Tuesday, January 15, 2019

॥ 14 ॥ बंगलाभाषा व साहित्य का विकास


यह काम पूरी तरह बंगाल भाषा एवं साहित्य से सम्बन्धित है। अत: इसके पहलुओं पर यथासंभव संक्षिप्त चर्चा की जायेगी।
नई व आधुनिक गद्यरीति की शुरुआत – कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर विद्यासागर के वारे में कवितायें और गद्य दोनों लिखे। ‘विद्यासागर चरित’ में वह लिखते हैं, “विद्यासागर बंगलाभाषा के प्रथम, वास्तविक कलाकार थे। उनसे पहले बंगला गद्यसाहित्य की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन वही सबसे पहले बंगला गद्य में कला की निपुणता ले आये।    
अपनी विख्यात आत्मजीवनी ‘जीवनस्मृति’ में वह ‘वर्णपरिचय’ पढ़ने के अपने शैशवकालीन अनुभव के बारे में बताते हैं। विद्यासागर द्वारा रचित ‘वर्णपरिचय’ में, शिशुओं को बंगला वर्णमाला, शब्द गठन और वाक्य निर्माण सिखाते हुये वह बिना युक्ताक्षर का पहला वाक्य पढ़ने के लिये देते हैं, “जल पड़े, पाता नड़े’। [पानी गिरता है, पत्ता हिलता है]। रवीन्द्रनाथ कहते हैं, “केवल याद आता है, ‘जल पड़े, पाता नड़े’। उस समय तक ‘कर खल’ इत्यादि शब्दों के हिज्जे का तूफान पार कर बस किनारे पहुँचा ही था। उस दिन पढ़ रहा था, ‘जल पड़े, पाता नड़े’। मेरे जीवन में यही आदि कवि की पहली कविता थी। उस दिन का आनन्द आज भी जब याद आता है तब समझता हूँ कि कविता में मेल [तुक] क्यों जरुरी है। मेल है इसीलिये वह पंक्ति खत्म होकर भी खत्म नहीं होती है – जब उसका वक्तव्य खत्म हो जाता है तब भी उसकी झंकार खत्म नहीं होती है, मेल को लेकर ज्ञान के साथ मन के साथ खेल चलते रहता है। इसी तरह घूम घूम कर उस दिन मेरे समस्त चैतन्य में पानी गिरते और पत्ते हिलते रहे… “ [रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जीवनस्मृति, पृ॰ 3]    
बंगला साहित्य के प्रख्यात इतिहासकार सुकुमार सेन कहते हैं, “उनके पहले राममोहन राय ने लिखा था कामकाज का गद्य, मृत्युंजय तर्कालंकार ने लिखा था पंडिताउ गद्य। इन दोनो स्टाइलों में से किसी में भी सभी अर्थों की अभिव्यक्ति देने, सभी काम संभव करने और भावों के वजन को ढोने की क्षमता नहीं थी। बंगला भाषा की, हिलने-डुलने वाली इस गद्यरीति का सुधार कर विद्यासागर नें इसे स्थायी सामान्य व सार्वजनिक रूप दिया। (‘सर्वजन’ कह कर यहाँ थोड़ा बहुत शिक्षित बंगाली की ही बात कर रहा हूँ)। … आज के अर्थों में विद्यासागर शायद ‘साहित्यिक’ नहीं थे, साहित्यसेवक भी नहीं थे, लेकिन उन्होने साहित्य के रथ के लिये रास्ता बना दिया था। वह थे साहित्य के यथार्थ मार्गनिर्माता।” [विद्यासागरिका, सुकुमार सेन, प्रसंग: विद्यासागर, सम्पादक: विमान बसु, प्रकाशक: बंगीय साक्षरता प्रसार समिति, 1970]
बंगला साहित्य व नाट्यसाहित्य के विद्वान आलोचक अजित कुमार घोष ‘शकुन्तला’ एवं सीतार वनवास’ की समीक्षा करते हुये कहते हैं कि दोनों रचनाओं की “भाषा बिल्कुल आधुनिक बंगला साधुभाषा है। संस्कृत शब्दों के नपेतुले इस्तेमाल में, पढ़ने में तृप्ति के लिहाज से, अर्थपूर्णता में एवं छन्द के स्वाभाविक माधुर्य में इन रचनाओं की समसामयिक कोई तुलना नहीं है। बंगला गद्य के इस स्वाभाविक छन्द का आविष्कार साहित्यिक विद्यासागर की प्रधानतम कीर्ति है।”
आगे कहते हैं, “साथ ही, और एक बात गौर करने वाली है। शकुन्तला का लालित्य सीतार वनवास में नहीं है, बल्कि उसकी जगह ली है गंभीरता। यानी भाषा विषय के अनुरूप है। … विषय के अनुरूप भाषा का गठन किसी भी साहित्यकार के लिये एक चुनौती है। उनकी शक्ति का वास्तविक परीक्षण उसी में होता है। … [उस चुनौती को स्वीकारने के कारण ही] उनमें सहजात रस का जो बोध था, जो अर्जित प्रज्ञा थी एवं जो दुर्लभ सामाजिक जागरूकता थी, उन सभी चीजों की परिणति हुई उनके लेखन की साहित्यिक सिद्धि।” [गद्यसाहित्ये विद्यासागर, अजित कुमार घोष, विद्यासागर स्मारकग्रंथ, सम्पादक गोलाम मुर्शिद, प्रकाशक: विद्योदय लाइब्रेरी प्राइवेट लिमिटेड, पहला भारतीय संस्करण, 1970]
वर्णमाला एवं वर्ण-शिक्षण का शोधन – प्रोफेसर गुरुचरण सामन्तो पटना स्थित कॉमर्स कॉलेज के प्राचार्य थे। साथ ही, बिहार के बंगलाभाषियों की अस्मिता के संघर्ष के वह मार्गदर्शक रहे। बंगलाभाषा के पठनपाठन, पाठ्यपुस्तक लेखन आदि के क्षेत्र में उनकी बड़ी भूमिका रही। उन्होने विद्यासागर द्वारा किये गये बंगला वर्णमाला के शोधन के बारे में कहा:
“90 के दशक में बिहार सरकार साल में 33 लाख रुपयों का बंगला पाठ्यपुस्तक छापती थी। अब झाड़खंड सरकार यह भार लेने को राजी हुई है। … बंगला पाठ्यपुस्तक के सरकारीकरण के बाद पहली कक्षा एवं दूसरी कक्षा के रिडर तैयार करने की जिम्मेदारी मुझे दी गई थी। उन ग्रंथों को रचने में गाइड लाइन हमलोग जरूर NCERT का अनुसरण किये थे पर सैद्धांतिक पद्धति के लिये जिन दो पुस्तकों से हमने सबसे अधिक मदद ली थी वे थे विद्यासागर का ‘वर्णपरिचय’ एवं रवीन्द्रनाथ का ‘सहजपाठ’। बिहार के लिये बंगला रिडर लिखते हुये हमने विस्मय के साथ गौर किया कि प्राथमिक भाषा-पाठ की रचना के लिये केन्द्रीय सरकार के NCERT ने जो गाइड लाइन भेजा था वैसे ही गाईड लाइन का उपयोग लगभग डेढ़ सौ साल पहले विद्यासागर ने अपना ‘वर्णपरिचय’ लिखने में किया था। उन्होने क्या अंग्रेजी किताब से यह पद्धति ली थी? आधुनिक काल की मुख्य पद्धति: शब्द एवं वाक्यों के क्रम में वर्णमाला की शिक्षा प्रदान, पहले शब्द सीख कर फिर शब्दों को जोड़ जोड़ कर वाक्यों का निर्माण, वर्ण एवं शब्दों की पुनरावृत्ति आदि विज्ञानसम्मत पद्धति का उपयोग उन्होने किया था। ‘वर्णपरिचय’ की रचना में उनके द्वारा किये गये कुछ और क्रांतिकारी प्रयोगों का जिक्र करना जरूरी है। वे थे: प्राचीन विद्वानों की धमकियों को अनसुनी करते हुये वाक्य में कॉमा, सेमिकोलॉन, प्रश्नचिन्ह, हाइफेन, डैश आदि विराम एवं विच्छेद चिन्हों का उपयोग करना, पैराग्राफ बाँट कर लिखना इत्यादि। यह सब उन्होने बलपूर्वक बंगला भाषा में प्रचलित किया था। उनके वैज्ञानिक व क्रांतिकारी बलप्रयोग का एक और दृष्टांत है बंगला वर्णमाला का सुधार। जैसे:
(क)  बंगला वर्णमाला से दीर्घ-ॠ तथा दीर्घ-ॡ को निर्वासित करना,
(ख)  अनुस्वार एवं विसर्ग को स्वरवर्ण से हटाकर व्यंजन वर्ण में ले आना,
(ग)  ड़, ढ़ एवं य को स्वतंत्र वर्ण के तौर पर व्यंजन वर्ण में जगह देना,
(घ)  क्ष वर्ण को युक्त-वर्ण के रूप में चिन्हित कर वर्णमाला से बाहर करना,
(ङ)  खंड-त को [बंगला में ‘ৎ’] आधा व्यंजन मान कर पाठ्यांश में कोई स्वतंत्र पाठ न देना एवं   अन्त में ‘ত’ एवं ‘ৎ’ का युक्त पाठ देना; आज कल भी कई लोग खंड-त को समाप्त कर त पर हलन्त लिखने के पक्ष में हैं,
(च)  चन्द्र विन्दु को स्वतंत्र व्यंजन वर्ण की स्वीकृति देना,
इस तरह विद्यासागर ने पहले के 16 + 34 = 50 वर्णों को नये ढंग से सजा कर 12 + 40 = 52 वर्णों में सीमित कर दिये जो आज भी बंगला भाषा में इस्तेमाल हो रहा है (हालाँकि बहुतों ने आज कल ॡ का वर्जन किया है)। उन दिनों का अखबार खोलने पर दिखेगा कि इन ‘म्लेच्छ’ सुधारों के विरोध में पोंगापंथी पंडितों ने जो हल्ला मचाया था उससे विद्यासागर विचलित नहीं हुये।” [गुरुचरण सामन्तो, ‘बिहारे विद्यासागर ओ वर्णपरिचय’, प्रतर्क, दिसम्बर 2005]
प्राइमर की रचना – उपर में ही ‘वर्णपरिचय’ का जिक्र है। वर्णपरिचय के प्रकाशन के पहले भी बंगला के कई मुद्रित प्राइमर बंगाल के बाजार में उपलब्ध थे। लेकिन वे लोकप्रिय नहीं बन पाये थे। पाठशालाओं और विद्यालयों में गुरुजी अपने स्मरण से ही बच्चों को वर्णमाला एवं भाषा की प्राथमिक पढ़ाई करा देते थे। लेकिन विद्यासागर उस वर्णमाला एवं उसकी पढ़ाई में क्रांतिकारी परिवर्तन ले आये। इसलिये 2 पैसे कीमत का यह नन्हा सा पुस्तक आने के कुछ वर्षों बाद से ही बाजार में ऐसा छाया कि आज भी छाया हुआ है। कहा जाता है कि जब विद्यासागर गाँवों में विद्यालय परिदर्शन के लिये जाते थे, उसी दौरान पाल्की में बैठे बैठे उन्होने इस पुस्तक की पाण्डुलिपि तैयार की।      
आज, डेढ़ सौ साल बाद भी बंगला सीखने का सबसे अधिक मानक प्राइमर है ‘वर्णपरिचय’। इसके पहले भाग एवं दूसरे भाग, दोनों का पहला संस्करण सन 1855 में प्रकाशित हुआ था। पहले भाग का अन्तिम संस्करण जो खुद विद्यासागर के हाथों किया गया था, उसका प्रकाशन उनके कर्माटाँड़ के पते से सन 1875 के जाड़े में हुआ था। वह संस्करण साठवाँ था, यानि, बीस वर्षों में इस पुस्तक के साठ संस्करण प्रकाशित हुये थे। जबकि दूसरे भाग का बासठवाँ संस्करण एक साल बाद यानि 1876 में विद्यासागर के हाथों सम्पन्न हुआ था। आज भी पश्चिम बंगाल सरकार इस पुस्तक को मुख्य प्राईमर का दर्जा दिये हुये है।    



॥ 13 ॥ नारी सशक्तिकरण : बालविवाह का विरोध

सन 1850 में ‘सर्वशुभंकरी’ नाम की मासिक पत्रिका में ‘बाल्यविवाहेर दोष’ (बालविवाह की बुराईयाँ) शीर्षक एक निबंध प्रकाशित हुआ था। उक्त पत्रिका में किसी भी आलेख के साथ लेखक का नाम नहीं था। पर बाद में विद्यासागर के समसामयिक, मित्र राजनारायण बसु लिखित ‘आत्मचरित’ तथा विद्यासागर के सुपुत्र शम्भुचन्द्र विद्यारत्न लिखित ‘विद्यासागरेर जीवन चरित’ ग्रंथ में जिक्र हुआ कि वह निबंध ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का ही लिखा हुआ है।
“आठवीं साल की उम्र में कन्या का दान करने से गौरीदान का पूण्योदय होता है, नौवीं साल की उम्र वाली को दान करने से पृथ्वी-दान का फल मिलता है, दसवीं साल वाली को पात्र के हाथों में देने से परलोक में पवित्र स्थान की प्राप्ति होती है आदि जो लाभ स्मृतिशास्त्र द्वारा प्रतिपादित किये गये हैं, उसी की मृगतृष्णा में मुग्ध होकर बिना परिणाम की विवेचना किये हमारे देश के सभी लोग बाल्यकाल में विवाह की प्रथा का प्रचलन किये हैं।”
इन्ही पंक्तियों से वह निबन्ध की शुरूआत करते हैं। जैसा कि पहले कहा गया है इस मसले पर उन्हे आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिला। लेकिन प्रेम और दाम्पत्य के बारे में या मानव-जीवन में उसके महत्व के बारे में वह क्या सोचते थे इसकी एक झलक उनके इस निबन्ध में देखने को मिलता है।
“मन की एकता ही प्रणय का मूल है। वह एकता उम्र, स्थिति, रूप, गुण, चरित्र, बाह्य भाव एवं आन्तरिक भाव आदि बहुत सारे कारणों पर निर्भर करती है। हमारे देश के बालदम्पति एक दूसरे का आशय नहीं जान पाये, एक दूसरे के अभिप्राय को समझने का उन्हे मौका नहीं मिला, स्थिति के बारे में जानकारी नहीं ले पाये, भेँट-मुलाकात के द्वारा एक दूसरे के चरित्र के बारे में जानना तो दूर, एक बार ठीक से नजरें भी नहीं मिली उनकी, केवल एक उदासीन बातुनी घटक के व्यर्थ उत्तेजक बातों पर भरोसा करते हुये पिता-माता ने जैसी अभिरुचि बनाई, वही बेटी और बेटे के लिये विधि के लिखे जैसी, सुखदुख की अलंघ्य सीमा बन गई। इसी लिये हमारे देश में दाम्पत्य के बन्धन में निश्छल प्रणय प्राय: नहीं दीखता है, प्रणयी बस भात-भोजन देने वाला और प्रणयिनी घर की नौकरानी बन कर संसार-यात्रा का निर्वाह करते हैं।”
“… प्राचीन समाज में लगभग सभी जातियों में विवाह अधिक उम्र में होते थे। हालाँकि उस समय होने वाले विवाहक्रिया के शास्त्र में आठ प्रकार का उल्लेख मिलता है, फिरभी अधिक उम्र में होने वाले गान्धर्व, आसुर, राक्षस, पैशाच – ये चार प्रकार के विवाह अधिक प्रचलित थे। इनके अलावे स्वयम्वर प्रथा का भी प्रचलन था और ये सभी प्रकार के विवाह, वर एवं कन्या के अधिक उम्र के न होने पर संभव ही नहीं है।”
“… लोकाचार व शास्त्र के प्रयोग के बन्धन में आबद्ध होकर दुर्भाग्य से हमलोग पीढ़ी दर पीढ़ी बालविवाह के कारण अन्तहीन क्लेश एवं निरन्तर दुर्दशा भोग रहे हैं। बाल्यावस्था में विवाह हो जाने के कारण विवाह का जो मीठा फल है – मधुर प्रणय – उसका स्वाद दम्पतियों को कभी भी नहीं प्राप्त होता है। बल्कि, अगर परस्पर प्रणय के साथ घरसंसार करना चाहे भी तो हर कदम विड़म्बनायेँ झेलनी पड़ती हैं। और, परस्पर के बीच अप्रीतिकर सम्बन्ध से जो सन्तान की उत्पत्ति होती है उसका भी उन्ही की तरह कुन्ठित होने की अधिक सम्भावना होती है। नवविवाहित बालक-बालिकायें परस्पर के मनोरंजन हेतु रसभरी बातें, उसी में उस्तादी, वाक-चातुर्य, कामकला कौशल इत्यादि के अभ्यास व अभिव्यक्ति में हर वक्त लगे रहते हैं। उस दिशा में आवश्यक उपायों की परिपाटी के बारे में सोचने में तत्पर रहते हैं। फलस्वरूप, उनके विद्याभ्यास में वाधा उत्पन्न होता है। जगत का जो सार है, विद्या, उसी धन से वंचित होकर वे सिर्फ मनुष्य की आकृति रह जाते हैं। दर-असल, वास्तविक मनुष्य में उनकी गिनती भी नहीं होती।”
“…सभी सुख का जो मूल है, दैहिक स्वास्थ्य, बालविवाह में उसका भी क्षय होता है। अन्यान्य जातियों की अपेक्षा हमारे देश के लोगों के शारीरिक व मानसिक सामर्थ्य में जो नितान्त कमी है, उसका कारण अगर ढूंढ़ा जाय तो बालविवाह ही नि:सन्देह प्रधान कारण माना जायेगा।”
“… हाय! कब हमें इस दुरवस्था से उद्धार करेंगे जगदीश्वर। और वह शुभदिन भी कितने समय के बाद आयेगा। खैर, आजकल इस विषय को लेकर जो आन्दोलन हो रहे हैं, उस से मंगल होगा। शायद कभी न कभी इस देश के लोग उस आगामी शुभ दिन के शुभ आगमन पर सुख की स्थिति में जी पायेंगे।”
आगे इस निबंध में विद्यासागर ‘सभ्य, सुशिक्षित’ व्यक्तियों से अनुरोध करते हैं कि वे नारीशिक्षा के लिये जितना उद्यम दिखायें, उतना ही उद्यम बालविवाह को खत्म करने में भी दिखायें, नहीं तो लक्ष्य की प्राप्ति कभी नहीं होगी। साथ ही, ‘जन्मकाल से बीस वर्षों की उम्र तक’ मृत्यु की अधिक संभावना प्रस्तावित करते हुये [निबंध में जिक्र नहीं है पर स्पष्ट है कि मृत्यु की यह उम्रसीमा पुरुष के लिये एवं दैहिक विकास सम्बन्धित होगी] विद्यासागर कहते हैं कि अगर बीस वर्ष की उम्र पार करने के बाद विवाह हो तो विधवाओं की संख्या भी अधिक नहीं होगी।
सन 1891 में जब फूलमणि यौन-हत्याकांड के बाद पहली बार भारत में स्वीकृति की उम्र (एज ऑफ कॉन्सेन्ट) पर कानून बनाने का सवाल आया तो विद्यासागर जीवित थे। सरकार ने राय मांगी। विद्यासागर ने दिनंक 16 फरवरी 1891 को जो लिखित जबाब दिया वह इस प्रकार था:-
“…मेरा प्रस्ताव होगा कि किसी पुरुष के लिये, उसकी पत्नी के प्रथम मासिक होने के पूर्व विवाह क्रिया को सम्पूर्ण करना [सहवास करना] दण्डनीय अपराध हो। चुँकि बहुसंख्यक लड़कियाँ 13, 14, या 15 साल की उम्र के पहले वह लक्षण प्राप्त नहीं करती, इसलिये मेरा प्रस्तावित कदम विधेयक से अधिक व्यापक, अधिक वास्तविक एवं अधिक बड़ी सुरक्षा प्रदान करेगा। साथ ही साथ, उस कदम का विरोध, धार्मिक क्रिया में हस्तक्षेप का आरोप लगा कर भी नहीं किया जा सकेगा।”
आगे विद्यासागर बालिका-पत्नियों की स्थिति के प्रति चिन्ता व्यक्त करते हुये यह भी जोर डालते हैं कि धार्मिक शास्त्रों में नियमों के उल्लंघन की सजा चुँकि आध्यात्मिक किस्म की है, इसलिये सरकारी दण्डात्मक कानून बनना ही चाहिये।    
भारत में बालविवाह निरोधक कानून पहलीबार 1929 में बना जिसमें लड़की की उम्रसीमा 15 की गई। उसके 
पहले सिर्फ भारतीय दण्ड संहिता 1860 के अनुसार बलात्कार की उम्रसीमा (रजामन्दी या पत्नी होने के बावजूद) 10 वर्ष थी जिसे 1891 में उपरोक्त फूलमनी-मृत्युकांड के उपरान्त 12 वर्ष किया गया था। 



॥ 12 ॥ नारी सशक्तिकरण : बहुविवाह के खिलाफ संघर्ष


बहुविवाह के खिलाफ संघर्ष भी विधवाविवाह के खिलाफ संघर्ष के साथ ही शुरु हुआ था।
यह एक सच्चाई है कि नई शिक्षा से लैस होकर शहरी हिन्दु मध्यवर्ग के युवाओं की नजर (मुख्यत: ‘उच्चजातीय’) अपने ही समुदाय के भीतर व्याप्त सामाजिक बुराईयों की ओर पड़ने लगी। उन्होने बगावत किया। इस बगावत की कई धारायें आगे बढ़ीं। मुख्यत: चार धारायें हमें दिखती है। पहला, वे लोग जो हिन्दु धर्म की सभी रीतिरिवाजों का सिर्फ विरोध ही नहीं किये बल्कि योरोपीय जीवनधारा को अपना लिये; कुछ ने तो धर्म ही त्याग दिया और इसाई बन गये। दूसरा, जो औपनिवेशिक प्रशासन और न्यायव्यवस्था में उनके समकक्ष होने के लिये विभिन्न गैर-बराबरियों के सवाल ब्रिटिश कानूनों के आइने में खड़े किये। तीसरा, जो अपने समाज में सुधार लाकर उसे आधुनिक बनाने की कोशिश किये। और चौथा, जो गरीब किसानों पर किये जा रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठाये। चारों धाराओं में से बड़े समाज-सुधारक भी आये, बड़े लेखक-कवि भी आये, बड़े पत्रकार भी आये। और इन सभी धाराओं के आगे की पीढ़ियाँ राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल भी हुईं। इस तीसरी और कुछ हद तक चौथी धारा में से ही ईश्वरचन्द्र विद्यासागर आये। लेकिन अपने चरित्र की ज्योति, अपनी कर्मदक्षता और कर्मशक्ति, मानवप्रेम, दया, करुणा, और खास तौर पर अपने समूचे व्यक्तित्व के अनोखेपन से वह अनन्य बन गये।
बहुविवाह के सवाल पर विद्यासागर का पहला हस्तक्षेप सन 1871 में लिखे गये एक पुस्तिका के द्वारा हुआ। उसी पुस्तिका के विज्ञापन में उन्होने 16 साल पहले बहुविवाह के खिलाफ शुरु किये गये कामों का जिक्र करते हैं।
“इस देश में बहुविवाह प्रचलित रहने के कारण, नारीजाति को सीमाहीन क्लेश का सामना करना पड़ रहा है एवं समाज का अनगिनत प्रकार से अनिष्ट हो रहा है। सरकारी कानून के बिना उस क्लेश व अनिष्ट के निवारण की संभावना नहीं है। इस कारण से देश के लोग, समय समय पर, इस कुत्सित प्रथा के निवारण की प्रार्थना करते हुये राजद्वार पर आवेदन करते रहते हैं। सर्वप्रथम, 16 वर्ष पूर्व, श्री किशोरीचाँद मित्र महाशय के उद्यम पर ‘बन्धुवर्गसमबाय’ [विद्यासागर के जीवनीकार के अनुसार इस संस्था का नाम अलग था – सुहृद समिति] नाम के समाज से भारतवर्ष के प्रशासकीय समाज [कम्पनी की सरकार] को एक आवेदन दिया गया। प्रतिपक्ष का भी एक आवेदन पड़ा कि बहुविवाह शास्त्रसम्मत है, इसे बन्द करने पर हिन्दुओं का धर्म लुप्त होगा, अत: इस मामले में सरकार का हस्तक्षेप उचित नहीं होगा। इन दो आवेदनों के सुपुर्द किये जाने के अलावे उस समय और कोई कार्यक्रम होते हुये दिखाई नहीं पड़ा।
“दो वर्षों के बाद बर्धमान, नवद्वीप, दिनाजपुर, नाटोर, दिघापति आदि स्थानों के राजा एवं देश के लगभग सभी मुख्य लोगों ने बहुविवाह के निवारण के लिये प्रशासकीय समाज को आवेदन किया। कहा जा सकता है कि इस समय तक देश के लोग इस विषय पर एकमत हुये थे क्योंकि निवारण की प्रार्थना करते हुये लगभग सभी स्थानों से आवेदन आया था; जबकि खिलाफ की बातें किसी भी पक्ष से नहीं आई थी। सुप्रसिद्ध बाबु दिवंगत रमाप्रसाद राय महाशय ने इस समय, इस कुत्सित प्रथा के निवारण हेतु जिस तरह जतन किया था और पूरी उत्साह के साथ विभिन्न तरीके से जितना परिश्रम किया था, उसके लिये उन्हे हजारों बार साधुवाद देना चाहिये। पूर्णत: यह विश्वास हुआ था कि व्यवस्थापक समाज द्वारा बहुविवाह निवारण की व्यवस्था करते हुये कानून बनायेगी। लेकिन, हतभाग्य देश के दुर्भाग्य के कारण उसी समय सरकार के विरुद्ध विद्रोह हुआ। सारे सरकारी अधिकारी विद्रोह के निवारण में पूर्णत: व्यस्त हो गये। बहुविवाह के निवारण की तरफ ध्यान देने की उन्हे अवकाश नहीं मिला।”
पुस्तक के विज्ञापन में इसके आगे भी विधवाविवाह के खिलाफ कानून बनवाने के लिये हुये प्रयासों का बिन्दुवार जिक्र है। उसमें विद्यासागर पाँच साल पहले इस पुस्तक की रचना की शुरुआत और फिर बीमार पड़ जाने के कारण काम अधुरा रह जाने की चर्चा करते हैं।
अन्तत: इस पुस्तक के लिखे जाने का कारण वह बताते हैं जो काफी रोचक है।
“इधर के दिनों में सुनने को मिला है कि कलकत्ता स्थित सनातनधर्मरक्षिणी सभा के सदस्यों ने बहुविवाह के निवारण हेतु विलक्षण उद्यम ग्रहण किया है। उनकी नितान्त इच्छा है कि यह अति जघन्य, अति नृशंस प्रथा बन्द हो जाय। इस प्रथा के बन्द होने पर शास्त्र की अवमानना होगी कि नहीं एवं धर्म का अपवाद होगा की नहीं इस आशंका को समाप्त करने के लिये सभा के अध्यक्षगण धर्मशास्त्र के व्यापारी बड़े बड़े पंडितों की राय ले रहे हैं एवं सरकार की चौखट पर आवेदन करने के लिये, दूसरों के द्वारा किये जा रहे उद्यमों का जायजा ले रहे हैं। वे लोग अच्छे अभिप्राय से प्रेरित होकर जो इतने उत्तम, देश के लिये हितकर मामले में हस्तक्षेप कर रहे हैं, उसमें उन्हे थोड़ी सहुलियत होगी, यह सोच कर मैंने इस पुस्तक को मुद्रित एवं प्रचारित किया।
“पिछली बार जो उद्यम लिये गये थे, तो कुछ लोगों ने कहा था कि सरकार ने ही परामर्श देकर किसी व्यक्ति को इस मामले मे सक्रिय किया है और उसी लिये बहुविवाह के निवारण की प्रार्थना करते हुये आवेदनपत्र दिया गया है। किसी किसी ने कहा था कि जिनके उद्यम से आवेदनपत्र दिया गया है वे हिन्दुधर्म से द्वेष रखने वाले हैं, हिन्दु धर्म का लोप करने के अभिप्राय से उन्होने ऐसा उद्यम किया है। लेकिन सनातनधर्मरक्षिणी सभा के उद्यम में वैसा आरोप लगने की बिल्कुल संभावना नहीं है। इस देश में हिन्दु धर्म की रक्षा हो, इसी के लिये सन्नातनधर्मरक्षिणी सभा स्थापित हुआ है।”
फिर भी विरोध करने वाले लोगों पर कटाक्ष करते हुये अन्तत: कहते हैं, “…सनातनधर्मरक्षिणी सभा से प्रार्थना है कि जब इस मामले में उन्होने हस्तक्षेप किया ही है तो बिना विशेष जतन एवं यथोचित प्रयास किये वे काम खत्म न समझें।”……
मूल पुस्तक में पहले वह धर्मशास्त्र के अनुसार किस किस स्थिति में एक से अधिक विवाह का प्रावधान है उसकी व्याख्या करते हैं। फिर वह एक एक कर हिन्दु समाज की आपत्तियों को उठाते हैं और उनका जबाब देते हैं। पहली आपत्ति जिसे वह उठाते हैं वह है कि ‘बहुविवाह शास्त्रानुसार एवं धर्मानुसार अभ्यास है’। और शास्त्रार्थों के बंधन में प्रतिपक्ष को ऐसा बांधते हैं कि उसे निकलने का रास्ता नहीं मिले। शास्त्रों का विवेचन कर वह अर्थ निकालते हैं कि पहली पत्नी के जीवित रहते इतर जाति में विवाह करने के तो विधान हैं पर अपनी जाति में नहीं।
दूसरी आपत्ति उठाते हैं कि ‘बहुविवाह बन्द होने पर कुलीन ब्राह्मणों का जातिपतन और धर्मनाश होगा’। बंगाल का इतिहास एवं लोकश्रुतियों के द्वारा पहले वह दिखाते हैं कि ‘कुलीन’ ब्राह्मणों की उत्पत्ति कैसे हुई, कितने प्रकार के ‘कुलीन’ मध्ययुगीय शासक द्वारा तय किये गये एवं क्यों किये गये। उसके बाद वह दिखाते हैं कि सभी ‘कुलीन’ कैसे कैसे धर्मभ्रष्ट और जातिभ्रष्ट हुये। फलत: अब वे कुलीन कहलाने योग्य हैं ही नहीं। उनका धर्मनाश बहुविवाह करने या न करने की प्रतीक्षा नहीं कर रहा है।
तीसरी आपत्ति में विद्यासागर ‘भंगकुलीन’ की बात को उठाते हैं कि बहुविवाह रहित होने पर भंगकुलीनों की कुलीन-मर्यादा खत्म हो जायेगी, क्योंकि शास्त्र के अनुसार कुलीनों की कन्या से विवाह करने पर ही उनकी ‘भंग’पन अगली पीढ़ी में खत्म हो पायेगी। इस आपत्ति पर विचार करने के क्रम में वह भंगकुलीनों के, विवाह के बाद व्याहता पत्नियों के प्रति किये गये व्यवहार की चर्चा करते है, उन व्याहता पत्नियों के भयावह, नारकीय जीवन का वर्णन करते हैं और कहते हैं कि इन भंगकुलीनों से नीच तो कोई है ही नहीं। ये ब्राह्मण क्या, मनुष्य कहलाने तक के योग्य नहीं हैं। क्या ऐसे नीचों के अनुरोध पर बहुविवाह चालु रहना चाहिये?
चौथी आपत्ति वह उठाते हैं कि ‘बेशक एक समय कुलीनों का अत्याचार था, वे लोग बहुत सारे विवाह करते थे लेकिन अब वह प्रथा खुद व खुद खत्म हो रही है, कुछ दिनों में पूरी तरह समाप्त हो जायेगा। इसलिये इस प्रथा को बन्द करने हेतु कानून की आवश्यकता नहीं है’। इस आपत्ति के खण्डन के क्रम में विद्यासागर पूरी सूची पेश करते हैं यह दिखाने के लिये कि बहुविवाह की प्रथा यथावत है, थोड़ी सी भी कमी नहीं आई है। आदमी का नाम, गाँव, जिला बताते हुये वह सूचीबद्ध करते हैं कि किस तरह 55 वर्ष की उम्र वाला कुलीन ब्राह्मण 80 विवाह किये हुये है, 64 वर्ष की उम्र वाला कुलीन ब्राह्मण 72 विवाह किये हुये है और 18 वर्ष की वाला युवा कुलीन भी 11 विवाह किये हुये है। यह एक लम्बी सूची है जिसमें सिर्फ वे ही नाम हैं जो चिन्हित किये जा सके हैं और जिन्होने दस या उससे अधिक विवाह किये हैं। दस के नीचे वालों की तो कोई गिनती संभव ही नहीं है। आगे एक अलग सूची में सिर्फ एक गाँव के 64 ब्राह्मणों का नाम और उम्र और विवाह की संख्या (एक से अधिक) उन्होने दिया है।  
पाँचवीं आपत्ति कायस्थों की थी कि बहुविवाह बन्द होने पर उनका ‘आद्यरस’ की प्रथा में विघ्न उत्पन्न होगी। पहले तो विद्यासागर स्पष्ट कह देते हैं कि इस प्रथा के न होने से न तो ‘कायस्थों का जातिपतन एवं धर्मनाश होता है’ और न ही उनके ‘विवाह इत्यादि में कोई असुविधा’ होती है। उसके बाद वह इस ‘आद्यरस’ का अर्थ एवं वास्तविक स्थिति का विश्लेषण करते हैं। तत्कालीन जाति-नियमों के अनुसार बंगाल के कायस्थ दो भाग – कुलीन व मौलिक – में विभाजित है, वह दिखाते हैं। फिर विवाह के नियमों का वर्णन करते हुये वह बताते हैं कि एक तरफ कायस्थ विवाह की व्यवस्था कहती है कि कुलीन ज्येष्ठपुत्र का विवाह कुलीन कन्या से ही होना चाहिये। दूसरी ओर, मौलिक कायस्थ कुलमर्यादा बढ़ाने के लिये अपनी कन्या का विवाह कुलीन ज्येष्ठपुत्र से ही करना चाहते हैं। फलस्वरूप, पहला विवाह कुलीन घर में कर कुलरक्षा कर चुके ज्येष्ठपुत्र से ही मौलिक कायस्थ अपनी कन्या का विवाह करते हैं। कुलीन कायस्थ ज्येष्ठपुत्र जो मौलिक कायस्थ घर में दूसरा विवाह करता है उसे ही ‘आद्यरस’ कहते हैं और वह वर, मौलिक घर में ‘आद्यरस का वर’ कहलाता है। आगे विद्यासागर दिखाते हैं कि एक तरफ इस ‘आद्यरस के वर’ को प्राप्त करने और अपने घर में आवभगत करने में मौलिक कायस्थ आर्थिक रूप से खस्ताहाल हो जाते हैं और दूसरी तरफ, ‘आद्यरस का वर’ बना पति के न रहने से अकेली व्याहता कुलीनकन्या की क्या हालत होती है।       
छठी आपत्ति ये होती थी कि बहुविवाह एक सामाजिक व्याधि है, सामाजिक तरीके से ही इसका रोध होना चाहिये; सरकार को इसमें हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिये। विद्यासागर व्यंग करते हुये हिन्दु समाज की कुछ कुरीतियों को गिनाते हैं जो न तो समाप्त हुआ न किसी ने प्रयास किया समाप्त करने के लिये। इसी में वह दहेज प्रथा को भी गिनाते हैं और दिखाते हैं पढ़े लिखे घरों में, पढ़े लिखे लड़के विवाह के लिये अधिक से अधिक कीमत में बेचे जाते हैं और यह बीमारी गाँवों से अधिक कलकत्ता शहर में है।
सातवीं आपत्ति है कि जब भारत के सभी प्रान्तों में, हिन्दु और मुसलमान दोनों सम्प्रदाय के लोगों में बहुविवाह प्रचलित है, तब सिर्फ बंगाल के हिन्दु सम्प्रदाय के लोगों ने क्यों आवेदन किया है। विद्यासागर कहते हैं कि बंगाल के हिन्दु सम्प्रदाय का जितना अनिष्ट इस प्रथा के कारण हो रहा है, शायद अन्य प्रान्तों में उतना नहीं हो रहा है। बंगाल के मुसलमान सम्प्रदाय में भी उतना दोष या अनिष्ट दिखाई नहीं पड़ता है। बंगाल के हिन्दु सम्प्रदाय में यह प्रथा बन्द हो जाने से न तो यहाँ का मुसलमान समाज विरोध करेगा और न ही अन्य प्रान्त के लोग्। और कहीं नही हुआ इसलिये बंगाल के हिन्दु सम्प्रदाय के लोग आवेदन करने पर भी कुछ न करें यह राजधर्म नहीं है। आगे थोड़ी आलोचना के स्वर में वह कहते हैं कि जो अंग्रेज सरकार कई प्रान्तों के लोगों के विरोधों के बावजूद सतीप्रथा को बन्द कर दिया था आह बहुविवाह के रोध हेतु बार बार लिखे जाने के बावजुद कोई कदम नहीं उठा रहा है।
अन्त में कुछ और प्रासंगिक बातों को कहते हुये उस आपत्ति को काटते हैं जो कहता है कि कुछ लोग नाम कमाने के लिये सरकार के पास आवेदन किये हैं। विद्यासागर जिक्र करते हैं कि बीस हजार से अधिक लोग आवेदन करने में शामिल हैं, इतने सारे लोग सिर्फ कुछ लोगों को नाम कमाने देने के लिये हस्ताक्षर करेंगे, इतने मूर्ख और और बेकार नहीं हैं। फिर वह कुछ बड़े महत्वपूर्ण लोगों का नाम गिनाते हैं जिन्होने हस्ताक्षर किया है।
पर बात यहीं खत्म नहीं हुई। क्योंकि हिन्दु समाज के अकर्मण्य उच्चजातीय समुदाय में बहुविवाह कुछ के लिये आय का जरिया था तो कुछ के लिये दैहिक हवस का। इसलिये बड़े बड़े नामी कुछ पंडित कूद पड़े बहुविवाह के समर्थन में शास्त्रों की व्याख्या में। उन्होने किताब लिखे, पर्चे बाँटे। विद्यासागर के खिलाफ हर तरीके से झूठा प्रचार किया। तब विद्यासागर ने पहले तो छोटा एक पर्चा लिखा। फिर पहले से काफी बड़ा एक पुस्तक लिखना पड़ा जिसमें बहुविवाह के समर्थन में लिखी गई एक एक पुस्तिका को सामने रखकर उनमें जिक्र किये श्लोकों और कथनों को पूरा का पूरा उद्धृत कर दिखाया गया कि किस तरह वे चतुर पंडित आधा अधुरा उद्धरण प्रस्तूत कर अपने भोगलालसा के समर्थन में व्याख्या कर रहे थे।
एक वर्ष बाद सन 1872 में लिखे गये पुस्तक के आगे विद्यासागर कुछ कर नहीं पाये। वास्तविकता यही है कि कोई भी कुछ नहीं कर पाया। स्वतंत्रता की प्राप्ति के पूर्व बहुविवाह के खिलाफ कोई कानून बना ही नहीं। हिन्दु समाज के लिये पहला कानून सन 1956 में बना।          



॥ 11 ॥ नारी सशक्तिकरण : विधवाविवाह


नारी सशक्तिकरण की दिशा में मुख्यत: चार प्रसंगों को ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, समाज-सुधार के अपने कार्यभारों के दायरे में लेते हुये दिखते है। बालविवाह, नारीशिक्षा, विधवाविवाह, बहुविवाह।
इस भाषा में बात को कहने का कारण है कि नवजागरण के पुरोधा-पुरुष कोई ऐसे व्यक्ति तो थे नहीं कि बस यूँ ही काम आते गया और करते गये। अपनी पढ़ाई खत्म कर रोजगार के क्षेत्र में अवतरित होते होते वह छात्रावस्था के अपने उगते विचारों को सुव्यवस्थित करने लग गये होंगे। अपने माता-पिता और परिवार के लिये अन्न की व्यवस्था करने के साथ साथ उन्होने जरूर सोचा होगा अब जीवन में करना क्या है। शैशव से अपने आसपास उन्होने नारियों की नारकीय जीवनस्थिति देखी थी, उन पर निर्मम अनाचार-अत्याचार होते हुये देखे थे। बड़ी बात यह है कि नारियों के आगे बढ़ने के लिये रास्ता बनाना उनके लिये सिर्फ नारीमुक्ति का प्रश्न नहीं था (जैसा कि आज भी कुछ लोग सोचते हैं) वल्कि सामाजिक मुक्ति का प्रश्न था – वह स्पष्ट देखते थे कि नारी मुक्त होगी गुलामी से तो पुरुष भी मुक्त होगा गुलाम-मालिक की मानसिकता से और समाज लैंगिक-गुलामी की दुर्व्यवस्था’ के दौर से आगे बढ़ेगा।
समाज-परिवर्तन को परिप्रेक्ष्य में रखने वाली यह सोच सबसे अधिक प्रतिफलित हुई है ‘बाल्यबिबाहेर दोष’ (बाल्यविवाह का दोष) शीर्षक निबन्ध में जो सन 1850 में ‘सर्वशुभंकरी’ नाम की मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। पर आश्चर्य है कि आगे चलकर विधवाविवाह के मुद्दे पर जिस तरह वह तन-मन-धन न्योछावर करते हुये भिड़ गये, या उसके तुरन्त बाद बहुविवाह के सवाल पर भी उतनी ही आत्यंतिक तीव्रता के साथ जुट गये, बालविवाह के सवाल पर, उपरोक्त दोनों मुद्दों पर जुझना शुरू करने से काफी पहले बिचारने के बावजूद वह उस तरह आगे नहीं बढ़ पाये।
एक बात पर गौर किया जा सकता है। सतीदाह के विरुद्ध एक तरफ राममोहन राय को हिन्दु शास्त्रों से अपने पक्ष का समर्थन जुटाना पड़ा था। दूसरी ओर, अंग्रेज सरकार की आम नीति, हिन्दु रीतिरिवाजों में दखल न देने की होने के बावजूद उसने दखल दिया क्यों कि सतीदाह इंग्लैन्ड के तत्कालीन कानून के तहत हत्या, गैर इरादतन हत्या या आत्महत्या के उत्प्रेरण के रूप में प्रत्यक्षत: अपराध बनता था। उसी तरह, विधवाविवाह के विरुद्ध ईश्वरचन्द्र विद्यासागर को भी हिन्दु शास्त्रों से अपने पक्ष का समर्थन तो जुटाना ही पड़ा था, साथ ही उन्होने अच्छा जनमत भी जुटाया था। दूसरी ओर, हिन्दु विधवाविवाह अंग्रेजों के कानूनों में से सिर्फ एक कानून में सवाल पैदा करता था, सम्पत्ति के उत्तराधिकार का सवाल, जिसे सन 1856 के विधवाविवाह कानून में शुरू में ही स्पष्ट कर दिया गया। बहुविवाह के सवाल पर सरकार के पीछे हटने का मुख्य कारण था 1857 की बगावत एवं अंग्रेजी राज के खिलाफ बंगाल से पेशावर तक जनता के क्षोभ का विस्फोट। जबकि बालविवाह पर रोक उम्र की गुत्थी में उलझा सवाल था। जबकि हिन्दु शास्त्र के विद्वान कहते थे कि कन्या के मासिक की पहली शुरुआत के 16 दिनों के अन्दर सम्भोग विधित है, अंग्रेजों के कानून में स्वीकृति की उम्र का 12 साल होना भी लगभग उसी सोच को प्रतिफलित करता था। विवाहयोग्यता की उम्र तब क्या होगी। विद्यासागर भी अपने निबन्ध में आठ साल, नौ साल, दस साल की उम्र में कन्याओं का विवाह कराने वालों की आलोचना तो करते हैं, लेकिन, उसके उपर? इग्यारह साल, बारह साल या तेरह, चौदह साल? पूरी दुनिया में स्वीकृति की उम्र और विवाहयोग्यता की उम्र पर सोच धीरे धीरे आज की स्थिति में पहुंची है; उन्नीसवीं सदी के मध्य में विद्यासागर भी तत्कालीन सोच में बंधे थे। लेकिन, फिर भी, बालविवाह की आलोचना के क्रम में वास्तविक प्रेम और दाम्पत्य का जो रूपरेखा वह खींचते हैं वह आज भी उतना ही आधुनिक है। वह रूपरेखा हम बाद में, बालविवाह वाले भाग में जानेंगे।   
विधवाविवाह के लिये संघर्ष
आज इतने वर्षों के बाद जब हम विधवाविवाह के लिये ईश्वरचन्द्र के संघर्ष की बात करते हैं तो कुछ दुसरे बहसों से गुजरना पड़ता है। उनके काम का पुनर्मुल्यांकन करने वाले कुछ आधुनिक विद्वान कहते हैं कि विद्यासागर का यह काम कोई ज्यादा महत्व नहीं रखता है क्योंकि विधवाओं के विवाह की समस्या सिर्फ उँची जातियों वह भी खास कर ब्राह्मणों की समस्या  थी, इसीलिये भारतीय समाज के सुधार का जो ब्राह्मणवादी विमर्श है उसी के दायरे में था उनका काम।
उनका पूरा सम्मान करते हुये हम सिर्फ यह कहना चाहेंगे कि पूरे समाज पर अगर सांस्कृतिक वर्चस्व ब्राह्मणवाद का है तो ब्राह्मण या उच्चजातीय समुदाय की किसी कुरीति का प्रभाव पुरे समाज पर नहीं था यह वे कैसे मान लेते हैं? और अगर था तो चोट का असर भी पूरे समाज पर कुछ न कुछ तो जरूर हुआ होगा!
इसी बात को दूसरे ढंग से तत्कालीन एक लेखक कहते हैं। गुरुप्रसाद सेन एक नामी वकील थे एवं सन 1864 में स्थापित बिहार के सबसे पुराने अखबार ‘बिहार हेरल्ड’ के संस्थापक सम्पादक। सन 1893 में प्रकाशित उनकी एक किताब, ‘स्टडी ऑफ हिन्दुइज्म’ में एक जगह पर वह कहते हैं:
“विषय पर इस तरह बहस की गई है जैसे वाध्यतामूलक वैधव्य अपवाद नहीं बल्कि नियम हो। बेशक सिर्फ बंगाल [यानी प्रेसिडेन्सी नहीं अविभाजित बंगप्रदेश – लेखक] के लिये यह नियम था क्योंकि यहाँ हिन्दु जनसंख्या थी 2॰3 लाख, लेकिन बंगाल के बाहर स्थिति बिल्कुल अलग थी। उदाहरणस्वरूप बिहार को लीजिये। यहाँ हिन्दु जनसंख्या थी 1॰8 लाख, जिसमें से 3 लाख या छट्ठा भाग ब्राह्मण, राजपूत, खत्री, बाभन एवं कायस्थ जातियाँ थीं एवं वाध्यतामूलक वैधव्य सिर्फ इन जातियों में लागू था।… इस तरह, विधवाविवाह हिन्दू जनसंख्या के 5/6 भाग में प्रचलित है, और, चुँकि मुसलमान जनसंख्या में विधवाविवाह की अनुमति है, अत: प्रदेश के 6/7 भाग जनसंख्या में विधवाविवाह प्रचलित है…” [An introduction to the study of Hinduism, Guru Prasad Sen, Calcutta, Thacker, Spink and Co., Publishers to the University, 1893. Pages. 60 -63]
आगे यह बताते हुये कि विधवाविवाह की पुरानी प्रचलित ‘संघई’ प्रथा के तहत किसी भी विधवा का विवाह हो सकता था लेकिन अमूमन कम उम्र की, बड़े-हो-चुके बच्चे अगर न हो तो, विधवाओं का ही विवाह होता था खासकर भूतपूर्व पति के छोटे भाई के साथ… और आगे ‘संघई’ विवाह का तौरतरीका बताते हुये… :
“पंडित विद्यासागर का सुधार बंगाल की हिन्दू जनता के, और बचे भारत की जनसंख्या के 1/7 भाग के हित में जरूरी था। बाकियों के लिये सुधार की आवश्यकता नहीं थी, सिर्फ उनकी पूरानी अच्छी प्रथा को बचाये रखने की जरूरत थी। हालाँकि, चुँकि जातियाँ उन जातियों के प्रभाव एवं उदाहरणों से घिरी हैं जो, जातियों की अनुक्रम में स्वीकार्य तौर पर उनसे ऊँची हैं, इसकी आशंका है कि जातियाँ या उनकी पंचायतें किसी बुरे लम्हे में ब्राह्मणवादी छलावा ओढ़ लें और अपने भीतर प्रचलित एक प्रथा को बन्द कर दें…” [पूर्वोक्त]
ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक वर्चस्व के खतरों को बताते हुये लेखक आगे यह भी कहते हैं कि अगर इस प्रभाव का खतरा न होता तो “मुश्किल होता समझना कि क्यों मुसलमान भी अपने समुदाय में आजकल विधवाविवाह की प्रवृत्ति को निरुत्साहित करने लगे हैं।      
तर्क-वितर्क में न जाकर आइये कुछ दिनों पहले की एक खबर पर नजर दौड़ायें। टेलिग्राफ अखबार में दिनांक 25॰8॰2003 को प्रकाशित एक खबरी-कहानी है, गौतम सरकार का लिखी हुई। खबर में जिक्र है कि दो साल पहले एक आदिवासी लड़के को इसलिये मार दिया गया क्योंकि वह एक विधवा से शादी करना चाहता था।
“Vidyasagar had waged a battle to abolish child marriage and advocated widow remarriage among tribals in the village.
“However, two years ago a tribal boy was killed in Karmatar because he wished to marry a widow. The incident was shocking as 130 years ago, 24 child widows were remarried by Vidyasagar here.”
हालाँकि, चुँकि विधवा को नहीं, लड़के को मारा गया, तो हो सकता है कि कहानी का दूसरा पहलू भी हो। लेकिन, रोज का अखबार पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि भले विधवायें अब औरत के रूप में पहले जैसी बन्दिशों में न हों और इसीलिये खुद दूसरी शादी कर लेने की घटनायें पहले की तुलना में अधिक हों लेकिन परिवार की ओर से घर की विधवा बेटी या बहू के दूसरे विवाह का आयोजन एक उल्लेखनीय, अनोखी घटना होती है।
यहाँ प्रसंगवश इस बात की भी चर्चा होनी जरुरी है कि 19वीं सदी के चौथे-पाँचवें दशक तथाकथित उच्च कूल के हिन्दु परिवारों में वालिका, किशोरी एवं युवा विधवाओं की समस्या, समस्या क्यों बनी। 4 दिसम्बर 1829 को अंग्रेज सरकार ने सतीदाह निरोधक कानून पारित किया था। उसके पीछे की कहानी एवं भारत के महान समाज सुधारक राममोहन राय की भूमिका का वर्णन यहाँ जरूरी नहीं है। लेकिन सतीदाह प्रथा बन्द होने से इस नारकीय स्थिति के शुरू होने के कारण तो बन्द नहीं हो जाते। बल्कि वे सभी कारण – विवाह की स्त्रीविरोधी प्रथा, पारिवारिक व्याभिचार, सम्पत्ति हड़पने की साजिशें, विधर्मी लुटेरों का हमला एवं राज, जातिगत बन्दिशें… - बढ़ ही रहे थे। क्योंकि, स्थायी बन्दोबस्त के माध्यम से जो जमीन्दारी प्रथा बंगाल (और बिहार) में लादी गई थी वह भले ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था का कोई पूंजीवादीकरण न किया हो, जमीन को माल बना दिया था एवं सम्पन्न, आधा-सम्पन्न श्रेणियों में पूंजीवादी लालच और अपराधीकरण को बढ़ा दिया था। ऐसी स्थिति में विधवाओं की संख्या बढ़ गई थी और उनका जीना और दूभर हो गया था। खुद राममोहन राय ने भी अपने लेखनों में बालविधवाओं की दुर्दशा का जिक्र किया था।
सन 1926 में पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर द्वारा रचित ‘विधवाविवाह’ सम्बन्धित पुस्तक का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हुआ था। अनुवादक थे जयदेव शर्मा विद्यालंकार। अपनी भूमिका में वह हिन्दु शास्त्रज्ञों के कट्टरपंथी वर्चस्व की चर्चा करते हुये आम सुधारकों की बात करते हैं जो या तो शास्त्रज्ञो के सामने खड़े होते ही या तो भयभीत होकर झुक जाते हैं या शास्त्र-वास्त्र की परवाह न करते हुये आगे बढ़ जाते हैं। फिर वह कहते हैं, “ऐसे वीर बहुत कम होते हैं जो सब क्षेत्र में विजय कर के अपने सुधारों को जनता में प्रबल रूप से चला दें। ऐसे दुर्द्वय वीरों में हमें स्त्री संसार के सुधार क्षेत्र में दो ही वीर नेताओं के नाम दीखते हैं, एक तो पूज्यपाद श्री 108 महर्षि दयानन्द सरस्वती दुसरे बंगाल के प्रसिद्ध विद्वान स्वनामधन्य स्वर्गीय श्री पं॰ ईश्वरचन्द्र विद्यासागर।” [‘विधवाविवाह’, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, अनुवाद - जयदेव शर्मा विद्यालंकार, कलकत्ता, प्रकाशक: गोविन्दराम हासानन्द, वैदिक पुस्तकालय, 370 अपर चितपुर रोड, कलकत्ता, भूमिका - दिनांक: 6॰5॰1926]
उनकी प्रशस्ति की अपनी सीमायें थी। खैर, चुँकि विद्यासागर के कामों पर लिखे जा रहे इस पुस्तक में यह भाग शुरू से ही सिर्फ तथ्यात्मक होने के बजाय थोड़ा तर्कात्मक भी हो गया है – यही स्वाभाविक भी था क्योंकि मूल प्रसंग हिन्दी जगत में काफी चर्चित है – उसी तरीके से आगे बढ़ें।
यह बात गौरतलब है कि विधवाविवाह होना चाहिये यह बात सबसे पहले कहने वाले विद्यासागर नहीं थे। उनके पहले कई व्यक्तियों ने विधवाविवाह के समर्थन में लिखा भी था एवं कईयों ने अपने ही घरों में विधवा का विवाह कराने का प्रयास भी किया था। विद्यासागर के जीवनीकार इन्द्र मित्र सन 1852 के 23 मार्च के ‘बंगाल हरकरा’ अखबार में छपी एक खबर को उद्धृत करते हैं जिसमें लिखा था कि ‘एक उदारपंथी देसी आदमी (नेटिव) ने एक विधवा से शादी की है। दोनों पक्ष अभी मुफस्सिल में हैं जहाँ यह शादी, लोग कहते हैं कि, रची गई है’।
उसी ‘बंगाल हरकरा’ अखबार में 11 मार्च 1845 को एक पत्र प्रकाशित हुआ था। यह पत्र बंगाल भाषा के पहले शब्दकोष-प्रणेता रामचन्द्र विद्याबागीश के निधन पर प्रकाशित हुआ था। पत्र में लिखा था कि ‘बेंगाल ब्रिटिश इन्डिया सोसायटी’ के आवेदन पर, हिन्दु विधवाओं के पुनर्विवाह के सम्बन्ध में रामचन्द्र विद्याबागीश ने हाल में जो उदार व्यवस्था दिये थे, उसके लागू होने पर वह हिन्दु सुधारकों में शीर्षस्थ गिने जाने चाहिये।  
उस समय बंगाल में विभिन्न सभासमितियों का बनना शुरू हो चुका था। इन्द्र मित्र जिक्र करते हैं कि सन 1854 के 15 दिसम्बर को काशीपुर में किशोरीचांद मित्र के घर पर ‘समाजोन्नतिविधायिनी सुहृद समिति’ स्थापित हुई। अध्यक्ष बने देवेन्द्रनाथ ठाकुर (कविगुरू रवीन्द्रनाथ ठकुर के पिता)। कार्यकारिणी समिति में थे उस समय के कलकत्ता के बौद्धिक व हिन्दु समाज सुधार जगत के कई महत्वपूर्ण हस्तियाँ। सभा में प्रस्ताव लाया गया कि नारीशिक्षा के प्रवर्तन के लिये, हिन्दु विधवाओं के पुनर्विवाह के लिये, बाल्यविवाह की परम्परा त्यागने के लिये एवं बहुविवाह का प्रचलन बन्द करने के लिये समिति की ताकत विशेष तौर पर लगाई जाय। एक दूसरे प्रस्ताव में हिन्दु विधवा के पुनर्विवाह लागु करने में कानूनी अक्षमता को दूर करने के लिये सरकार के पास आवेदन किया जाय।
यानि विद्यासागर ने सवाल को पहली बार नहीं उठाया था। न तो वह इस आशय से पहली बार शास्त्रों का विवेचन करने वाले थे, न वह पहली बार सरकार से आवेदन करने वाले थे और न ही वह पहली बार अपने हाथों से किसी विधवा का विवाह देने वाले थे। लेकिन फर्क ला दिया उनका चरित्र। जिस काम को करते थे बिल्कुल पिल पड़ते थे। यही बात शिक्षा और नारीशिक्षा के प्रसंग में भी लागु होती है। वह पहले व्यक्ति नहीं थे शिक्षा और नारीशिक्षा का प्रयास करने वाले। पर वह विद्यासागर थे। जिस रास्ते पर चलते थे उसका नक्शा ही पलट देते थे। विधवाविवाह के सवाल पर वह भावुक थे। उनके व्यक्तिगत जीवन की वेदनायें जुड़ी थी इससे। फिर भी भावुकता में नहीं बह कर एक सचेत सामाजिक कार्यकर्ता की तरह पहले एक असाधारण वादविवादमूलक पुस्तिका लिख कर जनमत को जागृत किया। जगह जगह बैठकें कर, शास्त्र का दंभ भरने वाले विद्वानों, धर्म के रुढ़िवादियों को परास्त किया, अंग्रेज सरकार के पास अपनी बात पहुँचाई तथा साथ में अपने समर्थन में प्रबल जनमत जुटाये। अन्तत: सरकार को मजबूर किया कि इसके पक्ष में कानून बने।        
अब आइये देखें कि विधवाविवाह के पक्ष और विपक्ष की क्या स्थिति थी।
यह तो सब जानते हैं कि इस दिशा में काम की शुरुआत उन्होने एक पुस्तिका से की थी, जिसके हिन्दी अनुवाद की चर्चा अभी की गई। यह पुस्तिका सन 1855 के जनवरी महीने में प्रकाशित हुई थी। बंगला साहित्य के एक विद्वान ने विद्यासागर को खण्डनात्मक लेखन (polemic) का राजा कहा है। सन 1856 के जुलाई महीने में ‘हिन्दु पैट्रियट’ ने लिखा, “… The first pamphlet by Pundit Issur Chunder Bidyasagur, which initiated the agitation, was written in a clear business like argumentative style. It was graced by none of the ornaments of rhetoric, and owed its unprecedented circulation to the intense interest of the subject and the very becoming manner in which it was introduced. It was just such a statement as a case should be opened with. We have called the cisculation of Pundit Issur Chunder Bidyasagur’s pamphlet unprecedented, for we do not think that the history of Bengali literature presents another instance of so universal, yet so rapid, a dissemination of a writing.”  
इसके बाद उन्होने इस विषय पर फिर से एक पुस्तिका लिखा। साथ ही, अपने आलोचकों एवं निन्दकों को दो तरीके से जबाब दिये। एक तो शास्त्रार्थ विवेचन के साथ, तर्क की शैली में, दूसरा, खास कर कुतर्की और निन्दकों के लिये व्यंग व परिहास की शैली में।
सिर्फ शास्त्रसम्मत प्रमाणित होने पर तो बात नहीं बनेगी, कानूनसम्मत भी करवा लेना होगा! इसीलिये शास्त्रज्ञों को अंतिम तौर पर परास्त करने के बाद विद्यासागर ने अंग्रेज सरकार के नाम एक आवेदन लिखा सन 1855 के 4 अक्तूबर को। यह व्यक्तिगत पत्र नहीं था। कुल 986 लोगों के हस्ताक्षर के साथ विद्यासागर ने इस सामुहिक आवेदन को अग्रसारित किया था।
इन्द्र मित्र द्वारा रचित जीवनी उन्होने भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार में संरक्षित Legislative Paper of Act XV 1856, Vol.I & II से पक्ष और विपक्ष में लिखे गये आवेदनपत्रों की जानकारी एवं प्रतियाँ संगृहित किये हैं। इसलिये इस लड़ाई की आगे की कहानी उन्ही के ग्रंथ से ली गई है।
986 लोगों द्वारा हस्ताक्षरित उपरोक्त आवेदन के बाद 6 दिसम्बर 1855 को एक आवेदन भेजा गया विधवाविवाह के पक्ष में जिसमें महाराज श्रीशचन्द्र रायबहादुर के अलावे कृष्णनगर एवं आसपास के इलाकों के कई निवासियों का हस्ताक्षर है। अगले ही दिन दिनांक 7 दिसम्बर की तारीख में बारासात, हालिशहर, बेलघरिया, महेश्वरपुर आदि इलाकों से कई लोगों के हस्ताक्षर सहित एक आवेदन पत्र दर्ज है जो ‘महामहिम श्रीलश्रीयुक्त भारतवर्षीय व्य्वस्थापक समाजाध्यक्ष महाशय’ को सम्बोधित है।
इस आवेदन में लिखी गई बातों को जीवनीकार ने उद्धृत किया है और सही किया है, क्योंकि सभी आवेदनों के पीछे की भावनाओं को सबसे अधिक स्पष्टता के साथ एवं नंगे सामाजिक यथार्थ के बीच इस पत्र में दर्ज किया गया,
“चुँकि नारीजाति अपने स्वाभाविक गुणों के कारण पुरुषों से तुलनीय है। स्त्री का निधन होने पर पुरुष अनायास विवाह कर सकता है। हमारे देश में विधवाओं के लिये भी ऐसी प्रथा का प्रचलित नहीं रहना स्वभाव के नितान्त विरुद्ध है। सिर्फ इतना ही नहीं कि ईश्वर के नियम को तोड़ने के कारण पतिरहित कामिनियों को असह्य यंत्रणा भोग करना पड़ता है एवं किसी किसी को घोर दुष्कर्म में प्रवृत्त होना पड़ता है, पुरुषों को भी उनके दुख के भागीदार बनने के कारण या कभी कभी दोनों जातियों के सम्मान की रक्षा के लिये असत्य का सहारा लेना पड़ता है। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर द्वारा रचित पुस्तकद्वय को पढ़, विधवाविवाह शास्त्रविरोधी नहीं है यह जान कर इस निर्दय एवं विधिविरुद्ध अनिष्टकर नियम का उल्लंघन करने को कई लोग तैयार हैं, लेकिन कहीं न्यायालय में ऐसा विवाह विवाह के रूप में स्वीकृत न हो एवं ऐसे विवाह से उत्पन्न सन्तान विधिवत सन्तान के रूप में न गिना जाय इस आशंका से वे प्रवृत्त नहीं हो पाते हैं। समाज से यह भय दूर होने पर अनायास एवं बहुत जल्द ही विधवाविवाह प्रचलित होने की सम्भावना है। …”       
इसके बाद कई आवेदन विधवाविवाह के पक्ष में आने शुरू हो गये।
सन 1855 के 7 दिसम्बर को ही पूना से भी विधवाविवाह के पक्ष में आया हुआ एक आवेदनपत्र दर्ज है। कलकत्ता मिशनरी कॉन्फ्रेन्स के सदस्यगण, 1855 के 22 दिसम्बर को विधवाविवाह के समर्थन मे एक आवेदन जमा दिये। सन 1856 के जनवरी में आया हुआ पक्ष का एक आवेदन दर्ज है जिसमें 685 लोगों का हस्ताक्षर है। सभी कलकत्ता एवं आसपास के रहनेवाले हैं। कुछ नामीगिरामी लोग, राजकृष्ण मुखोपाध्याय, शिवचन्द्र देव, दिगम्बर मित्र, रामनारायण तर्करत्न, प्यारीचरण सरकार, भुदेव मुखर्जी एवं तारिणीचरण सरकार उनमें शामिल हैं।
अगले साल, यानी 1856 का पहला आवेदन दर्ज है भिंचुर [?] के मराठाप्रधान एवं अन्य कई जनों का, 12 जनवरी को किये गये हस्ताक्षर के साथ विधवाविवाह के पक्ष में आवेदन भेजा गया है नासिक से, 18 जनवरी को। 21 फरवरी की तारीख में, मुर्शिदाबाद से आये आवेदन पर अनेकों हस्ताक्षर है। पर मुख्य हस्ताक्षरकर्ता हैं पन्डित मदनमोहन तर्कालंकार। 29 मार्च को मेदिनीपुर के निवासियों द्वारा हस्ताक्षरित एक आवेदन राजनारायण बसु द्वारा भेजा गया है। बाँकुड़ा एवं वर्धमान से विधवाविवाह के पक्ष में आवेदन 15 अप्रैल को भेजा गया है। अहमदनगर [अभी महाराष्ट्र में है] से 34 हिन्दुओं ने आवेदन भेजा है 25 अप्रैल को। 7 मई का एक आवेदन है जिस पर 312 लोगों का हस्ताक्षर है। इस आवेदनपत्र की खास बात यह है कि इसमें एक अलग नजरिया रखा गया है। कहा गया है कि विधवाविवाह देशाचार में प्रचलित नहीं है लेकिन शास्त्रसिद्ध है यह विद्यासागर ने प्रमाणित किया है। शास्त्र देशाचार से बड़ा होता है इसलिये विधवाविवाह लागू किया जाय्। हस्ताक्षरकर्ताओं में प्रमुखतम नाम है दीनबन्धु मित्र [प्रख्यात नाट्यकार, ‘नीलदर्पण’ के रचयिता]। 19 मई को मैमनसिंह से भगवानचन्द्र बसु ने पक्ष में आवेदन भेजा है। 20 जून को बारासात एवं आसपास के इलाकों के 111 हिन्दु निवासियों ने विधवाविवाह लागू किये जाने के लिये आवेदन भेजा है। 24 जुलाई को ढाका से 113 लोगों (हिन्दु) ने आवेदन भेजा है।
कलकत्ता के कुछ नामी बुद्धिजीवियों, रसिककृष्ण मल्लिक, किशोरीचांद मित्र, राधानाथ शिकदार, प्यारीचांद मित्र आदि ने आवेदन में एक अलग सुझाव दिया, “मामले की जरूरत बेहतर ढंग से पूरी होगी अगर विशेष वैधानिक कार्रवाई के माध्यम से सिर्फ हिन्दु विधवाओं के विवाह को विधिसम्मत बनाने के वजाय सामान्य विवाह कानून बनाया जाय।”
अब, जीवनीकार के ग्रंथ में जिक्र किये गये विधवाविवाह-विरोधी आवेदनों की भी चर्चा हो जाये।
विधवाविवाह कानून को पारित न होने देने के लिये सबसे अधिक हस्ताक्षरों वाला आवेदन जमा पड़ा था 1856 के 17 मार्च को। जमा कराने वाले थे राधाकान्त देव और इस आवेदन में 33000 हस्ताक्षर थे। विद्यासागर के जीवनीकार इन्द्र मित्र राष्ट्रीय अभिलेखागार में जाकर इस आवेदन को देखे होंगे। वह लिखते हैं, “सारे हस्ताक्षर दिख नहीं रहे हैं पर बहुत बड़ी संख्या में हस्ताक्षर थे, नि:सन्देह। कितने थे? मूल आवेदन के पीछे पेन्सिल से लिखा है 36764, फिर उसके पहले वाले पृष्ठ पर आवेदनपत्र के हस्ताक्षरों की संख्या के बारे में पेन्सिल से लिखा है – about 33000 signatures। सरकार द्वारा 5 जुलाई 1856 को प्राप्त, राधाकान्त देव का एक दूसरा आवेदन भी है जिसमें 617 लोगों का हस्ताक्षर है। उस आवेदन पर पहले वाले आवेदन के बारे में लिखा है – the one signed by Royal Radhakanta Dev and 33 thousand Hindu inhabitants. (Legislative Paper of Act XV 1856, Vol. I & II, P.1220)
पहला जिक्र है त्रिपुरा से 320 लोगों के हस्ताक्षर सहित आये आवेदन का। हालाँकि इसके साल का जो जिक्र बंगला के हिसाब से है वह सही नही बैठता है। साल अगर 1856 मान लें तो तारीख आती है 13-14 मार्च। बम्बई के सतारा जिले से 141 हिन्दुओं ने 25 मार्च 1956 को विरोध में आवेदन भेजा है। बम्बई के ही अन्तर्गत कसबा कल्लियाँ से 248 व्यक्तियों ने 23 अप्रैल 1856 को विरोध में आवेदन भेजा है। कलकत्ता-प्रवासी 784 उत्तर-भारतीय लोगों ने भी 1856 के अप्रैल में विरोध का आवेदन भेजा है। पुणा से कई हस्ताक्षरकर्ताओं ने 15 अप्रैल 1856 को विधवाविवाह कानून के प्रस्ताव को दबा देने का आवेदन दिया है।
सारे आवेदनों को देखने पर स्पष्ट होता है कि विरोध में पड़े आवेदनों की संख्या पक्ष में पड़े आवेदनों की संख्या से कहीं ज्यादा थे। एक और बात का सन्देह भी होता है। पक्ष के आवेदन पड़ना शुरू होने के लगभग छे महीने के बाद से विपक्ष के आवेदन पड़ने शुरु हुये। इससे प्रतीत होता है कि प्रतिष्ठित हिन्दु समाज को यह भरोसा था कि अंग्रेज सरकार उनसे सलाह मशविरा किये बिना इस दिशा में कोई काम नहीं करेगी। लेकिन बाद में सरकार की गतिविधियाँ देख कर वे हलचल में आये।
यह ऐतिहासिक संग्राम सिर्फ आवेदन-प्रत्यावेदनों तक सीमित नहीं था। साहित्यकार, कवियों का भी दो दल हो गया था। कुछ विद्यासागर की प्रशस्ति में लिख रहे थे तो कुछ उन्हे गालियाँ दे रहे थे। अखबारों और पत्रिकाओं में दोनों तरह के गीत, कविता, निबन्ध आदि छप रहे थे। बल्कि हिन्दु समाज के कुछ संरक्षक तो किराये के गुन्डे लगा दिये विद्यासागर के पीछे, उन्हे जान से मार डालने के लिये। दूसरी ओर बंगाल के मशहूर तांतियों ने नई साड़ी बनाई, जिसके किनारे की पूरी लम्बाई में (बंगला में जिसे ‘पाड़’ बोलते हैं) विधवाविवाह के पक्ष में एवं विद्यासागर की प्रशस्त्ति में एक पूरा गीत उकेरा गया है। विरोधियों ने एक और घटिया तरकीब सोचा। उधर बैरकपुर के हिन्दुस्तानी सिपाहियों में, बन्दूक के टोटे में लगाये जा रहे गाय और सुअर की चर्बी की खबरों को लेकर रोष फैल रहा था। यह सच था कि मुख्यत: आज के उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग से आये हुये उन सिपाहियों के पास जो खबरें पहुँच रही थी वह इसी प्रकार की थी कि अंग्रेज सरकार सिर्फ टोटे में चर्बी मिलाकर ही नहीं बल्कि उधर कलकत्ता में हिन्दु विधवाओं का जबरन विवाह करवा कर धर्म नष्ट कर रहा है। विधवाविवाह के विरोधियों ने इस तथ्य का इस्तेमाल किया प्रचार में। बल्कि बगावत के बाद वे कहते फिरे कि बागी सिपाही इधर ही, कलकत्ता की तरफ आ रहे हैं – विधवाविवाह कराने वालों की और उस विद्यासागर की खबर लेने के लिये।     
जो भी हो, सन 1856 के 26 जुलाई को विधवाविवाह कानून पारित हो गया।
उसके बाद कई विधवाविवाह हुये। कई विवाह तो विद्यासागर ने खुद खड़े होकर अपने खर्चे से करवाये। इतना खर्च किये कि खुद कर्ज के बोझ से दबते चले गये। सरकारी नौकरी छोड़ देने के कई वर्षों बाद दोबारा नौकरी तलाशनी पड़ी। अन्तत: नहीं किये वह नौकरी, वह एक अलग वृत्तान्त है। सिर्फ बंगाल ही नहीं, पूना, चेन्नई सहित कई जगहों पर विधवाविवाह आयोजित होने के खबर मिलते हैं। बंगाल में, कलकत्ता शहर से अधिक, गाँवों और मुफस्सिलों से विधवाविवाह सम्पन्न होने की अधिक खबर्रें आने लगीं।
लेकिन, यह तो सच था कि सतीदाह बन्द करने का कानून एक निरोधक कानून था। सजा का प्रावधान था। विधवाविवाह कानून न तो निरोधक कानून था और न हो सकता था। इसीलिये विधवाविवाहों का कोई ताँता नहीं लगने वाला था। लेकिन न सिर्फ नारियों की मुक्ति वल्कि प्रेम की मुक्ति की दिशा में एक बड़ा शंखनाद पूरे आसमान में ध्वनित हो चुका था। यही इस आन्दोलन की सफलता थी। इसे जातियों के प्रतिशत के आँकड़ों से नहीं विचारा जा सकता है।
और विवाहों का होना बन्द नहीं हुआ। ऐसा नहीं, कि माहौल बदल गया, विद्यासागर दुनिया से चले गये, समाज के सामने दूसरे मुद्दे आ गये और विधवाविवाह के वारे में जो सकारात्मक सोच उभर कर आई थी उसे फिर से गले में पत्थर बाँध कर कूँए में डुबा दिया सनातन हिन्दु समाज के मठाधीशों ने। बंगला साल 1312 के बैसाख (शायद 1905, अप्रैल) अंक में ‘भारती’ पत्रिका का यह मंतव्य सामने है:  
“बहुतों की धारणा है कि विद्यासागर द्वारा लागू किया गया विधवाविवाह सिर्फ कानून में लिखा रह गया है, व्यवहारिक तौर पर हिन्दु समाज इस सुधार के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखाया है। जबकि यथार्थ में, विधवाविवाह हिन्दुसमाज में क्रमश: शक्ति का संचय कर रहा है और पुष्ट हो रहा है।”
विद्यासागर के जीवनीकार जानकारी देते हैं कि इस उपरोक्त मन्तव्य के साथ पिछले साढ़े तीन सालों में हुये विधवाविवाहों की एक सूची भी भारती पत्रिका के उस निबन्ध में दिया गया है। सूची अखिल भारतीय है। संख्या है 81।
विधवाविवाह कानून लागू होने के सात साल के बाद वामावोधिनी पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। प्रकाशक व सम्पादक तो पुरूष ही थे लेकिन लिख पढ़ रही महिलाओं के लेखन से यह मंच देखते ही देखते भर उठा। आगे के वर्षों के महिला-लेखन का बुनियाद तैयार किया इस पत्रिका ने। इसी पत्रिका के एक अंक में प्रकाशित निबन्ध से विद्यासागर के जीवनीकार इन्द्र मित्र ने निम्नलिखित अंश उद्धृत किया है:
“विधवाविवाह का प्रस्ताव जब बंगसमाज में उठा, तब अनेकों शिक्षित युवक साहस के साथ विवाह के लिये अग्रसर हुये थे। दो-एक ने विवाह किया भी था। उस समय विधवा कन्या मिलना कठिन था। माता-पिता कन्या का विवाह देनें को आगे नहीं बढ़ रहे थे। इस सुधार पर उनको भरोसा नहीं था। विधवायें खुद भी उतनी तैयार नहीं थीं। लेकिन आज, दस से कुछ अधिक वर्षों की अवधि में हजार वर्षों का काम हो चुका है। लोगों की सोच और झुकाव में काफी परिवर्तन आया है। कष्ट एवं आवश्यकताओं के कारण अंधविश्व्वास मिट गया है। आज विधवाविवाह के सवाल पर समाज की स्थिति बिल्कुल विपरीत है। पहले कन्यायें तैयार नहीं थीं, वर तैयार थे; आज कन्यायें आगे बढ़ रही हैं, वर पीछे हट रहे हैं।…”



॥ 10 ॥ शिक्षा : कुछ अन्य शैक्षणिक कार्य


जमीन की बन्दोबस्ती के जो कानून इस्ट इन्डिया कम्पनी ने बनाये थे उसके तहत कम्पनी को बड़ा आय तो होता ही था, कर की अदायगी न होने के कारण जो नीलामियाँ होती थी उसमें भी कम्पनी के अधिकारियों को ही जमीन, सम्पत्ति हासिल होती थी। उधर, बहुत सारे नाबालिग जमीन्दार-पुत्रों के हाथों में जमीन्दारी आ रही थी या आने की संभावना बन रही थी। उनकी नासमझ ऐय्याशियों में जमीन्दारी के बिक जाने में कम्पनी को खास फायदा नहीं था। इसीलिये, जैसा कि ब्रजेन्द्रनाथ बंदोपाध्याय जिक्र करते हैं कि सन 1854 के 11 नवम्बर को कानून बना जिसके तहत ‘कोर्ट ऑफ वार्ड्स’ की देखरेख में नाबालिग जमीन्दार-पुत्रों की शिक्षा की व्यवस्था’ होनी थी। सन 1856 के मार्च महीने में वार्ड्स इन्स्टिट्युशन स्थापित किया गया। बनने के कुछ दिनों बाद कुछ गण्यमान्य व्यक्ति इसके परिदर्शक या ‘विजिटर’ नियुक्त किये गये। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर भी एक ‘विजिटर’ थे। उन्होने कई बार वार्ड्स इन्स्टिट्युशन का परिदर्शन किया एवं अन्य ‘विजिटरों’ से मतभेद के कारण एक साथ प्रतिवेदन न देकर अपना स्वतंत्र प्रतिवेदन दिया। सरकार ने और विशद में जाकर प्रतिवेदन देने को कहा तो फिर से अपने सुझावों को दुहराया। सुझाव मुख्यत: चार बातों को लेकर था। एक, कि वार्ड्स का घर न होकर संस्था को बोर्डिंग-स्कूल जैसा बनना चाहिये; दूसरा कि जमीन्दार-पुत्रों के लिये पाठ्यक्रम की सही व्यवस्था उनकी आवश्यकता के अनुरूप बनाई जाय; तीसरा कि पढ़ाई के लिये आवश्यक संख्या में योग्य शिक्षक नियुक्त किये जायें; और चौथा कि किसी भी स्थिति में बच्चों को मारा-पीटा नहीं जाय।
जो भी हो, न तो सरकार का यह प्रयोग बहुत सफल रहा और न ही विद्यासागर उस संस्था के परिदर्शक बहुत दिनों तक बने रहे। जीवनीकार ब्रजेन्द्रनाथ बंदोपाध्याय बताते हैं कि शायद 1865 के 28 मार्च को विद्यासागर आखरी बार वार्ड्स इन्सटिट्युशन परिदर्शन के लिये गये थे।
सरकार ने उच्चशिक्षा से सम्बन्धित कमिटी में भी विद्यासागर को रहने के लिये अनुरोध किया था। लेकिन विद्यासागर ने साफ कहा कि चुँकि वह ग्रंथकार हैं, पाठ्यपुस्तकों के लेखक हैं इसलिये उनका कमिटी में रहना पाठ्यविषयों एवं पुस्तकों के चयन को प्रभावित करने के लिये प्रतीत होगा। अत: वे कमिटी में नहीं रहेंगे।
‘विद्यासागरेर विज्ञानमानस’ पुस्तक के रचयिता तड़ित कुमार बंदोपाध्याय अपने पुस्तक में एक जगह विश्वरंजन पुरकाइत द्वारा रचित ‘इन्डियन रेनेशाँ ऐन्ड एडुकेशन’ से उद्धृत करते है:
“He was patriot and a true nationalist. He was an ardent advocate of non-official, secular and popular institution for higher education with a purely Indian teaching staff. …
“Vidyasagar was fully conversant and acquainted with the then psychological writings and researches in educational issues. He was dead against corporal punishment of students and making adverse and uncharitable remarks in the class which would wound the sentiments and personality development of the students. He introduced summer vacation and Sundays as holidays.
“Many of the present-day educational issues can be traced back to the days of Vidyasagar.”
इस अनुभाग को खत्म करते करते यह बताते चलें कि, सन 1864 में विद्यासागर जर्मनी स्थित प्राच्यविद्या केन्द्र Deutscher Akademischer Austanschdienst के सदस्य चुने गये थे। उसी वर्ष वह Royal Asiatic Society के भी सदस्य चुने गये। सन 1880 में अंग्रेज सरकार ने उन्हे सी॰आई॰ई॰ (कॉम्पैनियन ऑफ इन्डियन एम्पायर) की उपाधि से भूषित किया था (लोगों के पूछने पर कि यह सी॰आई॰ई॰ होता क्या है, वह कहते थे ‘छाई’ यानी राख)। सन 1883 में विद्यासागर पंजाब विश्वविद्यालय के ‘फेलो’ मनोनीत हुये थे।


॥ 9 ॥ शिक्षा : कर्माटाँड़ में किये गये शैक्षणिक कार्य

पाठक शायद जानते होंगे कि झारखंड के जामताड़ा जिले में स्थित कर्माटाँड़ कस्वे में विद्यासागर ने जमीन सहित एक मकान खरीदा था। दिनांक 2 अप्रैल 1974 का हिन्दुस्तान स्टैन्डर्ड अखबार में छपी एक खबर के अनुसार इस मकान का नाम ‘डायस बंग्लो’ था। खरीदने के बाद (एवं शायद कुछ परिवर्तन के साथ) विद्यासागर ने मकान का नाम रखा था ‘नन्दन कानन’। उस वक्त यह स्थान बंगाल प्रेसिडेन्सी के अन्तर्गत बिहार इलाके के संथाल परगना जिले में आता था। विद्यासागर ने यह सम्पत्ति उन्नीसवीं सदी में सत्तर की दशक की शुरुआत में किसी समय खरीदी थी। सन 1874 से उनके यहाँ रहने के तथ्य मिलते हैं। बीच बीच में काम से वह कलकत्ता, बर्धमान या और किसी जगह जाया करते थे। फिर जब ज्यादा बीमार पड़ने लगे तो उन्हे कलकत्ता जाकर रहना पड़ा। मोटे तौर पर जीवन के अंतिम 18 वर्ष वह इसी तरह गुजारे।
कर्माटाँड़ आने के कई कारण थे। कलकत्ते के हिन्दु मध्यवर्गीय लोगों की कूपमन्डुकता, रुढ़िवाद एवं उनके द्वारा किये जा रहे सुधार-प्रयासों के विरोध से विद्यासागर उकता गये थे। अपने परिवार से भी वह परेशान थे। नीतियों पर अड़े रहने की अपनी जिद पर वह कभी समझौता नहीं किये। बड़े बेटे को उन्होने वजायाफ्ता इच्छापत्र (विल) बनाकर सभी सम्पत्ति से अलग कर दिया था इसी कारण से। खैर, वह एक अलग कहानी है।
यहाँ जिक्र करने लायक एक ही बात है कि कर्माटाँड़ में उन्होने शैक्षणिक कार्य छोड़ा तो नहीं ही, बल्कि उसके नये आयाम खुले। उन्होने यहाँ के संथाल घरों की बेटियों के लिये कन्या विद्यालय शुरू किया। साथ ही, वयस्क संथालों के लिये शाम को प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम शुरू किया।
उनके इन दोनों कार्यों का जिक्र समकालीन लेखन में मौजूद है। लेकिन अधिक जानकारी अनुपलब्ध है, जैसे, कितनी बालिकायें आती थी या कितने प्रौढ़ आते थे, उन्हे किस किस विषय का पाठ दिया जाता था, दिन के किस समय से किस समय तक चलते थे विद्यालय आदि। लेकिन गौर तलब है कि मिशनरियों से अलग, तत्कालीन बंगाल प्रेसिडेन्सी के आदिवासियों में किसी भारतीय द्वारा किया गया यह पहला कन्या-शिक्षा कार्यक्रम था। प्रौढ़ शिक्षा का कार्यक्रम तो सभी पैमाने पर इस देश का पहला था।
उनके इस ऐतिहासिक कार्य को सम्मानित करने के लिये 100 वर्षों बाद 1979 में जब स्वतंत्र भारत के बिहार सरकार ने प्रौढ़ शिक्षा के तत्कालीन कार्यक्रम को लागू करने को सोचा तो उसका उद्घाटन कर्माटाँड़ स्थित ‘नन्दन कानन’ में ही किया गया। ज्ञातव्य हो कि उस समय तक, बिहार बंगाली (अविभाजित बिहार की) समिति ने ‘नन्दन कानन’ को खरीद लिया था। धरोहर को बचाने का यही एकमात्र तरीका था एवं बिहार सरकार ने इस पुनीत कार्य में पूरी तरह सहयोग किया था। बल्कि, बिहार बंगाली समिति द्वारा लगातार किये गये आवेदनों को स्वीकारते हुये केन्द्रीय सरकार ने रेलवे स्टेशन का नाम भी ‘कर्माटाँड़’ से बदल कर ‘विद्यासागर’ कर दिया था।     




॥ 8 ॥ शिक्षा : महाविद्यालय की स्थापना


पाठक अगर इन्टरनेट का इस्तेमाल करने वाले हों तो गुगल सर्च में अंग्रेजी में लिखें ‘मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन’। शुरु में ही दिखेगा विकिपिडिया पृष्ठ, ‘विद्यासागर कॉलेज’। ऐसा क्यों? पाठक पृष्ठ को खोलेंगे तो निम्नलिखित बातें लिखी मिलेंगी:
“विद्यासागर कॉलेज, उत्तर कोलकाता में, पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के नाम पर, कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध एक सरकार-प्रायोजित कॉलेज है। यह भारत का पहला निजी कॉलेज था जो भारतीयों के द्वारा चलाया जाता था, जहाँ भारतीय पढ़ाते थे एवं जिसका वित्त-पोषण भारतीयों के द्वारा होता था। पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने वर्ष 1872 में इस कॉलेज को स्थापित किया था। पहले यह ‘मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन’ के नाम से जाना जाता था।”
विकिपिडिया के उल्लिखित पृष्ठ पर यह भी लिखा मिलेगा कि आगे चलकर स्वामी विवेकानन्द, आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय, आचार्य यदुनाथ सरकार, राम मनोहर लोहिया, बाबु जगजीवन राम एवं अन्य कई महत्वपूर्ण व्यक्ति इस संस्थान में छात्र बने।
विद्यासागर के जीवनीकार सुबल चन्द्र मित्र ‘मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन’ के जन्म की कहानी बताने के क्रम में तत्कालीन मुद्रित एक पर्चे को उद्धृत करते हैं। पर्चे का शीर्षक था, ‘मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन से सन्बन्धित तथ्यों पर वक्तव्य’। पर्चा कहता है:
“1॰ सन 1859 में, कलकत्ता के उत्तरी भाग मे स्थित शंकर घोष लेन में कलकत्ता ट्रेनिंग स्कूल के नाम से एक विद्यालय स्थापित किया गया था। स्थापित करने वाले थे बाबु ठाकुरदास चक्रवर्ती, बाबु माधवचन्द्र धाड़ा, बाबु पतितपावन सेन, बाबु गंगाचरण सेन, बाबु यादवचन्द्र पालित एवं बाबु वैष्णवदास आढ्य या वैष्णवचरण आढ्य; सभी दिवंगत हो चुके हैं।”
पर्चा आगे यह बताता है कि संस्थापकों ने खुद विद्यालय की स्थापना का सारा खर्च उठाया था ल्रेकिन अन्य कई गण्यमान्य [भारतीय] व्यक्तियों ने कई तरीके से आगे मदद किया। यह भी कि विद्यालय का उद्देश्य था ‘बिना लाभ कमाये मध्यवर्गीय हिन्दु युवाओं के लिये कम खर्च में अंग्रेजी शिक्षा’ जो कि मिशनरी विद्यालयों के ईसाई धर्म प्रचार से खतरे से मुक्त हो।
धारा 4 में पर्चा कहता है:
“4॰ विद्यालय का प्रबन्धन पहले संस्थापक खुद सम्हालते थे लेकिन स्थापना के कुछ महीनों के उपरान्त उन्होने देखा कि पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जो सरकारी संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य एवं सरकारी बालिका विद्यालयों के अधीक्षक के तौर पर विद्यालय प्रबन्धन में सबसे अधिक अनुभवी थे, अब सरकारी सेवा से इस्तीफा देने के बाद काफी फुरसत में हैं। तो संस्थापकों ने उन्हे एवं बाबु राजकृष्ण बनर्जी को अनुरोध किया कि वे उन्हे मदद करें। उनकी रजामन्दी प्राप्त करने के बाद, संस्थापकों, उपरोक्त दो भद्रमहाशयों एवं कुछ और सदस्यों को लेकर एक प्रबन्ध-समिति बनाई गई। उक्त समिति ने विद्यालय का मार्च 1861 तक प्रबन्ध किया।”
यहीं से इस संस्था के साथ विद्यासागर के रिश्ते की शुरुआत हुई। अगले 11 वर्षों का इतिहास का पूरा बयान जरूरी नहीं। जैसा अक्सर होता है, संस्थापकों में विद्यालय के सचालन के विभिन्न मुद्दों को लेकर विवाद हुये, कुछ छोड़ कर चले गये, कुछ नये लोग जुड़े, फिर कुछ गुजर गये… सन 1972 आते आते विद्यासागर अकेले इस संस्था के साथ खड़े थे। तब तक विद्यालय का नाम ‘कलकत्ता ट्रेनिंग स्कूल’ से, कुछ अन्य नामों से गुजरते हुये ‘मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन’ हो चुका था। विद्यालय का प्रबन्ध, इसका मालिकाना सब कुछ विद्यासागर के कंधों पर डाल दिया गया, जबकि बैंक में विद्यालय का खाता पैसों के अभाव में बन्द हो चुका था।
लेकिन ईश्वरचन्द्र अपने स्वभाव से मजबूर थे। अगर किसी काम में हाथ डाल दिया तो बस डाल दिया। पीछे हटने का कोई सवाल पैदा ही नहीं होता था उनके सामने। उन्होने अपने पैसे भी लगाये लेकिन आगे उसकी जरूरत नहीं पड़ी। छात्रों की संख्या बढ़ने लगी और विद्यालय स्वावलम्बी हो गया। विद्यासागर अब तक, विद्यालय की बदलती हुई विभिन्न प्रबन्ध समितियों में सचिव के तौर पर काम करते हुये विद्यालय में कई सुधार ला चुके थे। अब उन्होने इसे महाविद्यालय बनाने को ठान लिया। 25 जनवरी 1872 को उन्होने अपने अलावे द्वारका नाथ मित्र एवं क्रिष्टोदास पाल को लेकर एक प्रबन्ध समिति का गठन किया एवं कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलसचिव के पास सम्बद्धता के लिये आवेदन किया।  उन्होने विद्यालय की ओर से कलकत्ता विश्वविद्यालय को पत्र लिखा कि इस विद्यालय से परिक्षार्थियों को स्नातक (कला) प्रथम की परीक्षा देने की अनुमति दी जाय्। उन्हे मालूम था कि विश्वविद्यालय का सिन्डिकेट, जो अंग्रेजों से भरा था, भारतीयों द्वारा चलाये जा रहे संस्था की गुणवत्ता पर कभी भरोसा नहीं करेगी एवं सम्बद्धता नहीं मिलेगी। इसलिये विद्यासागर ने औपचारिक पत्र के अलावा सिन्डिकेट के प्रभावशाली सदस्य ई॰ सी॰ बेली को अलग से पत्र लिख कर उन्हे प्रभावित करने का प्रयास किया।
अन्तत: सम्बद्धता मिल गई और उसके बाद के पहले ही वर्ष में (1874) मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन परीक्षाफल के हिसाब से सभी सम्बद्ध महाविद्यालयों में दूसरे नम्बर पर आया। सब अचंभे में थे। भारतीयों द्वारा चलाया जा रहा भारत का पहला महाविद्यालय और पहले ही वर्ष में दूसरे नम्बर पर! जीवनीकार सुबल चन्द्र मित्र जिक्र करते हैं कि प्रेसिडेन्सी कॉलेज के प्राचार्य एवं कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलसचिव मिस्टर सटक्लिफ ने कहा, “पंडित ने तो गजब कर दिया!”  
फिर क्या था। महाविद्यालय तो चल निकला। सन 1881 से सन 1892 तक मेट्रोपोलिटन इन्स्टिट्युशन के 498 छात्र स्नातक एवं 33 छात्र स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण हो चुके थे। सन 1885 से स्नातक-सम्मान भी शुरू हो चुका था। सन 1885 से सन 1892 तक 86 छात्र स्नातक-सम्मान उत्तीर्ण हुये। सन 1882 में ही कानून की पढाई के लिये भी कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्धता मिल गई थी। अगले दस वर्षों में 513 छात्र कानून में स्नातक हुये। बल्कि सन 1883, 1885 एवं 1886 में इसी महाविद्यालय के छात्रों ने प्रथम स्थान प्राप्त किया एवं उन्हे छात्रवृत्ति मिली।