्र छपा एक निबंध है फैज पर। फैज के पचास साल पहले रवीन्द्रनाथ सूफी-भक्ति की सोच को यूँ आगे बढ़ाते हैं कि ‘गमें-जाना’ और ‘गमें-दौरां’ एक ही तजुर्बे के दो पहलू हैं। बचा-बचा कर, ढक-ओढ़ कर जीते हुये जब जिन्दगी अंगुलियों के पोरों से बालू जैसे झरने लगती है, जब “मिठास में और मिठास घोल पिलाते रहने के बावजूद भी प्राण-प्रेयसी खोती चली जाती है” तब कवि एकबारगी कौंधते हैं बिजली की तरह`-

“इसलिये सोचा है आज कि खेलना होगा नयाखेल / रात के वक्त / मौत के झूले में, रस्सी पकड़ कर / बैठेंगे दोनों बहुत करीब / तूफान आ कर अट्टहास हसते हुये / ठेलेगा हमें – मैं और प्राण, खेलेंगे दोनों / झूलन का खेल / रात के वक्त।”

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन की सांस्कृतिक चेतना में आधुनिक मानवतावाद को प्रधान स्वर बनाया। एक ऐसा आधुनिक मानवतावाद जिसमें विज्ञान, प्रौद्योगिकी, सहकारिता, श्रम की पूंजी के साथ संघर्ष, युक्तिवाद जैसे तत्कालीन सभी आधुनिक चिंतनविंदुओं को आत्मसात करने की उदारता हो, उन पर खरे उतरने के लिये खुद को बदलने की भी सक्रियता हो, साथ ही साथ स्वदेश-भावना भी बलशाली हो – पूरी दुनिया से प्रेम करो, सभी अच्छी युक्तिग्राह्य बातों को नि:शंक ग्रहण करो अपने देश की उन्नति के लिये, अपनी जनता की खुशहाली के लिये।

सन 1916 में चीनी समुद्र में सफर के दौरान रवीन्द्रनाथ ने अपने प्रियजन को एक पत्र लिखा। उस पत्र में चीन के बारे में भविष्यवाणी थी जो बाद के दिनों में अक्षरश: सच्ची प्रमाणित हुई। लेकिन साथ ही साथ, उस भविष्यवाणी के शब्द दर्शाते हैं कि रवीन्द्रनाथ के मानवतावाद में समाजवादी क्रांति जैसी नई सोच के लिये भी कितनी जगह थी। माल वाहक नाव पर चीनी मजदूरों को काम करते हुये देखकर रवीन्द्रनाथ ने लिखा, “कर्म की यही मूर्ति है। एक दिन इसी की जीत होगी। यदि न हो, यदि वाणिज्य-दानव ही मनुष्य, घर-गृहस्थी, आनन्द-स्वतंत्रता आदि को लीलता चला जाए और एक वृहत गुलाम-सम्प्रदाय की सृष्टि कर डाले तथा उसी की मदद से कुछ थोड़े से लोगों का आराम और स्वार्थ-साधन करता रहे, तब यह पृथ्वी रसातल में चली जायेगी। चीन की यह इतनी बड़ी शक्ति – कर्म करने की शक्ति – जिस दिन हमारे इस युग के सर्वश्रेष्ठ वाहन को पा सकेगी, अर्थात जिस दिन विज्ञान को हाथ कर लेगी, उस दिन संसार की कौन सी शक्ति है जो उसे बाधा दे सके?” (साभार: मंदाकिनी, रवीन्द्र विशेषांक, बछवाड़ा, बेगुसराय)

इस संदर्भ को आगे बढ़ाते हुये एक और उद्धरण प्रस्तूत कर रहा हूँ। सन 1939 ई॰ में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने रूस की यात्रा की। रूस-यात्रा काल में लिखे गये उनके अत्यंत मूल्यवान पत्र। जिनमें उनका स्वदेश-चिन्तन समाहित है, ‘रूस की चिट्ठी” नाम की पुस्तक में संकलित है।

“ … फिलहाल रूस आया हूँ – न आने पर इस जन्म के तीर्थों का दर्शन अधूरा रहता। यहाँ ये लोग जो कुछ कर रहे हैं उसकी अच्छाई-बुराई विचारने से पहले, सर्वप्रथम बस यही लगता है कि कितना असम्भव सा साहस है। ‘सनातन’ नाम का पदार्थ इंसान की अस्थिमज्जा को, मन-प्राण को हजार रूपों में जकड़ रखा है – कितनी दिशाओं में कितने महल हैं उसके, कितने सारे दरवाजे और उन पर कितने पहरे हैं, कितने युगों से कितना टैक्स वसूल करते हुये उसकी तिजोरी हो उठी है पर्वत की तरह ऊँची। इन लोगों ने उस ‘सनातन’ को सीधा जटा पकड़ कर खींच फेंका है – न डर है, न चिन्ता, न संशय। सनातन की गद्दी फेंक कर, नये के लिये एकदम सा नया आसन बना दिया है। पश्चिम के महादेश विज्ञान के जादू से दु:साध्य को साध लिया है, देखकर तारीफ करता हूँ मन ही मन। पर यहाँ जो प्रकांड घटनायें घटित हो रही हैं, वह देखकर मैं सबसे ज्यादा विस्मित हुआ हूँ। सिर्फ अगर बड़े से तोड़फोड़ की बात होती तो इतना आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि नेस्तनाबूद करने की यथेष्ट शक्ति है इनमें। लेकिन देख पा रहा हूँ कि बहुत दूर तक फैले एक इलाके में एक नई दुनिया बसाने के लिये ये जुट गये हैं। विलम्ब सहा नहीं जा रहा है, क्योंकि पूरी दुनिया में प्रतिकूलता है, सब इनके विरोधी हैं – जितनी जल्दी हो सके इन्हें सीधा खड़ा होना होगा – हाथों हाथ सबूत देना होगा कि जो ये चाह रहे हैं वह भूल नहीं, धोखा नहीं है। हजारों वर्ष के विरुद्ध दस-पन्द्रह बरस ने जीतने का प्रण किया है। दूसरे देशों की तूलना में इनकी आर्थिक ताकत मामूली है, प्रतिज्ञा की ताकत जबर्दस्त है।

“यह जो क्रांति घटित हुई यह एक अर्से से रूस में ही होने के इंतजार में थी। कितने दिनों से चल रहा है आयोजन। ख्यातिप्राप्त, ख्यातिहीन कितने ही लोगों ने कितने बरसों से प्राण त्यागा है, असहनीय दुख स्वीकार किया है। पृथ्वी पर क्रांति के कारण बहुत दूर तक व्याप्त रहते हैं, लेकिन घनीभूत हो उठते हैं एक-एक स्थान पर। पूरे शरीर का रक्त दूषित होने से भी एक-एक कमजोर जगह पर फोड़ा बन कर लाल हो उठता है। जिनके हाथों में धन है, जिनके हाथों में सत्ता है, उनके हाथों से निर्धन और अक्षम लोगों को असहनीय यंत्रणा सहनी पड़ी है, इसी रूस में। दोनों के बीच की गैर-बराबरी की पराकाष्ठा का, अनन्त प्रलय के माध्यम से इसी रूस में प्रतिकार करने की कोशिश हो रही है।”

जो बात कहना चाहता हूँ,

कहा नहीं गया,

वह बस यही है कि –

देखा हूँ हजार बार

दरवाजे पर अपने

आँखों के सामने ही शाश्वत दिवालोक का विश्व।

अपरिचित का यह चिरपरिचय

इतनी सहजता से नित्य भर दिया है हृदय का गहन,

कि वह बात कह सकूँ, इतनी सरल वाणी

जानता नहीं हूँ मैं।

अपने जीवनकाल में खुद एक विश्वविद्यालय बन गए रवीन्द्रनाथ। नहीं, विश्वभारती की बात नहीं। वह तो एक विश्वविद्यालय है जिसे कवि ने अपने हाथों से बनाया। खुद उनकी सृजनशीलता एक विश्वविद्यालय बन गई। 60 वर्षों से अधिक की उर्वरतम काव्ययात्रा में स्वातंत्रोन्मुख भारत के सांस्कृतिक मानस का निर्माण, सौ से अधिक कहानियों में समाज के अंतर्विरोधों का गहन विश्लेषण, डेढ़ हजार गीतों में असीम के स्पन्दन से सराबोर जीवन-मुहूर्तों की रचना एवं गुलामी, दमन व अन्याय के खिलाफ उठते स्वर को भी भाषा देना, उन गीतों को धुनों में ढालते हुये शास्त्रीय प्रकरणों के सरल व तर्कसंगत इस्तेमाल पर निरन्तर प्रयोग करना, हजार से अधिक चित्रकारी के द्वारा रंग, रेखा एवं कविता के अन्तर्सम्बधों को नया आयाम देना; दर्जनभर उपन्यास एवं नाटकों के माध्यम से मानवीय यथार्थ की आलोचना में मुक्तिनायकों की तलाश करना, क्लासिकीय धाराओं से संश्लिष्ट पर स्वतंत्र एवं सहज एक नृत्य-पद्धति को विकसित करना … इन सबों के बाद है उनके शिक्षा, स्वावलम्बन, ग्राम-सुधार सम्बन्धित काम जो देश भर मे स्वातंत्रोत्तर आधुनिक भारत के निर्माताओं को प्रेरित करते रहे।

कहा जाता है कि पैरिस पर जिस दिन नाजियों ने हमला किया था, उस दिन भी फ्रांसीसी रेडिओ पर रवीन्द्रनाथ के ‘डाकघर’ नाटक का ब्रॉडकास्ट जारी था। 18 जुलाई 1942 को पोलैंड की राजधानी वारसॉ की एक बस्ती (घेटो) में जानुस कोर्जाक नाम के एक नाट्यप्रेमी ने स्थानीय बच्चों को लेकर पोलिश भाषा में ‘डाकघर’ नाटक का मंचन आयोजित किया। इतिहास में यह त्रासदी दर्ज है कि तीन हफ्तों के बाद कोर्जाक एवं सारे बच्चे ट्रेब्लिंका मृत्यु-शिविर में ले जाये गये। जब मॉस्को घिर रहा था हिटलर की फौजों से, किसी एक प्रेक्षागृह में ‘रक्तकरवी’ (लाल कनेर) नाटक का अभिनय जारी था। भारत एवं बांग्लादेश दोनों देशों का राष्ट्रगान रवीन्द्र-रचित है, जबकि श्रीलंका के राष्ट्रगान के रचयिता शांतिनिकेतन के छात्र थे एवं रवीन्द्रनाथ के गीतों से प्रेरित होकर ही उन्होने उस गीत की रचना की। गीत सुनने से रवीन्द्र-प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है।

जब उन पर लांछन लगाया गया कि ‘जन गण मन’ गीत उन्होने ब्रिटिश सम्राट पांचवें जॉर्ज के अभिनन्दन में लिखा है तो उन्होने एक अन्तरंग पत्र में लिखा, “शाश्वत मानव के इतिहास पथ पर युगों से धावित पथिकों की रथयात्रा के चिरसारथी के रूप में मैं चौथे या पांचवें जॉर्ज की स्तुति कर सकता हूँ, इस किस्म की असीमित मूढ़ता का सन्देह जो मेरे वारे में कर सकते हैं, उनके प्रश्नों का उत्तर देना आत्म-अपमान है।”*

पूरे ब्रिटिश राज में, उनकी संख्या कम नहीं है जिन्हे इस देश में ‘नाइट’ की उपाधि दी गई। लेकिन सिवाय रवीन्द्रनाथ ठाकुर के, कोई दूसरा नहीं रहा जिसने ब्रिटिश हुकूमत द्वारा किये गये किसी अन्यायपूर्ण काम के प्रतिवाद में ‘नाइट’ की उपाधि वापस कर दिया हो। जालियाँवालाबाग नरसंहार के विरोध में रवीन्द्रनाथ ने सिर्फ ‘नाइट की उपाधि का ही त्याग नहीं किया, भारत से इंग्लैंड तक लगातार गूंजता रहा उनका प्रतिवाद का स्वर। **

हिन्दी के आचार्य, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदीजी को रवीन्द्रनाथ के साहचर्य में बरसों रहने का अवसर प्राप्त हुआ था। वह लिखते हैं, “ऐसे लोग तो संसार में बहुत मिलेंगे, जिनके पास जाने से मनुष्य अपने भीतर के दोषों को देखता है, अपने अन्तस्थल के असुर को प्रत्यक्ष कर निराश हो जाता है; पर ऐसे लोग बहुत कम मिलेंगे, जो उसके भीतर देवता को प्रत्यक्ष करा दे। रवीन्द्रनाथ ऐसे ही महापुरुष थे।”

जनकवि नागार्जुन लिखते हैं :-

“हुए थे पैदा तुम
सुशिक्षित अभिजात धनाढ्य द्विजकुल में
नहीं खाई होगी अभाव की मार कभी
… फिर न हुए क्यों तुम
अकर्मण्य, आलसी, विलासी, भू-भार मात्र?
वाह्य आड़म्बर उतना भयानक !!
गला न क्यों घोंट सका
तुम्हारे महामानव का?
कहाँ से मिली तुम्हे इतनी अनुभूतियाँ
पीड़ित मनुष्यता के निम्नतम स्तर की?” (‘रवि ठाकुर’ कविता से)

रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मानवतावाद की जनवादी क्रांतिपक्षीय संभावनाओं को ओझल कर शासकवर्ग उन्हे अपनी सफेदपोशी का अलंकार न बना डाले इसकी निगरानी करना एवं जनता के रवीन्द्रनाथ को जनता के बीच बनाये रखना हमारा अहम सांस्कृतिक कार्यभार है। कौन कहेगा इस तरह :-


“जो भी दुख है धरती का, जो भी पाप,
जो भी अमंगल है,
जो भी अश्रुजल,
जो भी हलाहल है, हिंसा का
सारे लहर बन उठ रहे हैं
तट लांघ कर
ऊंचे आसमान का व्यंग करते हुये।
फिर भी नाव खे कर
सब कुछ ठेल कर
होना होगा पार,
कानों में लिये निखिल का हाहाकार,
माथे पर लिये उन्मत्त दुर्दिन,
दिल में लिये आशा अंतहीन।”

___________________________________________

*इस विषय पर पूर्णेन्दु मुखोपाध्याय लिखित तथा प्रतर्क साहित्य संसद द्वारा प्रकाशित एक पुस्तिका “प्रसंग: भारत का राष्ट्रगान जनगणमन एवं रवीन्द्रनाथ” का पीडीएफ प्रति इन्टर्नेट पर उपलब्ध है। कॉमेंट में दिये गये लिंक से डाउनलोड कर पढ़ा जा सकता है।

**इस विषय पर एक आलेख मेरे ही ब्लॉग पर उपलब्ध है। अधिक जानकारी के लिये पाठक कॉमेंट में दिये गये लिंक पर जा कर पढ़ सकते हैं।



Tuesday, May 3, 2022

বাঁধা পথ – বাঁধা গত

কয়েকবার জায়গা বদলাল আমাদের জড়ো হওয়ার।
রাস্তা বদলাল মিছিল যাওয়ার।
শেষের পরিসরটা বদলাল পথসভার।
কিছু কিছু মানুষও বদলাল ঝান্ডা, প্ল্যাকার্ড হাতে নেওয়ার।
এটাও সময়েরই বদল, তবে আমাদের নয় –
ধনিক উন্নয়নতন্ত্রের সিদ্ধান্ত বদল গত তিরিশ বছরের,
শহরে কতটা পরিসর পাবে টাকা
কতটা মানুষ।
আমরা নিয়ম মেনেই ধরে রেখেছি –
বলতে পারি প্রতিবাদের দৈনন্দিন,
বলতে পারি গতানুগতিক!
 
আবার কোনো একটি জায়গাতেও জড়ো হয়েছি বেশ কিছু বছর।
একই পথ দিয়ে মিছিল নিয়ে গেছি।
একই পরিসরে গোল হয়ে দাঁড়িয়ে করেছি পথসভা।
একই মানুষ নিয়ে দাঁড়িয়েছে ঝান্ডা, প্ল্যাকার্ড,
একই নেতৃবৃন্দ ভাষণ দিয়েছে (একই ভাষণ মোটামুটি)
সময় তখনো বদলেছে –
ধনিক উন্নয়নতন্ত্র এগিয়েছে লাগাতার
তাদের এজেন্ডায় আর আমরা দেখতেও পাইনি,
শহরে পরিসর ছড়াচ্ছে টাকা, পিছোচ্ছে মানুষ।
আমরা নিয়মটুকুতে ধরে রেখেছি
প্রতিবাদের দৈনন্দিন, তার গতানুগতিক।
 
এমন নয় যে নিয়ম ভাঙেনি মানুষেরা।
বিশেষ করে যুবক, যুবতীরা, নারীরা।
চাকরির জন্য, মাসোহারার জন্য।
ব্যারিকেড ভেঙেছে, চলেছে জলকামান, লাঠি, টিয়ারগ্যাস।
তখনো জারি থেকেছে বাকি দিনগুলোয়,
বলতে পারি প্রতিবাদের দৈনন্দিন,
বলতে পারি গতানুগতিক।
 
এটা সত্যি যে গতানুগতিক খেয়ে শেষ করে দৈনন্দিন।
কিন্তু এটাও সত্যি যে দৈনন্দিনেই টিপে টিপে মারা যায় গতানুগতিক।
 
৪.৫.২২